भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 270
२५२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. २५

त्कारणं ब्रह्म, तर्हि सर्वमित्युच्यते ? यथा 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छा० ३।१४।१) इति । कार्यं च कारणादव्यतिरिक्तमिति वक्ष्यामः—'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' ( ब्र० २।१।१४) इत्यत्र । तथान्यत्रापि विकारद्वारेण ब्रह्मण उपासनं दृश्यते—'एतं ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्त एतमग्नावध्वर्यव एतं महाव्रते छन्दोगाः' ( ऐ० आ० ३।२।३।१२ ) इति । तस्मादस्ति छन्दोऽभिधानेऽपि पूर्वस्मिन्वाक्ये चतुष्पाद् ब्रह्म निर्दिष्टम् । तदेव ज्योतिर्वाक्येऽपि परामृश्यत उपासनान्तरविधानाय ।

अपर आह—साक्षादेव गायत्रीशब्देन ब्रह्म प्रतिपाद्यते, संख्यासामान्यात् । यथा गायत्री चतुष्पदा षडक्षरैः पादैः, तथा ब्रह्म चतुष्पात् । तथान्यत्रापि छन्दोऽभि-

भामती

प्राधान्येन द्वारत्वोपपत्तेः । न चात्रोपलक्षणाभावेन नोपलक्ष्यं प्रतीयते, न हि कुण्डलेनोपलक्षितं कण्ठरूपं कुण्डलवियोगेऽपि पश्चात्प्रतीयमानमप्रतीयमानं भवति । तद्रूपप्रत्यायनमात्रोपयोगित्वादुपलक्षणानामनवच्छेदकत्वात् ।

तदेवं गायत्रीशब्दस्य मुख्यार्थत्वे गायत्र्या ब्रह्मोपलक्ष्यत इत्युक्तं, सम्प्रति तु गायत्रीशब्दः संख्यासामान्याद्गौण्या वृत्त्या ब्रह्मण्येव वर्तत इति दर्शयति ॐ अपर आह इति ॐ । तथाहि—षडक्षरैः पादैर्यथा गायत्री चतुष्पदा एवं ब्रह्मापि चतुष्पाद् । सर्वाणि हि भूतानि स्थावरजङ्गमान्यस्यैकः पादः । दिवि द्योतनवति चैतन्यरूपे स्वात्मनीति यावत् । त्रयः पादाः । अथवा दिव्याकाशे त्रयः पादाः । तथाहि श्रुतिः—'इदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशस्तत्तद्धि तस्य जागरितस्थानं जाग्रत् खल्वथं बाह्यान्

भामती-व्याख्या

द्वारा छोड़े गए चारों अक्षर और सोम लता लेकर आया। तब से गायत्री छन्द आठ अक्षरों का हो गया। याज्ञिकों ने सोम याग आरम्भ किया, उसके माध्यन्दिन सवन में त्रिष्टुभ् की प्रार्थना पर गायत्री ने उसे बुला लिया, तब से वह गायत्री के आठ अक्षरों को मिला कर ग्यारह अक्षरों का हो गया। तृतीय (सायं सवन में जगती की प्रार्थना पर गायत्री ने उसको भी आमन्त्रित कर दिया, तब से जगती छन्द गायत्री और त्रिष्टुभ् के ग्यारह अक्षरों को अपने एक अक्षर में मिला कर बारह अक्षरों वाला हो गया। इस प्रकार सभी छन्दों और तीनों सवनों की व्याप्ति गायत्री में अवगत होती है। गायत्री मन्त्र ही द्विजत्व का सम्पादक है—

मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धनम्।
तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते।। (मनु. २।१७०)

प्रथम जन्म माता की कुक्षि और द्वितीय जन्म गायत्री से होता है]। विशेषण के न होने पर विशिष्ट की अन्यत्र सत्ता (सर्वरूपता या व्यापकता) नहीं मानी जाती किन्तु उपलक्षण के न होने पर उपलक्ष्य पदार्थ की सत्ता अन्यत्र नहीं मानी जाती—यह बात नहीं, क्योंकि कुण्डल के न रहने पर भी कुण्डलोपलक्षित कण्ठ (ग्रीवा) प्रतीयमान होता है, क्योंकि उपलक्षण पदार्थ अपने उपलक्ष्य पदार्थ के पूर्ण स्वरूप का परिचायकमात्र होता है, उसका अवच्छेदक नहीं होता। इस प्रकार 'गायत्री' शब्द मुख्यार्थ होकर ब्रह्म का उपलक्षक है—यह सिद्ध किया गया है।

अब 'गायत्री' शब्द संख्या-सामान्यरूप गुण को लेकर गौणी वृत्ति के द्वारा ब्रह्म का बोधक है—यह मत दिखाने के लिए भाष्यकार कहते हैं—"अपर आह साक्षादेव गायत्रीशब्देन ब्रह्म प्रतिपाद्यते"। जैसे गायत्री के छः-छः अक्षरवाले चार पाद होते हैं, वैसे ही ब्रह्म के भी चार पाद हैं—सभी स्थावर-जङ्गम जगत् मिल कर ब्रह्म का एक पाद (चतुर्थ अंश) है। शेष तीन पाद द्युलोक (प्रकाशात्मक स्व-स्वरूप) में अवस्थित हैं। अथवा यहाँ 'दिवि' का