भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२६८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १

वाक्येन ब्रह्मोपासनं नियन्तुं शक्यते । उपासनं तु 'स क्रतुं कुर्वीत' इत्यनेन विधीयते । क्रतुः सङ्कल्पो ध्यानमित्यर्थः । तस्य च विषयत्वेन श्रूयते - 'मनोमयः प्राणशरीरः' इति जीवलिङ्गम् । अतो ब्रूमो जीवविषयमेतदुपासनमिति । 'सर्वकर्मा सर्वकामः' इत्याद्यपि श्रूयमाणं पर्यायेण जीवविषयमुपपद्यते । 'एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा' इति च हृदयायतनत्वमणीयस्त्वं चाराग्रमात्रस्य जीवस्यावकल्पते, नापरि- च्छिन्नस्य ब्रह्मणः । ननु 'ज्यायान्पृथिव्या' इत्याद्यपि न परिच्छिन्नेऽवकल्पत इति । अत्र ब्रूमः- न तावदणीयस्त्वं ज्यायस्त्वं चोभयमेकस्मिन्समाश्रयितुं शक्यं, विरोधात् । अन्यतराश्रयणे च प्रथमश्रुतत्वादणीयस्त्वं युक्तमाश्रयितुं, ज्यायस्त्वं तु ब्रह्मभावापेक्षया

भामती त्त्वादिभिर्धर्मैर्जीवे सुप्रसिद्धैर्जीवविषयसमर्पणेनानपेक्षितत्वात् । सर्वकर्मत्त्वादि च जीवस्य पर्यायेण भविष्यति । एवं चाणीयस्त्वमप्युपपन्नम् । परमात्मनस्त्वपरिमेयस्य तदनुपपत्तिः । प्रथमावगतेन चाणीय- स्त्वेन ज्यायस्त्वं तदनुगुणतया व्याख्येयम् । व्याख्यातं च भाष्यकृता । एवं कर्मकर्तृव्यपदेशः सप्तमीप्रथ-

भामती-व्याख्या क्रियते”। इस वाक्य में 'हि' अव्यय हेतुतार्थक है, अतः इस वाक्य का अर्थ यह होता है कि शूर्प अन्न के परिष्कार का साधन है, अतः शूर्प से होम करना चाहिए, फलतः 'शूर्प' पद अन्न के साधनीभूत सभी दर्वी, स्थाली आदि का उपलक्षक हो जाता है। इस पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए कहा गया है—

शूर्पसाधनता श्रौती नाश्रोतैः सा विकल्प्यते । अतो निरर्थको हेतुः स्तुतिः तस्मात्प्रवर्तिका ॥ (जै. न्या. मा. पृ. २५) ।

अर्थात् हेतु-विधि मान कर दर्वी-स्थाल्यादि अन्य साधनों का विधान नहीं हो सकता, क्योंकि शूर्पगत साधनता का जैसे प्रत्यक्ष प्रतिपादन है, वैसे दर्वी आदि की साधनता प्रत्यक्ष श्रुत नहीं, अतः उक्त वाक्य शूर्प-स्तुतिपरक अर्थवादमात्र है। उसी प्रकार फल-कामनादि से रहित होकर शान्तभाव से उपासना क्यों करना चाहिए ? इस जिज्ञासा का शामक वाक्य है— “यतः सर्वमिदं ब्रह्म”। अर्थात् जब सब कुछ ब्रह्मरूप है, तब प्राप्य-प्रापकभावादि सम्भव न होने के कारण किसी फल की कामना नहीं करनी चाहिए] ।

शङ्का—स्तुतिपरक 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' — इस वाक्य के द्वारा भी ब्रह्म की प्राप्ति हो सकती है, क्योंकि उपासना-विधि के लिए उपास्यत्वेन ब्रह्म अपेक्षित है।

समाधान — यह कहा जा चुका है कि उत्पत्ति-शिष्ट जीव का उपास्यत्वेन अन्वय हो जाने के कारण ब्रह्म की न तो उपास्यत्वेन अपेक्षा रहती है और न प्रकृत उपासना का उपास्य होने के लिए ब्रह्म में योग्यता है, क्योंकि प्रक्रान्त मनोमयत्वादि धर्म जीव में ही प्रसिद्ध हैं, ब्रह्म में नहीं, अतः मनोमयत्वादिरूप से ब्रह्म क्योंकर उपास्य बन सकेगा ? वहाँ जो “सर्वकर्मा, सर्वकामः, सर्वगन्धः, सर्वरसः” (छां. ३।१४।२) इस प्रकार सर्वकर्मत्वादि धर्मों का प्रतिपादन है, वह भी जीव में समञ्जस हो जाता है, क्योंकि जीव अपने अनन्त जन्म-पर्यायों में सभी कर्मों और सभी कामों (फलों) का सम्पादन कर लेता है। इसी प्रकार अणीयस्त्वादि धर्म भी हृदयादि उपाधियों के द्वारा जीव में ही उपपन्न होते हैं, अपरिमेय (अपरिच्छिन्न) ब्रह्म में नहीं। प्रथमोपात्त अणीयस्त्व के अनुसार ही ज्यायस्त्व (व्यापकत्व) का भी जीव में समन्वय भाष्यकार ने किया है कि जीव वस्तुदृष्ट्या ब्रह्मरूप है, ज्यायान् है। ‘एतमितः प्रेत्यभिसंभवितास्मि’ (छां. ३।१४।४) इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित उपास्यगत प्राप्ति- कर्मता और उपासक जीवगत प्राप्ति-कर्तृता का व्यवहार एवं “यथा व्रीहिर्वा, यवो वा श्यामाको