भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 354

३३६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ८

'एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति' इति प्राणव्रतमतिवादित्वमनुकृष्यापरि- त्यज्यैव प्राणं सत्यादिपरम्परया भूमानमवतारयन्प्राणमेव भूमानं मन्यत इति गम्यते । कथं पुनः प्राणे भूमनि व्याख्यायमाने 'यत्र नान्यत्पश्यति' इत्येतद् भूम्नो लक्षणपरं वचनं व्याख्यायेतेति ? उच्यते—सुषुप्त्यवस्थायां प्राणग्रस्तेषु करणेषु दर्शनादिव्यव- हारनिवृत्तिदर्शनात्सम्भवति प्राणस्यापि 'यत्र नान्यत्पश्यति' इत्येतल्लक्षणम् । तथा च श्रुतिः 'न शृणोति न पश्यति' इत्यादिना सर्वकरणव्यापारप्रत्यस्तमयरूपां सुषुप्त्य- वस्थामुक्तवा 'प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति' ( प्र० ४।२।३ ) इति तस्यामेवाव- स्थायां पञ्चवृत्तेः प्राणस्य जागरणं ब्रुवती प्राणप्रधानां सुषुप्त्यवस्थां दर्शयति । यच्चै- तद् भूम्नः सुखत्वं श्रुतम्—'यो वै भूमा तत्सुखम्' (छा० ७।२३) इति, तदप्यविरुद्धम् , 'अत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ यदेतस्मिन् शरीरे सुखं भवति' ( प्र० ४।६ ) इति सुषु- प्त्यवस्थायामेव सुखश्रवणात् । यच्च 'यो वै भूमा तदमृतम् ( छा० ७।२४।१ ) इति,

भामती

नामाद्याशान्तमतीत्य वदनशीलत्वमित्यर्थः । एतदुक्तं भवति—नायं तुशब्दः प्राणातिवादित्वाद् व्यवच्छिनत्ति, अपि तु तदतिवादित्वमपरित्यज्य प्रत्युत तदनुकृष्य तस्यैव प्राणस्य सत्यस्य श्रवणमननश्रद्धानिष्ठाकृतिभि- र्विज्ञानाय निश्चयाय सत्येनातिवदतीति प्राणव्रतमेवातिवादित्वमुच्यते । तुशब्दो नामाद्यतिवादित्वाद्व्य- वच्छिनत्ति । न नामाद्याशान्तवाद्यतिवादो, अपि तु सत्यप्राणवाद्यतिवादीत्यर्थः । अत्र चागमाचार्योपदे- शाभ्यां सत्यस्य श्रवणम् , अथागमाविरोधिभ्यान्न्यायनिवेशनं मननं, मत्वा च गुरुशिष्यसब्रह्मचारिभिरनसूयुभिः सह संवाद्य तत्त्वं श्रद्धत्ते । श्रद्धानन्तरं च विषयान्तरदर्शी विरक्तस्ततो व्यावृत्तः तत्त्वज्ञानाभ्यासं करोति, सेयमस्य कृतिः प्रयत्नः । अथ तत्त्वज्ञानाभ्यासनिष्ठा भवति, यदनन्तरमेव तत्त्वविज्ञानानुभवः प्रादुर्भवति ।

भामती-व्याख्या

वाक्य उसके विरुद्ध प्रतीत होते हैं, वैसे सभी वाक्यों का अन्यथा नयन कर लेना चाहिए, भाष्यकार ने उसका दिग्दर्शन कर दिया है ।

यह जो शङ्का होती है कि "एष तु वा अतिवदति, यः सत्येनातिवदति" (छां. ७।१६।१) इस वाक्य में प्रयुक्त 'तु' शब्द के द्वारा प्राण-दर्शी की अतिवादिता का विच्छेद करके सत्यार्थदर्शी की अतिवादिता का कथन किया है, अतः प्राण में सत्यस्वरूप भूमरूपता क्योंकर सिद्ध होगी ? उस शङ्का का निरास करने के लिए भाष्यकार कहते हैं—"प्राणमेव तु नामादिभ्य आशान्तेभ्यो भूयांसमुक्त्वा प्राणदर्शिनश्चातिवादित्वमिति वदति" । अतिवादित्व का अर्थ है—'नाम से लेकर आशा पर्यन्त पदार्थों का अतिक्रमण करके वदनशीलत्व । सारांश यह है कि "एष तु"—यहाँ पर 'तु' शब्द प्राण-दर्शी की अतिवादिता का विच्छेद नहीं करता, अपि तु प्राण-दर्शी की अति- वादिता का परित्याग न कर उसी की अनुवृत्ति करते हुए सत्यात्मक प्राण का साक्षात्कार करने के लिए श्रवण, मनन, श्रद्धा, निष्ठा और कृति का व्रत-पालन रूप अतिवादित्व प्रतिपादित है । 'तु' शब्द नामादि की अतिवादिता से इस अतिवादिता-व्रत का विच्छेद करता है कि नामादि- वादी अतिवादी नहीं, अपि तु सत्यसंज्ञक प्राण-वादी अतिवादी है। यहाँ आगम और आचार्य के उपदेश से उसी सत्य का श्रवण, आगमाविरोधी न्यायों के द्वारा मनन, गुरु-शिष्य-सहाध्यायी आदि ईर्ष्या-रहित व्यक्तियों के द्वारा विचार करके अधिकारी पुरुष उस तत्त्व पर श्रद्धा का लाभ करता है । श्रद्धा के अनन्तर विषयान्तर में दोष-दर्शन कर उससे विरक्त होकर उसी तत्त्व पर ध्यानाभ्यास करता है—यही है इसी ( अधिकारी व्यक्ति ) की कृति ( प्रयत्न ) । उस तत्त्व के ध्यानाभ्यास से उसमें वह निष्ठा (एकतानता) उत्पन्न होती है, जिसके अनन्तर ही तत्त्व का साक्षात्कार हो जाता है । इस तथ्य को बौद्ध-जैसे अवैदिक दार्शनिकों ने भी स्वीकार