भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्योतिषो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २४९
नहि इयते फलाय ब्रह्माथ्रयणीयं, इयते नेति नियमहेतुरस्ति । यत्र हि निरस्तसर्वविशेष-संबंधं परं ब्रह्मात्मत्वेनोपदिश्यते, तत्रैकरूपमेव फलं मोक्ष इत्यवगम्यते, यत्र तु गुण-विशेषसंबन्धं प्रतीकविशेषसंबन्धं वा ब्रह्मोपदिश्यते, तत्र संसारगोचराण्येवोच्चावचानि फलानि दृश्यन्ते—'अन्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद' (बृ० ४।४।२४) इत्या-द्यासु श्रुतिषु । यद्यपि न स्ववाक्ये किंचिज्ज्योतिषो ब्रह्मत्वलिङ्गमस्ति, तथापि पूर्वं-स्मिन्वाक्ये दृश्यमानं ग्रहीतव्यं भवति । तदुक्तं सूत्रकारेण—'ज्योतिश्चरणाभिधानाद्' इति । कथं पुनर्वाक्यान्तरगतेन ब्रह्मसंनिधानेन ज्योतिःश्रुतिः स्वविषयाच्छक्या प्रच्या-वयितुम् ? नैष दोषः; 'यदतः परो दिवो ज्योतिः' इति प्रथमतर्पठितेन यच्छब्देन सर्वनाम्ना द्युसंबन्धात्प्रत्यभिज्ञायमाने पूर्ववाक्यनिर्दिष्टे ब्रह्मणि स्वसामर्थ्येन परामृष्टे सत्यर्थाज्ज्योतिःशब्दस्यापि ब्रह्मविषयत्वोपपत्तेः । तस्मादिह ज्योतिरिति ब्रह्म प्रतिप-त्तव्यम् ॥ २४ ॥
छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात् तथा हि दर्शनम् ॥ २५ ॥
अथ यदुक्तं,—पूर्वस्मिन्नपि वाक्ये न ब्रह्माभिहितमस्ति, 'गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच' (छा० ३।१२।१) इति गायत्र्याख्यस्य छन्दसोऽभिहितत्वादिति—
भामती
पूर्ववाक्यस्य हि ब्रह्मार्थत्वे सिद्धे स्यादेतदेवं, न तु तद्ब्रह्मार्थमपि तु गायत्र्यर्थम् । 'गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च' इति गायत्रीं प्रकृत्यैवं श्रूयते 'त्रिपादस्यामृतं दिवि' इति ।
भामती-व्याख्या
पर समस्त विशेष सम्बन्ध-रहित ब्रह्म का जीवाभिन्नत्वेन उपदेश किया जाता है, वहाँ विविध फल न होकर मोक्षरूप एकविध ही फल माना जाता है, किन्तु जहाँ पर गुण-विशेष या प्रतीकादि विशेष पदार्थों के सम्बन्ध से ब्रह्म का उपदेश किया जाता है, वहाँ पर विविध सांसारिक फल ही अभिहित किए गए हैं, जैसे—"अन्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद" (बृह. उ. ४।४।२४) इत्यादि । यद्यपि “यदतः परो दिवो ज्योतिः" (छां. ३।१३।७) इस वाक्य में ज्योति पदार्थ की ब्रह्मात्मता का सूचक कोई लिङ्ग नहीं, तथापि पूर्व के "त्रिपाद-स्यामृतं दिवि" (छां. ३।१२।६) इस वाक्य में अवस्थित ब्रह्म के गमक लिङ्ग का ग्रहण सूत्रकार ने किया है—"ज्योतिश्चरणाभिधानात्” (ब्र. सू. १।१।२३) । चरणाभिधानात् का अर्थ है—त्रिपादभिधानात् । यहाँ यह प्रश्न उठता है कि वाक्यान्तर में गृहीत ब्रह्म-लिङ्ग के द्वारा वाक्यान्तरस्थ ज्योतिः' पद को अपनी मुख्यार्थ-बोधकता से वञ्चित क्योंकर किया जा सकता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि इस वाक्य में 'यत्'—इस प्रसिद्धार्थक सर्वनाम पद एवं द्यु पदार्थ की प्रत्यभिज्ञा के बल पर पूर्व वाक्यस्थ जो त्रिपाद ब्रह्म यहाँ परामृष्ट होता है, उसका सम्बन्ध सामर्थ्य या योग्यता को ध्यान में रख कर 'ज्योतिः' पद के साथ पर्यवसित हो जाता है । फलतः यहाँ 'ज्योतिः' पद के द्वारा ब्रह्म का ग्रहण करना चाहिए] ॥ २४ ॥
**पूर्वपक्ष—**पूर्व के ["त्रिपादस्यामृतं दिवि" (छां. ३।१२।६) इस] वाक्य में ब्रह्मपरता का निश्चय हो जाने पर ही "यदतः परो दिवो ज्योतिः' यहाँ ब्रह्म का परामर्श और 'ज्योति:' पद की ब्रह्मपरता का निश्चय हो सकता है, किन्तु पूर्व वाक्य ब्रह्मपरक न होकर त्रिपदा गायत्री छन्द का बोधक है, क्योंकि "गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किंच" (छां. ३।१२।१) इस प्रकार गायत्री छन्द का प्रकरण उठा कर “त्रिपादस्यामृतं दिवि" (छां. ३।१२।१) ऐसा कहा गया है ।
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