भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अक्षरस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३४१

भामती सर्वस्यैव रूपधेयस्य नामधेयात्मकत्वात् । सर्वं हि रूपधेयं नामधेयसम्भिन्नमनुभूयते, गौरयं वृक्षोऽयमिति । न चोपायत्वात्तत्सम्भेदसम्भवः । नहि धूमोपाया वह्निधीर्धूमसम्भिन्नं वह्निमवगाहते, धूमोऽयं वह्निरिति, किन्तु वैयधिकरण्येन धूमाद् वह्निरिति । भवति तु नामधेयसम्भिन्नो रूपधेयप्रत्ययो डित्थोऽयमिति । अपि च शब्दानुपायेऽपि रूपधेयप्रत्यये लिङ्गेन्द्रियजन्मनि नामसम्भेदो दृष्टः । तस्मान्नामसम्भिन्नाः पृथिव्यादयोऽम्बराान्ता नाम्ना प्रथिताश्च विद्वाश्च, नामानि चोङ्कारात्मकानि तद्व्याप्तत्वात् । तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णानि एवमोङ्कारेण सर्वा वागिति श्रुतेः । अत ॐकारात्मकाः पृथिव्यादयोऽम्बराान्ता इति वर्णा एवाक्षरं न परमात्मेति प्राप्तम् ।

भामती-व्याख्या से प्रयुक्त होता है । 'योगाद् रूढिर्बलीयसी'—इस न्याय के अनुसार यहाँ 'अक्षर' शब्द अकारादि वर्णों का ही बोधक है । श्रुति ने जो यह कहा है कि "कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति । स होवाचैतद्वै तदक्षरम्" ( बृह् उ. ३।८।७ ) अर्थात् उस अक्षर में ही आकाश ओत-प्रोत है। वह श्रुति का कहना भी वर्णात्मक अक्षर में घट जाता है, क्योंकि नामधेय ( शब्द ) और रूपधेय [ "भागरूपनामभ्यो धेयः" ( वार्तिक ५।४।३५ ) के द्वारा विहित स्वार्थार्थक धेय प्रत्ययान्त 'रूपधेय' शब्द से विवक्षित ] पदार्थ मात्र में तादात्म्य प्रतिपादित है—"वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" ( छां. ६।१।६ ) । अत एव सभी रूपधेय ( अभिधेय प्रपञ्च ) नामधेय ( शब्द ) से सम्भिन्न ( तादात्म्यापन्न ) ही प्रतीत होता है—गौरयम् [ यह चतुष्पात् पिण्ड गोः है अर्थात् गकार, अकार और विसर्गरूप शब्दात्मक है। आचार्य भर्तृहरि ने प्रपञ्च को शब्द का विवर्त या परिणाम माना है— अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥ ( वाक्यप. १।१ ) शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः ॥ ( वाक्यप. १।२० ) स्वयं ग्रन्थकार ने विवर्त का स्वरूप बताते हुए कहा है—"एकस्य तत्त्वादप्रच्युतस्य भेदानुकारेणासत्यविभक्तान्यरूपोपग्राहिता विवर्तः, स्वप्नविषयप्रतिभासवत्" ( वाक्यप. पृ. ५ ) इस प्रकार अक्षर ( शब्द ) में आकाशादि पदार्थों का ओत-प्रोत होना उपपन्न हो जाता है ] ।

यदि कहा जाय कि शब्द विषय-विशिष्ट ज्ञान का उपाय ( जनक ) होने के कारण विषय और ज्ञान से सम्भिन्न प्रतीत होता है, वस्तुतः अर्थरूप शब्द नहीं होता। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि धूम अग्नि-विशिष्ट ज्ञान का उपाय होने पर भी 'धमोऽग्निः'—इस प्रकार विषय से तादात्म्यापन्न प्रतीत नहीं होता, प्रत्युत 'धूमाद् अग्निः'—इस प्रकार वैयधिकरण्य-व्यवहार ही होता है। अतः शब्द और अर्थ का अधिष्ठान और अध्यस्तभाव होने के कारण ही सम्भेद ( तादात्म्य ) व्यवहार मानना होगा—'डित्थोऽयम्' । दूसरी बात यह भी है कि जो रूपधेय-प्रत्यय ( अर्थविशिष्ट-ज्ञान ) शब्द के द्वारा उत्पन्न न होकर प्रत्यक्ष या अनुमानादि के द्वारा उत्पादित होता है, वहाँ भी शब्द और अर्थ का सामानाधिकरण्य देखा जाता है । अतः शब्द में अर्थ अध्यस्त होने के कारण शब्द के द्वारा अर्थ ग्रथित अनुविद्ध या तादात्म्यसात् किया जाता है । "तद्यथा शंकुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृष्णानि, एवमोंकारेण सर्वा वाक् सन्तृष्णा, ओंकार एवेदं सर्वम्" ( छां. २।२३।३ ) इस श्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि जैसे किसी शंकु में सभी पत्ते पिरोए होते हैं, उसी प्रकार ओंकार में सभी शब्द गुँथे हैं, सभी शब्दों में व्याप्त होने के कारण ओंकार सर्वशब्दात्मक है, और समस्त पृथिव्यादि प्रपञ्च ओंकारात्मक है, अतः पृथिवी से लेकर अम्बर ( आकाश ) पर्यन्त सकल पदार्थ वर्णात्मक अक्षर में ओत-प्रोत होने के कारण उक्त श्रुति में 'अक्षर' पद से ओंकारादि वर्ण विवक्षित हैं,