भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३१२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. २४

इति । समवर्ततेत्यजायतेत्यर्थः । तथा 'स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते । आदिकर्ता स भूतानां ब्रह्माऽग्रे समवर्तत' इति च । विकारपुरुषस्यापि सर्वभूतान्तरा-त्मत्वं संभवति, प्राणात्मना सर्वभूतानामध्यात्ममवस्थानात् । अस्मिन्पक्षे 'पुरुष एवेदं विश्वं कर्म' इत्यादिसर्वरूपोपन्यासः परमेश्वरप्रतिपत्तिहेतुरिति व्याख्येयम् ॥ २३ ॥

( ७ वैश्वानराधिकरणम् । सू० २४-३२ ) वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ २४ ॥ 'को न आत्मा किं ब्रह्म' इति, 'आत्मानमेवेमं वैश्वानरं संप्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहि' (छा० ५।११।१, ६) इति चोपक्रम्य द्युसूर्यवायुवाकाशवारिपृथिवीनां सुतेजस्त्वादि-

भामती प्रकरणाणाऽसम्बन्धे जायमानमध्यपातित्वं जायमानग्रहणे कारणमुपन्यस्तं भाष्यकृता । तस्माद्धिरण्मगर्भ एव भगवान् प्राणात्मना सर्वभूतान्तरः कार्यो निर्दिष्ट इतत साम्प्रतम् । तत्किकमिदानीं सूत्रमनवधेयमेव ? नेत्याह ॐ अस्मिन् पक्षे इति ॐ प्रकरणात् ।

प्राचीनशालसत्ययज्ञेन्द्वद्युम्नजनकबुडिलाः समेत्य मीमांसां चक्रुः ॐ को न आत्मा किं ब्रह्म इति ॐ । आत्मत्युक्ते जीवात्मनि प्रत्ययो मा भूद् , अत उक्तं किं ब्रह्मेति । ते च मीमांसमाना निश्चयमनधिगच्छन्तः कैकेयराजं वैश्वानरविद्याविदमूपसेदुः । उपसद्य चोचुः ॐ आत्मानमेवेमं वैश्वानरं संप्रत्यध्येषि ॐ ।

भामती-व्याख्या प्रकरण की अपेक्षा श्रुति प्रबलतम है । जायमान विश्व-प्रतिपादन के प्रकरण में विश्वस्रष्टा का प्रतिपादन असम्बद्ध क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भाष्यकारने जायमान पदार्थों के निर्देश को उसके कारण ( जनक ) का उपलक्षण माना है । फलतः यहाँ प्राण तत्त्व के आश्रयीभूत भगवान् हिरण्यगर्भ का सर्वभूत-कारणत्वेन निर्देश सिद्ध होता है । यदि 'अग्निर्मूर्धा' – इत्यादि से परमेश्वर के स्वरूप का प्रतिपादन नहीं, तब "रूपोपन्यासाच्च" – इस सूत्र का सामञ्जस्य कैसे होगा ? इस प्रश्न का उत्तर भाष्यकार देते हैं—"अस्मिन् पक्षे पुरुष एवेदं विश्वं कर्म" (मुण्ड. २।१।१०) इत्यादि सर्वरूपोपन्यासः परमेश्वरप्रतिपत्तिहेतुरिति व्याख्येयम्" । यह प्रकरण प्रमाण किसी अन्य प्रमाण से बाधित नहीं, अतः उसके द्वारा परमेश्वर के स्वरूप का ही उपन्यास माना जाता है ॥ २३ ॥

विषय—(१) उपमन्यु के पुत्र प्राचीनशाल, (२) पुलुष के पुत्र सत्ययज्ञ, (३) भाल्लवि के पुत्र इन्द्रद्युम्न, ( ४ ) शर्कराक्ष के पुत्र जनक और ( ५ ) अश्वतराश्व के पुत्र बुडिल—इन पाँचों ने मिल कर विचार किया – "को न आत्मा किं ब्रह्म" ( छां. ५।११।१ ) । केवल आत्मा की जिज्ञासा करने पर जीवात्मा प्रसक्त होता है, उसकी व्यावृत्ति करने के लिए कहा है—किं ब्रह्म ? वे प्राचीनशालादि विचार करते-करते किसी निश्चय पर न पहुँच कर वैश्वानर-विद्या के ज्ञाता उद्दालक के पास गए । उसे भी विशेष ज्ञान नहीं था, अतः वह भी छठा जिज्ञासु बन गया, वे छहों उस विद्या के विशेषज्ञ कैकेयराज अश्वपति के पास गए और बोले—आप ही इस समय वैश्वानर का स्मरण ( ज्ञान ) रखते हैं, उसका उपदेश हम लोगों को करें। अश्वपति ने उन छहों ऋषि कुमारों से पृथक्-पृथक् पूछा कि आप लोग अभी तक