भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ३१
भामती नोद्घाटितः। स्वव्याख्यानेनैवोक्तप्रायत्वादिति सर्वमवदातम् ॥ ३१ ॥
इति श्रीवाचस्पतिमिश्रविरचिते भाष्यविभागे भामत्यां प्रथमस्याध्यायस्य प्रथमः पादः।
भामती-व्याख्या ह्यर्थो विधीयते" (जै. सू. २।१।१)। याग, दान, होमादिरूप भावार्थ कादाचित्क होने के कारण विधेय होते हैं, किन्तु जो पदार्थ सदैव (नित्य) होता है और जो कभी भी नहीं होता, वे दोनों विधेय नहीं होते—
नित्यं न भवनं यस्य यस्य वा नित्यभूतता।
न तस्य क्रियमाणत्वं खपुष्पाकाशयोरिव ॥ (तं. वा. पृ. ३७७)
ब्रह्म में किसी प्रकार का भी क्रियमाणत्व सम्भव नहीं, अतः उसमें विधि की विषयता क्योंकर सम्भावित होगी? ब्रह्म वाक्यान्तरों से अवगत होने के कारण वाक्यान्तरानधिगत सोमयाग के समान विधेय नहीं हो सकता। वाक्यान्तर से प्राप्त (अधिगत) ब्रह्म का अनुवाद करके उपासनरूप भावार्थ का विधान करना होगा, उपासनरूप भावार्थ एक नहीं, अपितु भिन्न है, जैसा कि भाष्यकार कहते हैं—'त्रिविधमिह ब्रह्मोपासनं विवक्षितम्—"प्राणधर्मेण, प्रज्ञाधर्मेण, स्वधर्मेण च"। "प्राप्ते कर्मणि नानेको विधातुं शक्यते गुणः"—इस न्याय के अनुसार प्रत्येक उपासना के लिए विधि-प्रत्यय की आवृत्ति करनी होगी, फलतः वाक्य-भेद प्रसक्त होगा। यह दोष अत्यन्त स्फुट होने के कारण भाष्यकार ने इसका उद्घाटन नहीं किया, अपनी व्याख्या शैली के आधार पर ध्वनित अवश्य कर दिया है ॥ ३१ ॥
भामतीव्याख्यायां प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः समाप्तः।