भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३४२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. १०

एवं प्राप्त उच्यते— पर एवात्माऽक्षरशब्दवाच्यः। कस्मात्? अम्बरात्तधृतेः— पृथिव्यादेराकाशान्तस्य विकारजातस्य धारणात्। तत्र हि पृथिव्यादेः समस्तविकारजातस्य कालत्रयविभक्तस्य 'आकाश एव तदोतं च प्रोतं च' इत्याकाशे प्रतिष्ठितत्वमुक्त्वा 'कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्च' इत्यनेन प्रश्नेनेदमक्षरमवतारितम्। तथा चोपसंहृतम्— 'एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च' इति। न चेयमम्बरात्तधृतिर्ब्रह्मणोऽन्यत्र संभवति। यदपि 'ॐकार एवेदं सर्वम्' इति, तदपि ब्रह्मप्रतिपत्तिसाधनत्वात् स्तुत्यर्थं द्रष्टव्यम्। तस्मान्न क्षरत्यश्नुते चेति नित्यत्वव्यापित्वाभ्यामक्षरं परमेव ब्रह्म ॥ १० ॥


भामती

एवं प्राप्तेऽभिधीयते अक्षरं परमात्मैव, न तु वर्णाः। कुतः? अम्बरात्तधृतेः। न खल्वम्बरात्तानि पृथिव्यादीनि वर्णा धारयितुमर्हन्ति, किन्तु परमात्मैव। तेषां परमात्मविकारत्वात्। न च नामधेयात्मकं रूपधेयमिति युक्तम्। स्वरूपभेदादुपायभेदादर्थक्रियाभेदाच्च। तथाहि— शब्दत्वसामान्यात्मकानि श्रोत्रग्राह्याण्यभिधेयप्रत्ययार्थक्रियाणि नामधेयान्यनुभूयन्ते। रूपधेयानि तु घटपटादीनि घटत्वपटत्वाविसामान्यात्मकानि चक्षुरादीन्द्रियग्राह्याणि मधुधारणप्रावरणाद्यर्थक्रियाणि च भेदेनानुभूयन्ते इति कुतो नामसम्भेदः? न च डित्थोऽयमिति शब्दसामानाधिकरण्यप्रत्ययः। न खलु शब्दात्मकोऽयं पिण्ड इत्यनुभवः; किंतु यो नानादेशकालसंप्लुतः पिण्डः सोऽयं सन्निहितदेशकाल इत्यर्थः।


भामती-व्याख्या

परमात्मा नहीं—यह पर्यवसित हो जाता है।

सिद्धान्त— अवयव शक्ति के आधार पर 'अक्षर' शब्द परमात्मा का ही बोधक है, वर्ण का नहीं, क्योंकि यहाँ 'अक्षर' शब्द से वही तत्त्व विवक्षित है, जिसने अम्बर-पर्यन्त (पृथिवी से लेकर आकाश तक सभी) जगत् को अपने में धारण कर रखा है। अम्बरान्त विश्व का धारण वर्ण कभी नहीं कर सकते, किन्तु परमात्मा ही प्रपञ्च को धारण कर सकता है, क्योंकि निखिल जगत् परमात्मा का ही विकार (विवर्त) है। प्रकृति और विकार में स्वरूप, उपाय (प्रमाण) अर्थक्रिया का भेद नहीं होता, किन्तु शब्द और अर्थ में स्वरूपादि का विस्पष्ट भेद पाया जाता है—शब्द का स्वरूप वर्णात्मक, उपाय (ग्राहक प्रमाण) श्रोत्र और अर्थक्रिया (प्रयोजन या उपयोग) विषयावबोधन है किन्तु अभिधेय अर्थ का स्वरूप घट-पटाद्यात्मक, ग्राहक प्रमाण चक्षुरादि इन्द्रिय और अर्थक्रिया जलादि का धारण है। इस प्रकार अत्यन्त भिन्न-भिन्न परिलक्षित होनेवाले नाम (शब्द) और रूप (अर्थ) का तादात्म्य सम्भव नहीं हो सकता। यह जो कहा जाता है कि 'डित्थोऽयम्'—यहाँ पर शब्द और अर्थ का तादात्म्य प्रतीत होता है। वह कहना उचित नहीं, क्योंकि डित्थोऽयम्'—इस प्रतीति का 'डित्थात्मकोऽयं पिण्डः' ऐसा अभिप्राय नहीं, किन्तु 'डित्थ' जिस पदार्थ की संज्ञा है, ऐसा विविध देश और काल में जो स्मर्यमाण पिण्ड होता है, वही यह दिखाई दे रहा है—इसी भाव का पुरातन पद्य मिश्रजी ने तात्पर्य टीका (पृ० २३०) में उद्धृत किया है—

देवदत्तादिशब्देन हृदयस्थेन यः स्मृतः।
चक्षुषापि स एवायं सम्प्रति दृश्यते ॥

स्मर्यमाण संज्ञा शब्द का आपाततः सम्बन्ध दृश्यमान पिण्ड के साथ अवश्य अवभासित होता है, किन्तु वह उपलक्षक के रूप में तटस्थ ही होता है, विकल्प ज्ञान में समाविष्ट नहीं होता, जैसा कि मिश्रजी ने ही अन्यत्र (ता० टी० पृ० २३० में) कहा है—"शब्दस्तु सम्पातायातो न निवेशयत्यात्मानम् इन्द्रियजे विकल्पे।"