भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. २५
तत्परिहर्तव्यम् । कथं पुनश्छन्दोऽभिधानान्न ब्रह्माभिहितमिति शक्यते वक्तुं ? यावता 'तावानस्य महिमा' इत्येतस्यामृचि चतुष्पाद् ब्रह्म दर्शितम् । नैतदस्ति, 'गायत्री वा इदं सर्वम्' इति गायत्रीमुपक्रम्य तामेव भूतपृथिवीशरीरहृदयवाक्प्राणप्रभेदैर्व्याख्याय 'सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्यनूक्तं तावानस्य महिमा' इति तस्यामेव
भामती
नन्वाकाशस्तल्लिङ्गादित्यनेनैव गतार्थमेतत् । तथाहि । तावानस्य महिमेत्यस्यामृचि ब्रह्म चतुष्पा- दुक्तम् । सैव च तदेतदृचाभ्यनूक्तमित्यनेन सङ्गमिता ब्रह्मलिङ्गम् । एवं गायत्री वा इदं सर्वमित्यक्षरसन्नि- वेशमात्रस्य गायत्र्या न सर्वत्वमुपपद्यते, न च भूतपृथिवीशरीरहृदयवाक्प्राणात्मत्वं गायत्र्याः स्वरूपेण सम्भवति । न च ब्रह्मपुरुषसम्बन्धित्वमस्ति गायत्र्याः । तस्माद्गायत्रीद्वारा ब्रह्मण एवोपासना न गायत्र्या इति पूर्वेणैव गतार्थत्वादनारम्भणीयमेतत् । न च पूर्वन्यायस्मारणे सूत्रसन्दर्भ एतावान् युक्तः ।
अत्रोच्यते — अस्त्यधिकशङ्का । तथाहि — गायत्रीद्वारा ब्रह्मोपासनेति कोऽर्थः । गायत्रीविकारोपा- धिनो ब्रह्मण उपासनेति । न च तदुपाधिनस्तदवच्छिन्नस्य सर्वात्मत्वम् , उपाधेरवच्छेदात् । न हि घटावच्छिन्नं नभोऽनवच्छिन्नं भवति । तस्मादस्य सर्वात्मत्वादिकं स्तुत्यर्थं, तद्वरं गायत्र्या एवास्तु स्तुतिः कयाचित् प्रणाड्या 'वाग्वै गायत्री वाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायति च' इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
भामती-व्याख्या
शङ्का — इस प्रकार के पूर्व पक्ष का परिहार तो 'आकाशाधिकरण' से ही किया जा सकता है कि जैसे 'आकाश' पद से घटित वाक्य में ब्रह्म का लिङ्ग (असाधारण धर्म) देख कर यह निश्चय किया कि आकाश के माध्यम से ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए, वैसे ही “तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि” ( छां. ३।१२।६ ) इस ऋचा में ब्रह्म को चतुष्पाद् कहा गया है और इसी ऋचा के द्वारा 'गायत्री' पद की ब्रह्म में संगमनिका की गई है — “सैषा चतुष्पदा गायत्री, तदेतद् ऋचाभ्य- नूक्तम्” ( छां. ३।१२।५ )। अतः यही ऋचा ब्रह्म का लिङ्ग ( बोधक ) है। इसी प्रकार “गायत्री वेदं सर्वम्” ( छां. ३।१२।१ ) इस श्रुति के द्वारा अभिहित सर्वरूपता गायत्री छन्द में नहीं बन सकती, क्योंकि उसका कलेवर अक्षरों के सन्निवेशमात्र में सिमटा हुआ है, वह जगत् का रूप क्योंकर होगी ? ‘सा येयं पृथिवी”, “सा यदिदमस्मिन् पुरुषे शरीरमस्मिन् हीमे प्राणाः”, “इदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयम्” ( छां. ३।१२।२-४ ) इन श्रुति वाक्यों के द्वारा अभिहित पृथिवीप्राणादिरूपता भी कथित गायत्री छन्द में साक्षात् सम्भव नहीं हो सकती और न “पञ्च ब्रह्मपुरुषाः” ( छां. ३।१३।६ ) इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित पञ्चब्रह्मपुरुष-सम्बन्धित्व इस गायत्री में बन सकता है, परिशेषतः गायत्री के द्वारा ब्रह्म की ही उपासना सिद्ध होती है, जो कि विगत आकाशाधिकरण से गतार्थ हो जाती है, इसके लिए इस ज्योतिरधिकरण के आरम्भ की क्या आवश्यकता ? ‘पूर्वाधिकरण का स्मरण दिलाना ही इस अधिकरण का उद्देश्य है’ — ऐसा कहना भी संगत नहीं, क्योंकि इतने उद्देश्य के लिए इतने बड़े सूत्र-सन्दर्भ का निर्माण युक्ति-युक्त नहीं कहा जा सकता ।
समाधान — इस सूत्र में पूर्वपक्षी की इतनी ही आशङ्का नहीं, अपितु अधिक आशङ्का यह है कि ‘गायत्री द्वारा ब्रह्मोपासना’ का तात्पर्य यह है कि ‘गायत्री विकाररूप उपाधि के द्वारा ब्रह्म की उपासना किन्तु गायत्रीरूप उपाधि से अवच्छिन्न ब्रह्म सर्वात्मक या अनवच्छिन्न स्वरूप नहीं हो सकता, क्योंकि घटादि उपाधियों से अवच्छिन्न आकाश कभी व्यापक या अनवच्छिन्न नहीं होता, अतः यहाँ सर्वात्मत्व का कथन केवल स्तुत्यर्थक है । स्तुत्यर्थक सर्वत्व का समन्वय तो किसी-न-किसी प्रकार गायत्री छन्द में भी हो सकता है, जैसा कि श्रुति कहती