भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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मनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंचालितम् २७१

विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ २ ॥

वक्तुमिच्छा विवक्षिता। यद्यप्यपौरुषेये वेदे वक्तुरभावान्नेच्छार्थः सम्भवति, तथाप्युपादानेन फलेनोपचर्यते। लोके हि यच्छब्दाभिहितमुपादेयं भवति तद्विवक्षितमित्युच्यते, यदनुपादेयं तदविवक्षितमिति। तद्ब्रह्मेऽप्युपादेयत्वेनाभिहितं विवक्षितं भवति, इतरदविवक्षितम्। उपादानानुपादाने तु वेदवाक्यतातपर्य्यातात्पर्य्याभ्यामवगम्येते। तदिह ये विवक्षिता गुणा उपासनायामुपादेयत्वेनोपदिष्टाः सत्यसंकल्पप्रभृत-


भामती

विना भुजङ्गो रूपवान्, तदा भुजङ्गस्यैवाभावात् किं रूपवत्। भुजङ्गदशायां तु न नास्ति वास्तवौ रज्जुः। तदिह समारोपितजीवरूपेण वस्तुसद् ब्रह्म रूपवदुच्यते, न तु ब्रह्मरूपैर्नित्यत्वादिभिर्जीवस्तद्वान् भवितुमर्हति, तस्य तदानीमसम्भवात्। तस्माद् ब्रह्मलिङ्गदर्शनाज्जीवे च तदसम्भवाद् ब्रह्मैवोपास्यं न जीव इति सिद्धम्। एतदुपलक्षणाय च सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति वाक्यमुपन्यस्तमिति। ॐ यद्यप्यपौरुषेयः इति ॐ। शास्त्रयोनित्त्वेऽपीश्वरस्य पूर्वपूर्वसृष्टिरचितसन्दभपिक्षरचनत्वेनास्वातन्त्र्यादपौरुषेयत्वाभिधानं, तथा चास्वातन्त्र्येण विवक्षा नास्तीत्युक्तम्। परिग्रहपरित्यागौ चोपादानानुपादाने उक्ते, न तूपादेयत्वमेव। अन्यथाोद्देश्यतयाऽनुपादेयस्य ग्रहादेरवविक्षितत्वेन चमसादावपि संमार्गप्रसङ्गात्। तस्मादनुपादेयत्वेऽपि


भामती-व्याख्या

समग्र रज्जुरूप विषय भी विद्यमान होता है, किन्तु रज्जु के प्रतीयमान ग्राह्यत्व और त्रिगुणत्वादि धर्मों का सम्बन्ध सर्प के साथ नहीं हो सकता, क्योंकि उस समय सर्प की सत्ता ही नहीं होती। सर्प-प्रतीति-काल में वास्तवी रज्जु नहीं होती—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि उसके बिना सर्प का भान ही नहीं हो सकता। प्रकृत में समारोपित जीव के मनोमयत्वादि धर्मों को लेकर ब्रह्म मनोमय कहा जा सकता है, किन्तु ब्रह्म के व्यापकत्व नित्यत्वादि धर्मों को लेकर जीव वैसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आरोप के पहले जीव की सत्ता ही नहीं मानी जाती। फलतः ब्रह्म के प्रतीयमान नित्यत्वादि धर्मों का सम्बन्ध जीव में सम्भव न होने के कारण ब्रह्म ही प्रक्रान्त उपासना का उपास्य है, जीव नहीं—इस भाव को ध्वनित करने के लिए ही भाष्यकार ने कहा है कि "इह च सर्वं खल्विदं ब्रह्म इति वाक्योपक्रमे श्रुतम्, तदेव मनोमयत्वादिधर्मैर्विशिष्टमुपदिश्यते इति युक्तम्" ॥ १ ॥

“विवक्षितगुणोपपत्तेश्च”—इस सूत्र में उपात्त विवक्षा (वक्तुमिच्छा) की अनुपपत्ति उठाते हुए भाष्यकार ने कहा है— "यद्यपि अपौरुषेये वेदे वक्तुरभावात् नेच्छार्थः सम्भवति"। यद्यपि “शास्त्रयोनित्वात्"—इस सूत्र में ईश्वर को वेदों का वक्ता माना गया है, उसकी इच्छा अनुपपन्न नहीं, तथापि ईश्वर भी गतकल्पीय वेद का ही उपदेष्टा है, स्वतन्त्रतया वेद का रचयिता नहीं माना जाता, अतः वेद के स्वतन्त्र वक्ता की इच्छा अनुपपन्न है। भाष्यकार ने जो कहा है— "उपादानेन फलेनोपचर्यते"। वहाँ उपादान का अर्थ ग्रहण है, विधेय नहीं, क्योंकि लोक में ग्राह्य पदार्थ को विवक्षित कहा जाता है, पदार्थगत विवक्षितत्व का पदार्थकर्मक उपादान (ग्रहण) उपलक्षक होता है। [स्वर्गादि फल के उद्देश्य से यागादि साधन पदार्थों का विधान होता है। विधेय पदार्थ को अगृहीत-ग्राह्य माना जाता है, यागादि यद्यपि ईश्वर के द्वारा गृहीत है, तथापि वह स्वतन्त्र वक्ता नहीं, अतः स्वतन्त्र वक्ता के द्वारा वह अगृहीत है। विधि वाक्य के द्वारा जो विधेय या उपादेय होता है, उसे ही विवक्षित मानने पर लौकिक भोजनादि दृष्टान्तों में उसका सामञ्जस्य नहीं होता, अतः भाष्यस्थ 'उपादान' शब्द का ग्रहण और 'अनुपादान' शब्द का अग्रहण अर्थ अभिमत है]। यदि विधेयत्व-समानाधिकरण उपादेयत्व को ही विवक्षितत्त्व का उपलक्षक माना जाता है, तब स्वर्गादिरूप उद्देश्य पदार्थों