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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

२५० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. २५

तत्परिहर्तव्यम् । कथं पुनश्छन्दोऽभिधानान्न ब्रह्माभिहितमिति शक्यते वक्तुं ? यावता 'तावानस्य महिमा' इत्येतस्यामृचि चतुष्पाद् ब्रह्म दर्शितम् । नैतदस्ति, 'गायत्री वा इदं सर्वम्' इति गायत्रीमुपक्रम्य तामेव भूतपृथिवीशरीरहृदयवाक्प्राणप्रभेदैर्व्याख्याय 'सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचाभ्यनूक्तं तावानस्य महिमा' इति तस्यामेव

भामती

नन्वाकाशस्तल्लिङ्गादित्यनेनैव गतार्थमेतत् । तथाहि । तावानस्य महिमेत्यस्यामृचि ब्रह्म चतुष्पा- दुक्तम् । सैव च तदेतदृचाभ्यनूक्तमित्यनेन सङ्गमिता ब्रह्मलिङ्गम् । एवं गायत्री वा इदं सर्वमित्यक्षरसन्नि- वेशमात्रस्य गायत्र्या न सर्वत्वमुपपद्यते, न च भूतपृथिवीशरीरहृदयवाक्प्राणात्मत्वं गायत्र्याः स्वरूपेण सम्भवति । न च ब्रह्मपुरुषसम्बन्धित्वमस्ति गायत्र्याः । तस्माद्गायत्रीद्वारा ब्रह्मण एवोपासना न गायत्र्या इति पूर्वेणैव गतार्थत्वादनारम्भणीयमेतत् । न च पूर्वन्यायस्मारणे सूत्रसन्दर्भ एतावान् युक्तः ।

अत्रोच्यते — अस्त्यधिकशङ्का । तथाहि — गायत्रीद्वारा ब्रह्मोपासनेति कोऽर्थः । गायत्रीविकारोपा- धिनो ब्रह्मण उपासनेति । न च तदुपाधिनस्तदवच्छिन्नस्य सर्वात्मत्वम् , उपाधेरवच्छेदात् । न हि घटावच्छिन्नं नभोऽनवच्छिन्नं भवति । तस्मादस्य सर्वात्मत्वादिकं स्तुत्यर्थं, तद्वरं गायत्र्या एवास्तु स्तुतिः कयाचित् प्रणाड्या 'वाग्वै गायत्री वाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायति च' इत्यादिश्रुतिभ्यः ।

भामती-व्याख्या

शङ्का — इस प्रकार के पूर्व पक्ष का परिहार तो 'आकाशाधिकरण' से ही किया जा सकता है कि जैसे 'आकाश' पद से घटित वाक्य में ब्रह्म का लिङ्ग (असाधारण धर्म) देख कर यह निश्चय किया कि आकाश के माध्यम से ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए, वैसे ही “तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि” ( छां. ३।१२।६ ) इस ऋचा में ब्रह्म को चतुष्पाद् कहा गया है और इसी ऋचा के द्वारा 'गायत्री' पद की ब्रह्म में संगमनिका की गई है — “सैषा चतुष्पदा गायत्री, तदेतद् ऋचाभ्य- नूक्तम्” ( छां. ३।१२।५ )। अतः यही ऋचा ब्रह्म का लिङ्ग ( बोधक ) है। इसी प्रकार “गायत्री वेदं सर्वम्” ( छां. ३।१२।१ ) इस श्रुति के द्वारा अभिहित सर्वरूपता गायत्री छन्द में नहीं बन सकती, क्योंकि उसका कलेवर अक्षरों के सन्निवेशमात्र में सिमटा हुआ है, वह जगत् का रूप क्योंकर होगी ? ‘सा येयं पृथिवी”, “सा यदिदमस्मिन् पुरुषे शरीरमस्मिन् हीमे प्राणाः”, “इदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयम्” ( छां. ३।१२।२-४ ) इन श्रुति वाक्यों के द्वारा अभिहित पृथिवीप्राणादिरूपता भी कथित गायत्री छन्द में साक्षात् सम्भव नहीं हो सकती और न “पञ्च ब्रह्मपुरुषाः” ( छां. ३।१३।६ ) इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित पञ्चब्रह्मपुरुष-सम्बन्धित्व इस गायत्री में बन सकता है, परिशेषतः गायत्री के द्वारा ब्रह्म की ही उपासना सिद्ध होती है, जो कि विगत आकाशाधिकरण से गतार्थ हो जाती है, इसके लिए इस ज्योतिरधिकरण के आरम्भ की क्या आवश्यकता ? ‘पूर्वाधिकरण का स्मरण दिलाना ही इस अधिकरण का उद्देश्य है’ — ऐसा कहना भी संगत नहीं, क्योंकि इतने उद्देश्य के लिए इतने बड़े सूत्र-सन्दर्भ का निर्माण युक्ति-युक्त नहीं कहा जा सकता ।

समाधान — इस सूत्र में पूर्वपक्षी की इतनी ही आशङ्का नहीं, अपितु अधिक आशङ्का यह है कि ‘गायत्री द्वारा ब्रह्मोपासना’ का तात्पर्य यह है कि ‘गायत्री विकाररूप उपाधि के द्वारा ब्रह्म की उपासना किन्तु गायत्रीरूप उपाधि से अवच्छिन्न ब्रह्म सर्वात्मक या अनवच्छिन्न स्वरूप नहीं हो सकता, क्योंकि घटादि उपाधियों से अवच्छिन्न आकाश कभी व्यापक या अनवच्छिन्न नहीं होता, अतः यहाँ सर्वात्मत्व का कथन केवल स्तुत्यर्थक है । स्तुत्यर्थक सर्वत्व का समन्वय तो किसी-न-किसी प्रकार गायत्री छन्द में भी हो सकता है, जैसा कि श्रुति कहती

ज्योतिषो ब्रह्मत्वम् ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्२५१

व्याख्यातरूपायां गायत्र्यामुदाहृतो मन्त्रः कथम कस्माद् ब्रह्म चतुष्पादभिदध्यात्? योऽपि तत्र 'यद्वै तद्ब्रह्म' (छा० ३।१२।५, ६) इति ब्रह्मशब्दः, सोऽपि छन्दसः प्रकृतत्वाच्छन्दो-विषय एव 'य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद' (छा० ३।११।३) इत्यत्र हि वेदोपनिषदमिति व्याचक्षते, तस्माच्छन्दोभिधानान्न ब्रह्मणः प्रकृतत्वमिति चेत्,—नैष दोषः, 'तथा चेतोऽर्पणनिगदात्' तथा गायत्र्याख्यच्छन्दोद्वारेण तदनुगते ब्रह्मणि चेतसोऽर्पणं चित्त-समाधानमनेन ब्राह्मणवाक्येन निगद्यते—'गायत्री वा इदं सर्वम्' इति। न ह्यक्षरसंनि-वेशमात्राया गायत्र्याः सर्वात्मकत्वं संभवति। तस्माद्यद्गायत्र्याख्यविकारेऽनुगतं जग-

भामती

तथा च 'गायत्री वा इदं सर्वम्' इत्युपक्रमे गायत्र्या एव हृदयादिभिर्व्याख्या, व्याहृत्य च 'सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री' इत्युपसंहारो गायत्र्यामेव समञ्जसो भवति। ब्रह्मणि तु सर्वमेतदसमञ्जसमिति यद्वैतद् ब्रह्मेति च ब्रह्मशब्दश्छन्दोविषय एव, यथैतां ब्रह्मोपनिषदमित्यत्र वेदोपनिषदुच्यते। तस्माद्गायत्रीच्छन्दो-ऽभिधानान्न ब्रह्मविषयमेतदिति प्राप्तम्।

एवं प्राप्तेऽभिधीयते। ॐ न ॐ कुतः ? ॐ तथा चेतोऽर्पणनिगदात् ॐ। गायत्र्याख्यच्छन्दोद्वारेण गायत्रीरूपविकारानुगते ब्रह्मणि चेतोऽर्पणं चित्तसमाधानमनेन ब्राह्मणवाक्येन निगद्यते। एतदुक्तं भवति — न गायत्री ब्रह्मणोऽवच्छेदिका, उत्पलस्येव नीलत्वं, येन तदवच्छिन्नममन्यत्र न स्यादवच्छेदविरहात्। किन्तु यदेव तद् ब्रह्म सर्वात्मकं सर्वकारणं तत्स्वरूपेणाशक्योपदेशमिति तद्विकारगायत्रीद्वारेणोपदिश्यते। गायत्र्याः सर्वच्छन्दो व्याप्या च सवनत्रयव्याप्त्या च द्विजातिद्वितीयजन्मजननी तया च श्रुतेर्विकारेषु मध्ये

भामती-व्याख्या

है—"वाग् वै गायत्री, वाग् वै सर्वं भूतं गायति च त्रायते च" (छां. ३।१२।१)। "गायत्री वा इदं सर्वम्" (छां. ३।१२।१) ऐसा उपक्रम करके वाक्, प्राणादिरूपों में गायत्री की व्याख्या प्रस्तुत की गई, उसके अनन्तर उपसंहार किया गया—"सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री" (छां. ३।१२।५)। यह सब कुछ गायत्री छन्द में ही उपपन्न होता है, ब्रह्म में नहीं। "यद्वै तद् ब्रह्म" (छां. ३।१२।६) यहां पर 'ब्रह्म' शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसका अर्थ है—'वेद', जैसे कि "एतामेवं ब्रह्मोपनिषदम्" (छां. ३।११।३) यहाँ 'ब्रह्मोपनिषद्' का अर्थ वेदगुह्यम् (वेद-रहस्य या वेदोपनिषत्) किया गया है। फलतः गायत्री छन्द का यहाँ अभिधान होने के कारण ब्रह्मोपासना का विधान नहीं किया जा सकता।

सिद्धान्त -उक्त पूर्वपक्ष का निरास करने के लिए सूत्रकार ने कहा है—न, क्योंकि गायत्रीसंज्ञक छन्द के द्वारा तदनुगत ब्रह्म में चित्त के अर्पण (उपासन) का इस ब्राह्मण वाक्य में प्रतिपादन हुआ है। तात्पर्य यह है कि जैसे 'नीलमुत्पलम्'—यहाँ पर नीलत्व (नील वर्ण) उत्पल (कमल) का अवच्छेदक है, वैसे गायत्री ब्रह्म का अवच्छेदक (विशेषण) नहीं कि तदवच्छिन्न ब्रह्म में व्यापकता अनुपपन्न हो। जो सर्वात्मक (व्यापक) ब्रह्म है, उसका स्वरूपेण उपदेश या उपासन सम्भव नहीं, अतः गायत्रीरूप विकार के द्वारा वह ब्रह्म उपलक्षित होता है। सभी विकार-वर्ग में गायत्री मन्त्र प्रधान है, क्योंकि गायत्री छन्द सब छन्दों में व्याप्त है, सोमयाग के तीनों सवनों [प्रातः, माध्यन्दिन एवं सायं तीनों कालों में अनुष्ठीयमान तीनों अभिषवों] में प्रयुक्त एवं द्विज ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य पुरुषों के द्वितीय जन्म का साधक है [ताण्ड्य महा ब्राह्मण ८।४] में एक आख्यायिका आती है कि पहले सभी छन्द चार-चार अक्षरों के होते थे। जगती छन्द सोम लता लाने के लिए द्युलोक गया, अपने तीन अक्षर वहीं छोड़ कर लौट आया, त्रिष्टुभ् छन्द गया और वह भी अपना एक अक्षर वहीं छोड़ कर असफल लौटा, किन्तु गायत्री छन्द गया, वह वहाँ जगती एवं त्रिष्टुभू के

२५२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. २५

त्कारणं ब्रह्म, तर्हि सर्वमित्युच्यते ? यथा 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छा० ३।१४।१) इति । कार्यं च कारणादव्यतिरिक्तमिति वक्ष्यामः—'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' ( ब्र० २।१।१४) इत्यत्र । तथान्यत्रापि विकारद्वारेण ब्रह्मण उपासनं दृश्यते—'एतं ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्त एतमग्नावध्वर्यव एतं महाव्रते छन्दोगाः' ( ऐ० आ० ३।२।३।१२ ) इति । तस्मादस्ति छन्दोऽभिधानेऽपि पूर्वस्मिन्वाक्ये चतुष्पाद् ब्रह्म निर्दिष्टम् । तदेव ज्योतिर्वाक्येऽपि परामृश्यत उपासनान्तरविधानाय ।

अपर आह—साक्षादेव गायत्रीशब्देन ब्रह्म प्रतिपाद्यते, संख्यासामान्यात् । यथा गायत्री चतुष्पदा षडक्षरैः पादैः, तथा ब्रह्म चतुष्पात् । तथान्यत्रापि छन्दोऽभि-

भामती

प्राधान्येन द्वारत्वोपपत्तेः । न चात्रोपलक्षणाभावेन नोपलक्ष्यं प्रतीयते, न हि कुण्डलेनोपलक्षितं कण्ठरूपं कुण्डलवियोगेऽपि पश्चात्प्रतीयमानमप्रतीयमानं भवति । तद्रूपप्रत्यायनमात्रोपयोगित्वादुपलक्षणानामनवच्छेदकत्वात् ।

तदेवं गायत्रीशब्दस्य मुख्यार्थत्वे गायत्र्या ब्रह्मोपलक्ष्यत इत्युक्तं, सम्प्रति तु गायत्रीशब्दः संख्यासामान्याद्गौण्या वृत्त्या ब्रह्मण्येव वर्तत इति दर्शयति ॐ अपर आह इति ॐ । तथाहि—षडक्षरैः पादैर्यथा गायत्री चतुष्पदा एवं ब्रह्मापि चतुष्पाद् । सर्वाणि हि भूतानि स्थावरजङ्गमान्यस्यैकः पादः । दिवि द्योतनवति चैतन्यरूपे स्वात्मनीति यावत् । त्रयः पादाः । अथवा दिव्याकाशे त्रयः पादाः । तथाहि श्रुतिः—'इदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशस्तत्तद्धि तस्य जागरितस्थानं जाग्रत् खल्वथं बाह्यान्

भामती-व्याख्या

द्वारा छोड़े गए चारों अक्षर और सोम लता लेकर आया। तब से गायत्री छन्द आठ अक्षरों का हो गया। याज्ञिकों ने सोम याग आरम्भ किया, उसके माध्यन्दिन सवन में त्रिष्टुभ् की प्रार्थना पर गायत्री ने उसे बुला लिया, तब से वह गायत्री के आठ अक्षरों को मिला कर ग्यारह अक्षरों का हो गया। तृतीय (सायं सवन में जगती की प्रार्थना पर गायत्री ने उसको भी आमन्त्रित कर दिया, तब से जगती छन्द गायत्री और त्रिष्टुभ् के ग्यारह अक्षरों को अपने एक अक्षर में मिला कर बारह अक्षरों वाला हो गया। इस प्रकार सभी छन्दों और तीनों सवनों की व्याप्ति गायत्री में अवगत होती है। गायत्री मन्त्र ही द्विजत्व का सम्पादक है—

मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धनम्।
तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते।। (मनु. २।१७०)

प्रथम जन्म माता की कुक्षि और द्वितीय जन्म गायत्री से होता है]। विशेषण के न होने पर विशिष्ट की अन्यत्र सत्ता (सर्वरूपता या व्यापकता) नहीं मानी जाती किन्तु उपलक्षण के न होने पर उपलक्ष्य पदार्थ की सत्ता अन्यत्र नहीं मानी जाती—यह बात नहीं, क्योंकि कुण्डल के न रहने पर भी कुण्डलोपलक्षित कण्ठ (ग्रीवा) प्रतीयमान होता है, क्योंकि उपलक्षण पदार्थ अपने उपलक्ष्य पदार्थ के पूर्ण स्वरूप का परिचायकमात्र होता है, उसका अवच्छेदक नहीं होता। इस प्रकार 'गायत्री' शब्द मुख्यार्थ होकर ब्रह्म का उपलक्षक है—यह सिद्ध किया गया है।

अब 'गायत्री' शब्द संख्या-सामान्यरूप गुण को लेकर गौणी वृत्ति के द्वारा ब्रह्म का बोधक है—यह मत दिखाने के लिए भाष्यकार कहते हैं—"अपर आह साक्षादेव गायत्रीशब्देन ब्रह्म प्रतिपाद्यते"। जैसे गायत्री के छः-छः अक्षरवाले चार पाद होते हैं, वैसे ही ब्रह्म के भी चार पाद हैं—सभी स्थावर-जङ्गम जगत् मिल कर ब्रह्म का एक पाद (चतुर्थ अंश) है। शेष तीन पाद द्युलोक (प्रकाशात्मक स्व-स्वरूप) में अवस्थित हैं। अथवा यहाँ 'दिवि' का

ज्योतिषो ब्रह्मत्वम् ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्२५३

घ्याथी शब्दोऽर्थान्तरे संख्यासामान्यात्प्रयुज्यमानो दृश्यते । तद्यथा- 'ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतम्' इत्युपक्रम्याह 'सैषा विराडन्नादी' ( छा० ४।३।८ ) इति । अस्मिन्पक्षे ब्रह्मैवाभिहितमिति न छन्दोऽभिधानम् । सर्वथाप्यस्ति पूर्वस्मिन्वाक्ये प्रकृतं ब्रह्म ॥ २५ ॥

भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ २६ ॥

इतश्चैवमभ्युपगन्तव्यमस्ति, पूर्वस्मिन्वाक्ये प्रकृतं ब्रह्मेति । यतो भूतादीन्पादान्व्यपदिशति । भूतपृथिवीशरीरहृदयानि हि निर्दिश्याह — 'सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री' इति । नहिं ब्रह्मसमाश्रयणे केवलस्य छन्दसो भूतादयः पादा उपपद्यन्ते । अपि


भामती

पदार्थान् वेव तथाऽयं वाव स योऽयमन्तःपुरुष आकाशः' शरीरमध्य इत्यर्थं, 'तद्धि तस्य स्वप्नस्थानं तथाऽयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशः' हृदयपुण्डरीक इत्यर्थः, तद्धि तस्य सुषुप्तिस्थानम् । तदेतत् 'त्रिपादस्यामृतं दिवि' इत्युक्तम् । तदेवं चतुष्पात्त्वसामान्याद्गायत्रीशब्देन ब्रह्मोच्यते इति । ॐ अस्मिन् पक्षे ब्रह्म वाभिहितम् इति ॐ । ब्रह्मपरत्वादभिहितमित्युक्तम् ॥ २५ ॥

ॐ षड्विधा इति ॐ । भूतपृथिवीशरीरहृदयवाक्प्राणा इति षट् प्रकारा गायत्र्याख्यस्य ब्रह्मणः श्रूयन्ते — "पञ्च ब्रह्मपुरुषा इति च हृदयसुषिषु ब्रह्मपुरुषश्रुतिर्ब्रह्मसम्बन्धितायां विवक्षितायां संभवति" । अस्यार्थः — हृदयस्यास्य खलु पञ्च सुषयः, पञ्च छिद्राणि । तानि च देवैः प्राणादिभी रच्यमानानि स्वर्गप्राप्तिद्वाराणीति देवसुषयः । तथाहि, हृदयस्य यत् प्राङ्मुखं छिद्रं तत्स्थो यो वायुः स प्राणस्तेन हि प्रायणकाले सञ्चरते स्वर्गलोकं, स एव चक्षुः स एवादित्य इत्यर्थः । 'आदित्यो ह वै बाह्यः प्राणः' इति


भामती-व्याख्या

अर्थ है— 'आकाशे' । ब्रह्म के तीन पाद आकाश में स्थित हैं, जैसा कि श्रुति कहती है— "यद्वै तद् ब्रह्मोतीदं वाव तयोऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशः" (छां. ३।१२।७) । इस श्रुति में त्रिपाद् अमृत ब्रह्म को जो पुरुष के बाहर अवस्थित भूताकाशस्वरूप कहा गया है, वह केवल स्तुत्यर्थक है । वस्तुत भूताकाश जागरित प्रपञ्चोपलक्षित चिदाकाश का आधार है, क्योंकि जागता हुआ यह आत्मा बाह्य (शरीर के बाहर अवस्थित) पदार्थों को जानता है, "अयं वाव स योऽयमन्तः पुरुष आकाशः (छां. ३।१२।८) यहाँ 'अन्तः' शब्द का अर्थ है— 'शरीरमध्ये' । शरीर के अन्दर स्थित आकाश पुरुष के स्वाप्न प्रपञ्च का आधार एवं "अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशः" (छां. ३।१२।९) यहाँ 'अन्तर्हृदये' का अर्थ भाष्यकार ने 'हृदयपुण्डरीके' किया है, क्योंकि वह पुरुष की सुषुप्ति का आश्रय है । अर्थात् जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के अभिमानी विश्व, तैजस और प्राज्ञ — ये तीनों जिसके पाद (पद्यते गम्यतेऽनेन इति पादो गमकः) हैं, ऐसा तुरीय तत्त्व आकाश में विराजमान है । इस प्रकार चतुष्पात्त्वरूप संख्या की समानता को लेकर 'गायत्री' शब्द के द्वारा ब्रह्म अवगमित होता है । भाष्यकार ने जो कहा है— अस्मिन् पक्षे ब्रह्मैवाभिहितम् ।' उसका तात्पर्य है — 'गौण्या वृत्त्या बोधितम्' ॥ २५ ॥

"सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री" (छा. ३।१२।५) इस श्रुति से पूर्व कथित भूत, पृथिवी, शरीर, हृदय, वाक् और प्राण—ये छः गायत्रीसंज्ञक ब्रह्म के प्रकार वर्णित हैं । भाष्यकार ने जो कहा है— "पञ्च ब्रह्मपुरुषाः (छां. ३।१३।६) इति च हृदयादिसुषिषु ब्रह्मपुरुषश्रुतिर्ब्रह्मसम्बन्धितायां विवक्षितायां सम्भवति" । इसका आशय यह है कि शरीर में रहनेवाले इस हृदय के पाँच देव-सुषि (छिद्र) हैं, उन्हें देव-सुषि इस लिए कहा जाता है प्राणादि पाँच देवताओं के द्वारा अभिरक्षित हैं। वे छिद्र ही स्वर्ग-प्राप्ति के द्वार हैं । (१) इस हृदय के पूर्वी छिद्र (द्वार) में अवस्थित जो वायु है, उसे प्राण कहते हैं, क्योंकि वह 'प्राग्

२५४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. २६

च ब्रह्मानाश्रयणे नेयमृक् संबध्येत—'तावानस्य महिमा' इति। अनया हि ऋचा स्वर- सेन ब्रह्मैवाभिधीयते, 'पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि' (छा० ३।१२।५ ) इति सर्वात्मत्वोपपत्तेः । पुरुषसूक्तेऽपीयमृङ्ग्रहपरतयैव समाम्नायते । स्मृतिश्च ब्रह्मण एवंरूपतां दर्शयति—'विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्' (गी० १०।४२ ) इति, 'यद्वै तद् ब्रह्म' ( छा० ३।१२।७ ) इति च निर्देशः । एवं सति मुख्यार्थ उपपद्यते । 'पञ्च ब्रह्मपुरुषाः' (छा० ३।१३।६ ) इति च हृदयसुषिषु ब्रह्मपुरुषश्रुतिर्ब्रह्मसंबन्धितायां विवक्षितायां संभवति । तस्मादस्ति पूर्वस्मिन्वाक्ये ब्रह्म प्रकृतम् । तदेव ब्रह्म ज्योति- र्वाक्ये द्युसंबन्धात्प्रत्यभिज्ञायमानं परामृश्यत इति स्थितम् ॥ २६ ॥

उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ २७ ॥

यदप्येतदुक्तं पूर्वत्र—'त्रिपादस्यामृतं दिवि' इति सप्तम्या द्यौराधारत्वेनोपदिष्टा; इह पुनः 'अथ यदतः परो दिवः' इति पञ्चम्या मर्यादात्वेन, तस्मादुपदेशभेदान्न तस्येह प्रत्यभिज्ञानमस्तीति, तत्परिहर्तव्यम् । अत्रोच्यते—नायं दोषः; उभयस्मिन्नप्य- विरोधात् । उभयस्मिन्नपि सप्तम्यन्ते पञ्चम्यन्ते चोपदेशे न प्रत्यभिज्ञानं विरुध्यते । यथा लोके वृक्षाग्रसंबद्धोऽपि श्येन उभयथोपदिश्यमानो दृश्यते, वृक्षाग्रे श्येनो


भामती

श्रुतेः । अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिस्तत्स्थो वायुविशेषो व्यानः । तत्सम्बद्धं श्रोत्रं तच्चन्द्रमाः । 'श्रोत्रेण सृष्टा विशश्चन्द्रमाश्च' इति श्रुतेः । अथ योऽस्य प्रत्यङ्मुखः सुषिस्तत्स्थो वायुविशेषोऽपानः स च वाक्, तत्सम्बन्धात्, वाक् चाग्निरिति । 'वाग्वा अग्नि' इति श्रुतेः । अथ योऽस्योदङ्मुखः सुषिस्तत्स्थो वायु- विशेषः स समानः, तत्सम्बद्धं मनः, तत्पर्जन्यो देवता । अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिस्तत्स्थो वायुविशेषः स उदानः । पादत लादारभ्योर्ध्वं नयनात् स वायुस्तदाधारश्चाकाशो देवता । ते वा एते पञ्च सुषयः । तत्सम्बद्धाः पञ्चहार्दस्य ब्रह्मणः पुरुषा न गायत्र्यामक्षरसन्निवेशमात्रे संभवन्ति, किन्तु ब्रह्मण्येवेति ॥२६॥ ॐ यथा लोके इति ॐ । यदाधारत्वं मुख्यं दिवस्तदा कथञ्चिन्मर्यादा व्याख्येया । यो हि श्येनो


भामती-व्याख्या

अनिति'—इस व्युत्पत्ति के आधार पर मरण-काल में स्वर्गलोक की ओर संचरण करता है । वही ( प्राण ) चक्षु है, वही आदित्य कहा गया है—"आदित्यो ह वै बाह्यः प्राणः" ( प्रश्नो. ३।८ ) । (२) इस हृदय के दक्षिण-द्वार पर व्यानसंज्ञक वायु है, वही श्रोत्र है, वही चन्द्रमा है—'श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्चन्द्रमाश्च' (ऐत. १।७।५ ) । (३) इस हृदय के पश्चिम द्वार पर अपान नाम की जो वायु है, वही वाक् है, वही अग्नि है—"वाग्वा अग्निः" ( ऐत. १।४ ) । (४) इस हृदय के उत्तर-द्वार पर समान नाम की जो वायु है, वही मन है, वही पर्जन्य ( वृष्टि ) है—"मनसा सृष्टा आपश्च वरुणश्च" ( ऐत. १।७।६ ) । (५) इस हृदय के ऊर्ध्वमुख द्वार पर जो वायु है, वही उदान कहलाता है, क्योंकि वह पाद-तल से ऊपर की दिशा में उत्क्रमण करता है । वही ( उदान ) आकाश है । ये पाँच द्वार हैं, इनके पाचों द्वार-पालों को ब्रह्म-पुरुष वैसे ही कहते हैं, जैसे राज-द्वार के द्वार-पालों को राज-पुरुष । यह सब कुछ उपपादन केवल अक्षर-सन्निवेशरूप गायत्री में उपपन्न न होकर ब्रह्म में ही समञ्जस होता है, अतः यहाँ 'गायत्री' शब्द ब्रह्मपरक ही सिद्ध होता है ॥ २६ ॥

पूर्वपक्षी ने जो कहा था कि "त्रिपादस्यामृतं दिवि" (छां ३।१२।१) यहाँ पर 'द्यु' शब्द सप्तम्यन्त और "यदतः परो दिवः" (छां. ३।१३।७) इस वाक्य में 'द्यु' शब्द पञ्चम्यन्त है, अतः उपदेश-भेद होने के कारण दोनों की एकता प्रत्यभिज्ञात नहीं । उसका परिहार यह किया जाता है कि "विवक्षातः कारकाणि भवन्ति"—इस न्याय के अनुसार एक ही अर्थ में

प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २५५

वृक्षाग्रात्परतः श्येन इति च । एवं दिव्येव सद्ब्रह्म दिवः परमित्युपदिश्यते । अपर आह - यथा लोके वृक्षाग्रेणासंबद्धोऽपि श्येन उभयथोपदिष्यमानो दृश्यते, वृक्षाग्रे श्येनो वृक्षाग्रात्परतः श्येन इति च । एवं च दिवः परमपि सद् ब्रह्म दिवीत्युपदिश्यते । तस्मादस्ति पूर्वनिर्दिष्टस्य ब्रह्मण इह प्रत्यभिज्ञानम् । अतः परमेव ब्रह्म ज्योतिःशब्दमिति सिद्धम् ॥ २७ ॥


( ११ प्रतर्दनाधिकरणम् । सू० २८-३१ )

प्राणस्तथानुगमात् ॥ २८ ॥

अस्ति कौषीतकिब्राह्मणोपनिषदीन्द्रप्रतर्दनाख्यायिका—'प्रतर्दनो ह वै दैवोदा-


भामती

वृक्षाग्रे वस्तुतोऽस्ति स च ततः परोऽप्यस्त्येव । अर्वाग्भागातिरिक्तमध्यपरभागस्थस्य तस्यैव वृक्षात्परतोऽवस्थानात् । एवं च बाह्यद्युभागातिरिक्तशरीरहार्दद्युभागस्थस्य ब्रह्मणो बाह्याद् द्युभागात् परतोऽवस्थानमुपपन्नम् । यदा तु मर्यादैव मुख्यतया प्राधान्येन विवक्षिता तदा लक्षणयाऽऽधारत्वं व्याख्येयम् । यथा गङ्गायां घोष इत्यत्र सामीप्यादिति । तदिदमुक्तम् ॐ अपर आह इति ॐ । अत एव दिवः परमपीत्युक्तम् ॥ २७ ॥


अनेकलिङ्गसन्दोहे बलवत्कस्य किं भवेत् ।
लिङ्गिनो लिङ्गमित्यत्र चिन्त्यते प्रागचिन्तितम् ॥

मुख्यप्राणजीवदेवताब्रह्मणामनेकेषां लिङ्गानि बहूनि संप्लवन्ते, तत्कतमदत्र लिङ्गं, लिङ्गाभासञ्च


भामती-व्याख्या

विभिन्न कारकों का प्रयोग बाधक नहीं, जैसे कि लोक में वृक्ष की चोटी पर बैठे श्येन पक्षी के लिए दोनों प्रकार का प्रयोग देखा जाता है---'वृक्षाग्रे श्येनः', 'वृक्षाग्रात् परतः श्येनः' । अर्थात् आधाररूप अर्थ की विवक्षा में सप्तमी मुख्यार्थक और पञ्चमी लाक्षणिक है क्योंकि जो श्येन वृक्ष के शिखर पर वस्तुतः बैठा है, वह वृक्ष से परे भी अवस्थित है । आशय यह है कि वृक्षाग्र कोई एक बिन्दु नहीं, अपितु नीचे-ऊपर की शाखा-प्रशाखाओं से व्याप्त एक ऐसा झुर-मुट है, जहाँ बैठा श्येन पक्षी अपनी निचली शाखा की अपेक्षा ऊपर स्थित है । इसी प्रकार बाह्य द्यु ( आकाश ) भाग से अतिरिक्त शरीरस्थ हार्दाकाश में अवस्थित ब्रह्म का बाह्याकाश की अपेक्षा परतः अवस्थान उपपन्न है । जब मर्यादा ( अपादानता ) विवक्षित होती है, तब पञ्चमी मुख्यार्थक और लक्षणा वृत्ति से आधारार्थक सप्तमी का समन्वय वैसे ही किया जा सकता है, जैसे 'गङ्गायां घोषः'—यहां सप्तमी का पर्यवसान सामीप्यार्थ को लेकर हो जाता है, भाष्यकार ने यही कहा है—"अपर आह दिवः परमपि सद्ब्रह्म दिवीति उपदिश्यते" ॥ २७ ॥


विषय वस्तु -
अनेकलिङ्गसन्दोहे बलवत् कस्य किं भवेत् ।
लिङ्गिनो लिङ्गमित्यत्र चिन्त्यते प्रागचिन्तितम् ॥
[ अनेक पदार्थों के लिङ्गों ( गमकों ) का एकत्र समावेश उपलब्ध होने पर किस पदार्थ का लिङ्ग प्रबल है—यह यहाँ विचार किया जाता है, इसका पहले विचार नहीं किया गया है ] अर्थात् मुख्य प्राण, जीव, देवता और ब्रह्म के लिङ्ग यहाँ प्रतीयमान हैं, उनमें

२५६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. २८

सिरिन्द्रस्य प्रियं धामोपजगाम युद्धेन च पौरुषेण च' इत्यारभ्याम्नाता । तस्यां श्रूयते - 'स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्स्व' इति । तथोत्तरत्रापि 'अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति' (कौ० ३।१,२,३) इति । तथा 'न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्याद्' इति । अन्ते च 'स एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः' (कौ० ३।८) इत्यादि ।

भामती

कतमदित्यत्र विचार्यते । न चायमर्थोऽत एव प्राण इत्यत्र विचारितः । स्यादेतत् — हिततमपुरुषार्थसिद्धश्च निखिलभ्रूणहत्यादिपापापरामर्शश्च प्रज्ञात्मत्वं चानन्त्वादिश्च न मुख्ये प्राणे सम्भवन्ति । तथैष साधु कर्म कारयति, एष लोकाधिपतिरित्याद्यपि । जीवे तु प्रज्ञात्मत्वं कार्याङ्गद्भावेदितरेषां त्वसम्भवः । वक्तृत्वञ्च वाक्करणव्यापारवत्त्वं यद्यपि परमात्मनि स्वरूपेण न सम्भवति तथाप्यनन्यथासिद्धबहुब्रह्मलिङ्गविरोधाज्जीवद्वारेण ब्रह्मण्येव कथञ्चित् व्याख्येयम्, जीवस्य ब्रह्मणोऽभेदात् । तथा च श्रुतिः — 'यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि' इति वाग्वदनस्य ब्रह्म कारणमित्याह । शरीरधारणमपि यद्यपि मुख्यमाणस्यैव तथापि प्राणव्यापारस्य परमात्मायत्तत्वात्परमात्मन एव । यद्यपि चात्रेन्द्रेदेवताया विग्रहवत्या लिङ्गमस्ति, तथाहि, इन्द्रधामगतं प्रतर्दनं प्रतीन्द्र उवाच । मामेव विजानीहीत्युपक्रम्य, प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मेत्यात्मनि प्राणशब्दमुच्चचार । प्रज्ञात्मत्वं चास्योपपद्यते, देवतानामप्रतिहतज्ञानशक्तित्वात् ।

भामती-व्याख्या

किसका लिङ्ग सत् और किसका असत् (लिङ्गाभास) है—यह यहाँ विचारणीय है। यह विचार पूर्वोक्त "अत एव प्राणः" (ब्र. सू. १।१।८) इस अधिकरण से गतार्थ नहीं, क्योंकि वहाँ ब्रह्म-लिङ्ग के अनुरोध पर 'प्राण' शब्द की केवल ब्रह्मपरता स्थिर की गई है, ब्रह्म और अब्रह्म के लिङ्गों की प्रबलता-दुर्बलता का विचार नहीं किया गया।

शङ्का— "सत्यं हीन्द्रः स होवाच—यामेव विजानीह्येतदेवाहं मनुष्य्याय हिततमं मन्ये। स यो मां विजानीयान्नास्य केन च कर्मणा लोको मीयते—न मातृवधेन, न पितृबधेन, न स्तेयेन, न भ्रूणहत्यया" (कौ. उ. ३।१) इस प्रकार इन्द्र ने प्रतर्दन के प्रति जो हिततम पुरुषार्थ-सिद्धि, भ्रूण-हत्यादि निखिल पापों का अश्लेष, प्रज्ञात्मत्व और अमृतत्व का प्रतिपादन किया है, वह वायु-विकारात्मक मुख्य प्राण में समज्स्य नहीं होता। "एष साधु कर्म कारयति", "एष लोकाधिपतिः" (कौ. उ. ३।८) इत्यादि सामर्थ्य भी मुख्य प्राण में नहीं घटता। जीव में प्रज्ञात्मंत्व का कथंचित् समन्वय हो जाने पर भी अन्य धर्मों की उपपत्ति नहीं होती। परमात्मा (ब्रह्म) में यद्यपि वक्तृत्व (वाग्व्यापारवत्त्व) साक्षात् नहीं, तथापि ब्रह्म के लिङ्गों (असाधारण धर्मों) का बाहुल्य उपलब्ध होने के कारण वक्तृत्वादि कतिपय धर्मों का भी ब्रह्म में जीव के द्वारा उपपादन कर लेना चाहिए, क्योंकि जीव ब्रह्म से अभिन्न होता है। "यद् वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते, तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि" (केन. १।४) यह श्रुति वाग्व्यवहार की कारणता ब्रह्म में बता रही है। शरीर-धारणरूप जीवत्व यद्यपि मुख्य प्राण का धर्म है, तथापि प्राणादि का व्यापार परमात्मा के अधीन ही होता है, अतः प्राण-धारकत्व का योग ब्रह्म से भी किया जा सकता है।

यद्यपि प्रतर्दन के उपदेष्टा इन्द्र में देवतत्व के सूचक विग्रहवत्त्वादि धर्म चर्चित हैं, क्योंकि इन्द्र-लोक में गए प्रतर्दन को इन्द्र ने 'मामेव विजानीहि'—ऐसा आरम्भ करके "प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा"—इस प्रकार अपने में प्राणरूपता का उपदेश किया है, जिससे यह अत्यन्त स्पष्ट हो जाता है, कि विग्रहवान् इन्द्र की यहाँ प्राणरूपेण उपासना विवक्षित है। प्रज्ञात्मता का सामञ्जस्य तो इन्द्र देवता में हो ही जाता है, क्योंकि देवगणों में प्रज्ञा या

प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २५७

तत्र संशयः - किमिह प्राणशब्देन वायुमात्रमभिधीयते, उत देवतात्मा, उत जीवः, अथवा परं ब्रह्मेति ? ननु 'अत एव प्राणः' इत्यत्र वर्णितं प्राणशब्दस्य ब्रह्म-परत्वम् । इहापि च ब्रह्मलिङ्गमस्ति - 'आनन्दोऽजरोऽमृतः' इत्यादि । कथमिह पुनः संशयः संभवति ? अनेकलिङ्गदर्शनादिति ब्रूमः । न केवलमिह ब्रह्मलिङ्गमेवोपलभ्यते, सन्ति हीतरलिङ्गान्यपि—'मामेव विजानीहि' (कौ० ३।१) इतीन्द्रस्य वचनं देवता-त्मलिङ्गम् । इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयतीति प्राणलिङ्गम् । 'न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्याद्' इत्यादि जीवलिङ्गम् । अत उपपन्नः संशयः तत्र प्रसिद्धेर्वायुः प्राण इति प्राप्ते

भामती

सामर्थ्यातिशयाच्चेन्द्रस्य हिततमपुरुषार्थहेतुत्वमपि । मनुष्याधिकारत्वाच्छास्त्रस्य देवान् प्रत्यप्रवृत्तेर्भ्रूण-हत्यादिपापापरामर्शस्योपपत्तेः । लोकाधिपत्यं चेन्द्रस्य लोकपालत्वात् । आनन्दादिरूपत्वं च स्वर्गस्यैवा-नन्दत्वात् । 'आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते' इति स्मृतेश्चामृतत्वमिन्द्रस्य । त्वाष्ट्रमहनमित्याद्या च विग्रहवत्त्वेन स्तुतिस्तत्रैवोपपद्यते । तथापि परमपुरुषार्थस्यापवर्गस्य परब्रह्मज्ञानादन्यतोऽनवाप्तेः परमानन्दरूपस्य मुख्यस्यामृतत्वस्याजरावस्थस्य च ब्रह्मरूपाव्यभिचारादध्यात्मसम्बन्धभूम्नश्च पराचीन्द्रेऽनु-पपत्तेः इन्द्रस्य देवताया आत्मनि प्रतिबुद्धस्य चरमदेहस्य वामदेवस्येव प्रारब्धविपाककर्माशयमात्रं भोगेन क्षपयतो ब्रह्मण एव सर्वमेतत्कल्पत इति विग्रहवदिन्द्रजीवप्राणवायुपरित्यागेन ब्रह्मैवात्र प्राणशब्दं प्रतीयत इति पूर्वपक्षाभावादनारभ्यमेतदिति ।

अत्रोच्यते — 'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः सह ह्येतावस्मिन् शरीरे वसतः

भामती-व्याख्या

ज्ञान की अप्रतिहत (अबाध) शक्ति होती है। इन्द्रादि विशेष शक्ति-सम्पन्न होने के कारण हिततम (परम) पुरुषार्थ के हेतु भी माने जाते हैं। भ्रूण-हत्यादि-जनित पाप का सम्बन्ध भी इन्द्रादि देवगणों के साथ नहीं होता, क्योंकि विधि-निषेधात्मक शास्त्रों के अधिकारी त्रैवर्णिक मनुष्य ही माने जाते हैं, देवगण नहीं। इन्द्र लोकपाल देवता होने के कारण लोकाधिपति कहा जाता है। स्वर्ग सुखरूप है, अतः स्वर्गाधिपति को आनन्दरूप कहा जाता है। "आभूतसम्प्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते"—इस परिभाषा के अनुसार त्रिलोक्यन्तर्गत भूतों के प्रलय-पर्यन्त रहनेवाले स्वर्गादि लोकों को अमृत (अनश्वर) कह दिया गया है, अतः औपचारिक अमृतत्व भी इन्द्र में घट जाता है। इन्द्र ने जो अपनी स्तुति करते हुए कहा है—"त्वाष्ट्रमहनम्', वह स्तुति विग्रहधारी इन्द्र देवता में ही उपपन्न होती है।

तथापि परमपुरुषार्थरूप मोक्ष का साधन ब्रह्म-ज्ञान से भिन्न इन्द्रदेवतादि का ज्ञान नहीं होता। परमानन्दरूपता एवं मुख्य (अनौपचारिक) अमृतत्व—ये दोनों धर्म ब्रह्मरूपता से अव्यभिचरित हैं। जिस प्राण तत्त्व के साथ उपासक के शरीर का बहुल सम्पर्क (ब्र. सू. १।१।२९ में) बताया गया है—"अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्य उत्थापयति" (कौ. उ. ३।३) ऐसा प्राण बाह्य इन्द्र नहीं हो सकता, अपितु ब्रह्म ही हो सकता है। इन्द्र ने प्रतर्दन को जो उपदेश दिया है कि "मामेव विजानीहि" वह इन्द्र ने अपने आप में ब्रह्मरूपता का वैसे ही साक्षात्कार करके दिया है, जैसे वामदेव ने अपने अन्तिम जन्म में शेष प्रारब्ध का उपभोग करते समय गर्भ-वास में कहा था—"अहं मनुरभवं सूर्यश्च" (बृह. उ. १।४।१०)। ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मरूप हो जाता है, उसमें ब्रह्म के लिङ्गों का समन्वय समुचित ही माना जाता है। फलतः प्रकृत में विग्रहधारी इन्द्र, जीव और प्राण वायु को छोड़ कर 'प्राण' शब्द ब्रह्म को ही कहता है, इस प्रकार पूर्व पक्ष के उठने का यहाँ कोई अवसर ही नहीं, अतः इस अधिकरण के आरम्भ की कोई आवश्यकता नहीं है।

३३

२५८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. २८

उच्यते—प्राणशब्दं ब्रह्म विज्ञेयम् । कुतः ? तथाऽनुगमात् । तथा हि—पौर्वापर्येण पर्यालोच्यमाने वाक्ये पदार्थानां समन्वयो ब्रह्मप्रतिपादनपर उपलभ्यते । उपक्रमे तावत् 'वरं वृणीष्व' इतीन्द्रेणोक्तः प्रतर्दनः परमं पुरुषार्थं वरमुपचिक्षेप—'त्वमेव मे वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यसे' इति । तस्मै हिततमत्वेनोपदिश्यमानः प्राणः कथं परमात्मा न स्यात् ? नह्यान्यत्र परमात्मज्ञानाद्धिततमप्राप्तिरस्ति, 'तमेव विदि-

भामती

सहोत्क्रामतः' इति यस्यैव प्राणस्य प्रज्ञात्मन उपास्यत्वमुक्तं तस्यैव प्राणस्य प्रज्ञात्मना सहोत्क्रमणमुच्यते । न च ब्रह्मण्यभेदे द्विवचनं, न सहभावः, न चोत्क्रमणम् । तस्माद्वायुरेव प्राणः । जीवश्च प्रज्ञात्मा सह प्रवृत्तिनिवृत्त्या भक्त्यैकत्वमनयोरुपचरितं यो वै प्राण इत्यादिना । आनन्दामराजरापहतपापत्वाद्यश्च ब्रह्मणि प्राणे भविष्यन्ति । तस्माद्यथायोगं त्रय एवात्रोपास्याः । न चैष वाक्यभेदो दोषमावहति । वाक्यार्थावगमस्य पदार्थावगमपूर्वकत्वात् । पदार्थानां चोक्तेन मार्गेण स्वातन्त्र्यात् । तस्मादुपास्यभेदादु-पासात्रैविध्यमिति पूर्वः पक्षः ।

सिद्धान्तस्तु—सत्यं पदार्थावगमोपायो वाक्यार्थावगमः, न तु पदार्थावगमपराण्येव पदानि, अपि त्वेकवाक्यार्थावगमपराणि । तमेव त्वेकं वाक्यार्थं पदार्थावगममन्तरेण न शक्नुवन्ति कर्तुमित्यन्तरा तदर्थमेव तमप्यवगमयन्ति, तेन पदानि विशिष्टैकार्थविबोधनस्वरसान्येव बलवद्बाधकोपनिपातान्नानार्थ-बोधपरतां नीयन्ते । यथाहुः—'सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदश्च नेष्यते' इति ।

तेन यथोपांशुयाजवाक्ये जामितादोषोपक्रमे तत्प्रतिसमाधानोपसंहारे चेकवाक्यत्वाय प्रजा-

भामती-व्याख्या

समाधान—"यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः सह ह्येतावस्मिन् शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः" ( कौ. उ. ३।३,४ ) इस श्रुति के द्वारा जिस प्राण की प्रज्ञारूपेण उपासना प्रतिपादित है, उसी प्राण का प्रज्ञा के साथ-साथ वास और उत्क्रमण कहा गया है। ब्रह्म प्राण से अभिन्न तत्त्व है, उसमें न तो 'वसन्तः' और 'उत्क्रामतः' का द्विवचन उपपन्न होता है, न सहवास और न सह उत्क्रमण । अतः यहाँ 'प्राण' पद से प्राण वायु का ही ग्रहण करना होगा । जीव प्रज्ञात्मा कहलाता है । इन दोनों का सहवास, सहोत्क्रमण और औपचारिक एकत्व भी कहा जा सकता है—"यो वै प्राणः सा प्रज्ञा" । आनन्दत्व, अमरत्व, अजरत्व और अपहतपाप्मत्वादि ब्रह्मरूप प्राण में घट जाते हैं, अ : प्राण वायु, इन्द्र देवता और जीव—ये तीनों ही यथायोग उपासनीय हैं । तीन पदार्थों की उपासना विवक्षित होने से वाक्य-भेद प्रसक्त होता है—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि पदार्थों का ज्ञान वाक्यार्थ-ज्ञान का जनक होता है, यहाँ पदार्थ तीन स्वतन्त्ररूप से उपदिष्ट हैं, अतः उपास्य पदार्थों के भेद से त्रिविध उपासना विवक्षित है ।

सिद्धान्त—यह सत्य है कि वाक्यार्थावबोध का उपाय पदार्थावगम होता है, किन्तु वाक्यस्थ पद केवल पदार्थावगति में ही पर्यवसित होते हैं—ऐसा कोई नियम नहीं, वस्तु-स्थिति यह है कि एकवाक्य के घटकीभूत सभी पद एकवाक्यार्थ की अवगति के जनक होते हैं। उसी एक वाक्यार्थ को पदार्थावगम के बिना अवगत नहीं कराया जा सकता, अतः सभी पद वाक्यार्थावगम करने के लिए ही अपने पदार्थों का ज्ञान कराया करते हैं, फलतः एक विशिष्ट वाक्यार्थ के स्वभावतः बोधक पदों को किसी प्रबल बाधक के द्वारा ही अनेकार्थवि-बोधपरक ठहराया जा सकता है, श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—"सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्य-भेदश्च नेष्यते" ( श्लो. वा. पृ. १३५ ) । अत एव [ उपांशुयाजाधिकरण ( जै. सू. २।१।४ ) में विचार किया गया है—"जामि वा एतद् यज्ञस्य क्रियते यदन्वञ्चौ पुरोडाशौ, उपांशुयाज-

प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २५९

त्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ( श्वेता० ३।८ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तथा 'स यो मां वेद न ह वै तस्य केनचन कर्मणा लोको मीयते न स्तेयेन न भ्रूणहत्याया' ( कौ० ३।१ ) इत्यादि च ब्रह्मपरिग्रहे घटते । ब्रह्मविज्ञानेन हि सर्वकर्मक्षयः प्रसिद्धः - 'क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे' ( मु० २।२।८ ) इत्याद्यासु श्रुतिषु । प्रज्ञात्मत्वं च ब्रह्मपक्ष एवोपपद्यते, नहाचेतनस्य वायोः प्रज्ञात्मत्वं संभवति । तथोपसंहारेऽपि - 'आनन्दोऽजरोऽमृतः' इत्यानन्दत्वादीनि न ब्रह्मणोऽन्यत्र सम्यक् संभवन्ति । 'स न साधुना कर्मणा भूयान्भवति नो एवासाधुना कर्मणा कनीयानेष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते । एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्योऽधो निनीषते' इति, 'एष लोकाधिपतिरेष लोकपाल एष लोकेशः' ( कौ० ३।८ ) इति च । सर्वमेतत्परस्मिन्ब्रह्मण्याश्रीयमाणेऽनुगन्तुं शक्यते न मुख्ये प्राणे । तस्मात्प्राणो ब्रह्म ॥ २८ ॥

न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसंबन्धभूमा ह्यस्मिन् ॥ २९ ॥

यदुक्तं - प्राणो ब्रह्मेति, तदाक्षिप्यते । न परं ब्रह्म प्राणशब्दम् । कस्मात् ? वक्तुरात्मोपदेशात् । वक्ता हीन्द्रो नाम कश्चिद्विग्रहवान्देवताविशेषः स्वमात्मानं प्रतर्दनायाचचक्षे - 'मामेव विजानीहि' इत्युपक्रम्य 'प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा' इत्यहंकारवादेन । स एष वक्तुरात्मत्वेनोपदिश्यमानः प्राणः कथं ब्रह्म स्यात् ? नहि ब्रह्मणो वक्तृत्वं संभवति, 'अवागमनः' ( बृह० ३।८।८ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तथा विग्रहसंबन्धिभिरेव ब्रह्मण्यसंभवद्भिर्धर्मैरात्मानं तुष्टाव-'त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनमरुन्मुखान्यतीन्छालावृकेभ्यः प्रायच्छम्' इत्येवमादिभिः । प्राणत्वं चेन्द्रस्य बलवत्त्वादुपपद्यते । 'प्राणो वै बलम्' इति हि विज्ञायते । बलस्य चेन्द्रो देवता प्रसिद्धा । 'या च काचिद्वलप्रकृतिरिन्द्रकर्मैव तत्' इति हि वदन्ति प्रज्ञात्मत्वमप्यप्रतिहतज्ञानत्वाद्देवतात्मनः संभवति । अप्रतिहतज्ञाना देवता इति हि वदन्ति । निश्चिते चैवं देवतात्मोपदेशे हिततमत्वादिवचनानि यथासंभवं तद्विषयाण्येव योजयितव्यानि । तस्माद्वक्तुरिन्द्रस्यात्मोपदेशान्न प्राणो ब्रह्मेत्याक्षिप्य प्रतिसमाधीयते - 'अध्यात्मसंबन्धभूमा ह्यस्मिन्' इति । अध्यात्मसंबन्धः

भामती

पतिरुपांशु यष्टव्य इत्यादयो न पृथग्विधयः किन्तुर्थवादा इति निर्णीतं, तथेहापि मामेव विजानीहीत्युपक्रम्य प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मेत्युक्त्वान्ते स एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽऽनन्दोऽजरोऽमृत इत्युपसंहाराद् ब्रह्मण्येक-

भामती-व्याख्या

मन्तरा यजति, विष्णुरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्योऽजामित्वाय, अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यावजामित्वाय" (तै. सं. २।६।६) । 'अन्वञ्चौ' का अर्थ है—निरन्तर (अव्यवहित) क्रियमाण । आग्नेय और अग्नीषोमीय—इन दोनों यागों में पुरोडाश द्रव्य है, अतः दोनों कर्मों का निरन्तर ( लगातार ) अनुष्ठान करने पर अजामित्व ( आलस्य ) उत्पन्न हो सकता था, अतः इन दोनों कर्मों के मध्य में घृतद्रव्यक उपांशुयाज नाम का कर्म किया जाता है । वहां सन्देह किया गया है कि विष्णुवादि-घटित तीनों वाक्य तीन पृथक्-पृथक् कर्मों के विधायक हैं ? अथवा "उपांशुयाजमन्तरा यजति"—यह वाक्य ही केवल एक कर्म का विधायक है और उक्त तीनों वाक्य उसी कर्म के अनुवादक हैं ? वहाँ ] निर्णय दिया गया है कि उपांशुयाज-वाक्य में जिस 'जामिता' दोष का उपक्रम किया गया है, उसी का अन्त में उपसंहार किया गया, इस प्रकार की एकवाक्यता के आधार पर यही स्थिर होता है कि

२६०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[अ. १ पा. १ सू. ३०

प्रत्यगात्मसंबन्धः, तस्य भूमा बाहुल्यम् , अस्मिन्नध्याये उपलभ्यते । 'यावद्धयस्मिन् शरीरे प्राणो वसति तावदायूः' इति प्राणस्यैव प्रज्ञात्मनः प्रत्यग्भूतस्यायुष्प्रदानोप-संहारयोः स्वातन्त्र्यं दर्शयति, न देवताविशेषस्य पराचीनस्य । तथाऽस्तित्वे च प्राणानां निःश्रेयसमित्यध्यात्ममेवेन्द्रियाश्रयं प्राणं दर्शयति । तथा 'प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति' (कौ० ३।३) इति । 'न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात्' इति चोपक्रम्य 'तद्यथा रथस्यारेषु नेरिमर्र्पिता नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञा-मात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः' इति विषयेन्द्रियव्यवहारानभिभूतं प्रत्यगात्मानमेवोपसंहरति । 'स म आत्मेति विद्यात्' इति चोपसंहारः प्रत्यगात्मपरिग्रहे साधुर्न पराचीनपरिग्रहे । 'अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः' (बृह० २।५।१९) इति च श्रुत्यन्तरम् । तस्मादध्यात्मसंबन्धबाहुल्याद् ब्रह्मोपदेश एवायं न देवतात्मोपदेशः ॥ २९ ॥

कथं तर्हि वक्तुरात्मोपदेशः—

शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् ॥ ३० ॥

इन्द्रो नाम देवतात्मा स्वमात्मानं परमात्मत्वेनाहमेव परं ब्रह्मेत्यार्षेण दर्शनेन यथाशास्त्रं पश्यन्नुपदिशति स्म—'मामेव विजानीहि' इति । यथा 'तद्धैतत्पश्यन्नृषिर्वा-मदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्च' इति, तद्वत् । 'तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्' (बृ० १।४।१०) इति श्रुतेः । यत्पुनरुक्तं 'मामेव विजानीहि' इत्युक्त्वा विग्रह-धर्मैरिन्द्र आत्मानं तुष्टाव त्वाष्ट्रवधादिभिरिति, तत्परिहर्तव्यम् । अत्रोच्यते—न तावत् त्वाष्ट्रवधादीनां विज्ञानेन्द्रस्तुत्यर्थत्वेनोपन्यासः, यस्मादेवंकर्माहं तस्मान्मां विजा-नीहीति । कथं तर्हि ? विज्ञानस्तुत्यर्थत्वेन यत्कारणं त्वाष्ट्रवधादीनि साहसान्युपन्यस्य परेण विज्ञानस्तुतिमनुसंदधाति—'तस्य मे तत्र लोम च न मीयते स यो मां वेद न ह वै तस्य केन च कर्मणा लोको मीयते' इत्यादिना । एतदुक्तं भवति—यस्मादीदृशान्यपि क्रूराणि कर्माणि कृतवतो मम ब्रह्मभूतस्य लोमापि न हिंस्यते, स योऽन्योऽपि मां वेद न तस्य केनचिदपि कर्मणा लोको हिंस्यत इति । विज्ञेयं तु ब्रह्मैव 'प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा' इति वक्ष्यमाणम् । तस्माद् ब्रह्मवाक्यमेतत् ॥ ३० ॥

भामती

वाक्यत्वावगतौ सत्यां जीवमुख्यप्राणलिङ्गे अपि तदनुगुणतया नेतव्ये, अन्यथा वाक्यभेदप्रसङ्गात् । यत् पुनर्भेददर्शनं 'सह ह्येतौ' इति तज्ज्ञानक्रियाशक्तिभेदेन बुद्धिप्राणयोः प्रत्यगात्मोपाधिभूतयोर्निर्देशः प्रत्य-गात्मानमेवोपलक्षयितुम् । अत एवोपलक्ष्यस्य प्रत्यगात्मस्वरूपस्याभेदमपलक्षणभेदेनोपलक्षयति ॐ प्राण एव प्रज्ञात्मा इति ॐ :

भामती-व्याख्या

"प्रजापतिरुपांशु यष्टव्यः"—इत्यादि तीनों वाक्य पृथक् कर्म के विधायक नहीं, अपितु अर्थवादमात्र हैं। वैसे ही प्रकृत में "मामेव विजानीहि"—इस प्रकार का उपक्रम करके अन्त में कहा गया है—"स एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽऽनन्दोऽजरोऽमृतः ।" इससे पूरे वाक्य-समूह की ब्रह्म में एकवाक्यता अवगत होती है, अतः वहाँ उपलभ्यमान जीव और प्राणवायु के लिङ्गों की ब्रह्मपरक ही व्याख्या करनी चाहिए, अन्यथा वाक्य-भेद प्रसक्त होता है। "सह ह्येतौ वसतः"—इत्यादि वाक्यों से जो भेद प्रतीत होता है, उससे प्रत्यगात्मा की ही उपस्थिति कराई जाती है, क्योंकि प्रज्ञा (बुद्धि) और प्राण दोनों प्रत्यगात्मा की उपाधि हैं। अत एव उनसे उपलक्षित प्रत्यगात्मा का अभेद उपलक्षणों के भेद-निर्देश से सूचित किया जाता

[ प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २६१

जीवमुख्यप्राणलिङ्गानेति चेन्नोपासात्रैविध्या-

दाश्रितत्वादिह तद्योगात् ॥ ३१ ॥

यद्यप्यध्यात्मसंबन्धभूमादर्शनान्न पराचीनस्य देवतात्मन उपदेशः, तथापि न ब्रह्मवाक्यं भवितुमर्हति । कुतः ? जीवलिङ्गान्मुख्यप्राणलिङ्गाच्च । जीवस्य तावदस्मिन् वाक्ये विस्पष्टं लिङ्गमुपलभ्यते 'न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्याद्' इत्यादि । अत्र हि वागादिभिः करणैर्व्यापृतस्य कार्यकारणाध्यक्षस्य जीवस्य विज्ञेयत्वमभिधीयते । तथा मुख्यप्राणलिङ्गमपि—'अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति' इति । शरीरधारणं च मुख्यप्राणस्य धर्मः, प्राणसंवादे वागादीन्प्राणान्प्रकृत्य—'तान्वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्द्वाणमवष्टभ्य विधारयामि' ( प्र० २।३ ) इति श्रवणात् । ये तु 'इमं शरीरं परिगृह्य' इति पठन्ति, तेषामिमं जीवमिन्द्रियग्रामं वा परिगृह्य' शरीरमुत्थापयतीति व्याख्येयम् । प्रज्ञात्मत्वमपि जीवे तावच्चेतनत्वादुपपन्नम् । मुख्येऽपि प्राणे प्रज्ञासाधनप्राणान्तराश्रयत्वादुपपन्नमेव । जीवमुख्यप्राणपरिग्रहे च प्राणप्रज्ञात्मनोः सहवृत्तित्वेनाभेदनिर्देशः, स्वरूपेण च भेदनिर्देश इत्युभयथापि निर्देश उपपद्यते—'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स प्राणः सह ह्येतावस्मिन् शरीरे वसतः सहोत्क्रामतः' इति । ब्रह्मपरिग्रहे तु किं कस्माद्भिद्येत ? तस्मादिह जीवमुख्यप्राणयोरन्यतर उभौ वा प्रतीयेयातां न ब्रह्मेति चेत्—नंतदेवम्;


भामती

तस्मादनन्यथासिद्धब्रह्मलिङ्गानुसारतः । एकवाक्यबलात्प्राणजीवलिङ्गोपपादनम् ॥ इति संग्रहः ॥ २८-३० ॥

'न ब्रह्मवाक्यं भवितुमहति' इति । नैष सम्भवां ब्रह्मवाक्यमेव भवितुमहंतीति, किन्तु यथायोगं किञ्चिदत्र जीववाक्यं, किञ्चिन्मुख्यप्राणवाक्यं, किञ्चिद्ब्रह्मवाक्यमित्यर्थः । ॐ प्रज्ञासाधनप्राणान्तराश्रयत्वादिति ॐ । प्राणान्तराणीन्द्रियाणि, तानि हि मुख्ये प्राणे प्रतिष्ठितानि । जीवमुख्यप्राणयोरन्यतर इत्युपक्रममात्रम् । ॐ उभौ इति ॐ । पूर्वपक्षतत्त्वम् । ब्रह्म तु ध्रुवम् । ॐ न ब्रह्म इति ॐ । न ब्रह्म-


भामती-व्याख्या

है—"प्राण एव प्रज्ञात्मा"। अतः यहाँ का निष्कर्ष यह है कि—

तस्मादनन्यथासिद्धब्रह्मलिङ्गानुसारतः ।
एकवाक्यबलात् प्राणजीवलिङ्गोपपादनम् ॥

ब्रह्म के अव्यभिचरित आनन्दत्वादि लिङ्गों के अनुसार एकवाक्यता अवगत होती है, अतः प्राणवायु और जीव के प्रतीयमान लिङ्गों का ब्रह्म में ही सामञ्जस्य कर लेना चाहिए ॥ २८-३० ॥

भाष्यकार ने जो कहा है कि "न ब्रह्मवाक्यं भवितुमर्हति" उसका आशय यह है कि उक्त वाक्य नियमतः ब्रह्मपरक नहीं हो सकता, किन्तु कोई वाक्य जीवपरक, कोई मुख्य प्राणपरक और कोई ब्रह्मपरक भी हो सकता है, क्योंकि जीव और मुख्य प्राण का लिङ्ग भी विद्यमान है [ "वक्तारं विद्यात्" ( कौ. उ. ३।८ ) यहाँ कार्य-करणाध्यक्षरूप जीव को विज्ञेय बताया है। "प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति" ( कौ. उ. ३।३ ) यहाँ शरीरधारण मुख्य प्राण का व्यापार कथित है । मुख्य प्राण ही प्रज्ञा के साधनीभूत प्राणान्तर ( इन्द्रियों ) का आश्रय ( प्रतिष्ठापक ) माना जाता है, अतः वह प्रज्ञात्मा है। भाष्यकार ने पूर्व पक्ष का उपसंहार करते हुए जो कहा है—"तस्मादिह जीवमुख्यप्राणयोरन्यतर उभौ वा प्रतीयेयाताम्, न ब्रह्म" वहाँ अन्यतरत्व का केवल उपक्रम किया गया है, अर्थात् अन्यतर

२६२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ३१

उपासात्रैविध्यात् । एवं सति त्रिविधमुपासनं प्रसज्येत—जीवोपासनं, मुख्यप्राणो- पासनं ब्रह्मोपासनं चेति। न चैतदेकस्मिन् वाक्येऽभ्युपगन्तुं युक्तम्, उपक्रमोपसंहारा- भ्यां हि वाक्यैकत्वमवगम्यते। 'मामेव विजानीहि' इत्युपक्रम्य 'प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्स्व' इत्युक्त्वा, अन्ते 'स एव प्राण एव प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतः' इत्येकरूपावुपक्रमोपसंहारौ दृश्येते । तत्रार्थैकत्वं युक्तमाश्रयितुम् । न च ब्रह्मलिङ्गमन्यपरत्वेन परिणेतुं शक्यम्, दशानां भूतमात्राणां प्रज्ञामात्राणां च ब्रह्मणोऽन्यत्रापर्णानुपपत्तेः । आश्रितत्वाच्चान्यत्रापि ब्रह्मलिङ्गवशात् प्राणशब्दस्य ब्रह्मणि प्रवृत्तः । इहापि च हिततमोपन्यासादिब्रह्मलिङ्गयोगाद् ब्रह्मोपदेश एवायमिति गम्यते । यत्तु मुख्यप्राणलिङ्गं दर्शितम् - 'इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति' इति - तदसत्, प्राणव्यापारस्यापि परमात्Parse error: Invalid macro definition.त्मायत्तत्वात्परमात्मन्युपचरितुं शक्यत्वात्, 'न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥' (काठ० २।५।५ ) इति श्रुतेः । यदपि 'न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्याद्' इत्यादि जीव लिङ्गं दर्शितं तदपि न ब्रह्मपक्षं निवारयति। नहि जीवो नामात्यन्तभिन्नो ब्रह्मणः, 'तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादिश्रुतिभ्यः । बुद्धयाद्युपाधिकृतं तु विशेषमाश्रित्य ब्रह्मैव सञ्जीवः कर्ता भोक्ता चेत्युच्यते । तस्योपाधिकृतविशेषपरित्यागेन स्वरूपं ब्रह्म दर्शयितुं 'न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् इत्यादिन प्रत्यगात्माभिमुखीकरणार्थं उपदेशो न विरुध्यते। 'यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥' ( के० १।४) इत्यादि च श्रुत्यन्तरं वचनादिक्रियाव्यापृतस्यैवात्मनो ब्रह्मत्वं दर्शयति । यत्पुनरेतदुक्तम्- 'सह ह्येतावस्मिञ्छरीरे वसन्तः सहोत्क्रामतः' इति प्राणप्रज्ञात्मनोर्भेददर्शनं ब्रह्मवादे नोपपद्यत इति नैष दोषः; ज्ञानक्रियाशक्तिद्वयाश्रययो- र्बुद्धिप्राणयोः प्रत्यगात्मोपाधिभूतयोर्भेदनिर्देशोपपत्तेः उपाधिद्वयोपहितस्य तु प्रत्यगात्मनः स्वरूपेणाभेद इत्यतः प्राण एव प्रज्ञात्मेत्येकीकरणमविरुद्धम् ।

भामती वेत्यर्थः । ॐ दशानां भूतमात्राणाम् इति ॐ । पञ्च शब्दादयः पञ्च पृथिव्यादय इति दश भूतमात्राः । पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि पञ्च बुद्धय इति दश प्रज्ञामात्राः । तदेवं स्वमतेन व्याख्याय प्राचां वृत्तिकृतां मतेन व्याचष्टे ॐ अथवा इति ॐ । पूर्वं प्राणस्यैकमुपासनमपरं जीवस्यापरं ब्रह्मण इत्युपासनत्रैविध्येन वाक्यभेदप्रसङ्गो दूषणमुक्तम्, इह तु ब्रह्मण एकस्यैवोपासात्रयविशिष्टस्य विधानान्न वाक्यभेद इत्यभिमानः प्राचां वृत्ति- कृताम् । तदेतदालोचनीयं, कथं न वाक्यभेद इति युक्तं सोमेन यजेतेत्यादौ सोमादिगुणविशिष्टयागविधानं

भामती-व्याख्या को ही उपासना की जाय - ऐसा स्थिर नहीं । 'उभौ' - यह निर्देश जीव और मुख्य प्राण की प्राप्तिमात्र का बोधक है, ब्रह्म का निषेधक नहीं, क्योंकि ब्रह्म की उपासना तो ध्रुवभावी है । 'न ब्रह्म' इसका अर्थ अवधारणपूर्वक है- 'न ब्रह्मव' । फलतः पूर्व पक्षी की ओर से 'जीव', 'मुख्य प्राण' और 'ब्रह्म' - इन तीनों की उपासना का पर्यवसान किया है, तभी सिद्धान्त में त्रिविध उपासना को असम्भव बताया गया है। भाष्यकार ने जो ब्रह्म की असाधारण क्षमता बताते हुए कहा है - "दशानां भूतमात्राणां प्रज्ञामात्राणां च ब्रह्मणोऽन्यत्रार्पणानुपपत्तेः" । वहाँ शब्दादि पाँच और पृथिव्यादि पाँच - ये मिला कर दश भूतमात्राएँ हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रिय और और उनके कार्यभूत पाँच ज्ञान' - ये दश प्रज्ञामात्राएँ हैं। ३१ वें सूत्र की स्वाभिमत व्याख्या करने के अनन्तर भाष्यकार प्राचीन आचार्य वृत्तिकार के मतानुसार व्याख्या प्रस्तुत करते हैं- 'अथवा 'नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्त्वादिह

प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २६३

अथवा—‘नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्वादिह तद्योगात्’ इत्यस्यायमन्योऽर्थः—न ब्रह्मवाक्येऽपि जीवमुख्यप्राणलिङ्गं विरुध्यते । कथम् ? उपासात्रैविध्यात् । त्रिविधमिह ब्रह्मोपासनं विवक्षितम्—प्राणधर्मेण, प्रज्ञाधर्मेण, स्वधर्मेण च । तत्र ‘आयुर्मृतमुपास्स्वायुः प्राणः’ इति, ‘इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति’ इति, ‘तस्मादेतदेवोक्थमुपासीत’ इति च प्राणधर्मः । ‘अथ यथास्यै प्रज्ञायै सर्वाणि भूतान्येकीभवन्ति तद्व्याख्यास्यामः’ इत्युपक्रम्य ‘वागेवास्या एकमङ्गमदुदुहत्तस्यै नाम परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि नामान्याप्नोति’ इत्यादिः प्रज्ञाधर्मः । ‘ता वा एता दशैव भूतमात्रा अधिप्रज्ञं दश प्रज्ञामात्रा अधिभूतम् । यद्धि भूतमात्रा न स्युर्न प्रज्ञामात्राः स्युः । यद्धि प्रज्ञामात्रा न स्युर्न भूतमात्राः स्युः । नह्यन्यतरतो रूपं किंचन सिद्धयेत् । नो एतन्नाना । ‘तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्मा’ इत्यादिर्ब्रह्मधर्मः । तस्माद् ब्रह्मण एवैतदुपाधिद्वयधर्मेण स्वधर्मेण चैकमुपासनं त्रिविधं विवक्षितम् । अन्यत्रापि ‘मनोमयः प्राणशरीरः’ ( छा० ३।१४।२ ) इत्यादावुपाधिधर्मेण ब्रह्मण उपासनमाश्रितम् । इहापि तद्युज्यते, वाक्यस्योपक्रमोपसंहाराभ्यामेकार्थत्वावगमात् प्राणप्रज्ञाब्रह्मलिङ्गावगमाच्च । तस्माद् ब्रह्मवाक्यमेतदिति सिद्धम् ॥ ३१ ॥

इति श्रीमच्छारीरकमीमांसाभाष्ये श्रीशंकरभगवत्पादकृतौ प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ ॥


भामती

तद्गुणविशिष्टस्यापूर्वस्य कर्मणोऽप्राप्तस्य विधिविषयत्वात् । इह तु सिद्धरूपं ब्रह्म न विधिविषयो भवितुमर्हति, अभावार्थत्वात् । भावार्थस्य विधिविषयत्वनियमाद्, वाक्यान्तरेभ्यश्च ब्रह्मावगतेः प्राप्तत्वात् तदनूद्याप्राप्तोपासाभावार्थो विधेयस्तस्य च भेदाद्विद्यावृत्तिलक्षणो वाक्यभेदोऽतिस्फुट इति भाष्यकृता

भामती-व्याख्या

तद्योगाद्’—इत्यस्यायमन्योऽर्थः” । भाष्यकार ने अपनी व्याख्या के अनुसार पूर्वपक्ष में वाक्य-भेद-प्रसङ्गरूप दोष दिखाया अर्थात् ( १ ) मुख्य प्राण की उपासना, ( २ ) जीव की उपासना और ( ३ ) ब्रह्म की उपासना—इन तीन उपासनाओं की प्रसक्ति के द्वारा वाक्यभेदापत्ति होती है, किन्तु वृत्तिकार की धारणा यह है कि त्रिविध उपासना से युक्त एक ही ब्रह्म का विधान हो जाने से वाक्य-भेद प्रसक्त नहीं होता । अतः यहाँ वाक्य-भेद क्यों नहीं होता—यह विचारणीय है । ‘‘सोमेन यजेत’’ ( तै. सं. ३।२।२ ) इत्यादि स्थलों पर सोमादि द्रव्य याग के अङ्ग ( गुण ) हैं, अतः अनेक गुणों से युक्त एक प्रधान ( याग ) का विधान वाक्यभेद के बिना ही सम्पन्न हो जाता है । [ महर्षि जैमिनि कहते हैं—‘‘तद्गुणास्तु विधीयेरन्नविभागाद् विधानार्थे न चेदन्येन शिष्टाः’’ ( जै. सू. १।४।९ ) । यदि अन्य किसी वाक्य के द्वारा गुण और कर्म शिष्ट ( उपदिष्ट या विहित ) नहीं, तब उन गुणों से युक्त कर्म का विधान एक ही वाक्य से हो जाता है, वाक्य-भेद प्रसक्त नहीं होता, वार्तिककार भी कहते हैं

न चेदन्येन शिष्टाः स्युर्यागाः शब्देन केनचित् ।
ते गुणाश्चोपदिश्येरन् विधिना ह्यविभागतः ॥ ( तं. वा. पृ. ३४० )

यागादि कर्म कृति-साध्य होने के कारण विधेय हो जाते हैं, किन्तु ] ब्रह्म वैसा नहीं, अपितु सिद्ध पदार्थ है, भावार्थ ( धात्वर्थ ) स्वरूप न होने से विधेय क्योंकर होगा ? भावार्थ ही नियमतः विधि का विषय माना जाता है—‘‘भावार्थाः कर्मशब्दाः, तेभ्यः क्रिया प्रतीयेत, एष

२६४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ३१

भामती नोद्घाटितः। स्वव्याख्यानेनैवोक्तप्रायत्वादिति सर्वमवदातम् ॥ ३१ ॥

इति श्रीवाचस्पतिमिश्रविरचिते भाष्यविभागे भामत्यां प्रथमस्याध्यायस्य प्रथमः पादः।


भामती-व्याख्या ह्यर्थो विधीयते" (जै. सू. २।१।१)। याग, दान, होमादिरूप भावार्थ कादाचित्क होने के कारण विधेय होते हैं, किन्तु जो पदार्थ सदैव (नित्य) होता है और जो कभी भी नहीं होता, वे दोनों विधेय नहीं होते—

नित्यं न भवनं यस्य यस्य वा नित्यभूतता।
न तस्य क्रियमाणत्वं खपुष्पाकाशयोरिव ॥ (तं. वा. पृ. ३७७)

ब्रह्म में किसी प्रकार का भी क्रियमाणत्व सम्भव नहीं, अतः उसमें विधि की विषयता क्योंकर सम्भावित होगी? ब्रह्म वाक्यान्तरों से अवगत होने के कारण वाक्यान्तरानधिगत सोमयाग के समान विधेय नहीं हो सकता। वाक्यान्तर से प्राप्त (अधिगत) ब्रह्म का अनुवाद करके उपासनरूप भावार्थ का विधान करना होगा, उपासनरूप भावार्थ एक नहीं, अपितु भिन्न है, जैसा कि भाष्यकार कहते हैं—'त्रिविधमिह ब्रह्मोपासनं विवक्षितम्—"प्राणधर्मेण, प्रज्ञाधर्मेण, स्वधर्मेण च"। "प्राप्ते कर्मणि नानेको विधातुं शक्यते गुणः"—इस न्याय के अनुसार प्रत्येक उपासना के लिए विधि-प्रत्यय की आवृत्ति करनी होगी, फलतः वाक्य-भेद प्रसक्त होगा। यह दोष अत्यन्त स्फुट होने के कारण भाष्यकार ने इसका उद्‌घाटन नहीं किया, अपनी व्याख्या शैली के आधार पर ध्वनित अवश्य कर दिया है ॥ ३१ ॥

भामतीव्याख्यायां प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः समाप्तः।

मनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २६५

प्रथमाध्याये द्वितीयः पादः ।

[ अत्रास्पष्टब्रह्मलिङ्गयुक्तवाक्यानामुपास्यब्रह्मविषयाणां विचारः ]
( १ सर्वत्र प्रसिद्धयधिकरणम् । सू० १-८ )

प्रथमे पादे 'जन्माद्यस्य यतः' इत्याकाशादेः समस्तस्य जगतो जन्मादिकारणं ब्रह्मेत्युक्तम् । तस्य समस्तजगत्कारणस्य ब्रह्मणो व्यापित्वं, नित्यत्वं, सर्वज्ञत्वं, सर्वशक्तित्वं, सर्वात्मत्वमित्येवंजातीयका धर्मा उक्ता एव भवन्ति । अर्थान्तरप्रसिद्धानां च केषांचिच्छब्दानां ब्रह्मविषयत्वहेतुप्रतिपादनेन कानिचिद्वाक्यानि स्पष्टब्रह्मलिङ्गानि संदिह्यमानानि ब्रह्मपरतया निर्णीतानि । पुनरप्यन्यानि वाक्याून्यस्पष्टब्रह्मलिङ्गानि संदिह्यन्ते—किं परं ब्रह्म प्रतिपादयन्त्याहोस्विदर्थान्तरं किंचिदिति ? तन्निर्णयाय द्वितीयतृतीयौ पादावारभ्येते ।

भामती

अथ द्वितीयं पादमारिप्सुः पूर्वोक्तमर्थं स्मारयति वक्ष्यमाणोपयोगितया ॐ प्रथमे पादे इति ॐ । उत्तरत्र हि ब्रह्मणो व्यापित्वनित्यत्वादयः सिद्धवद्धेतुतयोपदेक्ष्यन्ते । न चैते साक्षात्पूर्वमुपपादिता इति हेतुभावेन न शक्या उपवेष्टुमिति, अत उक्तम् ॐ समस्तजगत्कारणस्य इति ॐ । यद्यप्येते न पूर्वं कण्ठत उक्तास्तथापि ब्रह्मणो जगज्जन्मादिकारणत्वोपपादनेनाधिकरणसिद्धान्तन्यायेनोपक्षिप्ता इत्युपपन्नस्तेषा-मुत्तरत्र हेतुभावेनोपन्यास इत्यर्थः । ॐ अर्थान्तरप्रसिद्धानाञ्च इति ॐ । यत्रार्थान्तरप्रसिद्धा एवाकाशप्राण-ज्योतिरादयो ब्रह्मणि व्याख्यान्ते तदव्यभिचारिलिङ्गश्रवणात् तत्र कैव कथा मनोमयादीनामर्थान्तरे प्रसिद्धानां पदानां ब्रह्मगोचरत्वनिर्णयं' प्रतीत्यभिप्रायः । पूर्वपक्षाभिप्रायं त्वग्रे दर्शयिष्यामः ।

भामती-व्याख्या

संगति--द्वितीय पाद का भाष्य आरम्भ करने से पहले वक्ष्यमाणार्थ का उपयोगी होने के कारण पूर्व-प्रसङ्ग का स्मरण दिलाते हैं--“प्रथमे पादे 'जन्माद्यस्य यतः' इत्याकाशादेः समस्तस्य जगतो जन्मादिकारणं ब्रह्मेत्युपक्षिप्तम्” । आगे चल कर ब्रह्म के व्यापकत्व-नित्यत्वादि ऐसे धर्मों को हेतु के रूप में प्रस्तुत किया जायगा, जो कि प्रायः सिद्धवत् ( उपपादित--जैसे ) हैं, किन्तु उनका पहले साक्षात् उपपादन नहीं किया गया, तब उनका हेतु के रूप में क्योंकर उपन्यास हो सकेगा ? अतः भाष्यकार ने कहा--“समस्तजगत्कारणस्य ब्रह्मणो व्यापित्वं नित्यत्वं सर्वज्ञत्वं सर्वशक्तिकमत्त्वं सर्वात्मत्वमित्येवं जातीयका धर्मा उक्ता एव भवन्ति” । यद्यपि व्यापित्वादि धर्म साक्षात् किसी शब्द के द्वारा अभिहित नहीं, तथापि ब्रह्म में जगत् के जन्मादि-कारणत्व का उपपादन कर देने से 'अधिकरण सिद्धान्त' के अनुसार ब्रह्म में व्यापित्वादि धर्मों की उपपत्ति अर्थात् हो जाती है और उत्तरत्र उनका हेतु के रूप में उपन्यास संगत हो जाता है [ न्याय-सूत्रकार ने 'अधिकरण सिद्धान्त' का लक्षण किया है--“यत्सिद्धावन्यप्रकरणसिद्धिः सोऽधिकरणसिद्धान्तः” ( न्या. सू. १।१।३० ) । शब्दान्तर में इसे अर्थापत्ति कहा जा सकता है कि ईश्वर में जगत्कारणत्व सिद्ध होने पर सर्वज्ञत्वादि धम अर्थात् सिद्ध हो जाते हैं, क्योंकि जिसमें सर्वज्ञत्वादि नहीं, ऐसा अल्पज्ञ पुरुष जगत् का रचयिता नहीं हो सकता ] । “अर्थान्तरप्रसिद्धानां शब्दानाम्”--इस भाष्य के द्वारा ऐसे 'आकाश', 'प्राण' और 'ज्योति' शब्दों का ग्रहण किया गया है, जो अर्थान्तर ( ब्रह्म से भिन्न भूताकाशादि ) के लिए लोक में प्रसिद्ध हैं, किन्तु ब्रह्म के असाधारण ( अव्यभिचारी ) धर्मों का निर्देश पाकर ब्रह्मपरक निर्णीत हुए हैं। तब अर्थान्तर में प्रसिद्ध मनोमयादि शब्दों के लिए कहना ही क्या ? उनमें वैसे ही लिङ्गों को देख कर ब्रह्म-बोधकत्व का निर्णय क्यों न किया जा सकेगा ? पूर्वपक्षी का अभिप्राय आगे चल कर कहा जायगा ।

३४

२६६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. २ सू. १ ]

सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् ॥ १ ॥

इदमाम्नायते—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत। अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत', 'मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः' ( छा० ३।१४।१, २ ) इत्यादि । तत्र संशयः—किमिह मनोमयत्वादिभिर्धर्मैः शारीर आत्मोपास्यत्वेनोपदिश्यते, आहोस्वित्परं ब्रह्मेति ? किं तावत्प्राप्तम् ? शारीर इति । कुतः ? तस्य हि कार्यकारणाधिपतेः प्रसिद्धो मनआदिभिः संबन्धो न परस्य ब्रह्मणः, 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' ( मु० २।१।२ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।


भामती

ॐ इदमाम्नायते—सर्वं खल्विदं ब्रह्म ॐ । कुतः ? ॐ तज्जलान् इति ॐ । यतस्तस्माद् ब्रह्मणो जायत इति तज्जम् । तस्मिंश्च लीयत इति तल्लम् । तस्मिंश्चानिति स्थितिकाले चेष्टत इत वदन् जगत्तस्मात्सवं खल्विदं जगद् ब्रह्म । अतः कः कस्मिन् रज्यते कश्च कं द्वेष्टीति रागद्वेषरहितः शान्तः सन्नुपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत मनोमयः प्राणशरीर इत्यादि ।

तत्र संशयः — किमिह मनोमयत्वादिभिर्धर्मैः शारीर आत्मोपास्यत्वेनोपदिश्यते आहोस्वित् ब्रह्मेति ? किं तावत्प्राप्तम् ? शारीरः जीव इति । कुतः ? क्रतुमित्यादिवाक्येन विहितां क्रतुभावनामनूद्य सर्वमित्यादिवाक्यं शमगुणे विधिः । तथा च सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति वाक्यं प्रथमपठितमप्यर्थालोचनया परमेव, तदर्थोपजीवित्वात् । एवं च सङ्कल्पविधिः प्रथमो निर्विषयः सन्प्रपर्यंस्तमग्निविषयापेक्षः स्वयम-निवृत्तो न विध्यन्तरेणोपजीवितुं शक्यः, अनुपपादकत्वात् । तस्माच्छान्ततागुणविधानात् पूर्वमेव मनोमयः


भामती-व्याख्या

विषय— "सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति, स क्रतुं कुर्वीत मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः" (छां. ३।१४।१, २) इत्यादि वाक्यों में कहा गया है कि 'यह समस्त प्रपञ्च निश्चितरूप से ब्रह्मात्मक है, क्योंकि यह प्रपञ्च तज्ज (ब्रह्म से जायमान), तल्ल (ब्रह्म में विलीन) एवं तदन (ब्रह्म से ही अनुप्राणित या स्थितिशील) है, अतः शान्त चित्त से ब्रह्म की उपासना कर, यह मनोमय, प्राणशरीरवाला एवं भारूप (चैतन्यस्वरूप) है—ऐसी उपासना करनी चाहिए ।

संशय— क्या यहाँ मनोमयत्वादि धर्मों के द्वारा शारीर (जीव) आत्मा उपास्यत्वेन उपदिष्ट है ? अथवा ब्रह्म ?

पूर्वपक्ष— मनोमयत्वादि धर्मों के माध्यम से जीव की ही उपासना विवक्षित है, क्योंकि मनोमयत्वादि धर्मों का सम्बन्ध जीव के साथ ही प्रसिद्ध है । दूसरी बात यह भी है कि "स क्रतुं कुर्वीत" (छां ३।१४।२) इस वाक्य के द्वारा क्रतु (ध्यान, भावना या उपासना) का विधान करके, उस उपासना के उद्देश्य से "सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत" (छां. ३।१४।१) इस वाक्य के द्वारा शान्ति (शम) रूप गुण का विधान किया गया है, अतः "सर्वं खल्विदं ब्रह्म"—यह वाक्य प्रथम पठित होने पर भी अर्थ क्रम के अनुसार उपासना-विधि के अनन्तर माना जाता है, क्योंकि गुण (अङ्ग) को प्रधान की अपेक्षा होने के कारण प्रधान-विधि के अनन्तर ही गुण (अङ्ग) की विध होती है, पहले नहीं । पहले तो "क्रतुं कुर्वीत" यह विधि अपने विषय के अभाव में अपने स्वरूप-लाभ में व्यग्र होने के कारण शम-विधि की उपजीव्य नहीं बन सकती, अतः शान्ततारूप गुण का विधान करने से पहले ही "मनोमयः प्राणशरीरः" इत्यादि विषयोपस्थापक वाक्यों के साथ उपासना विधि का

मनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २६७

ननु 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इति स्वशब्देनैव ब्रह्मोपात्तं, कथमिह शारीर आत्मोपास्य आशङ्क्यते ? नैष दोषः, नेदं वाक्यं ब्रह्मोपासनाविधिपरं । किं तर्हि ? शमविधिपरम् । यत्कारणं 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत' इत्याह । एतदुक्तं भवति— यस्मात्सर्वमिदं विकारजातं ब्रह्मैव तज्जत्वात्तल्लत्वात्तदनत्वाच्च । न च सर्वस्यैकात्म- त्वेन रागादयः संभवन्ति, तस्माच्छान्त उपासीतेति । न च शमविधिपरत्वे सत्यनेन

भामती

प्राणशरीर इत्यादिभिर्विषयोपनायकैः सम्बध्यते । मनोमयादि च कार्यकारणसङ्घातात्मनो जीवात्मन एव निरूढमिति जीवात्मनोपास्येनोपरक्तोपासना न पश्चाद् ब्रह्मणा सम्बद्धुमर्हति, उत्पत्तिशिष्टगुणावरो- धात् । न च सर्वं खल्विदमिति वाक्यं ब्रह्मपरमपि तु शमहेतुवन्निगदार्थवादः शान्तताविधिपरः, शूर्पेण जुहोति तेन ह्यन्नं क्रियत इतिवत् । न चान्यपराबदपि ब्रह्मापेक्षिततया स्वीक्रियत इति युक्तम् । मनोमय-

भामती-व्याख्या

सम्बन्ध स्थापित होता है । मनोमयत्वादि धर्म कार्य (शरीर) और करण (इन्द्रियों) के संघातरूप जीव में ही निरूढ हैं, अतः उनके द्वारा जीव ही उपास्यत्वेन प्रक्रान्त है । जीवोपासनापरक वाक्य के द्वारा ब्रह्म की उपासना का विधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि उपासना के उत्पत्ति (विधि) वाक्य में ही मनोमयत्वादिरूपेण जीव की उपास्यता शिष्ट (उपदिष्ट) है, अतः वाक्यान्तर में निर्दिष्ट ब्रह्म को उस उपासना का विषय (उपास्य) नहीं मान सकते । [उत्पत्ति-शिष्ट (उत्पत्ति विधि में उपदिष्ट) अङ्ग के द्वारा जब प्रधान कर्म की आकांक्षा निवृत्त हो जाती है, तब वाक्यान्तर से विहित गुण का विधान उस कर्म में नहीं हो सकता, जैसा कि महर्षि जैमिनि ने कहा है—"न वा प्रकरणात् प्रत्यक्षविधानाच्च न प्रकरणं द्रव्यस्य" (जै. सू. १।४।१४) । चातुर्मास्य नाम को इष्टि के चार पर्व (भाग) होते हैं—(१) वैश्वदेव, (२) वरुणप्रघास (३) साकमेध और (४) शुनासीरीय । प्रथम पर्व में आठ कर्म विहित हैं—(१) आग्नेयमष्टाकपालं निर्वपति, (२) सौम्यं चरुम्, (३) सावित्रं द्वादश- कपालम्, (४) सारस्वतं चरुम्, (५) पौष्णं चरुम्, (६) मारुतं सप्तकपालम्, (७) वैश्वदेव- मामिक्षाम्, (८) द्यावापृथिव्येककपालम् (तैं. सं. १।८।२) । इन आठ यागों की सन्निधि में पठित "वैश्वदेवेन यजेत"—इस वाक्य के द्वारा उक्त आठ कर्मों में विश्वेदेवरूप देवता का विधान विवक्षित है ? अथवा कर्मान्तर का विधान ? इस प्रकार के सन्देह का निराकरण करते हुए कहा गया है—

गुणान्तरावरुद्धत्वान्नावकाशयो गुणोऽपरः ।
विकल्पोऽपि न वैषम्यात्साम्नामेव युज्यते ।। (तं. वा. पृ. ३४७)

अर्थात् उक्त आठों कर्मों के उत्पत्ति वाक्यों में उपदिष्ट अग्नि, सोमादि देवताओं के द्वारा ही कर्मों की आकांक्षा शान्त हो जाती है, देवतान्तर के विधान का अवसर ही नहीं रहता । उसी प्रकार प्रकृत उपासना-विधि में उत्पत्ति-शिष्ट जीव का उपास्यत्वेन अन्वय हो जाने पर वाक्यान्तर के द्वारा ब्रह्मरूप उपास्य के अन्वय का अवसर ही नहीं रह जाता ] ।

दूसरी बात यह भी है कि "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छां. ३।१४।१) यह वाक्य ब्रह्म का विधायक नहीं, अपितु शम-विधि का वैसे ही हेतुवन्निगदार्थवाद है, जैसे "शूर्पेण जुहोति" (मै. सं. १।१०।११) इस विधि का हेतुवन्निगदार्थवाद है—"तेन ह्यन्नं क्रियते" (श. ब्रा. २।८।३।२३)। [हेतुवन्निगदाधिकरण (जै. सू. १।२।३) में विचार किया गया है कि हेतु- हेतुमद्भाव के प्रकाशक वाक्यों को विधि-वाक्य माना जाय ? अथवा अर्थवाद ? जैसे "शूर्पेण जुहोति"—इस शूर्प-विधि को विषय करके पूर्वपक्ष की ओर से कहा गया है कि "तेन ह्यन्नं

२६८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १

वाक्येन ब्रह्मोपासनं नियन्तुं शक्यते । उपासनं तु 'स क्रतुं कुर्वीत' इत्यनेन विधीयते । क्रतुः सङ्कल्पो ध्यानमित्यर्थः । तस्य च विषयत्वेन श्रूयते - 'मनोमयः प्राणशरीरः' इति जीवलिङ्गम् । अतो ब्रूमो जीवविषयमेतदुपासनमिति । 'सर्वकर्मा सर्वकामः' इत्याद्यपि श्रूयमाणं पर्यायेण जीवविषयमुपपद्यते । 'एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा' इति च हृदयायतनत्वमणीयस्त्वं चाराग्रमात्रस्य जीवस्यावकल्पते, नापरि- च्छिन्नस्य ब्रह्मणः । ननु 'ज्यायान्पृथिव्या' इत्याद्यपि न परिच्छिन्नेऽवकल्पत इति । अत्र ब्रूमः- न तावदणीयस्त्वं ज्यायस्त्वं चोभयमेकस्मिन्समाश्रयितुं शक्यं, विरोधात् । अन्यतराश्रयणे च प्रथमश्रुतत्वादणीयस्त्वं युक्तमाश्रयितुं, ज्यायस्त्वं तु ब्रह्मभावापेक्षया

भामती त्त्वादिभिर्धर्मैर्जीवे सुप्रसिद्धैर्जीवविषयसमर्पणेनानपेक्षितत्वात् । सर्वकर्मत्त्वादि च जीवस्य पर्यायेण भविष्यति । एवं चाणीयस्त्वमप्युपपन्नम् । परमात्मनस्त्वपरिमेयस्य तदनुपपत्तिः । प्रथमावगतेन चाणीय- स्त्वेन ज्यायस्त्वं तदनुगुणतया व्याख्येयम् । व्याख्यातं च भाष्यकृता । एवं कर्मकर्तृव्यपदेशः सप्तमीप्रथ-

भामती-व्याख्या क्रियते”। इस वाक्य में 'हि' अव्यय हेतुतार्थक है, अतः इस वाक्य का अर्थ यह होता है कि शूर्प अन्न के परिष्कार का साधन है, अतः शूर्प से होम करना चाहिए, फलतः 'शूर्प' पद अन्न के साधनीभूत सभी दर्वी, स्थाली आदि का उपलक्षक हो जाता है। इस पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए कहा गया है—

शूर्पसाधनता श्रौती नाश्रोतैः सा विकल्प्यते । अतो निरर्थको हेतुः स्तुतिः तस्मात्प्रवर्तिका ॥ (जै. न्या. मा. पृ. २५) ।

अर्थात् हेतु-विधि मान कर दर्वी-स्थाल्यादि अन्य साधनों का विधान नहीं हो सकता, क्योंकि शूर्पगत साधनता का जैसे प्रत्यक्ष प्रतिपादन है, वैसे दर्वी आदि की साधनता प्रत्यक्ष श्रुत नहीं, अतः उक्त वाक्य शूर्प-स्तुतिपरक अर्थवादमात्र है। उसी प्रकार फल-कामनादि से रहित होकर शान्तभाव से उपासना क्यों करना चाहिए ? इस जिज्ञासा का शामक वाक्य है— “यतः सर्वमिदं ब्रह्म”। अर्थात् जब सब कुछ ब्रह्मरूप है, तब प्राप्य-प्रापकभावादि सम्भव न होने के कारण किसी फल की कामना नहीं करनी चाहिए] ।

शङ्का—स्तुतिपरक 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' — इस वाक्य के द्वारा भी ब्रह्म की प्राप्ति हो सकती है, क्योंकि उपासना-विधि के लिए उपास्यत्वेन ब्रह्म अपेक्षित है।

समाधान — यह कहा जा चुका है कि उत्पत्ति-शिष्ट जीव का उपास्यत्वेन अन्वय हो जाने के कारण ब्रह्म की न तो उपास्यत्वेन अपेक्षा रहती है और न प्रकृत उपासना का उपास्य होने के लिए ब्रह्म में योग्यता है, क्योंकि प्रक्रान्त मनोमयत्वादि धर्म जीव में ही प्रसिद्ध हैं, ब्रह्म में नहीं, अतः मनोमयत्वादिरूप से ब्रह्म क्योंकर उपास्य बन सकेगा ? वहाँ जो “सर्वकर्मा, सर्वकामः, सर्वगन्धः, सर्वरसः” (छां. ३।१४।२) इस प्रकार सर्वकर्मत्वादि धर्मों का प्रतिपादन है, वह भी जीव में समञ्जस हो जाता है, क्योंकि जीव अपने अनन्त जन्म-पर्यायों में सभी कर्मों और सभी कामों (फलों) का सम्पादन कर लेता है। इसी प्रकार अणीयस्त्वादि धर्म भी हृदयादि उपाधियों के द्वारा जीव में ही उपपन्न होते हैं, अपरिमेय (अपरिच्छिन्न) ब्रह्म में नहीं। प्रथमोपात्त अणीयस्त्व के अनुसार ही ज्यायस्त्व (व्यापकत्व) का भी जीव में समन्वय भाष्यकार ने किया है कि जीव वस्तुदृष्ट्या ब्रह्मरूप है, ज्यायान् है। ‘एतमितः प्रेत्यभिसंभवितास्मि’ (छां. ३।१४।४) इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित उपास्यगत प्राप्ति- कर्मता और उपासक जीवगत प्राप्ति-कर्तृता का व्यवहार एवं “यथा व्रीहिर्वा, यवो वा श्यामाको

मनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २६९

भविष्यतीति। निश्चिते च जीवविषयत्वे यदन्ते ब्रह्मसंकीर्तनं—'एतद्ब्रह्म' (छा० ३।१४।४) इति, तदपि प्रकृतपरामर्शार्थत्वाज्जीवविषयमेव। तस्मान्मनोमयत्वादिभिर्धर्मैर्जीव उपास्यः।

इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः—परमेव ब्रह्म मनोमयत्वादिभिर्धर्मैरुपास्यम्। कुतः? सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्। यत्सर्वेषु वेदान्तेषु प्रसिद्धं ब्रह्मशब्दस्यालम्बनं जगत्कारणम्, इह च 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इति वाक्योपक्रमे श्रुतं, तदेव मनोमयत्वादिधर्मैर्विशिष्टमुपदिश्यत इति युक्तम्। एवं च सति प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रिये न भविष्यतः। ननु वाक्योपक्रमे

भामती

मान्तता चाभेदेऽपि जीवात्मनि कथञ्चिद्भेदीपचारेण राहोः शिर इतिवद् द्रष्टव्या। एतद् ब्रह्मेति च जीवविषयं जीवस्यापि देहादिबृंहणत्वेन ब्रह्मत्वात्। एवं सत्यसङ्कल्पादयोऽपि परमात्मवर्तिनो जीवेऽपि सम्भवन्ति, तदव्यतिरेकात्। तस्माज्जीव एवोपास्यत्वेन विवक्षितः, न परमात्मेति प्राप्तम्।

एवं प्राप्तेऽभिधीयते— समासः सर्वनामार्थः सन्निकृष्टमपेक्षते। तद्धितार्थोऽपि सामान्यं नापेक्षाया निवर्त्तकः॥ तस्मादपेक्षितं ब्रह्म ग्राह्यमन्यपरादपि। तथा च सत्यसङ्कल्पप्रभृतीनां यथार्थता॥

भवेदेतदेवं यदि प्राणशरीर इत्यादीनां साक्षाज्जीववाचकत्वं भवेत्। न त्वेतदस्ति। तथाहि—प्राणः शीरमस्येति सर्वनामार्थो बहुव्रीहिः सन्निहितं च सर्वनामार्थं सम्प्राप्य तदभिधानं पर्यवस्येत्। तत्र मनोमयपदं पर्यवसिताभिधानं तदभिधानपर्यवसानायालं, तदेव तु मनोविकारो वा मनःप्रचुरं वा

भामती-व्याख्या

वा श्यामाकतण्डुलो वैवमयमन्तरात्मन् पुरुषो हिरण्मयः" (शत. ब्रा. १०।६।३।२) इत्यादि श्रुतियों में उपासक का सप्तम्यन्त ('अन्तरात्मन्') पद से तथा उपास्य का प्रथमान्त 'पुरुष' पद से निर्देश जीव-ब्रह्म का 'राहोः शिरः' के समान औपचारिक भेद लेकर बन जाता है। श्रुति में 'एतद्ब्रह्म' यह निर्देश भी जीवविषयक है, क्योंकि जीव भी देहादि के बृंहण (वृद्धि) का कारण होने से ब्रह्म कहा जाता है। श्रुति-निर्दिष्ट ब्रह्मगत सत्यसंकल्पत्वादि धर्म भी जीव में संभव हो जाते हैं, क्योंकि वह ब्रह्म से अभिन्न है। फलतः उक्त श्रुति में जीव ही उपास्यत्वेन विवक्षित है, ब्रह्म नहीं।

सिद्धान्त— समासः सर्वनामार्थः सन्निकृष्टमपेक्षते। तद्धितार्थोऽपि सामान्यं नापेक्षाया निवर्तकः॥ तस्मादपेक्षितं ब्रह्म ग्राह्यमन्यपरादपि। तथा च सत्यसंकल्पप्रभृतीनां यथार्थता॥

यहाँ जीव को तभी उपास्य माना जा सकता था, जब कि 'प्राणशरीरः' इत्यादि पद साक्षात् जीव के वाचक होते, किन्तु ऐसा नहीं, क्योंकि 'प्राणः शरीरमस्य'—ऐसा बहुव्रीहि समास जिस अन्यर्था का बोधक है, वह समास-घटक 'अस्य'—इस सर्वनाम पद का अर्थ है जो कि सन्निकृष्टार्थ का परामर्शक माना जाता है। प्रकृत में ब्रह्म ही सन्निकृष्ट है। यह जो कहा गया है कि 'मनोमयः' इस पद का तद्धित (मयट्) प्रत्यय योग्यता के आधार पर 'अन्तःकरणोपाधिक जीव का उपास्यत्वेन उपनायक है, जीव को लेकर उपास्य की आकांक्षा निवृत्त हो जाती है, वहाँ ब्रह्म का अन्वय नहीं हो सकता। वह कहना सम्भव नहीं, क्योंकि 'मनोमय' पद सामान्यतः मनोविकार-सम्बन्धी पदार्थ का उपस्थापक है, वह जीव ही है—ऐसा नहीं कह