भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ज्योतिषो ब्रह्मत्वम् ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्२५१

व्याख्यातरूपायां गायत्र्यामुदाहृतो मन्त्रः कथम कस्माद् ब्रह्म चतुष्पादभिदध्यात्? योऽपि तत्र 'यद्वै तद्ब्रह्म' (छा० ३।१२।५, ६) इति ब्रह्मशब्दः, सोऽपि छन्दसः प्रकृतत्वाच्छन्दो-विषय एव 'य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद' (छा० ३।११।३) इत्यत्र हि वेदोपनिषदमिति व्याचक्षते, तस्माच्छन्दोभिधानान्न ब्रह्मणः प्रकृतत्वमिति चेत्,—नैष दोषः, 'तथा चेतोऽर्पणनिगदात्' तथा गायत्र्याख्यच्छन्दोद्वारेण तदनुगते ब्रह्मणि चेतसोऽर्पणं चित्त-समाधानमनेन ब्राह्मणवाक्येन निगद्यते—'गायत्री वा इदं सर्वम्' इति। न ह्यक्षरसंनि-वेशमात्राया गायत्र्याः सर्वात्मकत्वं संभवति। तस्माद्यद्गायत्र्याख्यविकारेऽनुगतं जग-

भामती

तथा च 'गायत्री वा इदं सर्वम्' इत्युपक्रमे गायत्र्या एव हृदयादिभिर्व्याख्या, व्याहृत्य च 'सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री' इत्युपसंहारो गायत्र्यामेव समञ्जसो भवति। ब्रह्मणि तु सर्वमेतदसमञ्जसमिति यद्वैतद् ब्रह्मेति च ब्रह्मशब्दश्छन्दोविषय एव, यथैतां ब्रह्मोपनिषदमित्यत्र वेदोपनिषदुच्यते। तस्माद्गायत्रीच्छन्दो-ऽभिधानान्न ब्रह्मविषयमेतदिति प्राप्तम्।

एवं प्राप्तेऽभिधीयते। ॐ न ॐ कुतः ? ॐ तथा चेतोऽर्पणनिगदात् ॐ। गायत्र्याख्यच्छन्दोद्वारेण गायत्रीरूपविकारानुगते ब्रह्मणि चेतोऽर्पणं चित्तसमाधानमनेन ब्राह्मणवाक्येन निगद्यते। एतदुक्तं भवति — न गायत्री ब्रह्मणोऽवच्छेदिका, उत्पलस्येव नीलत्वं, येन तदवच्छिन्नममन्यत्र न स्यादवच्छेदविरहात्। किन्तु यदेव तद् ब्रह्म सर्वात्मकं सर्वकारणं तत्स्वरूपेणाशक्योपदेशमिति तद्विकारगायत्रीद्वारेणोपदिश्यते। गायत्र्याः सर्वच्छन्दो व्याप्या च सवनत्रयव्याप्त्या च द्विजातिद्वितीयजन्मजननी तया च श्रुतेर्विकारेषु मध्ये

भामती-व्याख्या

है—"वाग् वै गायत्री, वाग् वै सर्वं भूतं गायति च त्रायते च" (छां. ३।१२।१)। "गायत्री वा इदं सर्वम्" (छां. ३।१२।१) ऐसा उपक्रम करके वाक्, प्राणादिरूपों में गायत्री की व्याख्या प्रस्तुत की गई, उसके अनन्तर उपसंहार किया गया—"सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री" (छां. ३।१२।५)। यह सब कुछ गायत्री छन्द में ही उपपन्न होता है, ब्रह्म में नहीं। "यद्वै तद् ब्रह्म" (छां. ३।१२।६) यहां पर 'ब्रह्म' शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसका अर्थ है—'वेद', जैसे कि "एतामेवं ब्रह्मोपनिषदम्" (छां. ३।११।३) यहाँ 'ब्रह्मोपनिषद्' का अर्थ वेदगुह्यम् (वेद-रहस्य या वेदोपनिषत्) किया गया है। फलतः गायत्री छन्द का यहाँ अभिधान होने के कारण ब्रह्मोपासना का विधान नहीं किया जा सकता।

सिद्धान्त -उक्त पूर्वपक्ष का निरास करने के लिए सूत्रकार ने कहा है—न, क्योंकि गायत्रीसंज्ञक छन्द के द्वारा तदनुगत ब्रह्म में चित्त के अर्पण (उपासन) का इस ब्राह्मण वाक्य में प्रतिपादन हुआ है। तात्पर्य यह है कि जैसे 'नीलमुत्पलम्'—यहाँ पर नीलत्व (नील वर्ण) उत्पल (कमल) का अवच्छेदक है, वैसे गायत्री ब्रह्म का अवच्छेदक (विशेषण) नहीं कि तदवच्छिन्न ब्रह्म में व्यापकता अनुपपन्न हो। जो सर्वात्मक (व्यापक) ब्रह्म है, उसका स्वरूपेण उपदेश या उपासन सम्भव नहीं, अतः गायत्रीरूप विकार के द्वारा वह ब्रह्म उपलक्षित होता है। सभी विकार-वर्ग में गायत्री मन्त्र प्रधान है, क्योंकि गायत्री छन्द सब छन्दों में व्याप्त है, सोमयाग के तीनों सवनों [प्रातः, माध्यन्दिन एवं सायं तीनों कालों में अनुष्ठीयमान तीनों अभिषवों] में प्रयुक्त एवं द्विज ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य पुरुषों के द्वितीय जन्म का साधक है [ताण्ड्य महा ब्राह्मण ८।४] में एक आख्यायिका आती है कि पहले सभी छन्द चार-चार अक्षरों के होते थे। जगती छन्द सोम लता लाने के लिए द्युलोक गया, अपने तीन अक्षर वहीं छोड़ कर लौट आया, त्रिष्टुभ् छन्द गया और वह भी अपना एक अक्षर वहीं छोड़ कर असफल लौटा, किन्तु गायत्री छन्द गया, वह वहाँ जगती एवं त्रिष्टुभू के