भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३१८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. २७ |
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त्मत्वान्पुरुषत्वं पुरुषेऽन्तःप्रतिष्ठितत्वं चोभयमुपपद्यते। ये तु ‘पुरुषविधमपि चैनमधीयते’ इति सूत्रावयवं पठन्ति, तेषामेषोऽर्थः—केवलजाठरपरिग्रहे पुरुषेऽन्तःप्रतिष्ठितत्वं केवलं स्यान्न पुरुषविधत्वम्। पुरुषविधमपि चैनमधीयते वाजसनेयिनः—‘पुरुषविधं पुरुषेऽन्तःप्रतिष्ठितं वेद’ इति। पुरुषविधत्वं च प्रकरणाद्यदधिदैवतं द्युमूर्धत्वादि पृथिवीप्रतिष्ठितत्वान्तं, यच्चाध्यात्मं प्रसिद्धं मूर्धत्वादि चुबुकप्रतिष्ठितत्वान्तं तत्परिगृह्यते ॥ २६ ॥
अत एव न देवता भूतं च ॥ २७ ॥
यत्पुनरुक्तं भूताग्नेरपि मन्त्रवर्णे द्युलोकादिसंबन्धदर्शनान्मूर्धैव सुतेजा इत्याद्यवयवकल्पनं तस्यैव भविष्यतीति, तच्छारीराया देवताया वैश्वर्ययोगादिति। तत्परिहर्तव्यम्। अत्रोच्यते—अत एवोक्तेभ्यो हेतुभ्यो न देवता वैश्वानरः। तथा भूताग्निरपि न वैश्वानरः। नहि भूताग्नेरौष्ण्यप्रकाशमात्रत्मकस्य द्युमूर्धत्वादिकल्पनोपपद्यते; विकारस्य विकारान्तरात्मत्वासंभवात्। तथा देवतायाः सत्यप्यैश्वर्ययोगे न द्युमूर्धत्वादिकल्पना संभवति, अकारणत्वात्परमेश्वर्यत्वाच्च। आत्मशब्दासम्भवश्च सर्वेष्वेषु पक्षेषु स्थित एव ॥ २७ ॥
भामती
तस्मात् स एषोऽग्निर्वैश्वानरो यदिति यदः पूर्वेण सम्बन्धः, पुरुष इति तत्र पुरुषद्दष्टेरुपदेश इति युक्तम् ॥ २५, २६ ॥
अत एवैतेभ्यः श्रुतिस्मृत्यवगतद्युमूर्धत्वादिसम्बन्धसर्वलोकाश्रयफलभागित्वसर्वपाप्मप्रदाहात्मब्रह्मपदोपक्रमेभ्यो हेतुभ्य इत्यर्थः। ‘यो भानुना पृथिवीं द्यामुतेमाम्’ इति मन्त्रवर्णोऽपि न केवलोष्ण्यप्रकाशविभवमात्रस्य भूताग्नेरिममीदृशं महिमानमाहापि तु ब्रह्मविकारतया तद्रूप्येणेति भावः ॥ २७ ॥
भामती-व्याख्या
का ही प्रतिपादन अपेक्षित होता, तब उस जाठराग्नि के लिए केवल अन्तःप्रतिष्ठितत्व ( शरीर के अन्दर रहना ) ही कहा जा सकता था, उसमें पुरुषत्व का विधान सम्भव नहीं होता, जैसा कि वाजसनेयी शाखा में कहा है—“स एषोऽग्निर्वैश्वानरो यत्पुरुषः” ( शत. ब्रा. १०.६।१।११ )। 'पुरुष' शब्द का अर्थ है—पूर्ण ( व्यापक )। जाठराग्नि व्यापक नहीं, अपितु उसके द्वारा उपलक्षित ब्रह्म ही पुरुष तत्त्व है। सूत्र में जो कहा है—“पुरुषमपि”, वहाँ प्रयुक्त 'अपि' शब्द का अर्थ यह है कि केवल अन्तःप्रतिष्ठितत्व का अभिधान न करके पुरुषत्व का भी विधान किया गया है। अत एव ( वैश्वानर में पुरुषत्व का विधान अपेक्षित होने के कारण ) पञ्चपादिकाकार का वह वक्तव्य भी निरस्त हो जाता है, जो कहा है कि 'उक्त श्रुति-वाक्य में पुरुष का अनुवाद करके वैश्वानरत्व का विधान किया गया है।' उस वक्तव्य को मान लेने पर पुरुष में वैश्वानर की भावना ( उपासना ) प्राप्त होगी। इतना ही नहीं “परमेश्वरदृष्टिर्हि जाठरे वैश्वानरे इहोपदिश्यते”—यह भाष्य भी विरुद्ध पड़ जाता है, अतः वैश्वानर में पुरुषत्व की भावना यहाँ अनुवादित है, पुरुष में वैश्वानरत्व की भावना नहीं। “स एषोऽग्निर्वैश्वानरो यत्”—यहाँ पर 'यत्' पद के द्वारा पूर्वोपस्थापित वैश्वानर का अनुवाद किया गया और ‘पुरुषः’—इस पद से पुरुषत्व का विधान किया जाता है॥ २५-२६ ॥
“अत एव न देवतां भूतं च”—इस सूत्र में 'अत एव' शब्द का अर्थ यह है कि ‘कथित श्रुति, स्मृति के द्वारा अवगत द्युमूर्धत्वादि का सम्बन्ध, सर्वलोकाश्रितफल-भोक्तृत्व, सर्वपाप-प्रदाह और आत्मा एवं ब्रह्म शब्द का उपक्रम’—इन हेतुओं से उक्त श्रुति में ‘वैश्वानर’ और ‘अग्नि’ पदों के द्वारा अग्नि के अभिमानी देव या भौतिक अग्नि का ग्रहण नहीं किया जा