भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २६७
ननु 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इति स्वशब्देनैव ब्रह्मोपात्तं, कथमिह शारीर आत्मोपास्य आशङ्क्यते ? नैष दोषः, नेदं वाक्यं ब्रह्मोपासनाविधिपरं । किं तर्हि ? शमविधिपरम् । यत्कारणं 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत' इत्याह । एतदुक्तं भवति— यस्मात्सर्वमिदं विकारजातं ब्रह्मैव तज्जत्वात्तल्लत्वात्तदनत्वाच्च । न च सर्वस्यैकात्म- त्वेन रागादयः संभवन्ति, तस्माच्छान्त उपासीतेति । न च शमविधिपरत्वे सत्यनेन
भामती
प्राणशरीर इत्यादिभिर्विषयोपनायकैः सम्बध्यते । मनोमयादि च कार्यकारणसङ्घातात्मनो जीवात्मन एव निरूढमिति जीवात्मनोपास्येनोपरक्तोपासना न पश्चाद् ब्रह्मणा सम्बद्धुमर्हति, उत्पत्तिशिष्टगुणावरो- धात् । न च सर्वं खल्विदमिति वाक्यं ब्रह्मपरमपि तु शमहेतुवन्निगदार्थवादः शान्तताविधिपरः, शूर्पेण जुहोति तेन ह्यन्नं क्रियत इतिवत् । न चान्यपराबदपि ब्रह्मापेक्षिततया स्वीक्रियत इति युक्तम् । मनोमय-
भामती-व्याख्या
सम्बन्ध स्थापित होता है । मनोमयत्वादि धर्म कार्य (शरीर) और करण (इन्द्रियों) के संघातरूप जीव में ही निरूढ हैं, अतः उनके द्वारा जीव ही उपास्यत्वेन प्रक्रान्त है । जीवोपासनापरक वाक्य के द्वारा ब्रह्म की उपासना का विधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि उपासना के उत्पत्ति (विधि) वाक्य में ही मनोमयत्वादिरूपेण जीव की उपास्यता शिष्ट (उपदिष्ट) है, अतः वाक्यान्तर में निर्दिष्ट ब्रह्म को उस उपासना का विषय (उपास्य) नहीं मान सकते । [उत्पत्ति-शिष्ट (उत्पत्ति विधि में उपदिष्ट) अङ्ग के द्वारा जब प्रधान कर्म की आकांक्षा निवृत्त हो जाती है, तब वाक्यान्तर से विहित गुण का विधान उस कर्म में नहीं हो सकता, जैसा कि महर्षि जैमिनि ने कहा है—"न वा प्रकरणात् प्रत्यक्षविधानाच्च न प्रकरणं द्रव्यस्य" (जै. सू. १।४।१४) । चातुर्मास्य नाम को इष्टि के चार पर्व (भाग) होते हैं—(१) वैश्वदेव, (२) वरुणप्रघास (३) साकमेध और (४) शुनासीरीय । प्रथम पर्व में आठ कर्म विहित हैं—(१) आग्नेयमष्टाकपालं निर्वपति, (२) सौम्यं चरुम्, (३) सावित्रं द्वादश- कपालम्, (४) सारस्वतं चरुम्, (५) पौष्णं चरुम्, (६) मारुतं सप्तकपालम्, (७) वैश्वदेव- मामिक्षाम्, (८) द्यावापृथिव्येककपालम् (तैं. सं. १।८।२) । इन आठ यागों की सन्निधि में पठित "वैश्वदेवेन यजेत"—इस वाक्य के द्वारा उक्त आठ कर्मों में विश्वेदेवरूप देवता का विधान विवक्षित है ? अथवा कर्मान्तर का विधान ? इस प्रकार के सन्देह का निराकरण करते हुए कहा गया है—
गुणान्तरावरुद्धत्वान्नावकाशयो गुणोऽपरः ।
विकल्पोऽपि न वैषम्यात्साम्नामेव युज्यते ।। (तं. वा. पृ. ३४७)
अर्थात् उक्त आठों कर्मों के उत्पत्ति वाक्यों में उपदिष्ट अग्नि, सोमादि देवताओं के द्वारा ही कर्मों की आकांक्षा शान्त हो जाती है, देवतान्तर के विधान का अवसर ही नहीं रहता । उसी प्रकार प्रकृत उपासना-विधि में उत्पत्ति-शिष्ट जीव का उपास्यत्वेन अन्वय हो जाने पर वाक्यान्तर के द्वारा ब्रह्मरूप उपास्य के अन्वय का अवसर ही नहीं रह जाता ] ।
दूसरी बात यह भी है कि "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छां. ३।१४।१) यह वाक्य ब्रह्म का विधायक नहीं, अपितु शम-विधि का वैसे ही हेतुवन्निगदार्थवाद है, जैसे "शूर्पेण जुहोति" (मै. सं. १।१०।११) इस विधि का हेतुवन्निगदार्थवाद है—"तेन ह्यन्नं क्रियते" (श. ब्रा. २।८।३।२३)। [हेतुवन्निगदाधिकरण (जै. सू. १।२।३) में विचार किया गया है कि हेतु- हेतुमद्भाव के प्रकाशक वाक्यों को विधि-वाक्य माना जाय ? अथवा अर्थवाद ? जैसे "शूर्पेण जुहोति"—इस शूर्प-विधि को विषय करके पूर्वपक्ष की ओर से कहा गया है कि "तेन ह्यन्नं