भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 329, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूतयोनेः ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३११
‘एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी’ इति हि पूर्वत्र प्राणादि पृथिव्यन्तं तत्त्वजातं जायमानत्वेन निरदिक्षत् । उत्तरत्रापि च ‘तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः’ इत्येवमादि ‘अतश्च सर्वा ओषधयो रसाश्च’ इत्येवमन्तं जायमानत्वेनैव निर्देक्ष्यति । इहैव कथम कस्मादन्तराले भूतयोने रूपमुपन्यसेत् ? सर्वात्मत्वमपि सृष्टिं परिसमाप्योपदेक्ष्यति ‘पुरुष एवेदं विश्वं कर्म’ (मुण्ड० २।१।१०) इत्यादिना । श्रुतिस्मृत्योश्च त्रैलोक्यशरीरस्य प्रजापतेर्जन्मादि निर्दिश्यमानमुपलभामहे — ‘हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम’ (ऋ० सं० १०।१२१।१)
भामती
जायमानत्वसम्भवे नाकस्माज्जनकत्वकल्पनं युक्तम् । प्रकरणं त्वेतद्विश्वयोनेः, सन्निधिश्च जायमानानां, सन्निधेश्च प्रकरणं बलीय इति जायमानपरित्यागेन विश्वयोनेरेव प्रकरणिनो रूपाभिधानमिति चेत् । न, प्रकरणिनः शरीरेन्द्रियविरहितस्य विग्रहवत्त्वविरोधात् । न चैतावता मूर्धादिश्रुतयः प्रकरणविरोधात् स्वार्थत्यागेन सर्वात्मतामात्रपरा इति युक्तम्, श्रुतेरत्यन्तविप्रकृष्टार्थात्प्रकरणाद्बलीयस्त्वात् । सिद्धे च
भामती-व्याख्या
में जो कहा गया है कि “अग्निर्मूर्धा”—इत्यादि स्वरूप का अभिधान विश्व के कारणीभूत परमेश्वर का है, वह कहना उचित नहीं, क्योंकि इस वाक्य से पूर्व “एतस्माज्जायते प्राणो मनः” (मुण्ड. २।१।२) और इस वाक्य के पश्चात् भी “तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः” (मुण्ड. २।१।५) इत्यादि वाक्यों के द्वारा जायमान विश्व के स्वरूप का निर्देश किया गया है, तब मध्य में “अग्निर्मूर्धा”—इत्यादि से परमेश्वर के स्वरूप का प्रसङ्ग अकस्मात् क्योंकर आ जायगा ? अतः जायमान प्रपञ्च के मध्य में चर्चित “अग्निर्मूर्धा”—इत्यादि स्वरूप जायमान जगत् का है, उसके जनक परमेश्वर का नहीं ।
शङ्का—‘‘अग्निर्मूर्धा’’—इत्यादि स्वरूप का प्रतिपादन जायमान जगत् का नहीं, अपितु उसके जनकीभूत परमात्मा का है, क्योंकि यह प्रकरण विश्व-स्रष्टा का है और सन्निधिरूप स्थान प्रमाण से जायमान जगत् का निर्देश किया जाता है, स्थान की अपेक्षा प्रकरण प्रमाण प्रबल होता है, जैसा कि माधवाचार्य का कहना है—“तस्मात्प्रकरणेन सन्निधिबाधात् सर्वेषां विदेवनादयः” (न्या. मा. वि. ३।३।१०) ।
समाधान—यहाँ सन्निधिरूप स्थान प्रमाण का प्रकरण से बाध नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ स्थान प्रमाण का सहायक सामर्थ्यात्मक लिङ्ग प्रमाण है कि जो शरीरवान् है, वही कार्य का जनक हो सकता है, अतः अग्निर्मूर्धा आदि वाक्य के द्वारा विश्व-स्रष्टा के विग्रह (शरीर) का प्रतिपादन किया गया है, शरीर-रहित पुरुष विश्वयोनि नहीं हो सकता ।
शङ्का—यहाँ लिङ्ग प्रमाण का तात्पर्य शरीरवत्त्व के बोधन में नहीं, अपितु सर्वात्मत्व के प्रतिपादन में है, क्योंकि “अग्निर्मूर्धा”—इत्यादि श्रुति-वाक्य प्रकरण से विरुद्ध होने के कारण अपने वाच्यार्थ का परित्याग करके परमात्मा की सर्वात्मता का प्रतिपादन करते हैं ।
समाधान—(१) श्रुति, (२) लिङ्ग, (३) वाक्य (४) प्रकरण, (५) स्थान और (६) समाख्या—इन छः प्रमाणों में श्रुतिप्रमाण सबसे प्रबल माना गया है, द्र. जै. सू. ३।३।१४) । अतः परमेश्वर के विग्रह (शरीर) का अभिधान करनेवाले श्रुतिवाक्य अन्यार्थपरता की कल्पना में बाधित हो जाते हैं, निरपेक्ष शब्दात्मक श्रुति प्रमाण की रक्षा करने के लिए परमेश्वर के विग्रह-प्रतिपादन में उक्त वाक्य का तात्पर्य मानना आवश्यक है । प्रकरण प्रमाण अत्यन्त विप्रकृष्ट अर्थ का गमक होता है और श्रुतिप्रमाण अन्तरङ्ग अर्थ का बोधक, अतः