भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 288

२७० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [अ. १ पा. २ सू. १

शमविधिधिविवक्षया ब्रह्म निर्दिष्टं न स्वविवक्षयेत्युक्तम्। अत्रोच्यते—यद्यपि शमविधि- विवक्षया ब्रह्म निर्दिष्टं तथापि मनोमयत्वादिषूपदिश्यमानेषु तदेव ब्रह्म सन्निहितं भवति। जीवस्तु न सन्निहितो न च स्वशब्देनोपात्त इति वैषम्यम् ॥ १ ॥


भामती

'किमर्थमित्यत्रापि न विज्ञायते। तद्येनैष शब्दः समवेतार्थो भवति स समासार्थः। न चैष जीव एव समवेतार्थो न ब्रह्मणीति, तस्याप्राणो ह्यमना इत्यादिभिस्तद्विरहप्रतिपादनादिति युक्तम्। तस्यापि सर्वविकारकारणतया विकाराणां च स्वकारणादभेदात्तेषां च मनोमयतया ब्रह्मणस्तत्कारणस्य मनोमय- त्वोपपत्तेः। स्यादेतत् — जीवस्य साक्षात् मनोमयत्वादयो ब्रह्मणस्तु तद्द्वारा, तत्र प्रथमं द्वारस्य बुद्धिस्थत्वा- त्तदेवोपास्यमस्तु, न पुनर्जघन्यं ब्रह्म, ब्रह्मलिङ्गानि च जीवस्य ब्रह्मणोऽभेदाज्जीवेऽप्युपपत्स्यन्ते। तदेतदत्र सम्प्रधार्यम् — किं ब्रह्मलिङ्गैर्जीवानां तदभिन्नानामस्तु तद्गत्ता, तथा च जीवस्य मनोमयत्वादिभिः प्रथम- मवगमात्तस्यैवोपास्यत्वम्, उत न जीवस्य ब्रह्मलिङ्गवत्ता तदभिन्नस्यापि, जीवलिङ्गैस्तु ब्रह्म तद्गत्, तथा च ब्रह्मलिङ्गानां दर्शनात् तेषां च जीवेऽनुपपत्तेर्ब्रह्मणैवोपास्यमिति ? वयं तु पश्यामः—

समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत्।
विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत् ॥

समारोपितस्य हि रूपेण भुजङ्गस्य भीषणत्वादिना रज्जू रूपवती, न तु रज्जुरूपेणाभिगम्यत्वा-


भामती-व्याख्या

सकते, सांख्याभिमत प्रधानादि का भी ग्रहण किया जा सकता है। फलतः अन्यपरक (विहित शम की स्तुति के बोधक) "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" इस वाक्य के द्वारा ब्रह्म का उपास्यत्वेन ग्रहण करना चाहिए, सत्यसंकल्पत्वादि का स्वरसतः सामञ्जस्य भी ब्रह्म में ही होता है]। यद्यपि "अप्राणो ह्यमनाः" (मुण्ड. २।१।२) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा ब्रह्म में मनोमयत्वादि का साक्षात् सम्बन्ध निषिद्ध है, तथापि मन से अवच्छिन्न होने के कारण जो जीव मन का विकार या मनोमय माना जाता है, उस जीवरूप विकार का भी ब्रह्म कारण है, कार्य और कारण का अभेद होता है, इस प्रकार जीव के माध्यम से ब्रह्म में भी मनोमयत्वादि का सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।

शङ्का — जब कि मनोमयत्वादि का साक्षात् सम्बन्ध जीव के साथ और जीव के द्वारा ब्रह्म के साथ सम्पन्न किया जाता है, तब साक्षात् मनोमय जीव को ही उपास्य मानना चाहिए और जो ब्रह्म के लिङ्गों (धर्मों) का निर्देश है, वह भी जीव में घटा लेना चाहिए, क्योंकि जीव ब्रह्म से अभिन्न है।

समाधान — यहाँ यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि क्या ब्रह्म के धर्मों (व्यापकत्वादि) का जीव में सम्बन्ध ब्रह्म के माध्यम से माना जाय ? अथवा जीव के मनोमयत्वादि धर्मों का सम्बन्ध ब्रह्म में जीव के माध्यम से किया जाय ? यदि कहा जाय कि जीव के धर्मों का परम्परा सम्बन्ध ब्रह्म के साथ हो सकता है, किन्तु ब्रह्म के धर्मों का जीव के साथ परम्परा सम्बन्ध नहीं हो सकता, तब ब्रह्म के व्यापकत्वादि धर्मों का योग जीव में नहीं हो सकता, अतः उन धर्मों के द्वारा ब्रह्म को ही उपास्य मानना होगा। यहाँ हमारा (वाचस्पति मिश्र का) कहना यह है कि—

समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत्।
विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत् ॥

रज्जुरूप विषय (अधिष्ठान) में जहाँ सर्प का समारोप होता है, वहाँ सर्परूप समारोपित पदार्थ के प्रतीयमान भीषणत्वादि धर्मों का सम्बन्ध रज्जु के साथ तो हो जाता है, क्योंकि उस

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 288, कुल 639 में से · BharatKosha