भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ज्योतिषो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २४७

प्रत्यभिज्ञायते । तत्परित्यज्य प्राकृतं ज्योतिः कल्पयतः प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रिये प्रसज्ये- याताम् । न केवलं ज्योतिर्वाक्य एव ब्रह्मानुवृत्तिः, परस्यामपि शाण्डिल्यविद्यायामनु- वर्तिष्यते ब्रह्म । तस्मादिह ज्योतिरिति ब्रह्म प्रतिपत्तव्यम् । यत्तूक्तम्- 'ज्योतिर्दीप्यत' इति चैतौ शब्दौ कार्ये ज्योतिषि प्रसिद्धाविति । नायं दोषः; प्रकरणाद्ब्रह्मावगमे सत्य-

भामती

विभक्त्यर्थस्यान्यतामात्रेणान्यता युक्ता । एवं च स्ववाक्यस्थानि तेजोलिङ्गान्यसमञ्जसानीति ब्रह्मण्येव गमयितव्यानि, गमितानि च भाष्यकृता । तत्र ज्योतिर्ब्रह्मविकार इति ज्योतिषा ब्रह्मोपलक्ष्यते । अथ वा प्रकाशमात्रवचनो ज्योतिःशब्दः, प्रकाशश्च ब्रह्मणि मुख्यः, इति ज्योतिर्ब्रह्मेति सिद्धम् । ॐ प्रकृतहाना- प्रकृतप्रक्रिये इतिॐ । प्रसिद्धद्यपेक्षायां पूर्ववाक्यगतं प्रकृतं सन्निहितमप्रसिद्धं तु कल्प्यं न प्रकृतम् । अत एवोक्तं ॐ कल्पयत इति ॐ । सन्दंशन्यायमाह ॐ न केवलम् इतिॐ । ॐ परस्यापि ब्रह्मणो नामाविप्रती-

भामती-व्याख्या

समीपस्थ वाक्य में चर्चित ) होना चाहिए । आगम को छोड़कर अन्य किसी भी प्रमाण के द्वारा उस ज्योति की प्रसिद्धि नहीं । “पादोऽस्य सर्वा भूतानि” ( छां. ३।१२।६ ) इस पूर्व वाक्य में द्युलोक-सम्बन्धी त्रिपाद ब्रह्म प्रसिद्ध है, अतः उसी का सम्बन्ध “यदतः परो दिवः' इस वाक्य की ज्योति से पर्यवसित हो जाता है । यह जो कहा गया कि पूर्व वाक्य में ‘द्यु’ शब्द सप्तम्यन्त और इस वाक्य में ‘दिवः' यह पञ्चम्यन्त है, अतः दोनों में प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती । वह कहना उचित नहीं, क्योंकि “सत्त्वप्रधानानि नामानि – इस न्याय के अनुसार प्रकृत्यर्थ प्रधान और प्रत्ययार्थ गौण होता है । प्रत्ययार्थ की प्रधानता जो प्रसिद्ध है, वह कृत् और तद्धित प्रत्ययों को ही विषय करती है । द्युरूप प्रधानार्थ की एकता जब प्रत्यभिज्ञात है, तब प्रत्ययार्थरूप गौणार्थ का भेद उसकी एकता को भङ्ग नहीं कर सकता । इसी प्रकार इस वाक्य में ‘दीप्यते' – इत्यादि तेज के लिङ्गों का भी सामञ्जस्य ब्रह्मरूप ज्योति में हो जाता है । भाष्यकार ने ‘ज्योति' पद से उपलक्षित ब्रह्म में सामञ्जस्य स्थापित करते हुए कहा है— “दीप्यमानकार्यज्योतिरूपलक्ष्यते ब्रह्मण्यपि प्रयोगसम्भवात् ।” अथवा ‘ज्योतिः' शब्द यहाँ प्रकाशमात्र का वाचक है, प्रकाश है— ब्रह्म, अतः ‘ज्योति' पद की प्रधान ( अभिधा ) वृत्ति ही ब्रह्म से प्रसिद्ध हो जाती है । भाष्यकार ने जो कहा है— “प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रिये प्रसज्ये- याताम्” । वहाँ प्रसिद्धार्थपेक्षी ‘यत्' से घटित “यत्परो दिवः” ( छां. ३।१३।७ ) इस वाक्य के समीप में पठित ‘त्रिपादस्यामृतं दिवि” ( छां. ३।१२।६ ) इस वाक्य की प्रतिपाद्य ब्रह्म वस्तु का ‘प्रकृत' पद से ग्रहण किया गया है । उसकी अपेक्षा अप्रसिद्ध पदार्थ कल्पनीय होने के कारण अप्रकृत है, अत एव भाष्यकार ने कहा है— “कल्पयतः” । ‘ज्योतिः' पद से ब्रह्म का ग्रहण करने में सन्दंश-न्याय दिखाया गया है— “न केवलं ज्योतिर्वाक्य एव ब्रह्मानुवृत्तिः, परस्यामपि शाण्डिल्यविद्यायामनुवर्तिष्यते ब्रह्म” । आशय यह है कि “त्रिपादस्यामृतं दिवि” ( छां. ३।१२।६ ) इस पूर्व के एवं शाण्डिल्य ऋषि-द्वारा प्रतिपादित “सर्वं खल्विदं ब्रह्म, तज्जलानिति शान्त उपासीत” ( छां. ३।१४।१ ) इस पर वाक्य में जब ब्रह्म ही चर्चित है, तब ‘यदतः परो दिवो ज्योति' ( छां. ३।१३।७ ) इस मध्यपाती वाक्य में भी ‘ज्योतिः' पद से ब्रह्म का ही प्रतिपादन मानना होगा, क्योंकि सन्दंश ( सँड़सी ) में जकड़ी हुई वस्तु जैसे सँड़सी के दोनों दाँतों से बाहर नहीं जा सकती, सँड़सी को जहाँ भी ले जाया जाय, मध्यपाती वस्तु को वहाँ ही जाना पड़ता है । वैसे ही जब पूर्व और उत्तर वाक्यों में ब्रह्मपरता निश्चित है, तब मध्य वाक्य में भी ब्रह्मपरता माननी होगी ।