भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. २४
पूर्वेस्मिन्हि वाक्ये चतुष्पाद्ब्रह्म निर्दिष्टम्—‘तावानस्य महिमा ततो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि’ ( छा० ३।१२।६ ) इत्यनेन मन्त्रेण । तत्र यच्चतुष्पदो ब्रह्मणस्त्रिपादमृतं द्युसंबन्धिरूपं निर्दिष्टं, तदेवेह द्युसंबन्धान्निर्दिष्टमिति
भामती
तद्बलात् तेन नेयानि तेजोलिङ्गान्यपि ध्रुवम् ।
ब्रह्मण्येव प्रधानं हि ब्रह्मच्छब्दो न तत्र तु ॥
औत्सर्गिकं तावद्यदः प्रसिद्धार्थानुवादकत्वं यद्विधिविभक्तिमप्यपूर्वार्थविबोधनस्वभावात्प्रच्यावयति । यथा यस्याहिताग्नेरग्निर्गृहान् दहेत् यस्योभयं हविरात्तिमार्च्छेदिति । यत्र पुनस्तत्प्रसिद्धमन्यतो न कथञ्चिदवाप्यते, तत्र वचनानि त्वपूर्वत्वादिति सर्वनाम्नः प्रसिद्धार्थत्वं वलादपनीयते । यथा यदाग्नेयोऽष्टाकपालो भवतीति । तदिह यवतः परो दिवो ज्योतिरिति यच्छब्दसामर्थ्याद् द्युमर्य्यादेनापि ज्योतिषा प्रसिद्धेन भवितव्यम् । न च तस्य प्रमाणान्तरतः प्रसिद्धिरस्ति । पूर्ववाक्ये च द्युसम्बन्धि त्रिपाद् ब्रह्मप्रसिद्धमिति प्रसिद्धयपेक्षायां तदेव सम्बध्यते । न च प्रधानस्य प्रातिपदिकार्थस्य तत्त्वेन प्रत्यभिज्ञाने तद्विशेषणस्य
भामती-व्याख्या
तद्बलात् तेन नेयानि तेजोलिङ्गान्यपि ध्रुवम् ।
ब्रह्मण्येव प्रधानं हि ब्रह्मच्छब्दो न तत्र तु ॥
“यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते” ( छा० ३।१३।७ ) इस वाक्य में ‘यत्’ पद सर्वनाम है, ‘सर्वनाम पद प्रसिद्धार्थक होते हैं’—यह एक औत्सर्गिक ( स्वाभाविक ) नियम है। अतः ‘यत्’ पद किसी प्रसिद्धार्थ का अनुवादक होता है, अत एव ‘यत्’ पद लिङादि विधि-विभक्ति से युक्त वाक्य की अज्ञातार्थ-बोधकत्वरूप विधिशक्ति ( विधायकता ) को नष्ट कर देता है, जैसे—“यस्याहिताग्नेरग्निर्गृहान् दहेत्”, “यस्योभयं हविरात्तिमार्च्छेत्” ( तै० ब्रा० ३।७ ।१७ ) इत्यादि वाक्यों में विधायकत्व नहीं माना जाता। [श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—
“येषामाख्यातशब्दानां यच्छब्दाद्युपबन्धनात् ।
विधिशक्तिः प्रणश्येत्तु ते सर्वत्राभिधायकाः ॥” (तं. वा. पृ. ४३३ )
‘यत्’ पद का योग होने के कारण उक्त वाक्यों में “दहेत्” और “आर्च्छेत्”—ये दोनों पद विधायक नहीं माने जाते । यहाँ आदि शब्द से आमन्त्रण विभक्ति, उत्तमपुरुष, यदि शब्दादि का ग्रहण किया जाता है, अतः “अहेर्बुध्निय मन्त्रं मे गोपाय” (तै. ब्रा. १।२।१।२६), “यदि सोममपहर्युः” इत्यादि वाक्य विधायक नहीं, ‘अनुवादक ही माने जाते हैं ] । यदादि पदों का योग रहने पर भी विधीयमान पदार्थ की अन्यतः प्राप्ति नहीं होती, उन वाक्यों में विधायकत्व माना जाता है—“वचनानि त्वपूर्वत्वात् तस्माद्यथोपदेशं स्युः” (जै. सू. ३।५।२१) । अर्थात् यद्यपि यदादि सर्वनाम पद प्रसिद्धार्थ के परामर्शी होते हैं, तथापि जहाँ विधित्सित कर्म की वाक्यान्तर के द्वारा प्राप्ति ( ज्ञप्ति ) नहीं होती है, वहाँ सर्वनाम पद प्रसिद्धार्थ-परामर्शी नहीं माना जाता और सर्वनाम-घटित वचन को विधायक माना जाता है, जैसे—“यदाग्नेयोऽष्टाकपालोऽमावास्यायां पौर्णमास्यां चाच्युतो भवति” ( तै. सं. २।६।३।३ ) इस वाक्य के द्वारा अमावस्या और पूर्णिमा—दोनों तिथियों में अष्टकपाल-संस्कृत पुरोडाशद्रव्यक कर्म का विधान किया जाता है एवं दूसरे वाक्य के द्वारा हवि का नाशरूप निमित्त प्रस्तुत किया जाता है कि जिस यजमान की सायं और प्रातः दोनों कालों की दूध-दधिरूप दोनों हवियों का नाश हो जाता है, वह अग्निदेव की शान्ति के लिए एक नैमित्तिक कर्म करे । प्रकृत में ‘यदतः’ इस वाक्य का घटकीभूत ‘यत्’ पद भी जिस द्युलोक के ऊर्ध्वलोकस्थ ज्योति का कथन करता है, वह भी कहीं प्रसिद्ध ( किसी