भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२४४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. २४ ]

इति छन्दोनिर्देशात् । अथापि कथंचित्पूर्वस्मिन्वाक्ये ब्रह्म निर्दिष्टं स्यात् , एवमपि न तस्येह प्रत्यभिज्ञानमस्ति । तत्र हि 'त्रिपादस्यामृतं दिवि' ( छा. ३।१२।१,६ ) इति द्यौरधिकरणत्वेन श्रूयते, अत्र पुनः 'परो दिवो ज्योतिः' इति द्यौर्मर्यादात्वेन । तस्मात्प्राकृतं ज्योतिरिह ग्राह्यमित्येवं प्राप्ते ब्रूमः—

भामती

वाक्यं शक्यम् । तस्मात्तेज एव ज्योतिर्न ब्रह्मेति प्राप्तम् । तेजःकथनप्रस्तावे तमःकथनं प्रतिपक्षोपन्यासेन प्रतिपक्षान्तरे दृढा प्रतीतिर्भवतीत्येतदर्थम् । चक्षुर्वृत्तेर्निरोधकमित्यर्थावरकत्वेन ।

आक्षेप्ताऽऽह ॐ ननु कार्यस्यापि इति ॐ । समाधातैकदेशी ब्रूते ॐ अस्तु तर्हि इति ॐ । यत्तेजोबन्नाभ्यामसंयुक्तं तदत्रिवृत्कृतमुच्यते । आक्षेप्ता दूषयति ॐ न इति ॐ । न हि तत् क्वचिदप्युपयुज्यते सर्वासामर्थक्रियासु त्रिवृत्कृतस्यैवोपयोगादित्यर्थः ।

एकदेशिनः शङ्कामाह ॐ इदमेव इति ॐ । आक्षेप्ता निराकरोति ॐ न, प्रयोजनान्तर इति ॐ ।


भामती-व्याख्या

दिवि" (छां. ३।१२।१) इस वाक्य में अधिकरणत्वेन श्रुत द्युलोक की प्रत्यभिज्ञा "परो दिवः" ( छां. ३।१३।७ ) इस वाक्य में नहीं हो सकती, क्योंकि इस वाक्य में द्यु को मर्यादा के रूप में उपस्थित किया गया है, अधिकरण के रूप में नहीं। दूसरी बात यह भी है कि "पादोऽस्य सर्वाभूतानि" ( छां. ३।१२।६ ) इस वाक्य में ब्रह्मपरता अभी तक सिद्ध नहीं हुई, तब इसके अनुरोध पर "अतः परो दिवो ज्योतिः" ( छां. ३।१३।१ ) इस वाक्य में 'ज्योति' शब्द को ब्रह्मार्थक क्योंकर माना जा सकता है ? अतः इस वाक्य में ज्योति पद से भौतिक तेज का ही ग्रहण किया जाता है, ब्रह्म का नहीं ।

भाष्यकार ने जो तेजोराशि की चर्चा के अवसर पर तम ( अन्धकार ) का उपन्यास किया है— "तमो ज्योतिरिति हीमौ शब्दौ परस्परप्रतिद्वन्द्विविषयौ प्रसिद्धौ ।” उसका उद्देश्य ज्योति-पदार्थ के स्वरूप को निखारना है, क्योंकि प्रतिपक्ष ( विरोधी ) पदार्थ के निरूपण से उसके विरोधी पदार्थ के स्वरूप की सुदृढ़ प्रतीति होती है, अतः तम के निरूपण से तेज का वैशद्य किया गया है । तम के लिए जो कहा गया है— 'चक्षुर्वृत्तेर्निरोधकम्', उसका तात्पर्य यह नहीं कि तम चाक्षुष वृत्ति का निर्गमन नहीं होने देता, क्योंकि रात्रि के घोर अन्धकार में भी दूरस्थ तारक मण्डल तक नेत्र-वृत्ति जाती है, अतः उक्त भाष्य-वाक्य का आशय यह है कि विषय वस्तु के स्वरूप को आच्छन्न कर अन्धकार चाक्षुष वृत्ति का विषय नहीं होने देता ।

आक्षेपवादी कहता है— "ननु कार्यस्यापि ज्योतिषः सर्वत्र गम्यमानत्वाद् द्युमर्यादावत्त्वमसमञ्जसम् ।” अर्थात् सौर्यादि तेज भी द्युलोक के नीचे सर्वत्र फैला दिखाई देता है, तब उसके लिए 'द्युलोक के ऊपर ही है'— ऐसा कहना क्योंकर सम्भव होगा ?

समाधान करनेवाला एकदेशी कहता है— "अस्तु तर्हि अत्रिवृत्कृतं तेजः प्रथमजम्” । जो तेज जल और पृथिवी से असम्पृक्त ( असम्बद्ध ) है. उसे अत्रिवृत्कृत तेज कहा जाता है । पञ्चीकृत तेज के समान त्रिवृत्कृत तेज सर्वत्र प्रसृत होता है, अत्रिवृत्कृत तेज नहीं, वही द्युलोक के अधो भाग में नहीं, अतः उसी का उपास्यत्वेन यहाँ निर्देश किया गया है ।

आक्षेपवादी उक्त कथन का निरास करता है— "न, अत्रिवृत्कृतस्य तेजसः प्रयोजनाभावात् ॥" अर्थात् त्रिवृत्कृत तेज ही प्रकाशनादि रूप अर्थक्रियाकारी या प्रयोजनवान् होता है, अत्रिवृत्कृत तेज अर्थक्रियाकारी न होने से सत् पदार्थ ही नहीं कहा जा सकता, उसकी उपासना भी सप्रयोजन नहीं कही जा सकती ।