भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २४८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २४ |
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नयोः शब्दयोरविशेषकत्वात् । दीप्यमानकार्यज्योतिरुपलक्षिते ब्रह्मण्यपि प्रयोगसं- भवात् । 'येन सूर्यस्तपति तेजसेद्धः' ( तै० ब्रा० ३।१२।९।७) इति च मन्त्रवर्णात् । यद्वा, — नायं ज्योतिःशब्दश्चक्षुर्वृत्तेरेवानुग्राहके तेजसि वर्तते; अन्यत्रापि प्रयोगदर्शनात् । 'वाचैवायं ज्योतिषास्ते' ( बृ० ४।३।५ ), 'मनो ज्योतिर्जुषताम्' ( तै० ब्रा० १।६।३।३ ) इति च । तस्माद्यत्कस्यचिदवभासकं तत्तज्ज्योतिःशब्देनाभिधीयते । तथा सति ब्रह्मणोऽपि चैतन्यरूपस्य समस्तजगदवभासहेतुत्वादुपपन्नो ज्योतिःशब्दः । 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' ( कौ० २।५।१५ ) 'तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम्' ( बृ० ४।४।१६ ) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च ।
यदप्युक्तं — द्युमर्यादत्वं सर्वगतस्य ब्रह्मणो नोपपद्यत इति । अत्रोच्यते, — सर्वगत- स्यापि ब्रह्मण उपासनार्थः प्रदेशविशेषपरिग्रहो न विरुध्यते । ननूक्तं निष्प्रदेशस्य ब्रह्मणः प्रदेशविशेषकल्पना नोपपद्यत इति । नायं दोषः; निष्प्रदेशस्यापि ब्रह्मण उपाधिविशेष- संबन्धात्प्रदेशविशेषकल्पनोपपत्तेः । तथा हि — आदित्ये, चक्षुषि, हृदय, इति प्रदेश- विशेषसंबन्धीनि ब्रह्मण उपासनानि श्रूयन्ते । एतेन 'विश्वतःपृष्ठेषु' इत्याधारबहुत्वमुप- पादितम् । यदप्येतदुक्तं, — औष्ण्यघोषाभ्यामनुमिते कौक्षेये कार्ये ज्योतिष्यध्यस्यमान- त्वात्परमपि दिवः कार्यं ज्योतिरेव-इति, — तदप्ययुक्तम्; परस्यापि ब्रह्मणो नामादि- प्रतीकवत्कौक्षेयज्योतिःप्रतीकत्वोपपत्तेः । 'दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत' इति तु प्रतीक- द्वारकं दृष्टत्वं श्रुतत्वं च भविष्यति । यदप्युक्तमल्पफलश्रवणाच्च ब्रह्मेति, — तदनुपपन्नम् ।
— भामती —
कथवद् इति । कौक्षेयं हि ज्योतिर्जीवभावेनानुप्रविष्टस्य परमात्मनो विकारः, जीवाभावे देहस्य शैत्यात् , जीवतश्चौष्ण्याज्ज्ञायते । तस्मात्तत्प्रतीकस्योपादानमुपपन्नम् । शेषं निगदव्याख्यातं भाष्यम् ॥ २४ ॥
भामती-व्याख्या
यह जो पूर्वपक्ष की ओर से कहा गया था कि प्रकृत ज्योति को ब्रह्मात्मक नहीं कह सकते, क्योंकि यह उदरस्थ कार्यरूप ज्योति में अध्यस्त मानी गई है, ब्रह्म कहीं पर भी अध्यस्त नहीं हो सकता, अन्यथा उसमें मिथ्यात्व प्रसक्त होगा। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि जैसे अध्यास-स्थल पर 'इदं रजतम्' — ऐसा समानाधिकरणता का व्यवहार होता है, वैसा ही "नाम ब्रह्मेत्युपास्ते" ( छां. ७।१।५ ) इस प्रकार प्रतीकोपासना-विधायक वाक्यों में भी होता है । अन्य पदार्थ की भावना से अन्य पदार्थ की उपासना को प्रतीकोपासना कहा जाता है, जैसे विष्णु की भावना से पाषाण, ब्रह्म की भावना से नाम या ज्योति आदि की उपासना । फलतः कौक्षेय ज्योति को प्रतीक मान कर ब्रह्म की उपासना हो जाती है । नाम-रूपादि प्रपञ्च ब्रह्म का कार्य होने से ब्रह्म का जैसे प्रतीक होता है, वैसे ही उदरस्थ तेज भी शरीर में जीवभावेन प्रविष्ट ब्रह्म का ही कार्य है, अतः कौक्षेय ज्योति को ब्रह्म का प्रतीक मानने में कोई अनुपपत्ति नहीं । शरीर में जीव के न रहने पर शरीर शीतल पड़ जाता है और जीव के रहने पर उष्णता रहती है, इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा उदरस्थ तेज को जीव का विकार ( कार्य ) माना जाता है । शेष भाष्य अत्यन्त सुगम है । [ "दृष्टं च श्रुतं च" ( छां. ३।१३।८ ) इत्यादि श्रुतियों से प्रतिपादित दृष्टत्व और श्रुतत्व ब्रह्म में साक्षात् नहीं, अपितु कौक्षेय ज्योति के माध्यम से ही सम्भव होता है । यह जो कहा गया कि इस उपासना का 'चक्षुष्यत्व ( दर्शनीयत्व ) रूप फल अत्यन्त स्वल्प होने के कारण इस उपासना को ब्रह्मोपासना नहीं कह सकते । वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि ब्रह्म की उपासना का 'इतना ही फल है'— ऐसा इयत्ता का अवधारण कहीं नहीं किया गया । वस्तु-स्थिति यह है कि जहां