भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

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पृष्ठ 287

मनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २६९

भविष्यतीति। निश्चिते च जीवविषयत्वे यदन्ते ब्रह्मसंकीर्तनं—'एतद्ब्रह्म' (छा० ३।१४।४) इति, तदपि प्रकृतपरामर्शार्थत्वाज्जीवविषयमेव। तस्मान्मनोमयत्वादिभिर्धर्मैर्जीव उपास्यः।

इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः—परमेव ब्रह्म मनोमयत्वादिभिर्धर्मैरुपास्यम्। कुतः? सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्। यत्सर्वेषु वेदान्तेषु प्रसिद्धं ब्रह्मशब्दस्यालम्बनं जगत्कारणम्, इह च 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इति वाक्योपक्रमे श्रुतं, तदेव मनोमयत्वादिधर्मैर्विशिष्टमुपदिश्यत इति युक्तम्। एवं च सति प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रिये न भविष्यतः। ननु वाक्योपक्रमे

भामती

मान्तता चाभेदेऽपि जीवात्मनि कथञ्चिद्भेदीपचारेण राहोः शिर इतिवद् द्रष्टव्या। एतद् ब्रह्मेति च जीवविषयं जीवस्यापि देहादिबृंहणत्वेन ब्रह्मत्वात्। एवं सत्यसङ्कल्पादयोऽपि परमात्मवर्तिनो जीवेऽपि सम्भवन्ति, तदव्यतिरेकात्। तस्माज्जीव एवोपास्यत्वेन विवक्षितः, न परमात्मेति प्राप्तम्।

एवं प्राप्तेऽभिधीयते— समासः सर्वनामार्थः सन्निकृष्टमपेक्षते। तद्धितार्थोऽपि सामान्यं नापेक्षाया निवर्त्तकः॥ तस्मादपेक्षितं ब्रह्म ग्राह्यमन्यपरादपि। तथा च सत्यसङ्कल्पप्रभृतीनां यथार्थता॥

भवेदेतदेवं यदि प्राणशरीर इत्यादीनां साक्षाज्जीववाचकत्वं भवेत्। न त्वेतदस्ति। तथाहि—प्राणः शीरमस्येति सर्वनामार्थो बहुव्रीहिः सन्निहितं च सर्वनामार्थं सम्प्राप्य तदभिधानं पर्यवस्येत्। तत्र मनोमयपदं पर्यवसिताभिधानं तदभिधानपर्यवसानायालं, तदेव तु मनोविकारो वा मनःप्रचुरं वा

भामती-व्याख्या

वा श्यामाकतण्डुलो वैवमयमन्तरात्मन् पुरुषो हिरण्मयः" (शत. ब्रा. १०।६।३।२) इत्यादि श्रुतियों में उपासक का सप्तम्यन्त ('अन्तरात्मन्') पद से तथा उपास्य का प्रथमान्त 'पुरुष' पद से निर्देश जीव-ब्रह्म का 'राहोः शिरः' के समान औपचारिक भेद लेकर बन जाता है। श्रुति में 'एतद्ब्रह्म' यह निर्देश भी जीवविषयक है, क्योंकि जीव भी देहादि के बृंहण (वृद्धि) का कारण होने से ब्रह्म कहा जाता है। श्रुति-निर्दिष्ट ब्रह्मगत सत्यसंकल्पत्वादि धर्म भी जीव में संभव हो जाते हैं, क्योंकि वह ब्रह्म से अभिन्न है। फलतः उक्त श्रुति में जीव ही उपास्यत्वेन विवक्षित है, ब्रह्म नहीं।

सिद्धान्त— समासः सर्वनामार्थः सन्निकृष्टमपेक्षते। तद्धितार्थोऽपि सामान्यं नापेक्षाया निवर्तकः॥ तस्मादपेक्षितं ब्रह्म ग्राह्यमन्यपरादपि। तथा च सत्यसंकल्पप्रभृतीनां यथार्थता॥

यहाँ जीव को तभी उपास्य माना जा सकता था, जब कि 'प्राणशरीरः' इत्यादि पद साक्षात् जीव के वाचक होते, किन्तु ऐसा नहीं, क्योंकि 'प्राणः शरीरमस्य'—ऐसा बहुव्रीहि समास जिस अन्यर्था का बोधक है, वह समास-घटक 'अस्य'—इस सर्वनाम पद का अर्थ है जो कि सन्निकृष्टार्थ का परामर्शक माना जाता है। प्रकृत में ब्रह्म ही सन्निकृष्ट है। यह जो कहा गया है कि 'मनोमयः' इस पद का तद्धित (मयट्) प्रत्यय योग्यता के आधार पर 'अन्तःकरणोपाधिक जीव का उपास्यत्वेन उपनायक है, जीव को लेकर उपास्य की आकांक्षा निवृत्त हो जाती है, वहाँ ब्रह्म का अन्वय नहीं हो सकता। वह कहना सम्भव नहीं, क्योंकि 'मनोमय' पद सामान्यतः मनोविकार-सम्बन्धी पदार्थ का उपस्थापक है, वह जीव ही है—ऐसा नहीं कह

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