भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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भूम्नो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३३३

इति । यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत्पश्यत्य- न्यद्विजानाति तदल्पम्' ( छा० ७।२३, २४ ) इत्यादि । तत्र संशयः—किं प्राणो भूमा स्यात् , आहोस्वित्परमात्मेति । कुतः संशयः ?

भामती नारदः खलु देवर्षिः कर्मविदनात्मवित्त्या शोच्यमात्मानं मन्यमानो भगवन्तमात्मज्ञमाजानसिद्धं महायोगिनं सनत्कुमारमुपससाद । उपसद्य चोवाच—भगवंश्चानात्मज्ञताजनितशोकसागरपारमुत्तारयतु मां भगवानिति । तत्तदुपश्रुत्य सनत्कुमारेण नामब्रह्मेत्युपास्स्वेत्युक्ते नारदेन पृष्टं किं नाम्नोऽस्ति भूय इति । तत्र सनत्कुमारस्य प्रतिवचनं वाग्वाव नाम्नो भूयसी । तदेवं नारदसनत्कुमारयोर्भूयसि प्रश्नोत्तरे वागिन्द्रियमुपक्रम्य मनःसङ्कल्पचित्तध्यानविज्ञानबलान्नततोयवायुसहिततेजोनभःस्मराशाप्राणेषु पर्यवसिते । कर्त्तव्याकर्त्तव्यविवेकः सङ्कल्पः, तस्य कारणं पूर्वापरविषयनिमित्तप्रयोजननिरूपणं चित्तम् । स्मरः, स्मरणम् : प्राणस्य च समस्तक्रियाकारकफलभेदेन पित्राद्यात्मत्वेन च रथारनाभिदृष्टान्तेन सर्वप्रतिष्ठत्वेन च प्राणभूयस्त्वदर्शिनोऽतिवादित्वेन च नामादिप्रपञ्चादाशान्ताद् भूयस्त्वमुक्त्वाऽपृष्ट एव नारदेन सनत्कुमार एकग्रन्थेन 'एष तु वातिवदति यः सत्येनातिवदतीति सत्यादीन् कृतिपर्यन्तानुक्त्वोपदिदेश, 'सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यम्' इति । तदुपश्रुत्य नारदेन सुखं भगवो विजिज्ञासेत्युक्ते सनत्कुमारो यो वै भूमा तत् सुखमित्युपक्रम्य भूमानं व्युत्पादयाम्बभूव, यत्र नान्यत्पश्यतीत्यादिना । तदीदृशे विषये विचार आरभ्यते । तत्र संशयः—किं प्राणो भूमा स्यादाहो परमात्मेति । भावभवित्रोस्तादात्म्यविवक्षया सामानाधिकरण्यं

भामती-व्याख्या कारण शोकाकुल देवर्षि नारद ने महायोगी ब्रह्मवेत्ता भगवान् सनत्कुमार की शरण में जाकर प्रार्थना की—भगवन् ! मैं अनात्मज्ञ होने के कारण शोक-सागर में डूब रहा हूँ, कृपया आप इस दीन जन का उद्धार करें। नारद की प्रार्थना सुनकर भगवान् सनत्कुमार ने पहले कहा— "नाम ब्रह्मेत्युपास्स्व" ( छां. ७।१।४ )। अर्थात् 'जैसे प्रतिमा की विष्णु-बुद्धया उपासना की जाती है, वैसे ही नाम (शब्द) की ब्रह्म-भावना से उपासना करनी चाहिए। ऐसा सुन कर श्री नारद ने पूछा—"अस्ति भगवो नाम्नो भूयः" ( छां. ७।१।५ ) अर्थात् क्या नाम से भी बढ़ कर कोई अधिक उपयुक्त माध्यम है ? इस प्रश्न का उत्तर भगवान् सनत्कुमार ने दिया— "वाग्वाव नाम्नो भूयसी" ( छां. ७।२।१ )। इस प्रकार नारद और सनत्कुमार की लम्बी प्रश्नोत्तर-परम्परा में 'वाक्' इन्द्रिय से लेकर मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, (मानस सामर्थ्य), अन्न, जल, वायु-सहित तेज, आकाश, स्मर, आशा (अभिलाषा) और प्राण की उत्तरोत्तर श्रेष्ठता कही गई। उनमें कर्त्तव्याकर्त्तव्य का विवेक संकल्प पदार्थ है, उसका कारण है—चित्त (अतीतादि विषयों के द्वारा साध्य प्रयोजन का ज्ञान)। 'स्मर' पद का अर्थ स्मरण है। अन्त में प्राण तत्त्व की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है कि जैसे पहिए की नाभि में अर (नाभि और नेमि को जोड़नेवाली लम्बी लकड़ी) प्रविष्ट होती है, वैसे ही इस प्राण तत्त्व में सब कुछ अवस्थित है। प्राण ही सकल कारक, करण और क्रियारूप है, प्राण ही पिता, माता, स्वसा और आचार्य है। प्राण में सर्वतः भूयस्त्व-दर्शी को अतिवादी (उत्कृष्टवादी) कह कर उसी प्रकरण में सनत्कुमार ने नारद के बिना पूछे ही "एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति"—इस प्रकार सत्यादि से लेकर कृति (प्रयत्न) पर्यन्त पदार्थों की चर्चा की और अन्त में "सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यम्"—ऐसा उपदेश दिया। उसको सुन कर नारद ने प्रार्थना की कि तब भगवन् सुख तत्त्व का उपदेश करें। श्री सनत्कुमार ने कहा—"यो वै भूमा तत्सुखम्" ( छां. ७।२३।१ ) और भूमा पदार्थ का व्युत्पादन किया—"यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति, स भूमा" ( छां. ७।२४।१ )। इस अधिकरण का यही विचारणीय विषय है।