भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

ज्योतिषो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २४५

ज्योतिरिह ब्रह्म ग्राह्यम्। कुतः ? चरणाभिधानात्। पादाभिधानादित्यर्थः ।

भामती

एकैकां त्रिवृतंत्रिवृतं करवाणीति तेजःप्रभृत्युपासनामात्रविषया श्रुतिनं सङ्कोचयितुं युक्तेत्यर्थः । एवमेकदेशिनि दूषिते परमसमाधाता पूर्वपक्षी ब्रूते । ꣸ अस्तु तर्हि त्रिवृत्कृतमेव इति ꣸ । ꣸ भागिनी युक्ता ꣸ । यद्यप्याधारबहुत्वश्रुतिर्ब्रह्मण्यपि कल्पितोपाधिनिबन्धना कथञ्चिदुपपद्यते । तथापि यथा कार्ये ज्योतिष्यतिशयेनोपपद्यते न तथाऽत्रेत्यत उक्तम् ꣸ उपपद्यतेतराम् इति ꣸ । ꣸ प्राकृतं ꣸ । प्रकृतेर्जातं, कार्यमिति यावत् । एवं प्राप्ते, उच्यते—

सर्वनाम प्रसिद्धार्थं प्रसाध्यार्थविघातकृत् ।
प्रसिद्धद्यपेक्षि सत्पूर्ववाक्यस्थमपकर्षति ॥

भामती-व्याख्या

एकदेशी अत्रिवृत्कृत तेज के लिए सप्रयोजनत्व की शङ्का करता है—“इदमेव प्रयोजनं यदुपास्यत्वमिति ।” उपासना भी एक प्रयोजन है, जिसको लेकर अत्रिवृत्कृत तेज को सप्रयोजन कहा जा सकता है ।

आक्षेपवादी उस प्रयोजनवत्ता का खण्डन करता है—“न प्रयोजनान्तरप्रयुक्तस्यैवादित्यादेरुपास्यत्वदर्शनात् ।” जिस पदार्थ की सृष्टि का कुछ प्रयोजन होता है, ऐसी आदित्यादि ज्योति ही उपास्य हो सकती है । अत्रिवृत्कृत तेज की न सृष्टि प्रयोजनवती है और न उपासना । “तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां’ सामान्यतः ‘तेज, जल और पृथिवी’—इन तीनों भूतों के त्रिवृत्करण की प्रतिपादिका है, इस श्रुति का केवल तेजरूप उपास्य मात्र के त्रिवृत्करण में तात्पर्य सीमित करना उचित नहीं ।

अत्रिवृत्कृत तेज का पक्ष दूषित हो जाने पर परम समाधाता ( पूर्वपक्षी ) अपना मन्तव्य प्रस्तुत करता है—“अस्तु तर्हि त्रिवृत्कृतमेव तेजः प्रथमजम्” । यद्यपि त्रिवृत्कृत तेज सर्वत्र व्याप्त है, केवल द्युलोक के ऊर्ध्व भाग में सीमित नहीं किया जा सकता, तथापि उपासना के लिए वैसा आरोप मात्र किया जा सकता है, किन्तु ब्रह्म सर्वथा निरवयव है, उसमें वैसी कल्पना भागिनी ( युक्ति-युक्त ) नहीं । “विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेषु”—इत्यादि वाक्यों के द्वारा जो आधार-बहुत्व का प्रतिपादन किया गया है, वह यद्यपि ब्रह्म में भी कल्पित उपाधियों के द्वारा कथञ्चित् उपपन्न हो सकता है, तथापि कार्यात्मक सावयव ज्योति में आधारबहुत्व का सामञ्जस्य सुसंगत और अत्यन्त सरल मार्ग से हो जाता है, भाष्यकार कहते हैं—“आधारबहुत्वश्रुतिः कार्ये ज्योतिषि उपपद्यतेतराम् ।”

यह कहा जा चुका है कि विवादास्पद ज्योति में उदरस्थ भौतिक ज्योति का सारूप्य भौतिकत्व-साधक है, उसी के कार्यभूत ऊष्मा और घोष का शरीर में भान होता है, इसकी ही उपासना का चक्षुष्य ( दर्शनीयता ) जैसा स्वल्प फल माना जा सकता है, “गायत्री वा इदं सर्वं भूतम्” ( छां० ३।१२।१ ) इस पूर्व के वाक्य में भी ब्रह्म का प्रकरण नहीं, केवल गायत्री छन्द का निर्देश है, अतः प्रकरण को देखते हुए भी ज्योति पद को ब्रह्मपरक नहीं माना जा सकता । पूर्व वाक्य में कथञ्चित् ब्रह्मपरत्व की कल्पना कर लेने पर भी उसकी इस ज्योति-वाक्य में प्रत्यभिज्ञा नहीं होती । फलतः प्रक्रान्त ‘ज्योति’ पद प्राकृत ( प्रकृतिजनित भौतिक ) ज्योति का ही अभिधायक सिद्ध होता है ।

सिद्धान्त—

सर्वनाम प्रसिद्धार्थं प्रसाध्यार्थविघातकृत् ।
प्रसिद्धद्यपेक्षि सत् पूर्ववाक्यस्थमपकर्षति ॥