भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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भूम्नो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३३५

आशान्तेभ्यो भूयांसं 'प्राणो वा आशाया भूयान' इत्यादिना सप्रपञ्चमुक्त्वा प्राणदर्शि- नश्चातिवादित्वम्—'अतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापहुवीत' इत्यभ्यनुज्ञाय

भामती

इति । न चात्मनः प्रकरणादात्मैव बुद्धिरत्थ इति तस्यैव भूमा स्यादिति युक्तम् , सनत्कुमारस्य नामब्रह्मे- त्युपास्वेति प्रतीकोपदेशरूपेणोत्तरेण नारदप्रश्नस्यापि तद्विषयत्वेन परमात्मोपदेशप्रकरणस्यानुत्थानात् । अतद्विषयत्वे चोत्तरस्य प्रश्नोत्तरयोर्वैयधिकरण्येन विप्रतिपत्तेरप्रामाण्यप्रसङ्गात् । तस्मादसति प्रकरणे प्राणस्यानन्तर्यात्तस्यैव भूमेति युक्तम् । तदेतत् संशयबीजं दर्शयता भाष्यकारेण सूचितं पूर्वपक्षसाधनमिति न पुनरुक्तम् । न च भूयोभूयः प्रश्नात्परमात्मैव नारदेन जिज्ञासित इति युक्तम् , प्राणोपदेशानन्तरं तस्योपरमात्तदेव प्राण एव भूमेति स्थिते यद्यत्तद्विरोधापातः प्रतिभाति तत्तदंनुगुणतया नेयं, नीतं च भाष्यकृता । स्यादेतत्—एष तु वातिवदतीति तुशब्देन प्राणदर्शिनोऽतिवादिनो व्यवच्छिद्य सत्येनातिवादिनं वदन् कथं प्राणस्य भूमानमभिदधीतेत्यत आह ॐ प्राणमेव तु इति ॐ । ॐ प्राणदर्शिनश्चातिवादित्वम् इति ॐ ।

भामती-व्याख्या

आर्ति (नाश) रूप भावार्थ भविता रूप (नश्यमान) हवि की अपेक्षा करता है, जैसा कि शबरस्वामी ने कहा है—"मृष्यामहे हविषा विशेषणम्" (शा. भा. पृ. १४३६) । [दर्शपूर्णमास के प्रकरण में श्रुत 'यस्योभयमार्तिमार्च्छेदेन्द्रं पञ्चशरावमोदनं निर्वपेत्'—इस वाक्य पर विचार करते हुए सन्देह किया गया है कि क्या सायं प्रातःकालीन उभय हवि की आर्ति (नाश) इस नैमित्तिक कर्म का निमित्त है? अथवा अन्यतर हवि की आर्ति? पूर्वपक्षी ने कहा—"यथाश्रुतिरिति चेत्" (जै. सू. ६।४।२२) अर्थात् यथाश्रुत उभय हवि की आर्ति ही निमित्त है । सिद्धान्ती ने कहा—"न तल्लक्षणत्वादुपपातो हि कारणाम्" (जै. सू. ६।४।२३) । अर्थात् केवल आर्ति को निमित्त न मानकर आर्ति-विशिष्ट हविरूप द्रव्य को निमित्त मानना होगा, क्योंकि निर्विशेष या निष्प्रतियोगिक आर्ति (नाश) तो अत्यन्त अप्रसिद्ध है, अतः हवि के द्वारा आर्ति को विशेषित करना होगा, फलतः हविरार्ति (हवि के नाश) को उक्त नैमित्तिक कर्म का निमित्त मानना होगा, वह चाहे उभय हवि की आर्ति हो या एक हवि की, दोनों अवस्थाओं में नैमित्तिक कर्म करना होगा]।

यदि कहा जाय कि 'परमात्मा' के प्रकरण में 'भूमा' पठित है, अतः परमात्मा में ही भूमरूपता पर्यवसित होती है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि भगवान् सनत्कुमार ने "नाम ब्रह्मेत्युपास्स्व"—ऐसा प्रतीकोपासना का उपदेश जिस प्रश्न के उत्तर में दिया, वह नारदीय प्रश्न भी तद्विषयक ही सिद्ध होता है, अतः परमात्मोपदेश का प्रकरण उठ ही नहीं सकता। यदि उत्तर वाक्य के विषय को प्रश्न-वाक्य का विषय नहीं माना जाता, तब प्रश्न और उत्तर का वैयधिकरण्य प्रसक्त होता है, भिन्नविषयक प्रश्नोत्तर-सन्दर्भ परस्पर व्याहतार्थक होने के कारण प्रमाणात्मक नहीं माना जा सकता। इस प्रकार प्राण-प्रकरण के सुलभ न होने के कारण सन्निधि-रूप स्थान प्रमाण के आधार पर प्राण तत्त्व में ही भूमरूपता प्राप्त होती है। यद्यपि यह परमात्मा के प्रकरण का अनुत्थान पूर्व पक्ष का साधक है, अतः भाष्यकार को पूर्वपक्ष-प्रदर्शन के अवसर पर इसका उद्भावन करना चाहिए था। तथापि जब भाष्यकार ने 'प्रकरणोत्थानात् परमात्मा भूमेत्यपि प्रतिभाति'—इस प्रकार प्रकरणोत्थान को संशय का कारण बताते हुए प्रकरणा-नुत्थान में पूर्वपक्ष की साधनता सूचित कर दी है, तब पूर्वपक्ष-प्रदर्शन के अवसर पर पुनः उसे कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती। भूयस्त्वविषयक प्रश्न के द्वारा नारद ने परमात्मा की जिज्ञासा प्रकट की—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि प्राणोपदेश के अनन्तर नारद आगे प्रश्न करने से उपरत ही हो जाता है। इस प्रकार प्राण ही भूमा है—ऐसा स्थिर हो जाने पर जो

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