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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

२७० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [अ. १ पा. २ सू. १

शमविधिधिविवक्षया ब्रह्म निर्दिष्टं न स्वविवक्षयेत्युक्तम्। अत्रोच्यते—यद्यपि शमविधि- विवक्षया ब्रह्म निर्दिष्टं तथापि मनोमयत्वादिषूपदिश्यमानेषु तदेव ब्रह्म सन्निहितं भवति। जीवस्तु न सन्निहितो न च स्वशब्देनोपात्त इति वैषम्यम् ॥ १ ॥


भामती

'किमर्थमित्यत्रापि न विज्ञायते। तद्येनैष शब्दः समवेतार्थो भवति स समासार्थः। न चैष जीव एव समवेतार्थो न ब्रह्मणीति, तस्याप्राणो ह्यमना इत्यादिभिस्तद्विरहप्रतिपादनादिति युक्तम्। तस्यापि सर्वविकारकारणतया विकाराणां च स्वकारणादभेदात्तेषां च मनोमयतया ब्रह्मणस्तत्कारणस्य मनोमय- त्वोपपत्तेः। स्यादेतत् — जीवस्य साक्षात् मनोमयत्वादयो ब्रह्मणस्तु तद्द्वारा, तत्र प्रथमं द्वारस्य बुद्धिस्थत्वा- त्तदेवोपास्यमस्तु, न पुनर्जघन्यं ब्रह्म, ब्रह्मलिङ्गानि च जीवस्य ब्रह्मणोऽभेदाज्जीवेऽप्युपपत्स्यन्ते। तदेतदत्र सम्प्रधार्यम् — किं ब्रह्मलिङ्गैर्जीवानां तदभिन्नानामस्तु तद्गत्ता, तथा च जीवस्य मनोमयत्वादिभिः प्रथम- मवगमात्तस्यैवोपास्यत्वम्, उत न जीवस्य ब्रह्मलिङ्गवत्ता तदभिन्नस्यापि, जीवलिङ्गैस्तु ब्रह्म तद्गत्, तथा च ब्रह्मलिङ्गानां दर्शनात् तेषां च जीवेऽनुपपत्तेर्ब्रह्मणैवोपास्यमिति ? वयं तु पश्यामः—

समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत्।
विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत् ॥

समारोपितस्य हि रूपेण भुजङ्गस्य भीषणत्वादिना रज्जू रूपवती, न तु रज्जुरूपेणाभिगम्यत्वा-


भामती-व्याख्या

सकते, सांख्याभिमत प्रधानादि का भी ग्रहण किया जा सकता है। फलतः अन्यपरक (विहित शम की स्तुति के बोधक) "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" इस वाक्य के द्वारा ब्रह्म का उपास्यत्वेन ग्रहण करना चाहिए, सत्यसंकल्पत्वादि का स्वरसतः सामञ्जस्य भी ब्रह्म में ही होता है]। यद्यपि "अप्राणो ह्यमनाः" (मुण्ड. २।१।२) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा ब्रह्म में मनोमयत्वादि का साक्षात् सम्बन्ध निषिद्ध है, तथापि मन से अवच्छिन्न होने के कारण जो जीव मन का विकार या मनोमय माना जाता है, उस जीवरूप विकार का भी ब्रह्म कारण है, कार्य और कारण का अभेद होता है, इस प्रकार जीव के माध्यम से ब्रह्म में भी मनोमयत्वादि का सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।

शङ्का — जब कि मनोमयत्वादि का साक्षात् सम्बन्ध जीव के साथ और जीव के द्वारा ब्रह्म के साथ सम्पन्न किया जाता है, तब साक्षात् मनोमय जीव को ही उपास्य मानना चाहिए और जो ब्रह्म के लिङ्गों (धर्मों) का निर्देश है, वह भी जीव में घटा लेना चाहिए, क्योंकि जीव ब्रह्म से अभिन्न है।

समाधान — यहाँ यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि क्या ब्रह्म के धर्मों (व्यापकत्वादि) का जीव में सम्बन्ध ब्रह्म के माध्यम से माना जाय ? अथवा जीव के मनोमयत्वादि धर्मों का सम्बन्ध ब्रह्म में जीव के माध्यम से किया जाय ? यदि कहा जाय कि जीव के धर्मों का परम्परा सम्बन्ध ब्रह्म के साथ हो सकता है, किन्तु ब्रह्म के धर्मों का जीव के साथ परम्परा सम्बन्ध नहीं हो सकता, तब ब्रह्म के व्यापकत्वादि धर्मों का योग जीव में नहीं हो सकता, अतः उन धर्मों के द्वारा ब्रह्म को ही उपास्य मानना होगा। यहाँ हमारा (वाचस्पति मिश्र का) कहना यह है कि—

समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत्।
विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत् ॥

रज्जुरूप विषय (अधिष्ठान) में जहाँ सर्प का समारोप होता है, वहाँ सर्परूप समारोपित पदार्थ के प्रतीयमान भीषणत्वादि धर्मों का सम्बन्ध रज्जु के साथ तो हो जाता है, क्योंकि उस

मनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंचालितम् २७१

विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ २ ॥

वक्तुमिच्छा विवक्षिता। यद्यप्यपौरुषेये वेदे वक्तुरभावान्नेच्छार्थः सम्भवति, तथाप्युपादानेन फलेनोपचर्यते। लोके हि यच्छब्दाभिहितमुपादेयं भवति तद्विवक्षितमित्युच्यते, यदनुपादेयं तदविवक्षितमिति। तद्ब्रह्मेऽप्युपादेयत्वेनाभिहितं विवक्षितं भवति, इतरदविवक्षितम्। उपादानानुपादाने तु वेदवाक्यतातपर्य्यातात्पर्य्याभ्यामवगम्येते। तदिह ये विवक्षिता गुणा उपासनायामुपादेयत्वेनोपदिष्टाः सत्यसंकल्पप्रभृत-


भामती

विना भुजङ्गो रूपवान्, तदा भुजङ्गस्यैवाभावात् किं रूपवत्। भुजङ्गदशायां तु न नास्ति वास्तवौ रज्जुः। तदिह समारोपितजीवरूपेण वस्तुसद् ब्रह्म रूपवदुच्यते, न तु ब्रह्मरूपैर्नित्यत्वादिभिर्जीवस्तद्वान् भवितुमर्हति, तस्य तदानीमसम्भवात्। तस्माद् ब्रह्मलिङ्गदर्शनाज्जीवे च तदसम्भवाद् ब्रह्मैवोपास्यं न जीव इति सिद्धम्। एतदुपलक्षणाय च सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति वाक्यमुपन्यस्तमिति। ॐ यद्यप्यपौरुषेयः इति ॐ। शास्त्रयोनित्त्वेऽपीश्वरस्य पूर्वपूर्वसृष्टिरचितसन्दभपिक्षरचनत्वेनास्वातन्त्र्यादपौरुषेयत्वाभिधानं, तथा चास्वातन्त्र्येण विवक्षा नास्तीत्युक्तम्। परिग्रहपरित्यागौ चोपादानानुपादाने उक्ते, न तूपादेयत्वमेव। अन्यथाोद्देश्यतयाऽनुपादेयस्य ग्रहादेरवविक्षितत्वेन चमसादावपि संमार्गप्रसङ्गात्। तस्मादनुपादेयत्वेऽपि


भामती-व्याख्या

समग्र रज्जुरूप विषय भी विद्यमान होता है, किन्तु रज्जु के प्रतीयमान ग्राह्यत्व और त्रिगुणत्वादि धर्मों का सम्बन्ध सर्प के साथ नहीं हो सकता, क्योंकि उस समय सर्प की सत्ता ही नहीं होती। सर्प-प्रतीति-काल में वास्तवी रज्जु नहीं होती—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि उसके बिना सर्प का भान ही नहीं हो सकता। प्रकृत में समारोपित जीव के मनोमयत्वादि धर्मों को लेकर ब्रह्म मनोमय कहा जा सकता है, किन्तु ब्रह्म के व्यापकत्व नित्यत्वादि धर्मों को लेकर जीव वैसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आरोप के पहले जीव की सत्ता ही नहीं मानी जाती। फलतः ब्रह्म के प्रतीयमान नित्यत्वादि धर्मों का सम्बन्ध जीव में सम्भव न होने के कारण ब्रह्म ही प्रक्रान्त उपासना का उपास्य है, जीव नहीं—इस भाव को ध्वनित करने के लिए ही भाष्यकार ने कहा है कि "इह च सर्वं खल्विदं ब्रह्म इति वाक्योपक्रमे श्रुतम्, तदेव मनोमयत्वादिधर्मैर्विशिष्टमुपदिश्यते इति युक्तम्" ॥ १ ॥

“विवक्षितगुणोपपत्तेश्च”—इस सूत्र में उपात्त विवक्षा (वक्तुमिच्छा) की अनुपपत्ति उठाते हुए भाष्यकार ने कहा है— "यद्यपि अपौरुषेये वेदे वक्तुरभावात् नेच्छार्थः सम्भवति"। यद्यपि “शास्त्रयोनित्वात्"—इस सूत्र में ईश्वर को वेदों का वक्ता माना गया है, उसकी इच्छा अनुपपन्न नहीं, तथापि ईश्वर भी गतकल्पीय वेद का ही उपदेष्टा है, स्वतन्त्रतया वेद का रचयिता नहीं माना जाता, अतः वेद के स्वतन्त्र वक्ता की इच्छा अनुपपन्न है। भाष्यकार ने जो कहा है— "उपादानेन फलेनोपचर्यते"। वहाँ उपादान का अर्थ ग्रहण है, विधेय नहीं, क्योंकि लोक में ग्राह्य पदार्थ को विवक्षित कहा जाता है, पदार्थगत विवक्षितत्व का पदार्थकर्मक उपादान (ग्रहण) उपलक्षक होता है। [स्वर्गादि फल के उद्देश्य से यागादि साधन पदार्थों का विधान होता है। विधेय पदार्थ को अगृहीत-ग्राह्य माना जाता है, यागादि यद्यपि ईश्वर के द्वारा गृहीत है, तथापि वह स्वतन्त्र वक्ता नहीं, अतः स्वतन्त्र वक्ता के द्वारा वह अगृहीत है। विधि वाक्य के द्वारा जो विधेय या उपादेय होता है, उसे ही विवक्षित मानने पर लौकिक भोजनादि दृष्टान्तों में उसका सामञ्जस्य नहीं होता, अतः भाष्यस्थ 'उपादान' शब्द का ग्रहण और 'अनुपादान' शब्द का अग्रहण अर्थ अभिमत है]। यदि विधेयत्व-समानाधिकरण उपादेयत्व को ही विवक्षितत्त्व का उपलक्षक माना जाता है, तब स्वर्गादिरूप उद्देश्य पदार्थों

२७२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [अ. १ पा. २ सू. २

यस्ते परस्मिन्ब्रह्मण्युपपद्यन्ते । सत्यसंकल्पत्वं हि सृष्टिस्थितिसंहारेष्वप्रतिबद्धशक्तित्वात् परमात्मन एवावकल्पते । परमात्मगुणत्वेन च 'य आत्माऽपहतपाप्मा' (छा० ८।७।१) इत्यत्र 'सत्यकामः सत्यसंकल्प' इति श्रुतम्। आकाशात्मेत्यादिनाकाशवदात्माऽस्येत्यर्थः । सर्वगतत्वादिभिर्धर्मैः संभवत्याकाशेन साम्यं ब्रह्मणः । 'ज्यायान्पृथिव्याः' इत्यादिना चैतदेव दर्शयति । यदाप्याकाश आत्मा यस्येति व्याख्यायते, तदापि संभवति सर्वजगत्कारणस्य सर्वात्मनो ब्रह्मण आकाशात्मत्वम् । अत एव 'सर्वकर्मा' इत्यादि । एवमिहोपास्यतया विवक्षिता गुणा ब्रह्मण्युपपद्यन्ते । यत्तूक्तं 'मनोमयः प्राणशरीरः' (छा० ३।१४।२) इति जीवलिङ्गं न तद् ब्रह्मण्युपपद्यत इति तदपि ब्रह्मण्युपपद्यत इति ब्रूमः, सर्वात्मकत्वाद्धि ब्रह्मणो जीवसम्बन्धीनि मनोमयत्वादीनि ब्रह्मसम्बन्धीनि भवन्ति । तथा च ब्रह्मविषये श्रुतिस्मृती भवतः—'त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः' (श्वे० ४।१३) इति, 'सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति' (गी० १३।१३) इति च । 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' (मुण्ड २।१।२) इति श्रुतिः शुद्धब्रह्मविषया, इयं तु 'मनोमयः प्राणशरीरः' इति सगुणब्रह्मविषयेति विशेषः । अतो विवक्षितगुणोपपत्तेः परमेव ब्रह्महोपास्यत्वेनोपदिष्टमिति गम्यते ॥ २ ॥

अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ ३ ॥

पूर्वेण सूत्रेण ब्रह्मणि विवक्षितानां गुणानामुपपत्तिरुक्ता । अनेन तु शारीरे तेषा-


भामती

ग्रह उद्देश्यतया परिगृहीतो विवक्षितः । तद्गतं त्वेकत्वमवच्छेदकत्वेन वर्जितमविवक्षितम् । इच्छानिच्छे च भक्तिः । तदिदमुक्तम् ॐ वेदवाक्य तात्पर्यातात्पर्याभ्यामवगम्येते इति ॐ । यत्परं वेदवाक्यं तत्तेनोपात्तं विवक्षितम्, अतत्परेण चानुपात्तमविवक्षितमित्यर्थः ॥ २ ॥

स्यादेतत्—यथा सत्यसङ्कल्पादयो ब्रह्मण्युपपद्यन्ते । एवं शारीरेऽप्युपपद्यन्ते, शारीरस्य ब्रह्मणोऽभे-


भामती-व्याख्या

को विवक्षित नहीं कह सकेंगे, क्योंकि वे उपादेय नहीं होते । उद्देश्य को अविवक्षित मान लेने पर “ग्रहं सम्मार्ष्टि” इस विधि में ग्रहत्व अविवक्षित हो जाता है, अतः चमसादि में भी सम्मार्जन प्राप्त होगा [डमरू के आकार के काष्ठमय पात्रों को 'ग्रह' कहा जाता है, क्योंकि उनमें सोमरस का ग्रहण किया जाता है और चतुष्कोणाकार काष्ठमय पात्रों को 'चमस' कहते हैं, क्योंकि उसमें रखे सोमरसादि का भक्षण अध्वर्यु आदि किया करते हैं]। जब गृहीतत्व धर्म को विवक्षितत्व का उपलक्षक मानते हैं, तब सम्मार्जन के लिए 'ग्रहसंज्ञक' पात्र ही गृहीत होते हैं, अतः ग्रहत्व विवक्षित हो जाता है, चमसादि में ग्रहत्व धर्म न होने के कारण उनमें सम्मार्ग प्राप्त नहीं होता जैसा कि चमसाधिकरण (जै. सू. ३।१।८) में निर्णीत है। “ग्रहं सम्मार्ष्टि”—यहाँ 'ग्रह' पद में एकवचन रखा गया है, उसके आधार पर एक ही ग्रह का सम्मार्जन प्राप्त होता है, अतः एकत्व विवक्षित (ग्रहगत उद्देश्यत्व का अवच्छेदक) नहीं माना जाता, फलतः सभी ग्रहों का सम्मार्जन होता है ग्रहैकत्वाधिकरण (जै. सू. ३।१।७) में ऐसा ही सिद्ध किया गया है । विवक्षित और अविवक्षित पदार्थों में इच्छा और अनिच्छा का गौणरूपेण प्रवेश माना जाता है । भाष्यकार ने यही ध्वनित करने के लिए कहा है— “उपादानानुपादाने तु वेदवाक्य तात्पर्यातात्पर्याभ्यामवगम्येते”। अर्थात् वेद-वाक्य का जिस अर्थ में तात्पर्य होता है, वह विवक्षित और जिस अर्थ में तात्पर्य नहीं होता, वह अविवक्षित है ॥ २ ॥

मनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २७३

मनुपपत्तिरुच्यते । तुशब्दोऽवधारणार्थः । ब्रह्मैवोक्तेन न्यायेन मनोमयत्वादिशुणं, न तु शारीरो जीवो मनोमयत्त्वादिगुणः, यत्कारणं 'सत्यसंकल्पः' आकाशात्मा, अवाकी, अनादरः, ज्यायान्पृथिव्या' इति चैवंजातीयका गुणा न शारीर आञ्जस्येनोपपद्यन्ते । शारीर इति शरीरे भव इत्यर्थः । नन्वीश्वरोऽपि शरीरे भवति । सत्यम्, शरीरे भवति, न तु शरीर एव भवति, 'ज्यायान्पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षात्' ( छा० ३।१४।३ ) 'आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः' ( गौड० ३।३ ) इति व्यापित्वश्रवणात् । जीवस्तु शरीर एव भवति, तस्य भोगाधिष्ठानाच्छरीरादन्यत्र वृत्त्यभावात् ॥ ३ ॥

कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॥ ४ ॥

इतश्च न शारीरो मनोमयत्वादिगुणः, यस्मात्कर्मकर्तृव्यपदेशो भवति 'एतमितः प्रेत्याभिसंभवितास्मि' ( छा० ३।१४।४ ) इति । एतमिति प्रकृतं मनोमयत्त्वादिगुणमुपा- स्यमात्मानं कर्मत्वेन प्राप्यत्वेन व्यपदिशति । अभिसंभवितास्मीति शारीरमुपासकं कर्तृत्वेन प्राप्तृत्वेन । अभिसंभवितास्मीति प्राप्तास्मीत्यर्थः । न च सत्यां गतावेकस्य कर्मकर्तृव्यपदेशो युक्तः । तथोपास्योपासकभावोऽपि भेदाधिष्ठान एव । तस्मादपि न शारीरो मनोमयत्त्वादिविशिष्टः ॥ ४ ॥

शब्दविशेषात् ॥ ५ ॥

इतश्च शारीरादन्यो मनोमयत्त्वादिगुणः, यस्माच्छब्दविशेषो भवति समान- प्रकरणे श्रुत्यन्तरे-'यथा व्रीहिर्वा यवो वा श्यामाको वा श्यामाकतण्डुलो वैवमयं- न्तरात्मन् पुरुषो हिरण्मयः' (शत० ब्रा० १०।६।३।२) इति । शारीरस्यात्मनो यः शब्दोऽ- भिधायकः सप्तम्यन्तोऽन्तरात्मन्निति, तस्माद्विशिष्टोऽन्यः प्रथमान्तः पुरुषशब्दो मनोमयत्त्वादिविशिष्टस्यात्मनोऽभिधायकः । तस्मात्तयोर्भेदोऽधिगम्यते ॥ ५ ॥

स्मृतेश्च ॥ ६ ॥

स्मृतिश्च शारीरपरमात्मनोर्भेदं दर्शयति-'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया' (गी० १८।६१) इत्याद्या । अत्राह-कः पुनरयं शारीरो नाम परमात्मनोऽन्यः, यः प्रतिषिध्यते 'अनुपपत्तेस्तु न

भामती वात् । शारीरगुणा इव मनोमयत्वादयो ब्रह्मण्यीयत आह सूत्रकारः-अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ ३ ॥ यत्तदवोचाम समारोप्यधर्माः समारोपविषये सम्भवन्ति, न तु विषयधर्माः समारोप्य इति । तस्यैत उत्थानम् । अत्राह चोदकः ॐ कः पुनरयं शारीरो नाम इति ॐ । न तावद्द्वेदप्रतिषेधाद्द्वेवे-

भामती-व्याख्या यह जो शङ्का होती है कि सत्यसंकल्पत्वादि धर्म जैसे ब्रह्म में घटते हैं, वैसे ही शारीर (जीव) में भी उपपन्न हो सकते हैं, क्योंकि जीव का ब्रह्म से अभेद है। जीव के मनोमय- त्वादि धर्मों का ब्रह्म में जैसे समन्वय किया जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म के सत्यसंकल्पादि धर्मों का जीव में सामञ्जस्य क्यों नहीं किया जा सकता ?

उस शङ्का का समाधान करने के लिए सूत्रकार ने कहा है- "अनुपपत्तेस्तु न शारीरः" । जीव केवल शरीर में रहने के कारण शारीर कहलाता है, अतः उसमें व्यापक ब्रह्म के व्यापकत्त्वादि धर्म उपपन्न नहीं हो सकते ॥ ३-५ ॥

यह जो कहा गया कि आरोपित (अध्यस्त) पदार्थ के धर्म अधिष्ठान में व्यवहृत होते हैं, अधिष्ठान के धर्म अध्यस्त में नहीं। उस पर पूर्वपक्षी शङ्का करता है कि ब्रह्म में अध्यस्त जीव ब्रह्म से भिन्न क्योंकर होगा ? जिन दो पदार्थों में भेद का निषेध एवं भेद का व्यवहार ३५

२७४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. २ सू. ७

शारीरः' इत्यादिना ? श्रुतिस्तु—'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता' ( बृ० ३।७।२३ ) इत्येवंजातीयका परमात्मनोऽन्यमात्मानं वारयति । तथा स्मृतिरपि—'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत' ( गी० १३।२ ) इत्येवंजातीयकेति । अत्रोच्यते—सत्यमेवैतत्, पर एवात्मा देहेन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिभिः परिच्छिद्यमानो बालैः शारीर इत्युपचर्यते । यथा घटकरकाद्युपाधिवशादपरिच्छिन्नमपि नभः परिच्छिन्नवदवभासते, तद्वत् । तदपेक्षया च कर्मकर्तृत्वादिभेदव्यवहारो न विरुध्यते, प्राक् 'तत्त्वमसि' इत्यात्मैकत्वोपदेशग्रहणात् । गृहीते त्वात्मैकत्वे बन्धमोक्षादिसर्वव्यवहारपरिसमाप्तिरेव स्यात् ॥ ६ ॥

अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च ॥ ७ ॥

अर्भकमल्पम्, ओको नीडम्, 'एष म आत्माऽन्तर्हृदये' ( छा० ३।१४।३ ) इति परिच्छिन्नायतनत्वात्, स्वशब्देन च 'अणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा' इत्यणीयस्त्वव्यपदेशात्, शारीर एवाराग्रमात्रो जीव इहोपदिश्यते, न सर्वगतः परमात्मेति यदुक्तं तत्परिहर्तव्यम् । अत्रोच्यते—नायं दोषः, न तावत्परिच्छिन्नदेशस्य सर्वगतत्वव्यपदेशः कथमप्युपपद्यते, सर्वगतस्य तु सर्वदेशेषु विद्यमानत्वात्परिच्छिन्नदेशव्यपदेशोऽपि

भामती व्यपदेशाच्च भेदाभेदावेकत्र भाविकौ भवितुमर्हतो विरोधादित्युकतम् । तस्मादेकमिह तात्त्विकमतात्त्विकं चेतरत् । तत्र पौर्वापर्येणाद्वैतप्रतिपादनपरत्वाद्वेदान्तानां द्वैतप्रहाणस्य मानान्तरस्याभावात्तद्वाघानाच्च, तेनाद्वैतमेव परमार्थः । तथा चानुपपत्तेस्त्वित्यस्यासङ्गतार्थमिव्यतः । परिहरति ॐ सत्यमेवैतत्, पर एवात्मा देहेन्द्रियमनोबुद्धयुपाधिभिरवच्छिद्यमानो बालैः शारीर इत्युपचर्यते ॐ । अनाद्यविद्यावच्छेदलब्धजीवभावः पर एवात्मा स्वतो भेदेनावभासते । तादृशाञ्च जीवानामाविद्या, न तु निरुपाधिको ब्रह्मणः । न चाविद्यायां सत्यां जीवात्मविभागः, सति च जीवात्मविभागे तदाश्रयाऽविद्येत्यन्योन्याश्रयमिति साम्प्रतम् । अनादित्वेन जीवाविद्ययोर्बीजाङ्कुरवदनवक्लृप्तेरयोगात् । न च सर्वज्ञस्य सर्वशक्तेश्च स्वतः कुतोऽकस्मा-

भामती-व्याख्या होता है, उनमें भेद और अभेद—दोनों तात्त्विक क्योंकर रह सकेंगे ? भेद और अभेद परस्पर अत्यन्त विरुद्ध होने के कारण एकत्र नहीं रह सकते, अतः भेद और अभेद में से यहाँ एक वास्तविक और दूसरा काल्पनिक मानना होगा । वेदान्त-वाक्यों के पौर्वापर्य को देख कर अभेद में तात्पर्य स्थिर होता है, भेद-ग्रह में अन्य कोई प्रमाण सुलभ नहीं, प्रत्युत “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा, नान्योऽतोऽस्ति श्रोता' ( बृह. उ. ३।७।२३ ) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा भेद का निषेध किया गया है । परिशेषतः जीव और ब्रह्म का अभेद ही पारमार्थिक सिद्ध होता है, अतः “अनुपपत्तेस्तु न शारीरः”—यह सूत्र संगतार्थक नहीं रह जाता, क्योंकि जब जीव ब्रह्म से भिन्न ही नहीं, तब जीव का निषेध और ब्रह्म का विधान क्योंकर हो सकेगा ?

उक्त शङ्का का परिहार-भाष्य है—“सत्यमेवैतत् । पर एवात्मा देहेन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिभिरवच्छिद्यमानो बालैः शारीर इत्युपचर्यते”। अर्थात् अनादि अविद्यारूप अवच्छेदक का भेद पाकर परमात्मा ही जीवरूप से पृथक् अवभासित होता है । उन्हीं जीवों की अविद्या मानी जाती है, उपाधि-रहित ब्रह्म की नहीं। अविद्या के होने पर जीव और ब्रह्म का विभाग एवं जीव-ब्रह्म का भेद होने पर जीवाश्रित अविद्या सिद्ध होगी—इस प्रकार अन्योन्याश्रय दोष क्यों नहीं होता ? ऐसे प्रश्न का उत्तर देने के लिए अविद्या का अनादि विशेषण लगाया है । जीव और अविद्या का बीज और अंकुर के समान अनादि प्रवाह होने के कारण अन्योन्याश्रय दोष नहीं माना जाता ।

मनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २७५

कयाचिदपेक्षया सम्भवति । यथा समस्तवसुधाधिपतिरपि हि सन्नयोध्याधिपतिरिति व्यपदिश्यते । कया पुनरपेक्षया सर्वगतः सन्नीश्वरोऽर्भकौका अणीयांश्च व्यपदिश्यत इति ? निचाय्यत्वादेवेति ब्रूमः । एवमणीयस्त्वादिगुणगणोपेत ईश्वरस्तत्र हृदयपुण्डरीके निचाय्यो द्रष्टव्य उपदिश्यते, यथा शालग्रामे हरिः । तत्रास्य बुद्धिविज्ञानं ग्राहकम् । सर्वगतोऽपीश्वरस्तत्रोपास्यमानः प्रसीदति । व्योमवच्चैतद् द्रष्टव्यम् । यथा सर्वगतमपि सद् व्योम सूचीपाशाद्यपेक्षयार्भकौकोऽणीयश्च व्यपदिश्यते; एवं ब्रह्मापि । तदेवं निचाय्यत्वापेक्षं ब्रह्मणोऽर्भकौकस्त्वमणीयस्त्वं च न पारमार्थिकम् । तत्र यदाशङ्क्यते—हृदायतनत्वाद् ब्रह्मणो हृदायतनानां च प्रतिशरीरं भिन्नत्वाद्विम्बायातनानां च शुकादीनामनेकत्वसावयवत्वानित्यत्वादिदोषदर्शनाद् ब्रह्मणोऽपि तत्प्रसङ्ग इति, तदपि परिहृतं भवति ॥ ७ ॥

संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥ ८ ॥

व्योमवत्सर्वगतस्य ब्रह्मणः सर्वप्राणिहृदयसम्बन्धाद्, चिद्रूपतया च शारीराद-


भामती

त्संसारिता, यो हि परतन्त्रः सोऽन्येन बन्धनागारे प्रवेश्येत, न तु स्वतन्त्रः, इति वाच्यम् । नहि तद्भागस्य जीवस्य सम्प्रतितनो बन्धनागारप्रवेशिता येनानुयुज्येत, किन्त्वयमनादिः पूर्वपूर्वकर्मविद्यासंस्कारनिबन्धना नानुयोगमर्हति । न चैतावता ईश्वरस्यानीशता, नह्युपकरणाद्यपेक्षिता कर्तुः स्वातन्त्र्यं विहन्ति । तस्माद्यत्किञ्चिदेतदपोति ।

विशेषादिति वक्तव्ये वैशेष्याभिधानमात्यन्तिकं विशेषं प्रतिपादयितुम् । यथा ह्यविद्याकल्पितः सुखादिसम्भोगोऽविद्यात्मन एव जीवस्य युज्यते, न तु निर्मृष्टनिखिलाविद्यातद्वासनस्य शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावस्य परमात्मन इत्यर्थः । शेषमतिरोहितार्थम् ॥ ३-८ ॥


भामती-व्याख्या

शङ्का — ब्रह्म सर्वज्ञ, सर्वशक्ति-समन्वित (स्वतन्त्र) है, उसमें अकस्मात् संसारित्व (जीवभाव) उपपन्न नहीं हो सकता, क्योंकि जो अल्पज्ञ और परतन्त्र होता है, वही किसी शासक के द्वारा बन्धनागार में डाला जाता है, स्वतन्त्र पुरुष नहीं।

समाधान — ब्रह्म के अंशभूत जीव में संसारिता आज पैदा नहीं हुई, कि उसके लिए यह प्रश्न उठता कि 'कुतोऽकस्मादस्य संसारिता ?' संसारिता तो अनादि है और जीव के पूर्व-पूर्व जन्मों में अर्जित कर्म, अविद्या और संस्कार के द्वारा उत्तरोत्तर संसरण होता जाता है। अविद्यादि की अपेक्षा होने से ईश्वर में स्वातन्त्र्य नहीं रहता—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि कुलालादि में दण्ड, चक्रादि की अपेक्षा होने पर भी घटादि का स्वतन्त्रकर्तृत्व नष्ट नहीं होता। अतः भेदाश्रित सभी आक्षेप निर्मूल हो जाते हैं क्योंकि भेद वास्तविक नहीं, आविद्यिक मात्र है ॥ ६-७ ॥

"सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न, वैशेष्यात्"—इस सूत्र में जीव और ब्रह्म का आत्यन्तिक भेद बताने के लिए 'विशेषात्'—ऐसा न कह कर 'वैशेष्यात्' ऐसा अभिधान किया गया है, क्योंकि अविद्या के द्वारा कल्पित सुखादि रूप सम्भोग अविद्यारूप जीव में ही बन सकता है, अविद्या एवं अविद्या-जन्य संस्कार से रहित, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वरूप ब्रह्म में नहीं हो सकता—इस प्रकार का वैशिष्ट्य 'वैशेष्य' पद में विहित भावार्थक 'ष्यञ्' प्रत्यय के द्वारा ही आविष्कृत होता है। अवशिष्ट भाष्य अत्यन्त स्पष्टार्थक है ॥ ८ ॥

२७६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. २ सू. ९

विशिष्टत्वात्, सुखदुःखादिसंभोगोऽप्यविशिष्टः प्रसज्येत । एकत्वाच्च । न हि परस्मादात्मनोऽन्यः कश्चिदात्मा संसारी विद्यते, 'नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता' (बृ० ३।७।२३) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तस्मात्परस्यैव ब्रह्मणः संसारसंभोगप्राप्तिरिति चेत् न, वैशेष्यात् । न तावत्सर्वप्राणिहृदयसंबन्धाच्चिद्रूपतया च शारीरवद् ब्रह्मणः संभोगप्रसङ्गः, वैशेष्यात् । विशेषो हि भवति शारीरपरमेश्वरयोः । एकः कर्ता भोक्ता धर्माधर्मादिसाधनः सुखदुःखादिमांश्च । एकस्तद्विपरीतोऽपहतपाप्मत्वादिगुणः । एतस्मादनयोर्विशेषादेकस्य भोगो नेतरस्य । यदि च सन्निधानमात्रेण वस्तुशक्तिमनाश्रित्य कार्यसम्बन्धोऽभ्युपगम्येत, आकाशादीनामपि दाहादिप्रसङ्गः । सर्वगतानेकात्मवादिनामपि समावेतौ चोद्यपरिहारौ । यदप्येकत्वाद् ब्रह्मण आत्मन्तराभावाच्छारीरस्य भोगेन ब्रह्मणो भोगप्रसङ्ग इति । अत्र वदामः—इदं तावद्देवानांप्रियः प्रष्टव्यः । कथमयं त्वयात्मान्तराभावोऽध्यवसीयत इति ? 'तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि', 'नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता' इत्यादिशास्त्रेभ्य इति चेत्, यथाशास्त्रं तर्हि शास्त्रीयोऽर्थः प्रतिपत्तव्यो न तत्रार्धजरतीयं लभ्यम् । शास्त्रं च 'तत्त्वमसि' इत्यपहतपाप्मत्वादिविशेषणं ब्रह्म शारीरस्यात्मत्वेनोपदिशच्छारीरस्यैव तावदुपभोक्तृत्वं वारयति । कुतस्तदुपभोगेन ब्रह्मण उपभोगप्रसङ्गः ? अथागृहीतं शारीरस्य ब्रह्मैकत्वं, तदा मिथ्याज्ञाननिमित्तः शारीरस्योपभोगः, न तेन परमार्थरूपस्य ब्रह्मणः संस्पर्शः । न हि बालैस्तलमलिनतादिभिर्व्योम्नि विकल्प्यमाने तलमलिनतादिविशिष्टमेव परमार्थतो व्योम भवति । तदाह—न, वैशेष्यादिति । नैकत्वेऽपि शारीरस्योपभोगेन ब्रह्मण उपभोगप्रसङ्गः, वैशेष्यात् । विशेषो हि भवति मिथ्याज्ञानसम्यग्ज्ञानयोः । मिथ्याज्ञानकल्पित उपभोगः, सम्यग्ज्ञानदृष्टमेकत्वम् । न च मिथ्याज्ञानकल्पितेनोपभोगेन सम्यग्ज्ञानदृष्टं वस्तु संस्पृश्यते । तस्मान्नोपभोगगन्धोऽपि शक्य ईश्वरस्य कल्पयितुम् ॥ ८ ॥


( अत्रधिकरणम् । सू० ९-१० )
अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ ९ ॥

कठवल्लीषु पठ्यते—'यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः' (१।२।२४) इति । अत्र कश्चिदोदनोपसेचनसूचितोऽत्ता प्रती-


भामती

कठवल्लीषु पठ्यते—
'यस्य च ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥' इति ॥
अत्र चादनीयौदनोपसेचनसूचितः कश्चिदत्ता प्रतीयते । अत्तृत्वं भोक्तृता वा संहर्तृता वा स्यात् । न च प्रस्तुतस्य परमात्मनो भोक्तृतास्ति, 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति' इति श्रुत्या भोक्तृताप्रतिषेधात्


भामती-व्याख्या

विषय—कठोपनिषत् में पढ़ा है—"यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः, मृत्युर्यस्योपसेचनम्, क इत्था वेद यत्र सः" (कठ० १।२।२५) । [जिस अत्ता (भक्षक) के ब्राह्मण और क्षत्रिय ओदन (भात) और मृत्युदेव उपसेचन (दाल) है, ऐसा अत्ता जहाँ (अपनी महिमा में ) रहता है, उसे कौन जानता है ? ] । इस श्रुति में ओदन और उपसेचनरूप भक्ष्य पदार्थ के निर्देश में जो भक्षक व्यक्ति सूचित किया गया है, वह इस भोग्य जगत् का या तो भोक्ता होगा या संहार करनेवाला । प्रक्रान्त ब्रह्म भोक्ता या भक्षक नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें

मनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २७७

यते। तत्र किमग्निरत्ता स्यात्, उत जीवः, अथवा परमात्मेति संशयः, विशेषानव- धारणात्, त्रयाणां चाग्निजीवपरमात्मनामस्मिन्ग्रन्थे प्रश्नोपन्यासोपलब्धेः। किं तावत् प्राप्तम्? अग्निरत्तेति। कुतः? 'अग्निरन्नादः' (बृ० १।४।६) इति श्रुतिप्रसिद्धि- भ्याम्। जीवो वाऽत्ता स्यात्, 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति' इति दर्शनात्। न परमात्मा, 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति' (मुण्ड० ३।१।१) इति दर्शनादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः--अत्ताऽत्र परमात्मा भवितुमर्हति। कुतः? चराचरग्रहणात्। चराचरं हि

भामती

जीवात्मनश्च भोक्तृताविधानात् ॐ तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति इति ॐ । तद्यदि भोक्तृत्वमत्तृत्वं ततो मुक्तसंशयं जीवात्मैव प्रतिपत्तव्यः ब्रह्मक्षत्रादि चास्य कार्यकारणसङ्घातो भोगायतनतया वा साक्षाद्वा सम्भवति भोग्यम्। अथ तु संहर्तृता भोक्तृता ततस्त्रयाणामग्निजीवपरमात्मनां प्रश्नोपन्यासोपलब्धेः संहर्तृत्वस्याविशेषाद्भवति संशयः। किमता अग्निरहो जीव उताहो परमात्मेति? अत्रौदनस्य भोग्यत्वेन लोके प्रसिद्धेर्भोक्तृत्वमेव प्रथमं बुद्धौ विपरिवर्त्तते, चरमं तु संहर्तृत्वमिति भोक्तैवात्ता। तथा च जीव एव। ॐ न जायते म्रियते इति ॐ च तस्यैव स्तुतिः, संहारकालेऽपि संस्कारमात्रेण तस्यावस्थानात्। दुर्ज्ञानत्वं च तस्य सूक्ष्मत्वात्। तस्माज्जीव एवात्तेहोपास्यत इति प्राप्तम्। यदि तु संहर्तृत्वमत्तृत्वं तथाप्यग्निरत्ता ॐ अग्निरन्नादः इति ॐ । श्रुतिप्रसिद्धिभ्याम्। एवं प्राप्तेऽभिधीयते। अत्तात्र परमात्मा, कुतः, चराचरग्रहणात् ॐ उभे यस्योदनः इति ॐ । ॐ मृत्युर्यस्योपसेचनम् इति ॐ। च श्रूयते तत्र यदि

भामती-व्याख्या

भोक्तृत्व का निषेध किया गया है—"अनश्नन्नन्योऽभचाकशीति" (मुण्ड. ३।१।१)। जीव जो भोक्ता माना गया है—"तयोरन्यः पिप्पलं स्वादु अत्ति" (मु. ३।१।१) अतः कथित अत्तृत्व यदि भोक्तृत्व है, तब निःसन्देह जीव की ही अत्तृत्वेन उपासना करनी होगी। ब्राह्मण और क्षत्रियादि से उपलक्षित कार्य-करण-संघातरूप (अपना) शरीर जीव का भोगायतन होने के कारण अथवा (छागादि का शरीर) साक्षात् भोग्य हो सकता है। यदि भोक्तृत्व का अर्थ संहार-कर्तृत्व विवक्षित है, तब अग्नि, जीव और ब्रह्म—इन तीनों में समानरूप से संहर्तृत्व सम्भव है, क्योंकि तीनों के विषय में प्रश्न और प्रतिवचन उपलब्ध हैं ["स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि" (कठो. १।१।१३) यह अग्निविषयक प्रश्न और "लोकादिमग्निं तमुवाच" (कठो. १।१।१५) यह अग्निविषयक उत्तर है। "येयं प्रेते विचिकित्सा" (कठो. १।१।२०) यह जीव के विषय में प्रश्न और "हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि" (कठो. २।१।६) यह जीवविषयक उत्तर है। "अन्यत्र धर्मात्" (कठो. १।२।१४) यह ब्रह्मविषयक प्रश्न एवं "हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि" (कठो. २।१।६) यह ब्रह्म के विषय में उत्तर है]।

संशय—तीनों की समान चर्चा से संशय हो जाता है कि यहाँ अत्ता (भक्षक) अग्नि है? या जीव? अथवा ब्रह्म? भोक्तृत्व और संहर्तृत्व में से लोक में ओदनादि भोग्य पदार्थ की प्रसिद्धि को लेकर भोक्तृत्व ही पहले बुद्धि में अवस्थित होता है और उसके पश्चात् संहर्तृत्व स्मृति-पथ में आता है।

पूर्वपक्ष—प्रक्रान्त अत्ता भोक्ता सर्वथा जीव ही है, क्योंकि "न जायते म्रियते" (कठो. १।२।१८) इत्यादि से उसी की स्तुति की जाती है, संहार (प्रलय) काल में भी संस्कार मात्रेण उसकी अवस्थिति मानी जाती है। जीव में दुर्ज्ञानता उसकी सूक्ष्मता के कारण है, फलतः जीव ही यहाँ अत्तृत्वेन उपास्य है। यदि संहर्त्ता को अत्ता माना जाता है, तब अग्नि को अत्ता कहना होगा, क्योंकि "अग्निरन्नादः" (बृह. उ. १।४।६) इत्यादि श्रुतियों में वैसा ही अभिहित है।

सिद्धान्त—यहाँ अत्ता (भक्षक) ब्रह्म है, क्योंकि "उभे यस्योदनः" "मृत्युर्यस्योप-

२७८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. २ सू. ९ ]

स्थावरजङ्गमं मृत्यूपसेचनमिहाद्यत्वेन प्रतीयते, तादृशस्य चाद्यस्य न परमात्मनोऽन्यः कात्स्न्र्येनात्ता संभवति । परमात्मा तु विकारजातं संहरन् सर्वमत्तीत्युपपद्यते । नन्विह चराचरग्रहणं नोपलभ्यते, कथं सिद्धवच्चराचरग्रहणं हेतुत्वेनोपादीयते ? नैष दोषः, मृत्यूपसेचनत्वेन सर्वस्य प्राणिनिकायस्य प्रतीयमानत्वाद् , ब्रह्मक्षत्रयोश्च प्राधान्यात्प्रदर्शनार्थत्वोपपत्तेः । यत्तु परमात्मनोऽपि नात्तृत्वं संभवति, 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति' इति दर्शनादिति । अत्रोच्यते- कर्मफलभोगस्य प्रतिषेधकमेतद्दर्शनं, तस्य संनिहितत्वात् । न विकारसंहारस्य प्रतिषेधकं, सर्ववेदान्तेषु सृष्टिस्थितिसंहारकारणत्वेन ब्रह्मणः प्रसिद्धत्वात् । तस्मात्परमात्मैवेहात्ता भवितुमर्हतीति ॥ ९ ॥

<div align="center"><b>भामती</b></div>

जीवस्य भोगायतनतया तत्साधनतया च कार्य्यकरणसङ्घातः स्थितः, न तर्ह्योदनः । नह्योदनो भोगायतनं, नापि भोगसाधनम्, अपि तु भोग्यः । न च भोगायतनस्य भोगसाधनस्य वा भोग्यत्वं मुख्यम् । न चात्र मृत्युरूपसेचनतया कल्प्यते । न च जीवस्य कार्य्यकरणसङ्घातो ब्रह्मक्षत्रादिरूपो भक्ष्यः, कस्यचित् क्रूरसत्त्वस्य व्याघ्रादेः कश्चिद्भूवेत्, न तु सर्वः सर्वस्य जीवस्य । तेन ब्रह्मक्षत्रविषयमपि जीवस्यात्तृत्वं न व्याप्नोति किमङ्ग पुनर्मृत्यूपसेचनप्राप्तं चराचरम् । न चौदनपदात् प्रथमावगतभोग्यत्वानुरोधेन यथासम्भवमत्तृत्वं योज्यत इति युक्तम् । नह्योदनपदं श्रुत्या भोग्यत्वमाह, किन्तु लक्षणया । न च लाक्षणिकभोग्यत्वानुरोधेन ※ मृत्यैर्यस्योपसेचनम् इति ※ च ※ ब्रह्मक्षत्रं च इति ※ श्रुतो सङ्कोचमर्हति । न च ब्रह्मक्षत्रे एवात्र विवक्षिते । मृत्यूपसेचनेन प्राणभृन्मात्रोपस्थापनात् । प्राणिषु प्रधानत्वेन च ब्रह्मक्षत्रोपन्यासस्योपपत्तेः । अन्यनिवृत्तेरशाब्दत्वात्, अनर्थत्त्वाच्च । तथा च चराचरसंहर्तृत्वं परमात्मन एव,

<div align="center"><b>भामती-व्याख्या</b></div>

सेचनः"—इस प्रकार चर और अचरात्मक समस्त प्रपञ्च का भोग्य (भक्ष्य) कोटि में ग्रहण किया गया है। वह यदि जीव का भोगायतन (भोग-साधन) रूप भोग्य है, तब वह ओदन के समान मुख्य भोग्य नहीं होगा, क्योंकि चराचरात्मक जगत् जीव का न तो भोगायतन है और न भोग-साधन। यह जो मुख्य भोग्यत्व का सम्पादन करते हुए कहा गया कि ब्रह्मक्षत्रोपलक्षित सभी छागादि शरीरों का जीव भोक्ता है, वह कहना संगत नहीं, क्योंकि वैसा भोक्ता तो कोई नितान्त क्रूर सिंह, व्याघ्रादि ही हो सकता है, सभी जीवों के भक्षक सभी जीव नहीं हो सकते। जब कि समग्र ब्राह्मण और क्षत्रिय-वर्ग ही सबका भोग्य नहीं हो सकता, तब भला मृत्युरूप उपसेचन से उपलक्षित समस्त चराचर जगत् किस जीव का भोग्य होगा ?

यह जो कहा गया कि यहाँ संहार्यत्व की अपेक्षा भोग्यत्व की प्रथमतः उपस्थिति 'ओदन' पद के प्रभाव से होती है, भोग्यत्व के द्वारा जो भोक्तृत्व प्रतीत होता है, उसके अनुसार 'ब्रह्म' और 'क्षत्र' पद समस्त चराचार के उपलक्षक न होकर उपभोग-योग्य केवल छागादि का उपस्थापक है। वह कहना भी युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि 'ओदन' पद भोग्यत्व का बोधक अभिधा वृत्ति से नहीं किन्तु लक्षणा के द्वारा ही होता है। लाक्षणिक भोग्यत्व के अनुरोध पर "मृत्युर्यस्योपसेचनम्", एवं "ब्रह्म च क्षत्रं च"—इन पदों की शक्ति या शक्यार्थ का संकोच नहीं किया जा सकता। केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय ही यहाँ विवक्षित नहीं, अपितु मृत्यूपसेचन के द्वारा समस्त प्राणियों की उपस्थिति विवक्षित है अतः प्राणियों में प्रधान होने के कारण ब्राह्मण और क्षत्रिय का उपन्यास युक्ति-संगत हो जाता है। जैसे "पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः" (वाल्मी. रा. कि. १७।३९) यह वाक्य परिसंख्या विधि होने के कारण शष्क, शल्यकि, गोधा, खड्गी (गेंडा) और कूर्म—इन पाँच नखवाले पाँच प्राणियों से अतिरिक्त पञ्च नखवाले मनुष्य एवं वानरादि प्राणियों की भक्षणीयता का निवर्त्तक है,

ऋतं पिबतो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् २७९

प्रकरणाच्च ॥ १० ॥

इतश्च परमात्मैवेहाऽत्ता भवितुमर्हति, यत्कारणं प्रकरणमिदं परमात्मनः, ‘न जायते म्रियते वा विपश्चित्’ ( काठ० १।२।१८ ) इत्यादि । प्रकृतग्रहणं च न्याय्यम् । ‘क इत्था वेद यत्र सः’ इति च दुर्विज्ञानत्वं परमात्मलिङ्गम् ॥ १० ॥


( ३ गुहाधिकरणम् । सू० ११-१२ )

गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥ ११ ॥

कठवल्लीष्वेव पठ्यते — 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः' ( काठ० १।३।१ ) इति । तत्र संशयः—किमिह बुद्धिजीवौ निर्दिष्टौ, उत जीवपरमात्मानाविति । यदि


भामती

नाग्नेः, नापि जीवस्य । तथा च ॐ न जायते म्रियते वा विपश्चिद् इति ॐ । ब्रह्मणः प्रकृतस्य न हानं भविष्यति ॐ क इत्था वेद यत्र सः इति ॐ च दुर्ज्ञानत्वमुपपत्स्यते । जीवस्य तु सर्वलोकप्रसिद्धस्य न दुर्ज्ञानता । तस्मादत्ता परमात्मैवेति सिद्धम् ॥ १० ॥


संशयमाह — ॐ तत्र इति ॐ । पूर्वपक्षे प्रयोजनमाह ॐ यदि बुद्धिजीवौ इति ॐ । सिद्धान्ते


भामती-व्याख्या

वैसे ही “ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः”—यह वाक्य भी ब्राह्मण और क्षत्रिय से भिन्न प्राणियों की भोग्यता ( भक्षणीयता ) का निवर्तक क्यों न मान लिया जाय ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि प्रत्येक पद की स्वार्थ में शक्ति होती है, अन्यार्थ की निवृत्ति उसका शक्यार्थ नहीं । अन्यार्थ की निवृत्ति यहाँ अनर्थक भी है, क्योंकि दृष्टान्त में मनुष्यादि के भक्ष्यत्व की निवृत्ति न होने पर “न हिंस्यात् सर्वा भूतानि” ( म. भारत. वन. २१२।३४ ) इस शास्त्र का बाध प्रसक्त होता है, उसका निवारण जैसे “पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः” इस परिसंख्या का विशेष प्रयोजन है, वैसे “ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः”—यहाँ अन्यनिवृत्तिपरक परिसंख्या विधि मानने पर कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । सिद्धान्त में संहर्तृत्वरूप भोक्तृत्व विवक्षित है, चराचरात्मक सर्व प्रपञ्च का संहर्तृत्व ब्रह्म में ही श्रुति-सिद्ध है—'तत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति च” ( तै. उ ३।१ ) । अग्नि और जीव में सर्वसंहर्तृत्व सम्भव नहीं । प्रकृत में “न जायते म्रियते वा कदाचन” ( कठो. १।२।१८ ) इत्यादिरूप से ब्रह्म प्रक्रान्त है, अतः ब्रह्म में सर्व प्रपञ्च के लयाभिधान से प्रकृत की हानि भी नहीं होती । “क इत्था वेद यत्र सः”—इस प्रकार की दुर्ज्ञानता भी ब्रह्म में समञ्जस होती है, अग्नि और जीव तो लोक-प्रसिद्ध ही है उनमें दुर्ज्ञानता का प्रतिपादन संगत नहीं । फलतः यहाँ ब्रह्म ही अत्ता सिद्ध होता है ॥ ९-१० ॥


संशय—“ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति, पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः” ( कठो. १।३।१ ) । यहाँ सन्देह होता है कि क्या 'ऋतं पिबन्तौ' इत्यादिरूपेण बुद्धि और जीव निर्दिष्ट हैं ? अथवा जीव और ब्रह्म ? पूर्वपक्ष के अनुसार यदि बुद्धि और जीव का निर्देश माना जाता है, तब बुद्धि का प्राधान्य होने के कारण कार्य ( शरीर ) और करण ( इन्द्रियों ) के समूह से भिन्न जीव प्रतिपादित होता है, वह भी प्रतिपादनीय है, क्योंकि 'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।

२८०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. २ सू. ११

बुद्धिजीवौ, ततो बुद्धिप्रधानात्कार्यकरणसंघाताद्विलक्षणो जीवः प्रतिपादितो भवति । तदपीह प्रतिपादयितव्यं, 'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥' (काठ० १।१।२०) इति पृष्टत्वात् । अथ जीवपरमात्मानौ ततो जीवाद्विलक्षणः परमात्मा प्रतिपादितो भवति । तदपीह प्रतिपादयितव्यम्, 'अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥' (काठ० १।२।१४) इति पृष्टत्वात् । अत्राहाक्षेप्ता—उभावप्येतौ पक्षौ न संभवतः । कस्मात् ? ऋतपानं कर्मफलोपभोगः, 'सुकृतस्य लोके' इति लिङ्गात् । तच्चेतनस्य क्षेत्रज्ञस्य संभवति, नाचेतनाया बुद्धेः । 'पिबन्तौ' इति च द्विवचनेन द्वयोः पानं दर्शयति श्रुतिः । अतो बुद्धिक्षेत्रज्ञपक्षस्तावन्न संभवति । अत एव क्षेत्रज्ञपरमात्मपक्षोऽपि न संभवति, चेतनेऽपि परमात्मनि ऋतपानासंभवात् । 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति' (मु० ३।१।१) इति मन्त्रवर्णादिति । अत्रोच्यते—नैष दोषः, छत्रिणो गच्छन्तीत्येकेनापि छत्रिणा बहूनां छत्रित्वोपचारदर्शनात् । एवमेकेनापि पिबता द्वौ पिबन्तावुच्येते । यद्वा—जीवस्तावत् पिबति, ईश्वरस्तु पाययति ।

भामती

प्रयोजनमाह ॐ अथ जीवपरमात्मानौ इति ॐ । औत्सर्गिकस्य मुख्यताबलात् पूर्वसिद्धान्तपक्षासम्भवेन पक्षान्तरं कल्पयिष्यत इति मन्वानः संशयमाक्षिपति ॐ अत्राह आक्षेप्तेति ॐ । ऋतं सत्यमवश्यम्भावीति यावत् । समाधत्ते ॐ अत्रोच्यते इति ॐ । आध्यात्मिकाधिकार्यादन्यो तावत्पातारावशक्यो कल्पयितुम् ।

भामती-व्याख्या

एतद् विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः" (कठो. १।१।२०) इस प्रकार जीव की ही जिज्ञासा प्रस्तुत की गई है। सिद्धान्त-पक्ष के अनुसार जीव और ब्रह्म का निर्देश मानने पर जीव से भिन्न ब्रह्म प्रतिपादित होता है। वह भी यहाँ प्रतिपादनीय है, क्योंकि "अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत् तत्पश्यसि तद् वद" (कठो. १।२।१४) इस प्रकार ब्रह्म भी जिज्ञासित है।

आक्षेप—पदार्थों के औत्सर्गिक (स्वाभाविक) सामर्थ्य को देखते हुए पूर्वपक्ष और सिद्धान्त पक्ष दोनों सम्भव नहीं, अतः तृतीय पक्ष की कल्पना करनी होगी—ऐसा समझ कर आक्षेपवादी उक्त संशय पर आक्षेप करता है—"अत्राहाक्षेप्ता उभावप्येतौ पक्षौ न सम्भवतः" । पूर्वपक्ष (बुद्धि और जीव में कर्मफलभोक्तृत्व) असम्भव इस लिए है कि ऋत रूप (सत्य या अवश्यंभावी) कर्म-फल का पान-कर्तृत्व (भोक्तृत्व) केवल जीवरूप चेतन में निसर्ग-सिद्ध है, जड़रूप बुद्धि में नहीं, अतः उन दोनों के लिए 'ऋतं पिबन्तौ' ऐसा द्विवचन का निर्देश क्योंकर सम्भव होगा ? इसी प्रकार सिद्धान्त-पक्ष के अनुसार जो ब्रह्म में कर्म-फल-भोक्तृत्व प्रतिपादित है, वह सम्भव नहीं, क्योंकि उसमें वह निषिद्ध है—"अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति" (मुण्ड. ३।१।१)।

आक्षेप का परिहार—कथित आक्षेप संभव नहीं, क्योंकि यद्यपि बुद्धि और जीव—इन दोनों में से केवल जीव ही भोक्ता है, जड़ होने के कारण बुद्धितत्त्व को भोक्ता नहीं कह सकते । इसी प्रकार जीव और ब्रह्म—इन दोनों में से भी एक केवल जीव ही भोक्ता है, ब्रह्म नहीं, क्योंकि असङ्ग होने के कारण उसको भोक्ता नहीं कहा जा सकता—"अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति" । तथापि जैसे छत्री (छाता-धारी) व्यक्ति के साथ अच्छत्री व्यक्तियों में भी छत्रित्व-व्यवहार होता है—"छत्रिणो यान्ति । वैसे ही कर्म-रस-पान-कर्त्ता (जीव) पुरुष के साथ बुद्धि और ब्रह्मरूप अभोक्ता पदार्थों में भोक्तृत्व-व्यवहार हो जाता है—'ऋतं

ऋतं पिबन्तौ ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८१

पाययन्नपि पिबतीत्युच्यते, पाचयितर्यपि पक्तृत्वप्रसिद्धिदर्शनात् । बुद्धिक्षेत्रज्ञपरिग्रहोऽपि संभवति, करणे कर्तृत्वोपचारात् । एधांसि पचन्तीति प्रयोगदर्शनात् । न चाध्यात्मोऽधिकारोऽन्यो कौचिद् द्वावृतं पिबन्तौ संभवतः । तस्माद् बुद्धिजीवौ स्यातां, जीवपरमात्मानौ वेति संशयः । किं तावत्प्राप्तं ? बुद्धिक्षेत्रज्ञाविति । कुतः ? 'गुहां

भामती

तदिह बुद्धेरचेतनत्वेन परमात्मनश्च भोक्तृत्वानषेधेन जीवात्मैवकः पाता परिशिष्यत इति सृष्टीरुपदधातीतिवद् द्विवचनानुरोधादपिवत्संस्पृष्टां स्वार्थस्य विवच्छुञ्छब्दो लक्षयन् स्वार्थमजहल्लितरेतरयुक्तपिबदपिबत्परो भवतीत्यर्थः । अस्तु वा मुख्य एव, तथापि न दोष इत्याह ॐ यद्वा इति ॐ । स्वातन्त्र्यलक्षणं हि कर्तृत्वं तच्च पातुरिव पाययितुरप्यस्तीति सोऽपि कर्त्ता । अत एव चाहुः "यः कारयति स करोत्येव इति ।" एवं करणस्यापि स्वातन्त्र्यविवक्षया कथञ्चित्कर्तृत्वं, यथा काष्ठानि पचन्तीति । तस्मान्मुख्यत्वेऽप्यविरोध इति । तदेवं संशयं समाधाय पूर्वपक्षं गृह्णाति ॐ बुद्धिक्षेत्रज्ञौ इति ॐ । नियताधारता बुद्धिजीवसम्भविनी न हि । क्लेशात् कल्पयितुं युक्ता सर्वगे परमात्मनि ॥

भामती-व्याख्या

पिबन्तौ' । 'छत्रिणो यान्ति'—इस लौकिक न्याय के लिए याज्ञिक-पद्धति में "सृष्टीरुपदधाति" ( तै. सं. ५।३।४।७ ) यह उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है [ भूमाधिकरण (जै. सू. १।४।१७) में कहा गया है कि अग्निचयन कर्म करने के लिए जिन ईंटों के द्वारा स्थण्डिल ( चबूतरा ) बनाया जाता है, उनका यज्ञ-मण्डप में ही निर्माण किया जाता है और स्थण्डिल चुनते समय मन्त्रों का उच्चारण करते रहते हैं । सृजतिपद-घटित “ब्रह्मासृज्यत, भूतान्यसृज्यत" ( तै. सं. ४।३।१०।१ ) इन मन्त्रों के द्वारा चुनी जानेवाली ईंटों को 'सृष्टि' पद से अभिहित किया जाता है । सृष्टिसंज्ञक ईंटों में वे ईंटें भी सम्मिलित कर ली जाती हैं, जिनकी सृष्टि संज्ञा नहीं, सृष्टि और असृष्टि इष्टिकाओं में 'सृष्टीरुपदधाति'—ऐसा व्यवहार वैसे ही हो जाता है, जैसे छत्री और अच्छत्री पुरुषों में छत्रिणों यान्ति—ऐसा व्यवहार लोक-प्रसिद्ध है ] । उसी प्रकार कर्म-जनित फलों के रस का पान करनेवाले व्यक्तियों के समूह में पान न करनेवाले बुद्धितत्त्व और ब्रह्म का भी समावेश हो जाता है । अथवा बुद्धिरूप करण में वैसे ही कर्तृत्व का व्यवहार हो जाता है, जैसे लोक में 'एधांसि पचन्ति'—ऐसा व्यवहार । इस अध्यात्म ( शरीर-सम्बन्धी पदार्थों पर विस्तृत प्रकाश डालनेवाले उपनिषत् ] शास्त्र में कर्म-रस पान करनेवाला अन्य कोई जोड़ा तो हो नहीं सकता, होगा तो बुद्धि और जीव या जीव और ब्रह्म का जोड़ा हो सकता है । 'पिबत्' पद अजहत्स्वार्थ लक्षणा के द्वारा दोनों का बोधक हो जाता है । अथवा लाक्षणिक पातृत्व को छोड़ कर मुख्य पातृत्व का ग्रहण किया जा सकता है—इसका प्रकार बताते हुए भाष्यकार कहते हैं—"यद्वा जीवः पिबति, ईश्वरस्तु पाययति" । पान क्रिया का स्वातन्त्र्यरूप कर्तृत्व जैसे पान करनेवाले व्यक्ति में रहता है, वैसे ही पान करानेवाले व्यक्ति में भी रहता है, अत एव 'यः करोति, स कारयति"—ऐसा लौकिक न्याय प्रसिद्ध है । बुद्धिरूप करण में पान की कर्तृता का व्यवहार कहा जा चुका है, अतः यदि मुख्य पातृत्व विवक्षित है, तब भी कोई अनुपपत्ति नहीं ।

पूर्व पक्ष—संशय की उपपत्ति करने के अनन्तर पूर्वपक्ष प्रस्तुत किया जाता है—"किं तावत् प्राप्तम् ? बुद्धिक्षेत्रज्ञाविति ।

नियताधारता बुद्धिजीवसम्भविनी न हि । क्लेशात् कल्पयितुं युक्ता सर्वगे परमात्मनि ॥

३६

२८२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. ११

प्रविष्टौ' इति विशेषात् । यदि शरीरं गुहा, यदि वा हृदयं, उभयथापि बुद्धिक्षेत्रज्ञौ गुहां प्रविष्टावुपपद्येते । न च सति संभवे सर्वगतस्य ब्रह्मणो विशिष्टदेशत्वं युक्तं कल्पयितुम् । 'सुकृतस्य लोके' इति च कर्मगोचरानतिक्रमं दर्शयति । परमात्मा तु न सुकृतस्य वा दुष्कृतस्य वा गोचरे वर्तते; 'न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्' इति श्रुतेः । 'छायातपौ' इति च चेतनाचेतनयोर्निर्देश उपपद्यते; छायातपवत्परस्परविलक्षणत्वात् । तस्माद् बुद्धिक्षेत्रज्ञाविहोच्येयातामित्येवं प्राप्ते ब्रूमः—विज्ञानात्मपरमात्मानाविहोच्ये-

भामती

न च पिबन्तावितिवत्प्रविष्टपदमपि लाक्षणिकं युक्तं, सति मुख्यार्थत्वे लाक्षणिकार्थत्वायोगात् । बुद्धिजीवयोश्च गुहाप्रवेशोपपत्तेः । अपि च सुकृतस्य लोक इति सुकृतलोकव्यवस्थाननेन कर्मगोचरानतिक्रम उक्तः । बुद्धिजीवौ च कर्मगोचरमनतिक्रान्तौ । जीवो हि भोक्तृतया बुद्धिश्च भोगसाधनतया धर्मस्य गोचरे स्थितौ, न तु ब्रह्म; तस्यातदायत्तत्वात् । किञ्च छायातपाविति तमःप्रकाशावुक्तौ । न च जीवः परमात्मनोऽभिन्नस्तमः, प्रकाशरूपत्वात् । बुद्धिस्तु जडतया तम इति शक्योपदेष्टुम् । तस्माद् बुद्धिजीवा- वत्र कथ्येते । तत्रापि प्रेते विचिकित्सापनुत्तये बुद्धेर्भेदेन परलोकी जीवो दर्शनीय इति बुद्धिरुच्यते ।

भामती-व्याख्या

कर्म-फल-भोक्ता व्यक्तियों का जो विशेषण दिया गया है—"गुहां प्रविष्टौ" (कठो. १।३।१) । वहाँ 'गुहा' पद से चाहे स्थूल शरीर का ग्रहण किया जाय, चाहे हृदय का, उभयथा गुहारूप नियत (परिच्छिन्न) देश की आधारता बुद्धि और जीव में ही सम्भव है, परमात्मा में उसकी कल्पना करनी युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि वह सर्वत्रग (व्यापक) है किसी एकदेश में रहनेवाला (परिच्छिन्न) नहीं । 'पिबन्तौ' पद लाक्षणिक (जीव और ब्रह्म—इन दोनों का लक्षक) है, वैसे ही "गुहां प्रविष्टौ"—यह भी उभय का लक्षक है'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि मुख्यार्थकत्व का असम्भव हो जाने पर ही किसी पद को लाक्षणिक माना जाता है, बुद्धि और जीव को लेकर जब 'प्रविष्टौ' पद मुख्यार्थक हो जाता है, तब उसे ब्रह्म का लक्षक मानने की आवश्यकता नहीं। दूसरी बात यह भी है कि "ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके" (कठो. १।३।१) इस मन्त्र के 'सुकृत' पद का यद्यपि उपनिषद्भाष्य में भाष्यकार ने 'ऋत' पद के साथ अन्वय करते हुए कहा है—"सुकृतस्य स्वयंकृतस्य कर्मण ऋतमिति पूर्वेण सम्बन्धः" (काठक-भाष्य पृ. ५९), किन्तु यहां 'सुकृतस्य लोके' ऐसी लेख-भङ्गी से 'सुकृत' पद का 'लोक' पद के साथ अन्वय प्रतीत हो रहा है। तथापि 'सुकृत' पद का उभयत्र अन्वय माना जा सकता है । 'सुकृतस्य लोके' का अर्थ है—'स्वयंकृतस्य पूर्वकर्मणः फलभूतेऽस्मिन् शरीरलक्षणे लोके' । इससे ऋत-पान करनेवालों के साथ कर्म का अटूट सम्बन्ध प्रतिपादित होता है, अतः ऐसे पान-कर्ता बुद्धि और जीव ही हो सकते हैं; क्योंकि जीव कर्ता और भोक्ता है एवं बुद्धि तत्त्व भोग का साधन । ब्रह्म वैसा नहीं हो सकता, क्योंकि वह कर्म के अधीन नहीं, जैसा कि श्रुति कहती है—"न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्" (कौ. ब्रा. उ. ३।९) । इसी प्रकार 'छायातपौ' शब्द के द्वारा अन्धकार और प्रकाश अभिहित हैं । जीव और ब्रह्म में से जीव को अन्धकाररूप नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह प्रकाशस्वरूप ब्रह्म से अभिन्न माना जाता है, बुद्धि जड़ होने के कारण अन्धकाररूप कही जा सकती है, अतः उक्त श्रुति में 'पिबन्तौ' पद के द्वारा बुद्धि और जीव का प्रतिपादन किया जाता है। बुद्धि का प्रतिपादन किस लिए ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि मरने के पश्चात् जो आत्मा की सत्ता और असत्ता का सन्देह होता है, उसकी निवृत्ति करने के लिए बुद्धितत्त्व से भिन्न परलोकगामी जीव का स्वरूप दिखाना आवश्यक है, अतः बुद्धि का ग्रहण किया गया है।

ऋतं पिबन्तौ ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८३


याताम्। कस्मात् ? आत्मानौ हि तावुभावपि चेतनौ समानस्वभावौ। संख्याश्रवणे च समानस्वभावेष्वेव लोके प्रतीतिर्दृश्यते । अस्य गोर्द्वितीयोऽन्वेष्टव्य इत्युक्ते गौरित्येव द्वितीयोऽन्विष्यते, नाश्वः पुरुषो वा । तदिह ऋतपानेन लिङ्गेन निश्चिते विज्ञानात्मनि द्वितीयान्वेषणाय समानस्वभावश्चेतनः परमात्मैव प्रतीयते । ननूक्तं गुहाहितत्वदर्शनाच्च परमात्मा प्रत्येतव्य इति गुहाहितत्वदर्शनादेव परमात्मा प्रत्येतव्य इति वदामः । गुहाहितत्वं तु श्रुतिस्मृतिष्वसकृत्परमात्मन एव दृश्यते—'गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्' (काठ० १।२।१२) 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्' (तै० २।१) 'आत्मान- मन्विच्छ गुहां प्रविष्टम्' इत्याद्यासु । सर्वगतस्यापि ब्रह्मण उपलब्ध्वर्थो देशविशेषो- पदेशो न विरुध्यत इत्येतदप्युक्तमेव । सुकृतलोकवर्तित्वं तु छत्रिवत्त्वदेकस्मिन्नपि

भामती

एवं प्राप्तेऽभिधीयते—

ऋतपानेन जीवात्मा निश्चितोऽस्य द्वितीयता ।
ब्रह्मणेव सरूपेण न तु बुद्ध्या विरूपया ॥
प्रथमं सद्वितीयत्वे ब्रह्मणोऽवगते सति ।
गुहाश्रयत्वं चरमं व्याख्येयमविरोधतः ॥

गौः सद्वितीयेत्युक्ते सजातीयेनैव गवान्तरेणावगम्यते, न तु विजातीयेनाश्वादिना । तदिह चेतनो जीवः सरूपेण चेतनान्तरेणैव ब्रह्मणा सद्वितीयः प्रतीयते, न त्वचेतनया विरूपया बुद्ध्या । तदेवममृतं पिबन्तावित्यत्र प्रथममवगते ब्रह्मणि तदनुरोधेन चरमं गुहाश्रयत्वं शालग्रामे हरिरितिवद्व्याख्येयम् । बहुलं हि गुहाश्रयत्वं ब्रह्मणः श्रुतय आहुः । तदिदमुक्तं ॐ तद्दर्शनादिति ॐ। तस्य ब्रह्मणो गुहाश्रयत्वस्य

भामती-व्याख्या

सिद्धान्त—

ऋतपानेन जीवात्मा निश्चितोऽस्य द्वितीयता ।
ब्रह्मणेव सरूपेण न तु बुद्ध्या विरूपया ॥ १ ॥
प्रथमं सद्वितीयत्वे ब्रह्मणोऽवगते सति ।
गुहाश्रयत्वं चरमं व्याख्येयमविरोधतः ॥ २ ॥

ऋत पान करनेवाला (कर्म-फल-भोक्ता) जीव है—यह तथ्य तो निश्चित है, उसमें “ऋतं पिबन्तौ”—यहाँ द्विवचन के द्वारा प्रतिपादित जो द्वितीयता है, उसकी निष्पत्ति ब्रह्म को लेकर ही होती है, बुद्धि का लेकर नहीं, क्योंकि ब्रह्म जीव के समानरूप का (चेतन) और बुद्धि विरुद्धरूप की (जड़) है। लोक में भी 'इयं गौः सद्वितीया'—ऐसा कहने पर इस गौ में सद्वितीयता दूसरी गौ को लेकर ही मानी जाती है, गर्दभादि को लेकर नहीं, क्योंकि दूसरी गौ इस गौ को सजातीय और गर्दभादि विजातीय हैं। फलतः “ऋतं पिबन्तौ”—यहाँ द्विवचन की उपपत्ति के लिए जीव के साथ ब्रह्म को जोड़ा जा सकता है, क्योंकि “न जायते म्रियते वा विपश्चित्” (कठो. १।२।१८) इत्यादि पूर्व वाक्यों के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म में ही गुहाश्रयत्व का वैसे ही अन्वय किया जा सकता है, जैसे शालग्राम में हरि का । ‘गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्' (कठो. १।२।१२), “यो वेद निहितं गुहायाम्” (तै. उ. २।१), “आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टम्” इत्यादि अनेक श्रौत-वाक्यों में गुहाश्रित ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है—इस तथ्य को सूचित करने के लिए सूत्रकार ने कहा है—“तद्दर्शनात्” (ब्र. सू. १।२।११) । 'तद्दर्शनात्' का अर्थ है—'तस्य (ब्रह्मणः) श्रुतिषु गुहाश्रयत्व दर्शनात्' । जब कि पूर्व वाक्यों में ब्रह्म का दर्शन प्रस्तुत किया गया है, तब “सुकृतस्य लोके”—इत्यादि परवर्ती

२८४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. २ सू. १२

वर्तमानमुभयोरविरुद्धम्। छायातपावित्यप्यविरुद्धम्। छायातपवत्परस्परविलक्षण- त्वात्संसारित्वासंसारित्वयोः। अविद्याकृतत्वात्संसारित्वस्य, पारमार्थिकत्वाच्चा- संसारित्वस्य। तस्माद्विज्ञानात्मपरमात्मानौ गुहां प्रविष्टौ गृह्येते ॥ ११ ॥

कुतश्च विज्ञानात्मपरमात्मानौ गृह्येते—

विशेषणाच्च ॥ १२ ॥

विशेषणं च विज्ञानात्मपरमात्मनोरेव भवति। 'आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु' (का० १।३।३) इत्यादिना परेण ग्रन्थेन रथिरथादिरूपककल्पनया विज्ञाना- त्मानं रथिनं संसारमोक्षयोर्गन्तारं कल्पयति। 'सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्' (का० १।३।९) इति च परमात्मानं गन्तव्यम्। तथा 'तं दुर्दर्शं गूढमनु- प्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति' (का० १।२।१२) इति पूर्वस्मिन्नपि ग्रन्थे मन्तृमन्तव्यत्वेनैतावेव विशेषितौ। प्रकरणं चेदं परमात्मनः। 'ब्रह्मविदो वदन्ति' इति च वक्तृविशेषोपादानं परमात्मप- रिग्रहे घटते। तस्मादिह जीवपरमात्मानावुच्येयाताम्। एष एव न्यायः 'द्वा सुपर्णा

भामती

श्रुतिषु दर्शनादिति। एवं च प्रथमावगतब्रह्मानुरोधेन सुकृतलोकवर्तित्वमपि तस्य लक्षणया श्वच्छिन्न्यायेन गमयितव्यम्। छायातपत्वमपि जीवस्याविद्याश्रयतया ब्रह्मणश्च शुद्धप्रकाशस्वभावस्य तदनाश्रयतया मन्तव्यम्। इममेव न्यायं द्वा सुपर्णेत्यत्राप्युदाहरणे कृत्वाचिन्तया योजयति ॐ एष एव न्याय इति ॐ। अत्रापि किं बुद्धिजीवौ उत जीवपरमात्मानाविति संशय्य करणरूपाया अपि बुद्धेरेधांसि पचन्तीतिवत् कर्तृत्वोपचाराद् बुद्धिजीवाविह पूर्वपक्षयित्वा सिद्धान्तयितव्यम्। सिद्धान्तश्च

भामती-व्याख्या

वाक्यों में अभिहित सुकृतलोक की लाक्षणिक वृत्तित्ता भी ब्रह्म में छत्रिन्याय यां सृष्ट्युपधान- न्याय से समञ्जस हो जाती है। जीव और ब्रह्म का स्वरूपतः वैलक्षण्य दिखाने के लिए कहा है—"छायातपौ"। वहाँ अविद्यारूप अन्धकार का आश्रय होने के कारण जीव को छाया और शुद्ध स्वप्रकाशस्वरूप ब्रह्म को आतप (प्रकाश) कह दिया गया है ॥ ११ ॥

[ "आत्मानं रथिनं विद्धि" (कठ० १।३।३) इत्यादि वाक्यों के द्वारा रथ-रथी-रूपक के माध्यम से अभिव्यञ्जित जीवगत गन्तृत्व एवं "सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्" (कठो. १।३।९) इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित ब्रह्म में गन्तव्यत्व (प्राप्यत्व), इसी प्रकार 'तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥" (कठो. १।२।१२) इत्यादि वाक्यों से कथित जीवगत मन्तृत्व (साक्षात्कर्तृत्व) एवं ब्रह्मनिष्ठ मन्तव्यत्वरूप (साक्षात्क्रियमाणत्व) आदि विशेषणों के द्वारा भी जीव और ब्रह्म ही 'गुहां प्रविष्टौ" सिद्ध होते हैं]।

इसी न्याय (गुहाधिकरण) की योजना 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया" (मुण्ड० ३।१।१) इस उदाहरण में भी करने के लिए भाष्यकार कहते हैं—'एष न्यायः 'द्वा सुपर्णा' इत्येवमादिष्वपि"। [यह योजना सैद्धान्तिक नहीं, अपितु अभ्युपगममात्र है। कृत्वा (वैसा मानकर) जो चिन्ता (विचार) की जाती है, उसे कृत्वाचिन्ता-(विचार या अभ्युपगममात्र) कहा जाता है, जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—"यत्पुनः परावृत्य भाष्यकारेणोक्तम्- "अथवा पुनरस्तु ज्ञाने धर्म इत्यभ्युपेत्यवादमात्रम्' तत् पूर्वोक्त दोषपरिहारसामर्थ्यप्रदर्शनार्थं कृत्वाचिन्तान्यायेनोक्तम्' (तं० वा० पृ० २८७) । "द्वा सुपर्णा"—इस मन्त्र में भी यद्यपि सिद्धान्ततः जीव और ब्रह्म विवक्षित नहीं, तथापि यदि उनकी विवक्षा मान ली जाय, तब

ऋतं पिबतो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८५


सयुजा सखाया' (मुण्ड ३।१।१) इत्येवमादिष्वपि। तत्रापि ह्यध्यात्मधिकारान्न प्राकृतौ सुपर्णावुच्येते। 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति' इत्यदनलिङ्गाद्विज्ञानात्मा भवति। 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति' इत्यनशनचेतनत्वाभ्यां परमात्मा। अनन्तरे च मन्त्रे तावेव द्रष्टृद्रष्टव्यभावेन विशिनष्टि—'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः' (मुण्ड० ३।१।२) इति। अपर आह—'द्वा सुपर्णा' इति नेयमृगस्याधिकरणस्य सिद्धान्तं भजते; पैङ्गिरहस्यब्राह्मणेनान्यथा व्याख्यातत्त्वात्। 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वमनश्नन्नन्योऽभिचाकशीतीत्यनश्नन्नन्योऽभिपश्यति ज्ञस्तावैतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ' इति। सत्त्वशब्दो जीवः, क्षेत्रज्ञशब्दः परमात्मेति यदुच्येत—तन्न; सत्त्वक्षेत्रज्ञशब्दयोरन्तःकरणशारीरपरतया प्रसिद्धत्वात्। तत्रैव च व्याख्यातत्त्वात्—'तदेतत् सत्त्वं येन स्वप्नं पश्यति, अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञस्तावैतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ' इति। नाप्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्षं भजते। नह्यत्र शारीरः क्षेत्रज्ञः कर्तृत्व-


भामती

भाष्यकृता स्फोरितः। तद्दर्शनादिति च 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नः' इत्यत्र मन्त्रे। न खलु मुख्ये कर्तृत्वे सम्भवति करणे कर्तृत्वोपचारो युक्त इति कृत्वाचिन्तामुद्घाटयति ॐ अपर आह ॐ। ॐ सत्त्वं ॐ बुद्धिः। शङ्कते ॐ सत्त्वशब्दः इति ॐ। सिद्धान्तार्थं ब्राह्मणं व्याचष्टे इत्यर्थः। निराकरोति ॐ तन्न इति ॐ। ॐ येन स्वप्नं पश्यति इति ॐ। येनेति करणमुपदिशति, ततश्च भिन्नं कर्तारं क्षेत्रज्ञम् ॐ यो यं शारीर उपद्रष्टा इति ॐ। अस्तु तर्ह्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्ष एव ब्राह्मणार्थः, वचनविरोवे न्यायस्याभासत्वादित्यत आह। ॐ नाप्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्षं भजते इति ॐ। एवं हि पूर्वपक्ष-


भामती-व्याख्या

उसके उपपादन में गुहाधिकरण की क्षमता है, क्योंकि] “द्वा सुपर्णा”—इस वाक्य में भी सन्देह किया जाता है कि क्या यहाँ सुपर्णों (दो पक्षियों) के रूप में बुद्धि और जीव विवक्षित हैं? अथवा जीव और ब्रह्म? जैसे 'एधांसि पचन्ति' (लकड़ियां भोजन पकाती हैं) यहाँ पाक के करण (साधनीभूत) काष्ठों में पाक-कर्तृत्व का गौण प्रयोग होता है, वैसे ही बुद्धिरूप करण में कर्म फल-भोग-कर्तृत्व का गौण प्रयोग मान कर बुद्धि और जीव को भोक्ता के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है—ऐसे पूर्वपक्ष का जो सिद्धान्त हो सकता है, वह भाष्यकार ने “समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नः”—इस मन्त्र में द्रष्टृत्व-द्रष्टव्यत्वरूप विशेषणों के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है—अध्यात्मधिकारान्न प्राकृतौ सुपर्णावुच्येते।”

इस सिद्धान्त की 'कृत्वाचिन्ता' का कारण (अनाभिमतता या अस्वरसता) दिखाते हैं—"अपर आह”। 'सत्त्वं' शब्द का अर्थ है—बुद्धि, अर्थात् पैङ्गिरहस्य नाम के ब्राह्मण में उक्त मन्त्र की व्याख्या करते हुए बुद्धि और जीव का कथित पक्षियों के रूप में प्रस्तुत किया है अतः जीव और ब्रह्म का वहाँ ग्रहण नहीं कर सकते। शङ्कावादी उक्त ब्राह्मण ही सिद्धान्त के अनुगुण व्याख्या करते हुए कहता है कि उक्त ब्राह्मण में 'सत्त्व' शब्द से जीव और 'क्षेत्रज्ञ' पद से ब्रह्म का ग्रहण क्यों न किया जाय? उसकी इस शङ्का का निराकरण करते हुए कहा गया है—"तन्न”। लोक एवं वेद में 'सत्त्व' शब्द बुद्धि एवं 'क्षेत्रज्ञ' शब्द शारीर (जीव) के लिए प्रसिद्ध माना जाता है। उसी अर्थ में उसकी व्याख्या भी की जाती है—"येन स्वप्नं पश्यति, अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञः, तावैतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ”। 'येन' शब्द के द्वारा स्वप्न-दर्शन के करण (साधन) का उपदेश किया गया है। उससे भिन्न स्वप्न-द्रष्टा (क्षेत्रज्ञ) का निर्देश किया गया है—"योऽयं शारीर उपद्रष्टा”। उक्त ब्राह्मण को पूर्वपक्ष का उपस्थापक क्यों न मान लिया जाय? इस प्रश्न का उत्तर है—"नाप्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्षं भजते।”

२८६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. २ सू. १२

भोक्तृत्वादिना संसारधर्मेणोपेतो विवक्ष्यते। कथं तर्हि ? सर्वसंसारधर्मातीतो ब्रह्म- स्वभावश्चैतन्यमात्रस्वरूपः; 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति,' 'अनश्नन्नन्योऽभिपश्यति ज्ञः' इति वचनात् । 'तत्त्वमसि', 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि' गी० १३।२) इत्यादिश्रुतिस्मृ- तिभ्यश्च । तावता च विद्योपसंहारदर्शनमेवमेवावकल्पते, 'तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ न ह वा एवंविदि किंचन रज आध्वंसते' इत्यादि । कथं पुनरस्मिन्पक्षे 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वम्' इत्यचेतने सत्त्वे भोक्तृत्ववचनमिति ? उच्यते-नेयं श्रुतिरचेत- नस्य सत्त्वस्य भोक्तृत्वं वक्ष्यामीति प्रवृत्ता । किं तर्हि ? चेतनस्य क्षेत्रज्ञस्याभोक्तृत्वं ब्रह्मस्वभावतां च वक्ष्यामीति । तदर्थं सुखादिविक्रियावति सत्त्वे भोक्तृत्वमध्यारोपयति । इदं हि कर्तृत्वं भोक्तृत्वं च सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरितरेतरस्वभावाविवेककृतं कल्प्यते । परमार्थ- तस्तु नान्यतरस्यापि संभवति; अचेतनत्वात्सत्त्वस्य, अविक्रियत्वाच्च क्षेत्रज्ञस्य । अविद्याप्रत्युपस्थापितस्वभावत्वाच्च सत्त्वस्य सुतरां न संभवति । तथा च श्रुतिः-

भामती

मस्य भजेत, यदि हि क्षेत्रज्ञे संसारिणि पर्यवस्येत् । तस्य तु ब्रह्मरूपतायां पर्यवस्यन्न पूर्वपक्षमपि स्वीकरोतीत्यर्थः । अपि च ॐ तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ न ह वा एवंविदि किञ्चन रज आध्वंसते इति ॐ । रजोऽविद्या नाध्वंसनं न संश्लेषमेवंविदि करोति । एतावतेव विद्योपसंहाराज्जीवस्य ब्रह्मात्मतापरतास्य लक्ष्यत इत्याह ॐ तावता च इति । चोदयति ॐ कथं पुनः इति ॐ । निराकरोति ॐ उच्यते-नेयं श्रुतिः इति ॐ । अनश्नन् जीवो ब्रह्माभिचाकशीतीत्युक्ते शङ्केत, यदि जीवो ब्रह्मात्मा नाश्नाति, कथं तर्हास्मिन् भोक्तृत्वावगमः, चेतन्यसमानाधिकरणं हि भोक्तृत्वमवभासत इति । तन्निरासायाह श्रुतिः ॐ तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति इति ॐ । एतदुक्तं भवसि-नेवं भोक्तृत्वं जीवस्य तत्त्वतः, अपि तु बुद्धिसत्त्वं सुखादि- रूपपरिणतं चितिच्छायापत्त्योपपन्नचेतन्यमिव भुङ्क्ते, न तु तत्त्वतो जीवः परमात्मा भुङ्क्ते । तदेतद-

भामती-व्याख्या

उक्त ब्राह्मण-वाक्य पूर्वपक्षपरक तब हो सकता था, जब कि वह क्षेत्रज्ञ ( संसरणशील जीव ) में पर्यवसित होता किन्तु उक्त ब्राह्मण वाक्य का पर्यवसान ब्रह्म में ही होता है, अतः वह पूर्वपक्ष- परक नहीं हो सकता । 'तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ न ह वा एवंविदि किंचन रज आध्वंसते ।" यहाँ 'रजः' शब्द का अर्थ अविद्या और 'आध्वंसन' का अर्थ संश्लेष ( सम्बन्ध ) है । फलतः विद्या ( ब्रह्म-साक्षात्कार ) में उपसंहृत ( पर्यवसित ) होने के कारण उक्त ब्राह्मण वाक्य में जीव- ब्रह्माभेदपरता लक्षित होती है—"तावता च विद्योपसंहारदर्शनमेवावकल्पते" । आक्षेपवादी का कहना है कि 'कथं पुनरस्मिन् पक्षे तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति अचेतने सत्त्वे भोक्तृत्ववचन- मिति"। अर्थात् उक्त मन्त्र में यदि बुद्धि और जीव का ग्रहण किया जाता है, तब जड़भूत बुद्धि तत्त्व में कर्म-फल-भोक्तृत्व क्योंकर उपपन्न होगा ? इस आक्षेप का परिहार किया जाता है—'नेयं श्रुतिरचेतनस्य सत्त्वस्य भोक्तृत्वं वक्ष्यामीति प्रवृत्ता" । 'अनश्नन् जीवो ब्रह्माभिचकाशीति' ऐसा अन्वय मानने पर यह शङ्का हो सकती थी कि "यदि जीवो ब्रह्मात्मा नाश्नाति, कथं तर्ह्यस्मिन् भोक्तृत्वावगमः ?" क्योंकि 'चेतनोऽहं भोक्ता'—इस प्रकार चतन्य के अधिकरण में ही भोक्तृत्व अवभासित होता है । उस शङ्का का निरास करने के लिए शङ्का की है—"तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति"—इस प्रकार बुद्धिरूप प्रथम पक्षी में प्रतिपादित भोक्तृत्व क्योंकर उपपन्न होगा ? इस शङ्का का उत्तर जो दिया गया—"नेयं श्रुतिरचेतनस्य सत्त्वस्य भोक्तृत्वं वक्ष्यामीति प्रवृत्ता" उसका आशय यह है कि जो जीवगत भोक्तृत्व प्रतीत होता है, वह तात्त्विक नहीं, अपितु बुद्धि का सत्त्वगुण सुखादिरूपेण परिणत होता है और बुद्धि ही चेतन्य पुरुष का प्रतिबिम्ब पाकर चेतन के समान होकर अपने में ( चैतन्यसमानाधिकरण ) भोक्तृत्व का अनुभव करती है, जीव तत्त्वतः ब्रह्म है, भोक्ता नहीं—यह विगत अध्यास-भाष्य

अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८७

'यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येद्' इत्यादिना स्वप्नदृग्दृष्टहस्त्यादिव्यवहारवदविद्याविषय एव कर्तृत्वादिव्यवहारं दर्शयति । 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्' ( बृ० ४।५।१५ ) इत्यादिना च विवेकिनः कर्तृत्वादिव्यवहाराभावं दर्शयति ॥ १२ ॥


( ४ अन्तरधिकरणम् । सू० १३-१७ )

अन्तर उपपत्तेः ॥ १३ ॥

'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति । तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति' ( छा० ४।१५।१ ) इत्यादि

भामती

ध्यासभाष्ये कृतव्याख्यानम् । तदनेन कृत्वाचिन्तोद्घाटिता ॥ १२ ॥

नन्वन्तस्तद्धर्मोपदेशादित्यनेनैवैतद् गतार्थम् । सन्ति खल्वत्राप्यमृतत्वादयो ब्रह्मधर्माः प्रतिबिम्बजीवदेवतास्वसम्भविनः । तस्माद् ब्रह्मधर्मोपदेशाद् ब्रह्मैवात्र विवक्षितम् । साक्षाच्च ब्रह्म शब्दोपादानात् । उच्यते—

एष दृश्यत इत्येतत् प्रत्यक्षेऽर्थे प्रयुज्यते ।
परोक्षं ब्रह्म न तथा प्रतिबिम्बे तु युज्यते ॥
उपक्रमवशात् पूर्वमितरेषां हि वर्णनम् ।
कृतं न्यायेन येनैव स खल्वत्रानुषज्यते ॥

भामती-व्याख्या

की व्याख्या ( विगत पृ० १४-१५ ) में स्पष्ट किया जा चुका है । फलतः “द्वा सुपर्णा सयुजा” इस मन्त्र में बुद्धि और जीव का ही ग्रहण किया गया है, जीव और ब्रह्म का नहीं, फिर भी इसमें गुहाधिकरण की योजना अभ्युपगममात्र या कृत्वा चिन्ता है ॥ १२ ॥

विषय — “य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति । तद् यद्यप्यस्मिन् सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति” ( छां. ४।१५।१ ) इत्यादि श्रुति-वाक्य कहते हैं कि 'जो यह आँख में पुरुष दिखाई देता है, वह आत्मा है—ऐसा कहा गया है, वही अमृत है, अभय पद है, वही ब्रह्म है'। इसमें जो घृत या जल डाला जाता है, वह पलकों में चला जाता है ।

संशय — वह पुरुष क्या अक्षिगत प्रतिबिम्ब है ? या विज्ञानात्मा ( जीव ) ? या इन्द्रिय का अधिष्ठाता देव ? अथवा परमेश्वर ( ब्रह्म ) ?

पूर्व पक्ष की असंभावना— यह उदाहरण “अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्” ( ब्र. सू. १।१।२० ) इस अधिकरण से ही गतार्थ हो जाता है, क्योंकि इस वाक्य में भी ब्रह्म के अमृतत्व, अभयत्वादि ऐसे धर्म अभिहित हैं, जो कि प्रतिबिम्ब, जीव और देवता में सम्भावित नहीं, अतः ब्रह्म-धर्मों का उपदेश होने के कारण दृश्यमान पुरुष के रूप में ब्रह्म ही विवक्षित है, इतना ही नहीं, 'ब्रह्म' शब्द साक्षात् निर्दिष्ट है— “एतद् ब्रह्म”। इस प्रकार का निर्णय देने के लिए अधिकरणान्तर की क्या आवश्यकता ?

पूर्वपक्ष की संभावना—

एष दृश्यत इत्येतत् प्रत्यक्षेऽर्थे प्रयुज्यते ।
परोक्षं ब्रह्म न तथा प्रतिबिम्बे तु युज्यते ॥ १ ॥
उपक्रमवशात् पूर्वमितरेषां हि वर्णनम् ।
कृतं न्यायेन येनैव स खल्वत्रानुषज्यते ॥ २ ॥

२८८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १३

श्रूयते। तत्र संशयः - किमयं प्रतिबिम्बात्माऽक्ष्यधिकरणो निर्दिश्यते, अथवा विज्ञा- नात्मा, उत देवतात्मेन्द्रियस्याधिष्ठाता, अथेश्वर इति। किं तावत्प्राप्तम् ? छायात्मा पुरुषप्रतिरूप इति। कुतः ? तस्य दृश्यमानत्वप्रसिद्धेः। 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इति च प्रसिद्धवदुपदेशात्। विज्ञानात्मनो वाऽयं निर्देश इति युक्तम्। स हि चक्षुषा रूपं पश्यंश्चक्षुषि सन्निहितो भवति। आत्मशब्दश्चास्मिन्पक्षेऽनुकूलो भवति। आदित्य- पुरुषो वा चक्षुषोऽनुग्राहकः प्रतीयते; 'रश्मिभिरेषोऽस्मिन्प्रतिष्ठितः' ( बृ० ५।५।२ ) इति श्रुतेः, अमृतत्त्वादीनां च देवतात्मन्यपि कथंचित्संभवात्। 'नेश्वरः; स्थानविशेष- निर्देशादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः- परमेश्वर एवाक्षिण्यभ्यन्तरः पुरुष इहोपदिष्ट इति।

भामती

ऋतं पिबन्तावित्यत्र हि जीवपरमात्मानौ प्रथमावगताविति तदनुरोधेन गुहाप्रवेशादयः पश्चादव- गता व्याख्याताः, तद्वदिहापि य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत इति प्रत्यक्षाभिधानात् प्रथममवगते छायापुरुषे तदनुरोधेनामृतत्वाभयत्वादयः स्तुत्या कथञ्चिद् व्याख्येयाः। तत्र चामृतत्वं कतिपयक्षणावस्थानाद्, अभयत्वमचेतनत्वात्, पुरुषत्वं पुरुषाकारत्वाद्, आत्मत्वं कनीनिकायां व्यापनात्, ब्रह्मरूपत्वमुक्तरूपा- मृतत्वादियोगात्। एवं वामनीत्वादयोऽप्यस्य स्तुत्यैव कथञ्चिन्नेतव्याः। कञ्च खं चेत्यादि तु वाक्यमग्नीनां नाचार्यवाक्यं नियन्तुमर्हति। आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति च गत्यन्तराभिप्रायं, न तूक्तपरिशिष्टाभिप्रायम्। तस्माच्छायापुरुष एवात्रोपास्य इति पूर्वः पक्षः। सम्भवमात्रेण तु जीवदेवते उपन्यस्ते, बाधकान्तरोप- दर्शनाय चैष दृश्यत इत्यस्यात्राभावात्। अन्तस्तद्धर्मोपदेशादित्यनेन निराकृतत्वात्।

भामती-व्याख्या

जैसे "ऋतं पिबन्तौ" ( कठो. १।३।१ ) यहाँ पर जीव और ब्रह्म प्रथमतः अवगत हैं, अतः उसके अनुरोध पर पश्चात् अवगत गुहा-प्रवेशादि भी जीव-ब्रह्मपरक माने जाते हैं। वैसे ही "य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते"- ऐसा प्रत्यक्षाभिधान होने के कारण प्रथमावगत छाया पुरुष में ही पश्चात्कथित अमृतत्व, अभयत्वादि धर्मों का स्तुत्यर्थक समन्वय करना होगा, ब्रह्म में नहीं, क्योंकि वह परोक्ष है, 'एष' पद के द्वारा उसका निर्देश नहीं किया जा सकता। छाया-पुरुष में कतिपयक्षणावस्थाायित्व होने के कारण अमृतत्व, अचेतन होने के कारण अभयत्व ( भय की अनुभूति का अभाव ), पुरुष की छाया में पुरुषाकारता होने के कारण पुरुषत्व, कनीनिका ( काली पुतली ) पर्यन्त गति होने के कारण आत्मत्व ( 'अत सातत्य गमने' धातु से निष्पन्न आत्मत्व का अर्थभूत सर्वतः व्याप्तत्व ), अमृतत्वादि का योग होने के कारण ब्रह्मत्व घट जाता है। इसी प्रकार वामनीत्व ( वामसंज्ञक कर्म-फलों का ) नेतृत्व, भामनीत्व ( प्रकाशरूपत्व ) आदि की व्याख्या भी प्रस्तुत की जा सकती है। यह जो कहा जाता है कि "प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म" ( छां. ४।१०।५ ) ऐसे उपक्रम के अनुरोध पर "य एषोऽक्षिणि पुरुषः" (छां. ४।१५।१)। वहाँ भी ब्रह्म का परामर्श किया जाना चाहिए। वह कहना उचित नहीं, क्योंकि 'प्राणो ब्रह्म'-यह अग्नियों का एवं "य एषोऽक्षिणि पुरुषः"-यह आचार्य का वाक्य है। अन्यकर्तृक वाक्य के अनुरोध पर अन्यकर्तृक वाक्य का नियमन नहीं किया जा सकता। "आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता" ( छां. ४।१४।१ ) यह वाक्य भी अग्नियों का ही है, अतः वह भी इस आचार्य-वाक्य का नियमन नहीं कर सकता। पूर्व पक्ष की निर्भरता छाया-पुरुष में ही है, जीव और अधिष्ठाता देव का उपन्यास केवल सम्भावना के आधार पर कर दिया गया है, वस्तु-स्थिति को लेकर नहीं, क्योंकि 'एष दृश्यते'-इस वाक्य का सामञ्जस्य भी देवतादि में नहीं होता, 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्'-इस अधिकरण के द्वारा जीवादि का निरास किया जा चुका है।

अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८९

कस्मात् ? उपपत्तेः । उपपद्यते हि परमेश्वरे गुणजातमिहोपदिश्यमानम् । आत्मत्वं तावन्मुख्यया वृत्त्या परमेश्वर उपपद्यते; 'स आत्मा तत्त्वमसि' इति श्रुतेः । अमृतत्वाभयत्वे च तस्मिन्नसकृच्छ्रुतौ श्रूयेते । तथा परमेश्वरानुरूपमेतदक्षिस्थानम् । यथा

भामती

एवं प्राप्त उच्यते – 'यः' 'एषः' इति ।

अनिष्पन्नाभिधाने द्वे सर्वनामपदे सती ।
प्राप्य सन्निहितस्यार्थं भवेतामभिधातृणी ॥

सन्निहिताश्च पुरुषात्मादिशब्दास्ते च न यावत् स्वार्थमभिवदन्ति तावत्सर्वनामभ्यां नार्थतुषोऽप्यभिधीयत इति कुतस्तदर्थस्यापरोक्षता । पुरुषात्मशब्दौ च सर्वनामनिरपेक्षौ स्वरसतो जीवे वा परमात्मनि वा वर्त्तेते इति । न च तयोश्चक्षुषि प्रत्यक्षदर्शनमिति निरपेक्षपुरुषपदप्रत्यायितार्थानुरोधेन य एष इति दृश्यत इति च यथासम्भवं व्याख्येयम् । व्याख्यातञ्च सिद्धवदुपादानं शास्त्राद्यपेक्षं विद्वद्विषयं प्ररोचनार्थम् । विदुषः शास्त्रत उपलब्धिरेव दृढतया प्रत्यक्षवदुपचर्यते प्रशंसार्थमित्यर्थः । अपि च तदेव चरमं प्रथमानुगुणतया नीयते यन्नेतुं शक्यम् , अल्पञ्च । इह त्वमृतत्वादयो बहवश्चाशक्याश्च नेतुम् । न हि स्वसत्ताक्षणावस्थानमात्रममृतत्वं भवति । तथा सति किं नाम नामृतं स्यादिति व्यर्थममृतपदम् । भयाभये


भामती-व्याख्या

सिद्धान्त –

अनिष्पन्नाभिधाने द्वे सर्वनामपदे सती ।
प्राप्य सन्निहितस्यार्थं भवेतामभिधातृणी ॥

'यः' और 'एषः'—ये दोनों सर्वनाम पद प्रथम श्रुत होने पर भी सापेक्ष होने के कारण चाक्षुषत्वरूप अर्थ के अभिधान में परिनिष्पन्न (पर्यवसित) नहीं हो सकते, अतः सन्निहित 'पुरुष' पद के विशेष्यरूप अर्थ को पाकर ही वे अभिधाता (वाचक) होते हैं। 'पुरुष' और 'आत्मा' आदि सन्निहित पद जब तक अपने अर्थ का अभिधान नहीं कर लेते, तब तक सर्वनाम पदों ('यः' और 'एषः') के द्वारा किसी भी अर्थ का अभिधान नहीं किया जा सकता, तब अपरोक्षत्व या चाक्षुषत्वरूप अर्थ का बोध वे क्योंकर करा सकेंगे ? 'पुरुष' और 'आत्मा' ये दोनों पद सर्वनाम पदों से निरपेक्ष होकर निसर्गतः जीव या परमात्मा (ब्रह्म) के बोधक होते हैं। जीव और ब्रह्म का चक्षु में प्रत्यक्षतः दर्शन नहीं होता। फलतः निरपेक्ष 'पुरुष' पद के द्वारा जब अपने अर्थ का अभिधान हो जाता है, तब उसके अनुरोध पर 'यः' और 'एषः'—इन दोनों सर्वनाम पदों की यथासम्भव व्याख्या करनी होगी। भाष्यकार ने इस अधिकरण के अन्त में वैसी ही व्याख्या की है—"अस्मिश्च पक्षे प्रसिद्धवदुपादानं शास्त्राद्यपेक्षं विद्वद्विषयं प्ररोचनार्थम्"। आशय यह है कि महावाक्यादि के द्वारा विद्वान् को जो बोध प्राप्त होता है, वह परोक्ष होने पर भी सुदृढ़ होने के कारण प्रत्यक्ष कह दिया गया है कि उक्त ज्ञान की स्तुति सम्पन्न हो । [ "तत्त्वमसि" आदि शास्त्र के द्वारा प्रत्यक्ष बोध की उत्पत्ति माननेवाले आचार्यों के मत से ब्रह्म के लिए भी 'एष दृश्यते शास्त्रेण'—ऐसा व्यवहार हो सकता है, किन्तु वाचस्पति मिश्र के मत से नहीं]।

दूसरी बात यह भी है कि प्रथमोपस्थिति के अनुसार पश्चादुपस्थित पदार्थ का सामञ्जस्य वहाँ ही किया जाता है, जहाँ वैसा करना सम्भव हो । प्रकृत में अमृतत्वादि ऐसे बहुत धर्म हैं, जिनका अन्यत्र संगमन सम्भव नहीं, क्योंकि किसी पदार्थ का केवल अपनी सत्ता के क्षण में रहना (कतिपयक्षणावस्थायित्व) मुख्यतः अमृतत्व नहीं कहा जा सकता, वैसा मान लेने पर संसार की कौन वस्तु अमृत न बन जायगी ? तब 'अमृत' विशेषण अत्यन्त व्यर्थ

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