भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २५७

तत्र संशयः - किमिह प्राणशब्देन वायुमात्रमभिधीयते, उत देवतात्मा, उत जीवः, अथवा परं ब्रह्मेति ? ननु 'अत एव प्राणः' इत्यत्र वर्णितं प्राणशब्दस्य ब्रह्म-परत्वम् । इहापि च ब्रह्मलिङ्गमस्ति - 'आनन्दोऽजरोऽमृतः' इत्यादि । कथमिह पुनः संशयः संभवति ? अनेकलिङ्गदर्शनादिति ब्रूमः । न केवलमिह ब्रह्मलिङ्गमेवोपलभ्यते, सन्ति हीतरलिङ्गान्यपि—'मामेव विजानीहि' (कौ० ३।१) इतीन्द्रस्य वचनं देवता-त्मलिङ्गम् । इदं शरीरं परिगृह्योत्थापयतीति प्राणलिङ्गम् । 'न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्याद्' इत्यादि जीवलिङ्गम् । अत उपपन्नः संशयः तत्र प्रसिद्धेर्वायुः प्राण इति प्राप्ते

भामती

सामर्थ्यातिशयाच्चेन्द्रस्य हिततमपुरुषार्थहेतुत्वमपि । मनुष्याधिकारत्वाच्छास्त्रस्य देवान् प्रत्यप्रवृत्तेर्भ्रूण-हत्यादिपापापरामर्शस्योपपत्तेः । लोकाधिपत्यं चेन्द्रस्य लोकपालत्वात् । आनन्दादिरूपत्वं च स्वर्गस्यैवा-नन्दत्वात् । 'आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते' इति स्मृतेश्चामृतत्वमिन्द्रस्य । त्वाष्ट्रमहनमित्याद्या च विग्रहवत्त्वेन स्तुतिस्तत्रैवोपपद्यते । तथापि परमपुरुषार्थस्यापवर्गस्य परब्रह्मज्ञानादन्यतोऽनवाप्तेः परमानन्दरूपस्य मुख्यस्यामृतत्वस्याजरावस्थस्य च ब्रह्मरूपाव्यभिचारादध्यात्मसम्बन्धभूम्नश्च पराचीन्द्रेऽनु-पपत्तेः इन्द्रस्य देवताया आत्मनि प्रतिबुद्धस्य चरमदेहस्य वामदेवस्येव प्रारब्धविपाककर्माशयमात्रं भोगेन क्षपयतो ब्रह्मण एव सर्वमेतत्कल्पत इति विग्रहवदिन्द्रजीवप्राणवायुपरित्यागेन ब्रह्मैवात्र प्राणशब्दं प्रतीयत इति पूर्वपक्षाभावादनारभ्यमेतदिति ।

अत्रोच्यते — 'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः सह ह्येतावस्मिन् शरीरे वसतः

भामती-व्याख्या

ज्ञान की अप्रतिहत (अबाध) शक्ति होती है। इन्द्रादि विशेष शक्ति-सम्पन्न होने के कारण हिततम (परम) पुरुषार्थ के हेतु भी माने जाते हैं। भ्रूण-हत्यादि-जनित पाप का सम्बन्ध भी इन्द्रादि देवगणों के साथ नहीं होता, क्योंकि विधि-निषेधात्मक शास्त्रों के अधिकारी त्रैवर्णिक मनुष्य ही माने जाते हैं, देवगण नहीं। इन्द्र लोकपाल देवता होने के कारण लोकाधिपति कहा जाता है। स्वर्ग सुखरूप है, अतः स्वर्गाधिपति को आनन्दरूप कहा जाता है। "आभूतसम्प्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते"—इस परिभाषा के अनुसार त्रिलोक्यन्तर्गत भूतों के प्रलय-पर्यन्त रहनेवाले स्वर्गादि लोकों को अमृत (अनश्वर) कह दिया गया है, अतः औपचारिक अमृतत्व भी इन्द्र में घट जाता है। इन्द्र ने जो अपनी स्तुति करते हुए कहा है—"त्वाष्ट्रमहनम्', वह स्तुति विग्रहधारी इन्द्र देवता में ही उपपन्न होती है।

तथापि परमपुरुषार्थरूप मोक्ष का साधन ब्रह्म-ज्ञान से भिन्न इन्द्रदेवतादि का ज्ञान नहीं होता। परमानन्दरूपता एवं मुख्य (अनौपचारिक) अमृतत्व—ये दोनों धर्म ब्रह्मरूपता से अव्यभिचरित हैं। जिस प्राण तत्त्व के साथ उपासक के शरीर का बहुल सम्पर्क (ब्र. सू. १।१।२९ में) बताया गया है—"अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्य उत्थापयति" (कौ. उ. ३।३) ऐसा प्राण बाह्य इन्द्र नहीं हो सकता, अपितु ब्रह्म ही हो सकता है। इन्द्र ने प्रतर्दन को जो उपदेश दिया है कि "मामेव विजानीहि" वह इन्द्र ने अपने आप में ब्रह्मरूपता का वैसे ही साक्षात्कार करके दिया है, जैसे वामदेव ने अपने अन्तिम जन्म में शेष प्रारब्ध का उपभोग करते समय गर्भ-वास में कहा था—"अहं मनुरभवं सूर्यश्च" (बृह. उ. १।४।१०)। ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मरूप हो जाता है, उसमें ब्रह्म के लिङ्गों का समन्वय समुचित ही माना जाता है। फलतः प्रकृत में विग्रहधारी इन्द्र, जीव और प्राण वायु को छोड़ कर 'प्राण' शब्द ब्रह्म को ही कहता है, इस प्रकार पूर्व पक्ष के उठने का यहाँ कोई अवसर ही नहीं, अतः इस अधिकरण के आरम्भ की कोई आवश्यकता नहीं है।

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