भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३१६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. २६

द्विष्ठावतिष्ठमानस्यैष निर्देशो भविष्यति, तस्यापि हि द्युलोकादिसंबन्धो मन्त्रवर्णादवगम्यते—'यो भानुना पृथिवीं द्यामुतेमामाततान रोदसी अन्तरिक्षम्' (ऋ० सं० १०।८८।३) इत्यादौ। अथवा तच्छरीराया देवताया ऐश्वर्ययोगाद् द्युलोकाद्यवयवत्वं भविष्यति। तस्मान्न परमेश्वरो वैश्वानर इति। अत्रोच्यते ॐ न तथादृष्ट्युपदेशादिति ॐ ॥

भामती व्यवस्थाप्यते, नानिश्चिताथेन निश्चितार्थम्। कर्मवच्च ब्रह्मापि सर्वशाखाप्रत्ययमेकमेव। न च द्युमूर्द्धत्वादिकं जाठरभूताग्निदेवताजीवात्मनामम्यतमस्यापि सम्भवति? न च सर्वलोकाश्रयफलभागिता। न च सर्वपाप्मप्रदाह इति परिशेष्यात्परमात्मैव वैश्वानर इति निश्चिते कुतः पुनरयमाशङ्कः—शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानान्नेति चेत् इति? उच्यते—तदेवोपक्रमानुरोधेनान्यथा नीयते, यन्नेतुं शक्यम्। अशक्यो च वैश्वानराग्निशब्दावम्यथा नेतुमिति शङ्कितुरभिमानः। अपि चान्तःप्रतिष्ठितत्वं प्रादेशमात्रत्वं च न सर्वव्यापिनोऽपरिमाणस्य च परब्रह्मणः सम्भवतः। न च प्राणाहुत्यधिकरणताऽम्यत्र जठराग्नेर्युज्यते। न च गार्हपत्याविहृदयाविता ब्रह्मणः सम्भविनो। तस्मात् यथायोगं जाठरभूताग्निदेवताजीवानामन्यतमो वैश्वानरः, न तु ब्रह्म। तथा च ब्रह्मात्मशब्दावुपक्रमगतावप्यन्यथा नेतव्यौ। द्युमूर्द्धत्वादयश्च स्तुतिमात्रम्। अथ वा अग्निशरीराया देवताया ऐश्वर्ययोगाद् द्युमूर्द्धत्वादय उपपद्यन्त इति शङ्कितुरभिसन्धिः।

अत्रोत्तरम्—न, कुतः? तथा दृष्ट्युपदेशात्। अद्धा चरममन्यथा सिद्धं प्रथमावगतमन्यथयति। न

भामती-व्याख्या अनुरोध पर वाजसनेयी बृहदारण्यक का वाक्यार्थ निश्चित हो जाता है, क्योंकि यह अत्यन्त प्रसिद्ध न्याय है कि "निश्चिताथेन ह्यनिश्चिताथं व्यवस्थाप्यते, न त्वनिश्चिताथेन निश्चितार्थम्"। जैसे कर्म अन्यान्य शाखाओं में प्रतिपादित होने पर भी एक ही माना जाता है, वैसे ही ब्रह्म भी विभिन्न शाखाओं से अवगत एकरूप ही माना जाता है। द्युलोक जिसका मस्तक है, ऐसा पदार्थ जाठराग्नि, भूताग्नि, देवता और जीव—इनमें से कोई भी नहीं, न सर्वलोक-फल का भोक्ता और न सर्व पाप का प्रदाहक है, परिशेषतः परमात्मा ही वैश्वानर निश्चित होता है, अतः यह पूर्वपक्ष कैसे उठ सकता है कि "शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानान्न"। अर्थात् 'वैश्वानर' शब्द ऐसी जाठराग्नि में रूढ है, जो केवल उदर के अन्दर अवस्थित है, अतः 'वैश्वानर' शब्द ब्रह्म का बोधक नहीं हो सकता।

समाधान—उपसंहार-वाक्य के अनुरोध पर वहाँ ही उपक्रम का अन्यथा नयन होता है, जहाँ वैसा करना सम्भव हो। 'वैश्वानर' और 'अग्नि'—इन दोनों शब्दों का अन्यथा नयन (अग्नि से भिन्न ब्रह्म का बोधकत्व) सम्भव नहीं—ऐसी पूर्वपक्षी की धारणा है। दूसरी बात यह भी है कि श्रुति में जो वैश्वानर के लिए अन्तःप्रतिष्ठितत्व (उदर में रहना) और प्रादेशमात्र में परिमित [अंगूठा और तर्जनी को पूरी तरह फैला देने से जो लम्बाई निकलती है, उसे प्रदेश कहते हैं, उसमें रहनेवाले पदार्थ को प्रादेशमात्र कहते हैं, ऐसा] कहा गया है, वह कहना सर्व-व्यापक और अपरिमित पर ब्रह्म के लिए कभी सम्भव नहीं हो सकता। शरीर में अवस्थित प्राणों की आहुति जाठराग्नि में ही सम्भव है, ब्रह्म में नहीं। हृदयादि में निहित गार्हपत्यादि अग्नियों की रूपकता भी ब्रह्म में समञ्जस नहीं होती। अतः जाठराग्नि, भूताग्नि, देवता और जीव—इनमें से कोई एक ही वैश्वानरास्पद हो सकता है, ब्रह्म नहीं। ऐसा निश्चय हो जाने पर उपक्रम वाक्य में जो 'ब्रह्म' और 'आत्मा' शब्द उपात्त हुए हैं, उनमें गौणी वृत्ति के द्वारा जाठराग्नि आदि की बोधकता पर्यवसित होती है। द्युलोकादि में मस्तकादिरूपता का प्रतिपादन केवल स्तुतिपरक है। अथवा अग्नि के अधिष्ठातृ देव में सर्वैश्वर्य के योग से उक्त कथन उपपन्न हो जाता है—ऐसा पूर्वपक्षी का आशय है।

सिद्धान्त—कथित पूर्वपक्ष का निराकरण करने के लिए कहा गया है—"न",