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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

३४२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. १०

एवं प्राप्त उच्यते— पर एवात्माऽक्षरशब्दवाच्यः। कस्मात्? अम्बरात्तधृतेः— पृथिव्यादेराकाशान्तस्य विकारजातस्य धारणात्। तत्र हि पृथिव्यादेः समस्तविकारजातस्य कालत्रयविभक्तस्य 'आकाश एव तदोतं च प्रोतं च' इत्याकाशे प्रतिष्ठितत्वमुक्त्वा 'कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्च' इत्यनेन प्रश्नेनेदमक्षरमवतारितम्। तथा चोपसंहृतम्— 'एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च' इति। न चेयमम्बरात्तधृतिर्ब्रह्मणोऽन्यत्र संभवति। यदपि 'ॐकार एवेदं सर्वम्' इति, तदपि ब्रह्मप्रतिपत्तिसाधनत्वात् स्तुत्यर्थं द्रष्टव्यम्। तस्मान्न क्षरत्यश्नुते चेति नित्यत्वव्यापित्वाभ्यामक्षरं परमेव ब्रह्म ॥ १० ॥


भामती

एवं प्राप्तेऽभिधीयते अक्षरं परमात्मैव, न तु वर्णाः। कुतः? अम्बरात्तधृतेः। न खल्वम्बरात्तानि पृथिव्यादीनि वर्णा धारयितुमर्हन्ति, किन्तु परमात्मैव। तेषां परमात्मविकारत्वात्। न च नामधेयात्मकं रूपधेयमिति युक्तम्। स्वरूपभेदादुपायभेदादर्थक्रियाभेदाच्च। तथाहि— शब्दत्वसामान्यात्मकानि श्रोत्रग्राह्याण्यभिधेयप्रत्ययार्थक्रियाणि नामधेयान्यनुभूयन्ते। रूपधेयानि तु घटपटादीनि घटत्वपटत्वाविसामान्यात्मकानि चक्षुरादीन्द्रियग्राह्याणि मधुधारणप्रावरणाद्यर्थक्रियाणि च भेदेनानुभूयन्ते इति कुतो नामसम्भेदः? न च डित्थोऽयमिति शब्दसामानाधिकरण्यप्रत्ययः। न खलु शब्दात्मकोऽयं पिण्ड इत्यनुभवः; किंतु यो नानादेशकालसंप्लुतः पिण्डः सोऽयं सन्निहितदेशकाल इत्यर्थः।


भामती-व्याख्या

परमात्मा नहीं—यह पर्यवसित हो जाता है।

सिद्धान्त— अवयव शक्ति के आधार पर 'अक्षर' शब्द परमात्मा का ही बोधक है, वर्ण का नहीं, क्योंकि यहाँ 'अक्षर' शब्द से वही तत्त्व विवक्षित है, जिसने अम्बर-पर्यन्त (पृथिवी से लेकर आकाश तक सभी) जगत् को अपने में धारण कर रखा है। अम्बरान्त विश्व का धारण वर्ण कभी नहीं कर सकते, किन्तु परमात्मा ही प्रपञ्च को धारण कर सकता है, क्योंकि निखिल जगत् परमात्मा का ही विकार (विवर्त) है। प्रकृति और विकार में स्वरूप, उपाय (प्रमाण) अर्थक्रिया का भेद नहीं होता, किन्तु शब्द और अर्थ में स्वरूपादि का विस्पष्ट भेद पाया जाता है—शब्द का स्वरूप वर्णात्मक, उपाय (ग्राहक प्रमाण) श्रोत्र और अर्थक्रिया (प्रयोजन या उपयोग) विषयावबोधन है किन्तु अभिधेय अर्थ का स्वरूप घट-पटाद्यात्मक, ग्राहक प्रमाण चक्षुरादि इन्द्रिय और अर्थक्रिया जलादि का धारण है। इस प्रकार अत्यन्त भिन्न-भिन्न परिलक्षित होनेवाले नाम (शब्द) और रूप (अर्थ) का तादात्म्य सम्भव नहीं हो सकता। यह जो कहा जाता है कि 'डित्थोऽयम्'—यहाँ पर शब्द और अर्थ का तादात्म्य प्रतीत होता है। वह कहना उचित नहीं, क्योंकि डित्थोऽयम्'—इस प्रतीति का 'डित्थात्मकोऽयं पिण्डः' ऐसा अभिप्राय नहीं, किन्तु 'डित्थ' जिस पदार्थ की संज्ञा है, ऐसा विविध देश और काल में जो स्मर्यमाण पिण्ड होता है, वही यह दिखाई दे रहा है—इसी भाव का पुरातन पद्य मिश्रजी ने तात्पर्य टीका (पृ० २३०) में उद्धृत किया है—

देवदत्तादिशब्देन हृदयस्थेन यः स्मृतः।
चक्षुषापि स एवायं सम्प्रति दृश्यते ॥

स्मर्यमाण संज्ञा शब्द का आपाततः सम्बन्ध दृश्यमान पिण्ड के साथ अवश्य अवभासित होता है, किन्तु वह उपलक्षक के रूप में तटस्थ ही होता है, विकल्प ज्ञान में समाविष्ट नहीं होता, जैसा कि मिश्रजी ने ही अन्यत्र (ता० टी० पृ० २३० में) कहा है—"शब्दस्तु सम्पातायातो न निवेशयत्यात्मानम् इन्द्रियजे विकल्पे।"

अक्षरस्य ब्रह्मत्वम् ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्३४३

भामती

संज्ञा तु गृहीतसम्बन्धैरत्यन्ताभ्यासात् पिण्डाभिनिवेशिन्येव संस्कारोद्बोधसम्पातायाता स्मर्यते । यथाहूः—

'यत्तत्संज्ञास्मरणं तत्र न तदप्यन्यहेतुकम् ।
पिण्ड एव हि दृष्टः सन् संज्ञां स्मारयितुं क्षमः ॥
संज्ञा हि स्मर्यमाणापि प्रत्यक्षत्वं न बाधते ।
संज्ञिनः सा तटस्था हि न रूपाच्छादनक्षमा ॥' इति ।

न च वर्णातिरिक्ते स्फोटात्मनि अलौकिकेऽक्षरपदप्रसिद्धिरस्ति लोके । न चैष प्रामाणिक इत्युपरिष्टात् प्रवेदयिष्यते । निरूपितं चास्माभिस्तत्त्वबिन्दौ । तस्माच्छ्रोत्रग्राह्याणां वर्णानामम्बराद्यधृतेरनुपपत्तेः समुदायप्रसिद्धिबाधनाद् अवयवप्रसिद्ध्या परमात्मैवाक्षरमिति सिद्धम् । ये तु प्रधानं पूर्वपक्षयित्वाऽ-


भामती-व्याख्या

जो सम्पादक ने लिखा है—"संज्ञा तु पिण्डाभिनिवेशिन्येव— इत्यत्र पिण्डानिवेशिन्येव इति युक्तमाभाति" । वह अत्यन्त युक्ति-युक्त है, क्योंकि न्यायवार्तिक की तात्पर्यटीका में वैसा ही सन्दर्भ उपलब्ध है ] । पिण्ड को देखकर उसकी संज्ञा का स्मरण उन व्यक्तियों के द्वारा किया जाता है, जिन्होंने संज्ञा और संज्ञी की सङ्गति का ग्रहण पहले कर रखा है । इस सङ्गति-ग्रहण से जनित संस्कार जब-जब उद्बुद्ध होते हैं, तब-तब संज्ञा का स्मरण होता रहता है, अत एव संज्ञीरूप पिण्ड को ही वृद्ध न्यायाचार्यों ने संज्ञा का स्मारक माना है—

यत् संज्ञास्मरणं तत्र न तदप्यन्यहेतुकम् ।
पिण्ड एव हि दृष्टः सन् संज्ञां स्मारयितुं क्षमः ॥
संज्ञा हि स्मर्यमाणापि प्रत्यक्षत्वं न बाधते ।
संज्ञिनः सा तटस्था हि न रूपाच्छादनक्षमा ॥

[ किसी पिण्ड को देखकर जो उसकी संज्ञा (वाचक शब्द) का स्मरण होता है, वह भी पिण्डगत शब्द-तादात्म्यापत्तिरूप हेतु से जनित नहीं होता कि उसका गमक हो जाता । सन्निहित पिण्ड ही प्रत्यक्ष होकर उस संज्ञा का स्मरण कराने में सक्षम होता है । स्मर्यमाण संज्ञा पिण्ड की प्रत्यक्षता का बाधक नहीं, संज्ञा तटस्थ (विषय में निविष्ट न) होने के कारण विषय के स्वरूप की आच्छादिका (व्यवसायिका) नहीं होती । फलतः पिण्डविषयक सविकल्पक में भी अभिलाप-संसर्ग-विषयकत्वरूप पारिभाषिक कल्पना का अभाव होने के कारण प्रस्तुत लक्षण घट जाता है, जो कि बौद्धों के लिए अनिष्ट और नैयायिकादि के लिए अभीष्ट है ] ।

वर्णों से अतिरिक्त स्फोटनाम के अलौकिक शब्द के लिए तो लोक में कहीं भी 'अक्षर' पद का व्यवहार नहीं होता और स्फोट कोई प्रामाणिक पदार्थ भी नहीं—यह आगे चलकर कहा जायगा और हम (वाचस्पति मिश्र) ने तत्त्वबिन्दु में स्फोट की अप्रामाणिकता पर पुष्कल प्रकाश डाला है—

मीयमानपरित्यागो बाधके नासति स्फुटे ।
दृष्टात् कार्योपपत्तौ नादृष्टपरिकल्पना ॥ ( त० बिन्दु० पृ० ८ )

[ अर्थात् जब तक कोई प्रबल बाधक उपलब्ध न हो, तब तक प्रमीयमान् (प्रमाण-सिद्ध) वर्णात्मक शब्द का परित्याग नहीं किया जा सकता । अनुभव-सिद्ध वर्णरूप दृष्ट साधन से ही जब अर्थावबोधरूप कार्य सम्पन्न हो जाता है, तब स्फोटरूप अदृष्ट (अननुभूयमान) पदार्थ की कल्पना नहीं की जा सकती ] । परिशेषतः श्रोत्र के द्वारा गृहीत होनेवाले वर्णात्मक अक्षर में पृथिव्यादि आकाशान्त भूत-वर्ग का धारण सम्भव नहीं, एवं 'अक्षर' पद का समुदाय-प्रसिद्ध

३४४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ११

स्यादेतत्—कार्यस्य चेत्कारणाधीनत्वमम्बरान्तधृतिरभ्युपगम्यते, प्रधानकार- णवादिनोऽपीयमुपपद्यते । कथमम्बरान्तधृतेर्ब्रह्मत्वप्रतिपत्तिरिति ? अत उत्तरं पठति —

सा च प्रशासनात् ॥ ११ ॥

सा चाम्बरान्तधृतिः परमेश्वरस्यैव कर्म । कस्मात् ? प्रशासनात् । प्रशासनं


भामती

नेन सूत्रेण परमात्मैवाक्षरमिति सिद्धान्तयन्ति, तैरम्बरान्तधृतेरित्यनेन कथं प्रधानं निराक्रियत इति वाच्यम् । अथ नाधिकरणत्वमात्रं धृतिः अपि तु प्रशासनाधिकरणता । तथा च श्रुतिः— 'एतस्य वाक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः' इति । तथाप्यम्बरान्तधृतेरित्यनर्थकम् , एतावद्वक्तव्यम्— अक्षरं प्रशासनादिति । एतावत्तैव प्रधाननिराकरणसिद्धेः । तस्माद्वर्णाक्षरतानिरिक्रियेवास्यार्थः । न च स्थूलादीनां वर्णेष्वप्राप्तेरस्थूलमित्यादिनिषेधानुपपत्तेर्वर्णेषु शङ्कव नास्तीति वाच्यम् , नहावश्यं प्राप्तिपूर्वका एव प्रतिषेधा भवन्ति, अप्राप्तेष्वपि नित्यानुवादानां दर्शनात् । यथा नान्तरिक्षे न दिवीत्यग्निनयननिषेधा- नुवादः । तस्माद् यत्किञ्चिदेतत् ॥ १० ॥ प्रशासनमाज्ञा चेतनधर्मो नाचेतने प्रधाने वाऽव्याकृते वा सम्भवति । न च मुख्यार्थसम्भवे कूलं


भामती-व्याख्या

(रूढ़) कोई अर्थ लोक में प्रसिद्ध नहीं, अतः 'न क्षरति'—इस प्रकार योगार्थरूप परब्रह्म ही विश्व का आधार सिद्ध होता है।

श्री भास्कराचार्य ने इस अधिकरण में शांकर मतानुसार किए गए पूर्वपक्ष का खण्डन करते हुए प्रधान (प्रकृति) तत्त्व को पूर्वपक्ष में प्रस्तुत किया है—"केचिदक्षरशब्दस्य वर्णे प्रसिद्धत्वादक्षरमोंकार इति पूर्वपक्षयन्ति वैयाकरणदर्शनं च स्फोटशब्द इत्यवतार्य गकारादि वर्णा एव शब्दा इति व्यवस्थापयन्ति । तदेतदधिकरणेनासम्बद्धम् । प्रधानस्य तु युज्यत, विकारधर्माणं कारणप्रसक्तेः" (भास्कर० पृ० ५४) । वह भास्कीय प्रस्तुतीकरण उचित नहीं, क्योंकि "अम्बरान्तधृतेः"—इस हेतु के द्वारा प्रधानतत्त्व का निराकरण क्योंकर होगा ? क्योंकि अम्बरान्त भूत-वर्ग की धारकता प्रधान में भी उपपन्न है।

भास्कराचार्य ने जो "सा च प्रशासनात्" (ब्र. सू. १।३।११) इस सूत्र के द्वारा प्रधान का निराकरण करते हुए कहा है—"एतस्यैवाक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः (बृह. उ. ३।८।९) इति प्रशासनमाज्ञापयितृत्वं चेतनधर्मः"। वह कहना भी उचित नहीं, क्योंकि इस प्रकार अम्बरान्तधृति का अर्थ यदि प्रशासनाधिकरणता मान लिया जाता है, तब भी "अम्बरान्तधृतेः"—यह सूत्रांश अनर्थक हो जाता है, तब तो "अक्षरं प्रशासनात्"— ऐसा एक सूत्र बना देना चाहिए था, इतनेमात्र से प्रधान-तत्त्व का निराकरण सम्पन्न हो जाता । अतः वर्णात्मक अक्षर का निराकरण करना ही यहाँ उचित है, प्रधान का नहीं।

भास्कराचार्य ने जो कहा है कि "'अस्थूलादि च तस्मिन्नुपपत्तेः" अर्थात् वर्णात्मक अक्षर में स्थूलत्वादि प्रसक्त (प्राप्त) ही नहीं, तब 'अस्थूलमनणु" (बृह. उ. ३।८।८) इत्यादि वाक्यों के द्वारा वर्णात्मक अक्षर में स्थूलत्वादि का प्रतिषेध अप्रसक्त-प्रतिषेध होने के कारण अनुपपन्न है। वह कहना भी उचित नहीं क्योंकि निषेध सदैव प्राप्तिपूर्वक ही होता है— ऐसा कोई नियम नहीं, अप्राप्त-स्थल पर भी प्राप्त नित्य निषेध का अनुवाद देखा जाता है, जैसे कि इष्टिका-चयन के सन्दर्भ में कहा गया है—"नान्तरिक्षे न दिवि" अर्थात् अग्निचयन कर्म के लिए जो श्येन पक्षी के आकार का स्थण्डिल बनाया जाता है, उसके लिए 'अन्तरिक्ष (आकाश) और द्यु में ईंट की चुनाई नहीं करनी चाहिए'—ऐसा निषेध अप्रसक्त-प्रतिषेध

अक्षरस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३४५

हीह श्रूयते-‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः’ (बृ० ३।८।९) इत्यादि । प्रशासनं च पारमेश्वरं कर्म । नाचेतनस्य प्रधानस्य प्रशासनं भवति । न ह्यचेतनानां घटादिकारणानां मृदादीनां घटादिविषयं प्रशासनमस्ति ॥११॥

अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥ १२ ॥

अन्यभावव्यावृत्तेश्च कारणाद् ब्रह्मैवाक्षरशब्दवाच्यम् । तस्यैवाम्बरात्तधृतिः कर्म नान्यस्य कस्यचित् । किमिदमन्यभावव्यावृत्तेरिति ? अन्यस्य भावोऽन्यभावः, तस्माद् व्यावृत्तिरन्यभावव्यावृत्तिरिति । एतदुक्तं भवति-यदन्यद् ब्रह्मणोऽक्षरशब्दवाच्यमिहाशङ्क्यते तद्भावादिदमम्बरात्तविधारणमक्षरं व्यावर्तयति श्रुतिः-‘तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ’ बृ० ३।८।११) इति । तत्रादृष्टत्वादिव्यपदेशः प्रधानस्यापि संभवति, द्रष्टृत्वादिव्यपदेशस्तु न संभवति, अचेतनत्वात् । तथा ‘नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ’ इत्यात्मभेदप्रतिषेधात् न शारीरस्योपाधिमतोऽक्षरशब्दवाच्यत्वम्, ‘अचक्षुष्कमश्रोत्रमवागमनः’ (बृ० ३।८।८) इति चोपाधिमत्ताप्रतिषेधात् । न हि

भामती

पिपत्तिषतीतिवद्गौणस्त्वसमुचितमिति भावः ॥ ११ ॥

अम्बरात्तविधारणस्याक्षरस्येश्वराद्यदन्यद्वर्णा वा प्रधानं वाऽव्याकृतं वा तेषामन्येषां भावोऽन्यभावस्तमत्यन्तं व्यावर्तयति श्रुतिः-तद्वा एतदक्षरं गार्गीत्यादिका । अनेनैव सूत्रेण जीवस्याप्यक्षरता निषिद्धेत्यत आह ॐ तथा इति ॐ । नान्यद्वित्यादिकया हि श्रुत्याऽऽत्मभेदः प्रतिषिध्यते । तथा चोपाधिभेदभिन्ना जीवा निषिद्धा भवन्त्यभेदाभिधानादित्यर्थः । इतोऽपि न शारीरस्याक्षरशब्दतेत्याह ॐ अचक्षुष्कम् इति ॐ । अक्षरस्य चक्षुराद्युपाधि वारयन्ती श्रुतिरोपाधिकस्य जीवस्याक्षरतां निषेधतीत्यर्थः । तस्माद्ब्रह्मण-

भामती-व्याख्या

है, क्योंकि आकाश में निराधार ईंटों का चयन कभी सम्भव ही नहीं, अतः आकाश में स्वतः सिद्ध चयनाभाव का अनुवादमात्र उक्त वाक्य के द्वारा किया जाता है । फलतः भास्करीय आलोचना निराधार है ॥ १० ॥

“एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ! सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः” (बृह. उ. ३।८।९) इस श्रुति में प्रतिपादित प्रशासन चेतन का धर्म है, अतः प्रधान और अव्यक्तादि अचेतन पदार्थों में नहीं रह सकता । यद्यपि “कूलं पिपतिषति”-इत्यादि प्रयोगों के आधार पर इच्छादि चेतन-धर्मों का गौणरूपेण व्यवहार जड़ पदार्थों में भी हो जाता है। तथापि मुख्यार्थ के सुलभ होने पर गौणार्थ का ग्रहण नहीं किया जाता, अतः प्रक्रान्त प्रशासक परमात्मा ही सिद्ध होता है, शब्द, प्रधान या अव्यक्त नहीं ॥ ११ ॥

आकाशान्त पदार्थों के विधारक ब्रह्मरूप अक्षर तत्त्व से भिन्न जो वर्ण (शब्द), प्रधान (प्रकृति) या अव्यक्तरूप भाव पदार्थ आशङ्कित हैं, उन भाव पदार्थों से इस सिद्धान्तित ब्रह्मरूप अक्षरतत्त्व को श्रुति भिन्न कर रही है-“तद्वा एतदक्षरं गार्गि अदृष्टं दृष्टृ” (बृह. उ. ३।८।११) । अर्थात् यह ब्रह्मरूप अक्षर तत्त्व शब्दादि जड़ पदार्थों से भिन्न है, क्योंकि यह द्रष्टा है, प्रधांनादि जड़ पदार्थों को द्रष्टा नहीं कह सकते। इसी सूत्र के द्वारा जीव में भी अभिमत अक्षरत्व का निरास हो जाता है, क्योंकि अन्यभाव (अन्यत्व या भेद) की व्यावृत्ति श्रुति कर रही है-‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” (बृह. उ. ३।७।२३) अर्थात् इस अक्षर तत्त्व से भिन्न कोई द्रष्टा नहीं। इस लिए भी शारीर (जीव) में अक्षरात्मकता नहीं, क्योंकि अभिमत अक्षर तत्त्व “अचक्षुष्कम्” (चक्षुरादि उपाधियों से रहित) है, किन्तु जीव चक्षुरादि

४४

३४६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. १३

निरुपाधिकः शारीरो नाम भवति । तस्मात्परमेव ब्रह्माक्षरमिति निश्चयः ॥ १२ ॥


( ४ ईक्षतिकर्मव्यपदेशाधिकरणम् । सू० १३ )

ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्सः ॥ १३ ॥

'एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारस्तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति' इति प्रकृत्य श्रूयते—'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत' (प्र० ५।२, ५) इति ।

किमिस्मिन्वाक्ये परं ब्रह्माभिध्यातव्यमुपदिश्यते आहोस्विदपरमिति । एतेनैवायतनेन परमपरं चैकतरमन्वेतीति प्रकृतत्वात्संशयः ।

तत्रापरमिदं ब्रह्मेति प्राप्तम् । कस्मात् ? 'स तेजसि सूर्ये संपन्नः', 'स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम्' इति च तद्विदो देशपरिच्छिन्नस्य फलस्योच्यमानत्वात् । नहि परब्रह्मविद्देशपरिच्छिन्नं फलमश्नुवीतेति युक्तम्, सर्वगतत्वात्परस्य ब्रह्मणः । नन्वपरब्रह्मपरिग्रहे परं पुरुषमिति विशेषणं नोपपद्यते । नैष दोषः, पिण्डापेक्षया प्राणस्य परत्वोपपत्तेः ।

भामती

प्रधानाऽव्याकृतजीवानामसम्भवात् सम्भवाच्च परमात्मनः परमात्मैवाक्षरमिति सिद्धम् ॥ १२ ॥

कार्यब्रह्म जनप्राप्तिफलत्वादर्थभेदतः ।
दर्शनध्यानयोर्ध्येयमपरं ब्रह्म गम्यते ॥

ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतीति श्रुतेः सर्वगतपरब्रह्मवेदने तद्भावापत्तौ स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकमिति न देशविशेषप्राप्तिरुपपद्यते । तस्मादपरमेव ब्रह्मेह ध्येयत्वेन चोद्यते । न चेक्षणस्य लोके तत्त्वविष-

भामती-व्याख्या

उपाधियों से युक्त है, अतः वह अम्बरान्त जगत् का विधारक अक्षर तत्त्व कदापि नहीं हो सकता । फलतः वर्ण (शब्द), प्रधान, अव्याकृत और जीव में अक्षररूपता सम्भव न होने के कारण परमात्मा ही अभीष्ट अक्षर तत्त्व सिद्ध होता है ॥ १२ ॥


विषय— 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत' (प्र. उ. ५।५) अर्थात् 'जो व्यक्ति इस परम पुरुष का तीन मात्रावाले 'ओम्' अक्षर के माध्यम से ध्यान करता है, वह ब्रह्मलोक में जाकर परब्रह्म का दर्शन कर लेता है'—इस श्रुति में 'परं पुरुष' विचारणीय है ।

संशय— क्या उक्त वाक्य में अपर ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) का ध्यान विहित है? अथवा पर ब्रह्म का ?

पूर्वपक्ष—
कार्यब्रह्म जनप्राप्तिफलत्वादर्थभेदतः ।
दर्शनध्यानयोर्ध्येयमपरं ब्रह्म गम्यते ॥

"ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (मुण्ड. ३।२।९) इस श्रुति में कथित पर ब्रह्म का ही यदि उक्त श्रुति में 'परम पुरुष' पद से ग्रहण किया जाता है, तब उसके दर्शन से ब्रह्मरूपता की प्राप्ति हो जाने के कारण उक्त स्थल पर "स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम्" (प्रश्न. ५।५) इस प्रकार ब्रह्मलोकरूप विशेष देश की प्राप्ति सम्भव नहीं रह जाती, अतः यहाँ अपर ब्रह्म (हिरण्यागर्भ)

ईक्षणीयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३४७

इत्येवं प्राप्तेऽभिधीयते परमेव ब्रह्महाभिध्यातव्यमुपदिश्यते । कस्मात् ? ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् । ईक्षतिर्दर्शनम् । दर्शनव्याप्यमी क्षतिकर्म । ईक्षतिकर्मत्वेनास्याभि-ध्यातव्यस्य पुरुषस्य वाक्यशेषे व्यपदेशो भवति—'स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते' इति । तत्राभिध्यायतेरतथाभूतमपि वस्तु कर्म भवति; मनोरथकल्पित-स्याप्यभिध्यायतिकर्मत्वात् । ईक्षतेस्तु तथाभूतमेव वस्तु लोके कर्म दृष्टमित्यतः परमा-

भामती

यत्त्वेन प्रसिद्धेः परस्यैव ब्रह्मणस्तथाभावाद् ध्यायतेश्च तेन समानविषयत्वात्परब्रह्मविषयमेव ध्यानमिति साम्प्रतम्, समानविषयत्वस्यासिद्धेः परो हि पुरुषो ध्यानविषयः, परात्परस्तु दर्शनविषयः । न च तत्त्वविषयमेव सर्वत्र दर्शनम्, अनृतविषयस्यापि तस्य दर्शनात् । न च मननं दर्शनं, तच्च तत्त्वविषय-मेवेति साम्प्रतम्, मननाङ्गेन तत्र तत्र दर्शनस्य निर्देशाद् । न च मननमपि तर्कपरनामावश्यं तत्त्व-विषयम् , यथाहुः—'तर्कोऽप्रतिष्ठः' इति । तस्मादपरमेव ब्रह्मेह ध्येयम् । तस्य च परत्वं शरीरापेक्षयेति । एवं प्राप्ते उच्यते ।

ईक्षणध्यानयोरेकः कार्यकारणभूतयोः ।
अर्थ औत्सर्गिकं तत्त्वविषयत्वं तयेश्च तेः ॥

ध्यानस्य हि साक्षात्कारः फलम् । साक्षात्कारश्चोत्सर्गतस्तत्त्वविषयः । क्वचित्तु बाधकोपनिपाते


भामती-व्याख्या

का ही ध्यान विहित है, उसका ही फल ब्रह्मलोक है।

**शङ्का—**उक्त वाक्य के अन्त में कहा है—"एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते"। ईक्षण (दर्शन) लोक में परमार्थ विषयक ही प्रसिद्ध है, अतः परब्रह्म का ही ईक्षण न्याय-प्राप्त है, उसी ईक्षणीय ब्रह्म का ही वाक्य के आरम्भ में ध्यान-विधान मानना होगा।

**समाधान—**ईक्षण और ध्यान में यह समानविषयता सम्भव नहीं, अपितु अर्थ-भेद (विषय-भेद) है, क्योंकि पर पुरुष (हिरण्यगर्भ) ध्यान का विषय और परात्पर ब्रह्म ईक्षण (दर्शन) का विषय होता है, अतः वाक्य के उपसंहार में दर्शनविषयत्वेन परब्रह्म का प्रतिपादन होने पर भी आरम्भ में ध्यान-विषयत्वेन अपर ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) का ही ग्रहण करना चाहिए। दूसरी बात यह भी है कि 'सत्यार्थविषयक ही सर्वत्र दर्शन विहित होता है'—ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि 'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्नि-गूढाम्' (श्वेता. १।३) इत्यादि वाक्यों में प्रकृति-जैसे अनृत (असत्य या बाधित) विषय का भी दर्शन अभिहित है। दर्शन के हेतुभूत मनन-ध्यानादि का भी तत्त्वविषयक होना अनिवार्य नहीं, क्योंकि मनन नाम है तर्क का और तर्क के विषय में कहा गया है—"तर्कोऽ-प्रतिष्ठः" (म. भा. ३।३१३।११७) अर्थात् तर्क अतत्त्वविषयक भी होता है, अत उसे एक विषय पर प्रतिष्ठित नहीं कहा जाता। यह जो कहा गया है कि "परं पुरुषमभिध्यायीत"—यहाँ हिरण्यगर्भरूप ध्येय ब्रह्म में भी परत्व का सामञ्जस्य इस प्रकार हो जाता है कि हिरण्यगर्भरूप सूत्रात्मा स्थूल शरीर (विराट्) की अपेक्षा पर है। शरीर की अपेक्षा प्राण पर है और हिरण्यगर्भ समष्टि प्राण का अभिमानी है।

सिद्धान्त—
ईक्षणध्यानयोरेकः कार्यकारणभूतयोः ।
अर्थ औत्सर्गिकं तत्त्वविषयत्वं तथेक्षतेः ॥

ईक्षण (साक्षात्कार) और ध्यान का कार्यकारणभाव माना जाता है। ध्यान कारण

३४८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. १३

त्मैवायँ सम्यग्दर्शनविषयभूत ईक्षितिकर्मत्वेन व्यपदिष्ट इति गम्यते । स एव चेह पर- पुरुषशब्दाभ्यामभिध्यातव्यः प्रत्यभिज्ञायते । नन्वभिध्याने परः पुरुष उक्तः, ईक्षणे तु परात्परः, कथमितर इतरत्र प्रत्यभिज्ञायत इति ? अत्रोच्यते—परपुरुषशब्दौ तावदुभ- यत्र साधारणौ । नचात्र जीवघनशब्देन प्रकृतोऽभिध्यातव्यः परः पुरुषः परामृश्यते, येन तस्मात्परात्परोऽयमीक्षितव्यः पुरुषोऽन्यः स्यात् । कस्तर्हि जीवघन इति ? उच्यते—घनो मूर्तिः । जीवलक्षणो घनो जीवघनः । सैन्धवखिल्यवद्यः परमात्मनो जीवरूपः खिल्यभाव उपाधिकृतः परश्च विषयेन्द्रियेभ्यः सोऽत्र जीवघन इति । अपर आह—'स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम्' इत्यतीतानन्तरवाक्यनिर्दिष्टो यो ब्रह्मलोकः परश्च लोकान्तरेभ्यः सोऽत्र जीवघन इत्युच्यते । जीवानां हि सर्वेषां करणप-


भामती

समारोपितगोचरो भवेत् । न चासत्यपवादे शक्य उत्सर्गस्त्यक्तुम् । तथा चास्य तत्त्वविषयत्वात्तत्कारणस्य ध्यानस्यापि तत्त्वविषयत्वम् । अपि च वाक्यशेषेणैकवाक्यत्वसम्भवे न वाक्यभेदो युज्यते । सम्भवति च परपुरुषविषयत्वेनार्थप्रत्यभिज्ञानात् समभिव्याहाराच्चैकवाक्यता । तदनुरोधेन च परात् पर इत्यत परादिति जीवघनविषयं द्रष्टव्यम् । तस्मात्तु परः पुरुषो ध्यातव्यश्च द्रष्टव्यश्च भवति । तदिदमुक्तम् ❄ न चात्र जीवघनशब्देन प्रकृतोऽभिध्यातव्यः परः पुरुषः परामृश्यते ❄। किन्तु जीवघनात् परात् परो यो ध्यातव्यो द्रष्टव्यश्च तमेव कथयितुं जीवघनो जीवः खिल्यभावमुपाधिवशादापन्नः स उच्यते । स साम- भिरुन्नीयते ब्रह्मलोकमित्यनन्तरवाक्यनिर्दिष्टो ब्रह्मलोको वा जीवघनः । स हि समस्तकरणात्मनः सूत्रात्मनो


भामती-व्याख्या

है और साक्षात्कार ध्यान का फल है । यह जो कहा जाता है कि साक्षात्कार तात्त्विक वस्तु को विषय करता है, वह एक औत्सर्गिक ( सामान्य ) नियम है, कहीं-कहीं बाधक प्रमाण के उपस्थित हो जाने पर उस नियम का अपवाद भी हो जाने से साक्षात्कार अतत्त्वविषयक ( समारोपित-विषयक ) भी हो जाता है किन्तु अपवाद के न होने पर औत्सर्गिक नियम का त्याग नहीं किया जा सकता । प्रकृत में कोई बाधक उपलब्ध नहीं, अतः साक्षात्कार ( ईक्षण ) सत्य वस्तु ( निर्गुण ब्रह्म ) को विषय करता है, अतः साक्षात्कार का कारणीभूत ध्यान भी तत्त्वविषयक ही होगा ।

दूसरी बात यह भी है कि किसी वाक्य की अपने वाक्य-शेष के साथ एकवाक्यता के सम्भव होने पर वाक्य-भेद युक्ति-युक्त नहीं माना जाता । ईक्षण और अभिध्यान में परमपुरुष- विषयकत्व की प्रत्यभिज्ञा हो रही है एवं ईक्षण और ध्यान का समभिव्याहार ( एक वाक्य में निर्देश ) भी है । कथित विषय-प्रत्यभिज्ञान एवं ईक्षण और ध्यान के समभिव्याहार के अनुरोध से 'परात्परम्'—यहाँ पर 'परात्' का अर्थ 'जीवघनात्' ऐसा ही पर्यवसित होता है, क्योंकि वाक्यशेष में कहा है—'स एतस्माज्जीवघनात् परात्परम्' । फलतः परमपुरुष ( निर्गुण ब्रह्म ) ही यहाँ ध्यातव्य और द्रष्टव्यरूप से प्रस्तुत किया गया है । भाष्यकार ने यही कहा है—"न चात्र जीवघनशब्देन प्रकृतोऽभिधातव्यः परः पुरुषः परामृश्यते ।" अर्थात् यहाँ 'जीवघन' शब्द के द्वारा प्रकृत ध्यातव्य पुरुष का ग्रहण नहीं किया गया कि द्रष्टव्य पुरुष उस ( ध्यातव्य ) से भिन्न सिद्ध होता । किन्तु जो जीवघन इन्द्रियादि से पर है, उससे भी परे ध्यातव्य और द्रष्टव्य तत्त्व का निर्देश करने के लिए जीवघन को ध्यातव्य वस्तु ( ब्रह्म ) के खिल्यभाव ( अल्परूप या अंशात्मक ) कहा गया है । उपाधि के द्वारा जीव में खिल्यभाव ( स्वल्पीभाव ) प्राप्त हुआ है । अथवा "स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम्"—इस पूर्ववर्ती वाक्य निर्दिष्ट ब्रह्मलोक को 'जीवघन' कहा है, क्योंकि वह ( ब्रह्मलोक ) लोकान्तर से पर एवं

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३४९

रिवृत्तानां सर्वकरणात्मनि हिरण्यगर्भे ब्रह्मलोकनिवासिनि संघातोपपत्तेर्भवति ब्रह्मलोको जीवघनः। तस्मात्परो यः परमात्मेक्षणकर्मभूतः स एवाभिध्यानेऽपि कर्मभूत इति गम्यते। परं पुरुषमिति च विशेषणं परमात्मपरिग्रह एवावकल्पते। परो हि पुरुषः परमात्मैव भवति, यस्मात्परं किंचिदन्यन्नास्ति; 'पुरुषान्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः' इति च श्रुत्यन्तरात्। 'परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारः' इति च विभज्य, अनन्तरमोंकारेण परं पुरुषमभिध्यातव्यं ब्रुवन्परमेव ब्रह्म परं पुरुषं गमयति। 'यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुच्यते' इति पाप्मविनिर्मोकफलवचनं परमात्मानमिहाभिध्यातव्यं सूचयति। अथ यदुक्तं—परमात्माभिध्यायिनो न देशपरिच्छिन्नफलं युज्यत इति, अत्रोच्यते—त्रिमात्रेणोंकारेणालम्बनेन परमात्मानमभिध्यायतः फलं ब्रह्मलोकप्राप्तिः, क्रमेण च सम्यग्दर्शनोत्पत्तिरिति क्रममुक्त्यभिप्रायमेतद्भविष्यतीत्यदोषः॥ १३॥

( ५ दहराधिकरणम्। सू० १४–२१)

दहर उत्तरेभ्यः ॥ १४ ॥

'अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यम्' (छा० ८।१।१) इत्यादिवाक्यं समाम्ना-

भामती

हिरण्यगर्भस्य भगवतो निवासभूमितया करणपरिवृतानां जीवानां तत्र सङ्घात इति भवति जीवघनः। तदेवं त्रिमात्रोङ्कारायतनं परमेव ब्रह्मोपास्यम्। अत एव चास्य देशविशेषाधिगतिः फलमुपाधिमत्त्वात्, क्रमेण च सम्यग्दर्शनोत्पत्तौ मुक्तिः। 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इति तु निरुपाधिकब्रह्मवेदनविषया श्रुतिः। अपरं तु ब्रह्मैकैकमात्रायतनमुपास्यमिति मन्तव्यम्॥ १३॥

“अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं सूक्ष्मं गुहाप्रायं पुण्डरीकसन्निवेशं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्पदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्”। आगमाचार्योपदेशाभ्यां श्रवणं तदविरोधिना तर्केण मननं च, तदन्वेषणं तत्पूर्वकं चादरनैरन्तर्यदीर्घकालसेवितेन ध्यानाभ्यासपरिपाकेन साक्षात्कारी विज्ञानम्।

भामती-व्याख्या

'जीवानां घनो यस्मिन्'—इस व्युत्पत्ति के आधार पर व्यष्टिककरणाभिमानी समस्तजीवों के घनरूप (समष्टिभूत हिरण्यगर्भ) का निवासस्थान ब्रह्मलोक है। इस प्रकार त्रिमात्रक ओंकार का आयतन परब्रह्म ही उपास्य है, अत एव उपासक को ब्रह्मलोकरूप देशविशेष की प्राप्ति और वहाँ ब्रह्मदर्शनपूर्वक मुक्ति का लाभ होता है। 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'—यह श्रुति निरुपाधिक ब्रह्म के दर्शन को विषय करती है और अपर ब्रह्म एक-एक मात्रा का आयतन होने से उपास्य होता है॥ १३॥

विषय—"अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः, तस्मिन् यदन्तरस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यम्" (छां. ८।१।१) यहाँ ब्रह्मपुर नाम है—स्थूल शरीर का, क्योंकि ब्रह्म की उपलब्धि इसी में होती है। 'दहर' शब्द का अर्थ सूक्ष्म कमल के आकार की गुफा (हृदय) है। उसमें अवस्थित जो छोटा-सा आकाश है, उसमें जो तत्त्व रहता है, उसका अन्वेषण करना चाहिए। श्रवण और मनन यहाँ 'अन्वेषण' पद से विवक्षित हैं। आगम और आचार्य के उपदेश से तत्त्वार्थ का बोध श्रवण और तदनुकूल तर्क

३५०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. १४

यते । तत्र योऽयं दहरे हृदयपुण्डरीके दहर आकाशः श्रुतः स किं भूताकाशः, अथवा विज्ञानात्मा, अथवा परमात्मेति संशय्यते । कुतः संशयः ? आकाशब्रह्मपुरशब्दाभ्याम् । आकाशशब्दो ह्ययं भूताकाशे परस्मिंश्च प्रयुज्यमानो दृश्यते । तत्र किं भूताकाश एव दहरः स्यात्, किंवा पर इति संशयः । तथा ब्रह्मपुरमिवि--- किं जीवोऽत्र ब्रह्मनामा तस्येदं पुरं शरीरं ब्रह्मपुरम्, अथवा परस्यैव ब्रह्मणः पुरं ब्रह्मपुरमिवि । तत्र जीवस्य परस्य वाऽन्यतरस्य पुरस्वामिनो दहराकाशत्वे संशयः ।

तत्राकाशशब्दस्य भूताकाशे रूढत्वाद् भूताकाश एव च दहरशब्द इति प्राप्तम् । तस्य च दहरायतनापेक्षया दहरत्वम् । 'यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः' इति च बाह्याभ्यन्तरभावकृतभेदस्योपमानोपमेयभावः, द्यावापृथिव्यादि च तस्मिन्नन्तः समाहितम्; अवकाशात्मनाकाशस्यैकत्वात्, अथवा जीवो दहर इति प्राप्तम्; ब्रह्मपुरशब्दात् । जीवस्य हीदं पुरं सच्छरीरं ब्रह्मपुरमिरत्युच्यते; तस्य स्वकर्म-

भामती

विशिष्टं हि तज्ज्ञानं पूर्वेभ्यः । तदिच्छा विजिज्ञासनम् ।

अत्र संशयमाह ॐ तत्र इति ॐ । तत्र प्रथमं तावदेव संशयः- कि दहराकाशादन्यदेव किञ्चिदन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं च उत दहराकाश इति । यदापि दहराकाशोऽन्वेष्टव्यस्तदापि किं भूताकाश आहो शारीर आत्मा, किं वा परमात्मेति । संशयहेतुं पृच्छति ॐ कुतः इति ॐ । तद्धेतुमाह ॐ आकाशब्रह्मपुरशब्दाभ्याम् इति ॐ । तत्र प्रथमं तावद् भूताकाश एव दहर इति पूर्वपक्षयति ॐ तत्राकाशशब्दस्य भूताकाशे रूढत्वाद् इति ॐ । एष तु बहुतरोत्तरसंदर्भ विरोधात्तुच्छः पूर्वपक्ष इत्यपरितोषेण पक्षान्तरमालम्बते पूर्वपक्षी ॐ अथ वा जीवो दहर इति ॐ । प्राप्तं युक्तमित्यर्थः । तत्र--

आधेयत्वाद्विशेषाद्वा पुरं जीवस्य युज्यते ।
देहो न ब्रह्मणो युक्तो हेतुद्वयवियोगतः ॥

भामती-व्याख्या

के द्वारा अर्थावधारण मनन कहलाता है। श्रवण और मनन के द्वारा अवगत पदार्थ का निरन्तर श्रद्धापूर्वक चिरध्यान करते-करते जो साक्षात्कार होता है, वही विजिज्ञासितव्यार्थ-घटक विज्ञान है, क्योंकि वह ज्ञान श्रवण और मनन से विशिष्ट है। विशिष्ट ज्ञान की इच्छा ही विजिज्ञासन पदार्थ है।

संशय— उक्त स्थल पर सर्व-प्रथम यह संशय होता है कि क्या दहराकाश से भिन्न कोई पदार्थ अन्वेष्टव्य और विजिज्ञासितव्य है ? अथवा दहराकाश ही विचारणीय है? दहराकाश-पक्ष में क्या भूताकाश ? या शारीर (जीव) ? अथवा परमात्मा (ब्रह्म) अन्वेष्टव्य है? संशय का कारण पूछा जाता है--- "कुतः"। उसका उत्तर है--- "आकाशब्रह्मपुरशब्दाभ्याम्"।

पूर्वपक्ष— प्रथमतः पूर्वपक्षी भूताकाश को ही दहराकाश बता रहा है--- "तत्राकाशशब्दस्य भूताकाशे रूढत्वात्"। यह पूर्वपक्ष अपने उत्तरवर्ती बहुत वाक्यों से विरुद्ध होने के कारण अत्यन्त तुच्छ है, इस अपरितोष के कारण पूर्वपक्षी पक्षान्तर प्रस्तुत करता है--- "अथवा जीवो दहर इति प्राप्तम्"। प्राप्तम् का अर्थ है--- युक्तम् ।

आधेयत्वाद् विशेषाच्च पुरं जीवस्य युज्यते ।
देहो न ब्रह्मणो युक्तो हेतुद्वयवियोगतः ॥

'दहर' पद से जीव का ग्रहण करना ही युक्ति-युक्त है, क्योंकि जीव को गौणी वृत्ति (ब्रह्मगत चैतन्यादि गुण के योग) से ब्रह्म कहा जाता है और जीव के इस शरीर को 'ब्रह्मपुर' कहते हैं,

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३५१

णोपार्जितत्वात् । भक्त्या च तस्य ब्रह्मशब्दवाच्यत्वम् । नहि परस्य ब्रह्मणः शरीरेण स्वस्वामिभावः संबन्धोऽस्ति । तत्र पुरस्वामिनः पुरैकदेशेऽवस्थानं दृष्टं, यथा राज्ञः ।

भामती

असाधारणेन हि व्यपदेशा भवन्ति । तद्यथा क्षितिजलपवनबीजादिसामग्रीसमवधानजन्माऽप्य- ङ्कुरः शालिबीजेन व्यपदिश्यते शाल्यङ्कुर इति । न तु क्षित्यादिभिः, तेषां कार्यान्तरेष्वपि साधार- ण्यात् । तदिह शरीरं ब्रह्मविकारोऽपि न ब्रह्मणा व्यपदेष्टव्यम् । ब्रह्मणः सर्वविकारकारणत्वेनातिसाधा- रण्यात् । जीवभेदधर्माधर्मोपार्जितं तदित्यसाधारणकारणत्वाज्जीवेन व्यपदिश्यत इति युक्तम् । अपि च ब्रह्मपुर इति सप्तम्यधिकरणे स्मर्यते, तेनाधेयेनानेन सम्बद्धव्यम् । न च ब्रह्मणः स्वे महिम्नि व्यवस्थित- स्यानाधेयस्याधारसम्बन्धः कल्पते । जीवस्त्वाराग्रमात्र इत्याधेयो भवति । तस्मात् ब्रह्मशब्दो रूढिं परि- त्यज्य देहादिवृंहणतया जीवे यौगिको वा भाक्तो वा व्याख्येयः । चैतन्यं च भक्तिः । उपधानानुपधाने तु विशेषः । ॐ वाच्यत्वं ॐ गम्यत्वम् । स्यादेतत् जीवस्य पुरं भवतु शरीरं, पुण्डरीकदहरगोचरता त्वन्यस्य भविष्यति, वत्सराजस्य पुर इवोज्जयिन्यां मैत्रस्य सद्मेत्यत आह ॐ तत्र पुरस्वामिन इति ॐ ।

भामती-व्याख्या

क्योंकि जीव परिच्छिन्न होने से आधेय और शरीर उसका अधिकरण है एवं जीव में ही यह विशेषता है कि वह अपने अदृष्टों के द्वारा इस शरीर का उपार्जन करता है । इसके विपरीत इस शरीर के साथ ब्रह्म का स्वस्वामिभावरूप सम्बन्ध नहीं बनता, क्योंकि ब्रह्म न तो परिच्छिन्न है और न अपने अदृष्टों के द्वारा शरीर का उपार्जक । दूसरी बात यह भी है कि जीव शरीर का विशेष सम्बन्धी है और ब्रह्म साधारण सम्बन्धी, 'असाधारण्येन व्यपदेशा भवन्ति'—इस न्याय के अनुसार जैसे शालीअंकुर (धान के अंकुर) के साथ शाली का विशेष सम्बन्ध होने के कारण उस अंकुर को 'शाल्यंकुरः' कहते हैं, 'क्षित्यंकुरः' या 'सलिलांकुरः' नहीं, क्योंकि क्षित्यादि के साथ उसका साधारण सम्बन्ध होता है, असाधारण नहीं । वैसे ही यह शरीर ब्रह्म का विकार (कार्य) होने पर भी 'ब्रह्मणः शरीरम्'—ऐसा नहीं कहला सकता, क्योंकि ब्रह्म समस्त विकार का साधारण कारण है किन्तु जीव इस शरीर का विशेष सम्बन्धी है, क्योंकि इस शरीर में रहनेवाले जीव ने इस शरीर का अपने अदृष्टों के द्वारा उपार्जन किया है, अतः इस शरीर को 'जीवशरीरम्' कहने के लिए 'ब्रह्मपुरम्' कह दिया गया है । दूसरी बात यह भी है कि 'ब्रह्मपुरे' यहाँ पर सप्तमी विभक्ति अधिकरणार्थ में विहित है, अतः आधेयरूप जीव के साथ ही इसका सम्बन्ध होना चाहिए, ब्रह्म के साथ नहीं, क्योंकि ब्रह्म स्वमहिमा में अवस्थित होने से किसी का आधेय नहीं । जीव का स्वरूप आरा की नोक के समान परिच्छिन्न कहा गया है, अतः वह आधेय हो सकता है, अतः 'ब्रह्मपुरे' यहाँ 'ब्रह्म' शब्द अपने रूढ अर्थ का परित्याग करके जीव में बृंहणकर्तृत्वेन यौगिक अथवा गौण मानना उचित है, ब्रह्म का चैतन्यरूप ही वह भक्ति (गुण) है, जिसके सम्बन्ध से जीव को ब्रह्म कह दिया गया है । ब्रह्म और जीव में चैतन्य की समानता होने पर भी निरुपाधित्व और सोपाधिकत्व की विशेषता है, अतः निरुपाधिक परतत्त्व का वाचक 'ब्रह्म' शब्द गौणी वृत्ति से जीव का बोधकमात्र है, वाचक नहीं । भाष्यकार ने जो कहा है—“तस्य ब्रह्मशब्द- वाच्यत्वम्” । वहाँ वाच्यत्व का तात्पर्य बोध्यत्व में ही है ।

शङ्का—इस शरीर को भले ही जीव का पुर (नगर) मान लिया जाय और इसकी संज्ञा 'ब्रह्मपुरम्' रख दी जाय किन्तु हृदय कमलगत 'दहराकाश' शब्द से जीव से भिन्न ब्रह्म का ही ग्रहण किया जायगा, क्योंकि जैसे महाराज वत्सराज के उज्जयिनी नगर में वत्सराज से भिन्न मैत्रादि का महल होता है, वैसे ही जीव के शरीररूप पुर (नगर) में जीव से भिन्न

३५२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ १ पा. ३ सू. १४

मनउपाधिकश्च जीवः, मनश्च प्रायेण हृदये प्रतिष्ठितमित्यतो जीवस्यैवेदं हृदयेऽन्तरवस्थानं स्यात् । दहरत्वमपि तस्यैव आराग्रोपमितत्वादवकल्पते । आकाशोपमितत्वादिश्च ब्रह्माभेदविवक्षया भविष्यति । न चात्र दहरस्याकाशस्यान्वेष्टव्यत्वं विजिज्ञासितव्यत्वं च श्रूयते । 'तस्मिन्यदन्तः' इति परविशेषणत्वेनोपादानादिति ।

अत उत्तरं ब्रूमः - परमेश्वर एवात्र दहराकाशो भवितुमर्हति, न भूताकाशो जीवो वा । कस्मात् ? उत्तरेभ्यो वाक्यशेषगतेभ्यो हेतुभ्यः । तथाहि अन्वेष्टव्यतयाऽभिहितस्य दहरस्याकाशस्य 'तं चेद् ब्रूयुः' इत्युपक्रम्य किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यम् इत्येवमाक्षेपपूर्वकं प्रतिसमाधानवचनं भवति - 'स ब्रूयाद्यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते' (छा० ८।१।३) इत्यादि । तत्र पुण्डरीकदहरत्वेन प्राप्तदहरत्वस्याकाशस्य


भामती

अयमर्थः - वेश्म खल्वधिकरणमनिर्दिष्टधेयमाधेयविशेषापेक्षायां पुरस्वामिनः प्रकृतत्वात्तेनैवाधेयेन सम्बद्धं सदनपेक्षं नाधेयान्तरेण सम्बन्धं कल्पयति । ननु तथापि शरीरमेवास्य भोगायतनमिति को हृदयपुण्डरीकेऽस्य विशेषो यत्तदेवास्य सद्मेत्यत आह ॐ मन उपाधिकश्च जीवः इति ॐ । ननु मनोऽपि चलतया सकलदेहवृत्ति पर्यायेणेत्यत आह ॐ मनश्च प्रायेण इति ॐ । आकाशशब्दश्चारूपत्वादिना सामान्येन जीवे भाक्तः । अस्तु वा भूताकाश एवायमाकाशशब्दो दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश इति, तथाप्यदोष इत्याह ॐ न चात्र दहरस्य आकाशस्य अन्वेष्टव्यत्वम् इति ॐ ।

एवं प्राप्ते उच्यते - भूताकाशस्य तावन्न दहरत्वं यावान्वाऽयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश इत्युपमानविरोधात् । तथाहि -


भामती-व्याख्या

ब्रह्म का वेश्म (महल) पुण्डरीक-दहर हो सकता है।

समाधान — उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार कह रहे हैं— "तत्र पुरस्वामिनः पुरैकदेशेऽवस्थानं दृष्टम्"। आशय यह है कि उक्त श्रुति में निर्दिष्ट 'वेश्म' शब्द एक ऐसे आधार को उपस्थित कर रहा है, जो अपने आधेय की अपेक्षा करता है, पुर-स्वामी के रूप में जीव प्रस्तुत है, अतः जीवरूप आधेय से जुड़ कर वेश्मरूप आधार अन्य (ब्रह्मरूप) आधेय का कल्पक नहीं हो सकता। यह जो प्रश्न उठता है कि शरीर तो जीव का भोगायतन है, अतः शरीररूप पुर के साथ उसका सम्बन्ध सम्भव है किन्तु हृदयपुण्डरीक के साथ उसका क्या संबंध ? उस प्रश्न का उत्तर है— "मन उपाधिकश्च जीवः, मनश्च प्रायेण हृदये प्रतिष्ठितम्"। यद्यपि मन चलायमान है, शरीर के कोने-कोने में घूमता रहता है, तथापि हृदय में उसका अधिक निवास रहता है। 'दहर' पद तो परिच्छिन्न जीव का निसर्गतः बोधक है और 'आकाश' शब्द भी स्ववाच्य (भूताकाश) में वर्तमान अरूपत्वादि गुण के योग से जीव का गमक हो सकता है। अथवा "दहरेऽस्मिन्नन्तराकाशः"—यहाँ पर 'आकाश' शब्द भूताकाश का ही वाचक है, फिर भी कोई दोष नहीं, क्योंकि वहाँ दहराकाश को अन्वेष्टव्य नहीं माना गया है कि उससे ब्रह्म की उपस्थिति करानी आवश्यक हो, किन्तु उस भूताकाश के अन्तःस्थित तत्त्व को अन्वेष्टव्य कहा गया है, वह उससे भिन्न हो सकता है।

सिद्धान्त — सर्वप्रथम भूताकाश में दहरत्व ही नहीं बनता, क्योंकि "यावान् वा अयमाकाशः, तावान् एषोऽन्तर्हृदये आकाशः" (छां० ८।१।३) इस श्रुति में उसको व्यापक उपमान के रूप में वर्णित किया गया है, अतः उसे दहर (परिच्छिन्न या अव्यापक) कहना विरुद्धाभिधान हो जाता है। अर्थात्—

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३५३

प्रसिद्धाकाशौपम्येन दहरत्वं निवर्त्यन्भूताकाशत्वं दहरस्याकाशस्य निवर्तयतीति गम्यते । यद्यप्याकाशशब्दो भूताकाशे रूढः, तथापि तेनैव तस्योपमा नोपपद्यत इति भूताकाशशङ्का निवर्तिता भवति । नन्वेकस्याप्याकाशस्य बाह्याभ्यन्तरत्वकल्पितेन भेदेनोपमानोपमेयभावः संभवतीत्युक्तम् । नैवं संभवति, अगतिका हीयं गतिः, यत्का- ल्पनिकभेदाश्रयणम् । अपि च कल्पयित्वापि भेदमुपमानोपमेयभावं वर्णयतः परिच्छ- न्नतवादभ्यन्तराकाशस्य न बाह्याकाशपरिमाणत्वमुपपद्येत । ननु परमेश्वरस्यापि 'ज्यायानाकाशात्' ( शत० ब्रा० १०।६।३।२ ) इति श्रुत्यन्तरन्नैवाकाशपरिमाणत्वमुप- पद्यते । नैष दोषः, पुण्डरीकवेष्टनप्राप्तदहरत्वनिवृत्तिपरत्वाद्वाक्यस्य न तावत्त्वप्रतिपाद- नपरत्वम् । उभयप्रतिपादने हि वाक्यं भिद्येत । नच कल्पितभेदे पुण्डरीकवेष्टित आका-


भामती

तेन तस्योपमेयत्वं रामरावणयुद्धवत् ।
अगत्या भेदमारोप्य गतौ सत्यां न युज्यते ॥

अस्ति तु दहराकाशस्य ब्रह्मत्वेन भूताकाशाद्भेदेनोपमानस्य गतिः । न चानवच्छिन्नपरिमाणमव- च्छिन्नं भवति । तथा सत्यवच्छेदानुपपत्तेः । न भूताकाशमानत्वं ब्रह्मणोऽत्र विधीयते, येन ज्यायानाकाशा- दिति श्रुतिविरोधः स्यात् , अपि तु भूताकाशोपमानेन पुण्डरीकोपाधिप्राप्तं दहरत्वं निवर्त्यते । अपि च सर्व एवोत्तरे हेतवो दहराकाशस्य भूताकाशत्वं व्यासेधन्तीत्याह ॐ न च कल्पितभेद इति ॐ । नापि


भामती-व्याख्या

तेन तस्योपमेयत्वं रामरावणयुद्धवत् ।
अगत्या भेदमारोप्य गतौ सत्यां न युज्यते ॥

यदि दहराकाश भूताकाश ही है, तब 'यावान् वाऽयमाकाशः, तावानेषोऽन्तर्हृदये आकाशः'—इस प्रकार एक ही भूताकाश में उपमान-उपमेयभाव सम्भव न हो सकेगा, क्योंकि उपमान और उपमेय का भेद होना आवश्यक माना जाता है—"साधर्म्यमुपमा भेदे" (काव्य प्र. पृ० ४४३) । अत एव—

गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः ।
रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ॥

इत्यादि स्थलों पर देश-कालादि उपाधियों के द्वारा गगनादि का भेद आरोपित कर उपमानो- पमेयभाव का जो सङ्गमन किया जाता है, वह अगति गति है किन्तु प्रकृत में गत्यन्तर सम्भव है कि दहराकाशरूप ब्रह्म उपमेय और भूताकाश की उपमान माना जा सकता है ।

शङ्का—यदि कहा जाय कि दहराकाश यदि ब्रह्म माना जाता है, तब भी वह हृदय- पुण्डरीकावच्छिन्न हीं अभिहित है, अतः उसके लिए निरवच्छिन्न भूताकाश की उपमा क्योंकर संगत होगी ? क्योंकि निरवच्छिन्न कभी सावच्छिन्न नहीं होता और यदि निरव- च्छिन्न भूताकाश कभी सावच्छिन्न पदार्थ का उपमान नहीं हो सकता और निरवच्छिन्न भूताकाश के उपमेय में हृदयादि को अवच्छेदक नहीं माना जा सकता ।

समाधान—यहाँ भूताकाश की उपमा के द्वारा ब्रह्म में आकाशगत परिमाण का विधान नहीं किया जाता, अन्यथा "ज्यायानाकाशात्" ( शत० ब्रा० १०।६।३।२ ) इत्यादि श्रुतियों से विरोध उपस्थित होता है, क्योंकि इन श्रुतियों में ब्रह्म को भूताकाश से भी अधिक परिमाण का बताया गया है । यहाँ वस्तु-स्थिति यह है कि ब्रह्म में हृदयपुण्डरीकरूप उपाधि के द्वारा जो सावच्छिन्नत्वरूप दहरत्व प्राप्त ( प्रतिपादित ) है, उस की निवृत्ति भूताकाश की उपमा से की जाती है, अन्य किसी परिमाण का विधान नहीं किया जाता । केवल भूताकाश

४५

३५४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ १ पा. ३ सू. १४

शैकदेशे द्यावापृथिव्यादीनामन्तःसमाधानमुपपद्यते । 'एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः' इति चात्मत्वापहतपाप्मत्वादयश्च गुणा न भूताकाशे संभवन्ति । यद्यप्यात्मशब्दो जीवे संभवति, तथापीतरेभ्यः कारणेभ्यो जीवाशङ्कापि निवर्तिता भवति । न ह्युपाधिपरिच्छिन्नस्याराग्रोपमितस्य जीवस्य पुण्डरीकवेष्टनकृतं दहरत्वं शक्यं निवर्तयितुम् । ब्रह्माभेदविवक्षया जीवस्य सर्वगतत्त्वादि विवक्ष्यतेति चेत्,–यदात्मतया जीवस्य सर्वगतत्वादि विवक्ष्येत, तस्यैव ब्रह्मणः साक्षात्सर्वगतत्वादि विवक्ष्यतामिति युक्तम् । यदप्युक्तं–ब्रह्मपुरमिरिति जीवेन परस्योपलक्षितत्वाद्ब्राह्म इव जीवस्यैवेदं पुरस्वामिनः पुरैकदेशवर्तित्वमस्त्विति । अत्र ब्रूमः–परस्यैवेदं ब्रह्मणः पुरं सच्छरीरं ब्रह्मपुरमित्युच्यते; ब्रह्मशब्दस्य तस्मिन्मुख्यत्वात् । तस्याप्यस्ति पुरेगानेन संबन्धः; उपलब्ध्यधिष्ठानत्वात् । 'स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते' (प्र० ५।५) । 'स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयः' (बृ० २।५।१८) इत्यादिश्रुतिभ्यः । अथवा,–जीवपुर एवास्मिन् ब्रह्म संनिहितमुपलक्ष्यते । यथा शालग्रामे विष्णुः संनिहित इति, तद्वत् । 'तद्यथेह

भामती

दहराकाशो जीव इत्याह ॐ यद्यप्यात्मशब्द इति ॐ ।

उपलब्धेरधिष्ठानं ब्रह्मणो देह इष्यते ।
तेनासाधारणत्वेन देहो ब्रह्मपुरं भवेत् ॥

देहे हि ब्रह्मोपलभ्यते इत्यसाधारणतया देहो ब्रह्मपुरमिवि व्यपदिश्यते, न तु ब्रह्मविकारतया । तथा च ब्रह्मशब्दार्थो मुख्यो भवति । अस्तु वा ब्रह्मपुरं जीवपुरं, तथापि यथा वत्सराजस्य पुरे उज्जयिन्यां मैत्रस्य सद्म भवति, एवं जीवस्य पुरे हृत्पुण्डरीकं ब्रह्मसदनं भविष्यति, उत्तरेभ्यो ब्रह्मलिङ्गेभ्यो ब्रह्माणोऽवधारणात् । ब्रह्मणो हि बाधके प्रमाणे बलीयसि जीवस्य च साधके प्रमाणे सति ब्रह्मलिङ्गानि

भामती-व्याख्या

की उपमा से ही ब्रह्म में दहरत्व ( सावच्छिन्नत्व ) का निषेध नहीं किया जाता, अपितु उत्तरवर्ती वाक्यों से प्रतिपादित द्यावापृथिव्यादि-समाहितत्त्वादि हेतुओं के द्वारा भी दहरत्व का प्रतिषेध किया जाता है—"न च कल्पितभेदे पुण्डरीकवेष्टिते आकाशैकदेशे द्यावापृथिव्यादीनामन्तःसमाधानमुपपद्यते"।

दहराकाश को जीवरूप भी नहीं मान सकते, क्योंकि यद्यप्यात्मशब्द जीव का बोधक है, तथापि उत्तर वाक्य-प्रतिपादित ब्रह्म के असाधारण धर्मों का समन्वय जीव में नहीं हो सकता ।

उपलब्धेरधिष्ठानं ब्रह्मणो देह इष्यते ।
तेनासाधारणत्वेन देहो ब्रह्मपुरं भवेत् ॥

देह में ही ब्रह्म की उपलब्धि होती है, अतः देह को ब्रह्मपुर कहा जाता है, ब्रह्म का विकार होने से देह को ब्रह्मपुर नहीं कह सकते, क्योंकि ब्रह्म निर्विकार है । इस प्रकार 'ब्रह्मपुर' शब्द का घटकीभूत 'ब्रह्म' पद मुख्यार्थक सम्भव हो जाता है । अथवा 'ब्रह्म' पद गौणी वृत्ति के द्वारा जीव का बोधक मानकर इस शरीररूप जीवपुर को ब्रह्मपुर कहा जा सकता है । तथापि जैसे महाराज वत्सराज के पुर ( नगर ) उज्जयिनी के किसी भाग में मैत्रादि का महल होता है, वैसे ही इस शरीर का हृदय पुण्डरीक ब्रह्म का सदन ( उपलब्धि-स्थल ) कहा जा सकता है । हृदयपुण्डरीक को ब्रह्म का ही सदन मानना होगा, क्योंकि उत्तरवर्ती ब्रह्म-गमक लिङ्गों ( असाधारण धर्मों ) के द्वारा वहाँ ब्रह्म का ही होना निश्चित

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३५५

कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते' (छा० ८।१।६) इति च कर्मणामन्तवत्फलत्वमुक्त्वा 'अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामाँ- स्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति' इति प्रकृतदहराकाशविज्ञानस्यानन्तफलत्वं वदन् परमात्मत्वमस्य सूचयति। यदप्येतदुक्तं, - न दहरस्याकाशस्यान्वेष्टव्यत्वं विजि- ज्ञासितव्यत्वं च श्रुतं; परविशेषणत्वेनोपादानादिति, अत्र ब्रूमः - यद्याकाशो नान्वेष्टव्य- त्वेनोक्तः स्यात्, 'यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः' इत्याद्याकाश- स्वरूपप्रदर्शनं नोपयुज्येत। नन्वेतदप्यन्तर्वर्तिवस्तुसद्भावप्रदर्शनायैव प्रदर्श्यते। 'तं


भामती

कथञ्चिद्भेदविवक्षया जीवे व्याख्यायन्ते। न चेह ब्रह्मणो बाधकं प्रमाणं साधकं वाऽस्ति जीवस्य। ब्रह्म- पुरव्यपदेशश्चोपपादितो ब्रह्मोपलब्धिस्थानतया। अर्भकौकस्त्वं चोक्तम्। तस्मात् सति सम्भवे ब्रह्मणि तल्लिङ्गानां नाब्रह्मणि व्याख्यानमुचितमिति ब्रह्मैव दहराकाशो न जीवभूताकाशाविति। श्रवणमननमनु- विद्य ब्रह्मानुभूय चरणं चारस्तेषां कामेषु चरणं भवतीत्यर्थः। स्यादेतद् - दहराकाशस्यान्वेष्यत्वे सिद्धे तत्र विचारो युज्यते, न तु तदन्वेष्टव्यम्, अपि तु तदाधारमन्यदेव किञ्चिदित्युकमित्यनुभाषते। ॐ यदप्ये- तद् इति ॐ। अनुभाषितं दूषयति ॐ अत्र ब्रूमः इति ॐ। यद्याकाशाधारमन्यदन्वेष्टव्यं भवेत्तदेवोपरि


भामती-व्याख्या

होता है। ब्रह्म के असाधारण धर्मों का जीव में किसी-न-किसी प्रकार तब समन्वय किया जा सकता था, जब कि यहाँ ब्रह्म का कोई प्रबल बाधक और जीव का साधक प्रमाण उपलब्ध होता, किन्तु यहाँ कोई वैसा प्रमाण उपलब्ध नहीं। 'ब्रह्मपुर' शब्द का ब्रह्मोपलब्धिपरत्वेन उपपादन किया जा चुका है। दहराकाश के समान एक स्वल्प या संकुल स्थान में ब्रह्म के रहने का भी उपपादन पहले "अर्भकौकस्त्वात्" (ब्र. सू. १।२।७) इस सूत्र में कहा जा चुका है। ब्रह्म के असाधारण धर्मों का समन्वय जब ब्रह्म में हो सकता है, तब ब्रह्म से भिन्न जीवादि में किसी-न-किसी प्रकार आयोजन उचित नहीं, फलतः ब्रह्म ही दहराकाश है, भूताकाश या जीव नहीं।

दहराकाश की उपासना का अनन्त फल श्रुत है—"अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्ति, एतांश्च सत्यान् कामान् तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति" (छां. ८।१।६)। अनुविद्य का अर्थ है—'अनु पश्चाद् विदित्वा' अर्थात् श्रवण और मनन के पश्चात् ब्रह्मात्मत्व का अनुभव (साक्षात्कार) करके। भाष्यकार ने भी ऐसा ही कहा है—"शास्त्राचार्योपदेशमनुविद्य स्वात्मसंवेद्यतामापाद्य" (छां. भा. पृ. ४४६)। 'कामचारः' का अर्थ है—कामेषु [काम्येषु (विषयेषु) चारः (उपलब्धिः)] अर्थात् यथेष्ट विषय की प्राप्ति या स्वातन्त्र्य।

शङ्का—दहराकाश में अन्वेषणीयत्व सिद्ध हो जाने पर ही उसके विषय में विचार करना उचित था किन्तु दहराकाश में अन्वेष्टव्यत्व प्रतिपादित न होकर उससे भिन्न उसमें रहनेवाले किसी अन्य तत्त्व को अन्वेष्टव्य और विजिज्ञास्य कहा गया है—"तस्मिन् यदन्तः तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यम्"।

समाधान—उक्त शङ्का का अनुवाद करके भाष्यकार "यदप्येतद्"—इत्यादि वाक्य से अनुवाद करके निरास कर रहे हैं—"अत्र ब्रूमः"। अर्थात् दहराकाश ही अन्वेष्टव्य है, उससे अन्य नहीं, क्योंकि यदि अन्य कोई तत्त्व अन्वेषणीय होता, तब आगे चलकर श्रुति उसका व्युत्पादन करती, किन्तु व्युत्पादन किया गया है दहराकाश का—"यावान् वा अयमाकाशः, तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः"। यह दहराकाश का निरूपण यह सिद्ध कर रहा है कि यही विचारणीय है।

३५६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. १४

चेद् ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यम्' इत्याक्षिप्य परिहारावसर आकाशौपम्योपक्रमेण द्यावापृथिव्यादीनामन्तःसमाहितत्वदर्शनात् । नैतदेवम् ; एवं हि सति यदन्तःसमाहितं द्यावापृथिव्यादि तदन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं चोक्तं स्यात्, तत्र वाक्यशेषो नोपपद्येत ।

भामती

न्युत्पादनीयमाकाशव्युत्पादनं तु क्वोपयुज्यते इत्यर्थः । चोदयति ॐ न त्वेतदपि इति ॐ । आकाशकथनर्माप तदन्तर्वर्तिवस्तुसद्भावप्रदर्शनायैव । अथाकाशपरमेव कस्मान्न भवतीत्यत आह ॐ तं चेद् ब्रूयुः इति ॐ । आचार्येण हि दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्द्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमित्युपदिष्टेऽन्ते- वासिनाऽऽक्षिप्तं, किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यम् ? पुण्डरीकमेव तावत् सूक्ष्मतरं तदवरुद्धमाकाशं सूक्ष्मत- मम्, तस्मिन् सूक्ष्मतमे किमपरमस्ति ? नास्त्येवेत्यर्थः । तत् किमन्वेष्टव्यमिति । तदस्मिन्नाक्षेपे परिसमाप्ते समाधानावसर आचार्यस्याकाशोपमानोपक्रमं वचः, उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी समाहिते इति । तस्मात् पुण्डरीकावरुद्धाकाशाश्रये द्यावापृथिव्यावेवान्वेष्टव्ये उपदिष्टे, नाकाश इत्यर्थः । परिहरति ॐ नेतदेवम् ॐ । ॐ एवं हि इति ॐ । स्यादेतद्-एवमेवैतन्नो खल्वभ्युपगमा एव दोषत्वेन चोद्यन्त इत्यत आह ॐ तत्र वाक्यशेषे इति ॐ । वाक्यशेषो हि दहराकाशात्मवेदनस्य फलवत्त्वं ब्रूते, यच्च फलवत् तत् कर्तव्यतया चोद्यते, यच्च कर्तव्यं तदिच्छतीति तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति दहराकाशविषयमवतिष्ठते । स्यादेतद् - द्यावापृथिव्यावेवात्मानौ भविष्यतः, ताभ्यामेवात्मा लक्ष्यिष्यते, आकाशशब्दवत् । ततश्चाकाशा-

भामती-व्याख्या

शङ्का-विचारणीय तो दहराकाशगत अन्य पदार्थ ही है किन्तु उसका आधार होने के कारण दहराकाश का निरूपण किया गया है, अन्यथा तदन्तर्भूत वस्तु का सद्भाव- क्योंकर सिद्ध होगा ?

यदि दहराकाश के अन्तर्वर्ती किसी अन्य पदार्थ का सद्भाव नहीं माना जाता, तब उत्तरवर्ती आक्षेप और उसका परिहार-दोनों असंगत हो जाते हैं, क्योंकि आचार्य का "दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः, तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्"-ऐसा उपदेश सुन कर शिष्य आक्षेप करता है-"किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यम् ?" अर्थात् पहले तो हृत्पुण्डरीक ही सूक्ष्मतर है और तद्गत आकाश तो उससे भी सूक्ष्मतम है, उस सूक्ष्मतम आकाश में अन्य पदार्थ क्या है ? कुछ भी नहीं। तब वह अन्वेष्टव्य क्योंकर होगा ?

उक्त आक्षेप के समाप्त हो जाने पर आचार्य ने आकाश की उपमा देकर दहराकाश का निरूपण करते हुए कहा है-"उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी समाहिते"। इस प्रकार पुण्डरीकावच्छिन्न आकाश के आश्रित द्यु और पृथिवी को ही अन्वेष्टव्य कहा है, आकाश को नहीं ।

समाधान-उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार ने कहा है-"नेतदेवम्"। यदि थोड़ी देर के लिए दहराकाशगत द्युलोकादि की अन्वेष्टव्यता को स्वीकार कर लिया जाता है, तब यद्यपि इष्टापादन कोई दोष नहीं माना जाता, तथापि वैसा स्वीकार कर लेने पर वाक्य-शेष में दहराकाश की आत्मरूपता का अभिसूचन अनुपपन्न हो जाता है, क्योंकि "अथ च इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामान्, तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति"- यह वाक्यशेष दहराकाश में आत्मरूपता के वेदन (उपासना) का फल बता रहा है। जिस पदार्थ का फल अभिहित होता है, वह पदार्थ कर्तव्य (अनुष्ठेय) होता है और जो अनुष्ठेय होता है, उसी की इच्छा की जाती है-"तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यम्"। फलतः दहराकाशगत आत्मरूपता ही विचारणीय सिद्ध होती है ।

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ३५७

'अस्मिन्कामाः समाहिताः', 'एष आत्माऽपहतपाप्मा' इति हि प्रकृतं द्यावापृथिव्यादि समाधानाधारमाकाशमाकृष्य 'अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामान्' इति समुच्चयार्थेन चशब्देनात्मानं कामाधारमाश्रितांश्च कामान्विज्ञेयान्वाक्यशेषो दर्शयति। तस्माद्वाक्योपक्रमेऽपि दहर एवाकाशो हृदयपुण्डरीकाधिष्ठानः सहान्तःस्थैः समाहितैः पृथिव्यादिभिः सत्यैश्च कामैर्विज्ञेय उक्त इति गम्यते। स चोक्तेभ्यो हेतुभ्यः परमेश्वर इति ॥ १४ ॥

गतिशब्दाभ्यां तथाहि दृष्टं लिङ्गं च ॥ १५ ॥

दहरः परमेश्वर उत्तरेभ्यो हेतुभ्य इत्युक्तम्। त एवोत्तरे हेतव इदानीं प्रपञ्च्यन्ते। इतश्च परमेश्वर एव दहरः, यस्माद् दहरवाक्यशेषे परमेश्वरस्यैव प्रतिपादकौ गतिशब्दौ भवतः- 'इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति'


भामती

धारौ तावेव परामृश्येते इत्यत आह ॐ अस्मिन् कामाः समाहिताः ॐ प्रतिष्ठिताः। ॐ एष आत्मापहतपाप्मा इति ॐ । ॐ अनेन प्रकृतं द्यावापृथिवीसमाधानाधारमाकाशमाकृष्य ॐ । द्यावापृथिव्याद्यभिधानव्यवहितमपीति शेषः। ननु सत्यकामज्ञानस्यैतत् फलं, तदनन्तरं निर्देशाद् , न तु दहराकाशवेदनस्येत्यत आह ॐ समुच्चयार्थेन चशब्देन इति ॐ । अस्मिन् कामा इति च एष इति चैकवचनान्तं न द्वे द्यावापृथिव्यौ पराम्रष्टुमर्हतीति दहराकाश एव परामृष्टव्य इति समुदायार्थः। तदनेन क्रमेण तस्मिन्यदन्तरित्यत्र तच्छब्दोऽनन्तरमप्याकाशमतिलङ्घ्य हृत्पुण्डरीकं परामृशतीत्युक्तं भवति। तस्मिन् हृत्पुण्डरीके यदन्तराकाशं तदन्वेष्टव्यमित्यर्थः ॥ १४ ॥

उत्तरेभ्य इत्यस्य प्रपञ्चः। एतमेव दहराकाशं प्रक्रम्य बताहो कष्टमिदं वर्तते जन्तूनां तत्त्वावबोधविकालानां यदेभिः स्वाधीनमपि ब्रह्म न प्राप्यते। तद्यथा चिरन्तननिरूढनिबिडमलपिहितानां कलधौतशकलानां पथि पतितानामुपर्यधुपरि सञ्चरद्भिरपि पान्थैरर्थनायद्भिर्प्रावखण्डनिवहविभ्रमेणैतानि नोपादीयन्त


भामती-व्याख्या

यह जो कहा गया कि द्युलोक और पृथिवी में ही आत्मरूपता पर्यवसित होगी, अतः इन्हीं के द्वारा आत्मा वैसे ही अभिलक्षित होगा, जैसे आकाश शब्द के द्वारा। इस प्रकार आकाश में आधृत द्यु और पृथिवी ही 'आकाश' पद से परामृष्ट (गृहीत) होगे। वह कहना उचित नहीं, क्योंकि "अस्मिन् कामाः समाहिताः" (इसी दहराकाश में समस्त कामनाएँ लगी हैं)। यह आत्मा निष्पाप है, इसी में स्वर्ग से लेकर पृथिवी तक के समस्त लोक अवस्थित हैं। द्यु पृथिव्यादि के इस निरूपण का व्यवधान होने पर भी उनके आधारभूत दहराकाश की अनुवृत्ति कर "एतांश्च सत्यान् कामान्" इस वाक्य में प्रयुक्त समुच्चयार्थक 'च' शब्द के द्वारा आत्मा और आत्माश्रित कामनाओं की विज्ञेयता प्रतिपादित की गई है। तात्पर्य यह है कि उक्त श्रुति मे प्रयुक्त 'अस्मिन्' और 'एषः'- इन एकवचनान्त शब्दों के द्वारा द्यु और पृथिवी—इन दो पदार्थों का परामर्श सम्भव नहीं, अतः दहराकाश ही ग्राह्य है। इस प्रकार 'तस्मिन्' यहाँ 'तत्' पद अनन्तरोक्त आकाश को छोड़ कर पुण्डरीक का उपस्थापक है, अतः उस (हृत्पुण्डरीक) में अवस्थित आकाश (दहराकाश) ही अन्वेष्टव्य सिद्ध होता है ॥ १४ ॥

चौदहवें सूत्र में उपन्यस्त 'उत्तरेभ्यः'---इस पद का व्याख्या-प्रपञ्च ही "गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं च"—इस सूत्र के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इसी दहराकाश को इङ्गित करते हुए कहा गया है कि 'अत्यन्त खेद है कि तत्त्वज्ञान से वञ्चित अज्ञानी जीवों के द्वारा स्वरूपभूत ब्रह्म की प्राप्ति वैसे ही नहीं की जाती, जैसे कि चिरन्तन मल की मोटी पर्त में

३५८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. १५

(छा० ८।३।२) इति। तत्र प्रकृतं दहरं ब्रह्मलोकशब्देनाभिधाय तद्विषया गतिः प्रजाशब्दवाच्यानां जीवानामाभिधीयमाना दहरस्य ब्रह्मतां गमयति। तथा ह्यहरहर्जीवानां सुषुप्तावस्थायां ब्रह्मविषयं गमनं दृष्टं श्रुत्यन्तरे 'सता सोम्य तदा संपन्नो भवति' (छा० ६।८।१) इत्येवमादौ। लोकेऽपि किल गाढं सुषुप्तमाचक्षते-'ब्रह्मीभूतो ब्रह्मतां गतः' इति। तथा ब्रह्मलोकशब्दोऽपि प्रकृते दहरे प्रयुज्यमानो जीवभूताकाश-शङ्कां निवर्तयन्ब्रह्मतामस्य गमयति। ननु कमलासनलोकमपि ब्रह्मलोकशब्दो गमयेत्। गमयेद्यदि ब्रह्मणो लोक इति षष्ठीसमासवृत्त्या व्युत्पाद्येत, सामानाधिकरण्यवृत्त्या


भामती

इत्यभिसन्धिमती साऽऽदृतमिव सस्नेहमिव श्रुतिः प्रवर्तते—'इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति' इति। स्वापकाले हि सर्वं एवायं विद्वानविद्वांश्च जीवलोको हृत्पुण्डरीकाश्रयं दहराकाशाख्यं ब्रह्मलोकं प्राप्तोऽप्यनाद्यविद्यातमःपटलपिहितदृष्टितया ब्रह्मभूयमापन्नोऽहमस्मीति न वेद सोऽयं ब्रह्मलोक-शब्दस्तद्गतिश्च प्रत्यहं जीवलोकस्य दहराकाशस्यैव ब्रह्मरूपलोकतामाहतुः। तदेतदाह भाष्यकारः ॐ इतश्च परमेश्वर एव दहरो यस्माद्दहरवाक्यशेषः इति ॐ। तदेनेन गतिशब्दो व्याख्यातो 'तथाहि दृष्टम्' इति सूत्रावयवं व्याचष्टे ॐ तथाह्यहरहर्जीवानाम् इति ॐ। वेदे च लोके च ॐ दृष्टम् ॐ। यद्यपि सुषुप्तस्य ब्रह्मभावे लौकिकं न प्रमाणान्तरमस्ति, तथापि वैदिकीमेव प्रसिद्धिं स्थापयितुमुच्यते ॐ ईदृशी नामेयं वैदिकी प्रसिद्धिर्यल्लोकेऽपि गीयते इति ॐ: यथा श्रुत्यन्तरे यथा च लोके तथेह ब्रह्मलोकशब्दो-पीति योजना। 'लिङ्गं च' इति सूत्रावयवव्याख्यानं चोद्यमुखेनावतारयति ॐ ननु कमलासनलोकमपि इति ॐ। परिहरति ॐ गमयेद्यदि ब्रह्मणो लोकः इति ॐ। अत्र तावन्निषादस्थपतिन्यायेन षष्ठीसमासात् कर्मधारयो बलीयानिति स्थितमेव, तथापीह षष्ठीसमासनिराकरणेन कर्मधारयस्थापनाय लिङ्गमप्यधिक-


भामती-व्याख्या

वेष्टित सुवर्ण-खण्डों के ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी पत्थर के टुकड़े समझ कर उनका ग्रहण नहीं कर पाते—ऐसा श्रुति कहती है "इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति" (छां. ८।३।१)। यद्यपि सुषुप्ति अवस्था में यह (विद्वान् से लेकर अविद्वान् तक) समग्र जीव-वर्ग प्रत्येक दिन हृदय कमल में अवस्थित दहराकाशसंज्ञक ब्रह्म को प्राप्त करके भी अनादि अविद्यारूप तमःपटल से दृष्टि अवरुद्ध होने के कारण 'अहं ब्रह्म'—इस प्रकार का ज्ञान नहीं कर पाता। 'ब्रह्मलोक' शब्द एवं 'ब्रह्मलोक की प्राप्ति' ये दोनों दहराकाश को ही ब्रह्मलोक सिद्ध कर रहे हैं, भाष्यकार का यही कहना है—"इतश्च परमेश्वर एव दहरो यस्माद् दहरवाक्यशेषे परमेश्वरस्यैव प्रतिपादकौ गतिशब्दौ भवतः" इस भाष्य के द्वारा सूत्रस्थ गति (ब्रह्मलोक प्राप्ति) और शब्द ('ब्रह्मलोक' शब्द) की व्याख्या की गई, अब 'तथा हि दृष्टम्'—इसकी व्याख्या की जाती है—"तथा ह्याहरहर्जीवानां सुषुप्त्यवस्थायां ब्रह्मविषयं गमनं दृष्टम्"। अर्थात् लोक और वेद में वैसा ही देखा जाता है। यद्यपि सुषुप्त जीव की ब्रह्मरूपता में लौकिक कोई प्रमाणान्तर उपलब्ध नहीं, तथापि वैदिक प्रसिद्धि की स्थापना में कहा जाता है कि यह वैदिक प्रसिद्ध है कि लोक में भी वैसा ही माना जाता है। जैसा अन्य श्रुतियों और लोक में प्रसिद्ध है, वैसा ही यह 'ब्रह्मलोक' शब्द भी दहराकाश के लिए प्रयुक्त होकर उसकी जीवरूपता का निराकरण करता है। सूत्र के 'लिङ्गं च'—इस शब्द की व्याख्या आक्षेपपूर्वक प्रस्तुत की जा रही है—"ननु कमलासनलोकमपि ब्रह्मलोकशब्दो गमयेत्।" इस आक्षेप का परिहार किया जाता है—"गमयेद् यदि ब्रह्मणो लोक इति षष्ठीसमासवृत्त्या व्युत्पाद्येत"। 'स्थपतिर्निषादः स्याच्छब्दसामर्थ्यात्' (जै. सू. ६।१।५१) इस सूत्र में यह स्थिर किया गया है कि 'निषादानां स्थपतिः'—इस प्रकार षष्ठी-तत्पुरुष की अपेक्षा

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३५९

तु व्युत्पाद्यमानो ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोक इति परमेव ब्रह्म गमयिष्यति। एवमेव चाहरह- र्ब्रह्मलोकगमनं दृष्टं ब्रह्मलोकशब्दस्य सामानाधिकरण्यवृत्तिपरिग्रहे लिङ्गम्। न ह्यहरह- रिमाः प्रजाः कार्यब्रह्मलोकं सत्यलोकाख्यं गच्छन्तीति शक्यं कल्पयितुम् ॥ १५ ॥

धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॥ १६ ॥

धृतेश्च हेतोः परमेश्वर एवायं दहरः। कथम्? 'दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः' इति हि प्रकृ- त्याकाशौपम्यपूर्वकं तस्मिन्सर्वसमाधानमुक्त्वा तस्मिन्नेव चात्मशब्दं प्रयुज्यापहतपा- प्मत्वादिगुणयोगं चोपदिश्य तमेवानतिवृत्तप्रकरणं निर्दिशति—'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय' (छा० ८।४।१) इति। तत्र विधृतिरित्यात्मशब्द- सामानाधिकरण्याद्विधारयितोच्यते; किंचः कर्तरि स्मरणात्। यथोदकसंतानस्य विधारयिता लोके सेतुः क्षेत्रसंपदामसंभेदाय, एवमयमात्मैषामध्यात्म्यादिभेदभिन्नानां लोकानां वर्णाश्रमादीनां च विधारयिता सेतुरसंभेदायासंकरायेति। एवमिह प्रकृते दहरे विधारणलक्षणं महिमानं दर्शयति। अयं च महिमा परमेश्वर एव श्रुत्यन्तरादुप- लभ्यते 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः' इत्यादेः। तथान्यत्रापि निश्चिते परमेश्वरवाक्ये श्रूयते 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय' इति। एवं धृतेश्च हेतोः परमेश्वर एवायं दहरः ॥ १६ ॥

भामती

मस्तीति तदप्युक्तं सूत्रकारेण। तथाहि लोकवेदप्रसिद्धाहरहर्ब्रह्मलोकप्राप्त्यभिधानमेव लिङ्गं कमलासन- लोकप्राप्तेर्विपक्षादसम्भवाद्व्यावर्त्तमानं षष्ठीसमासाशङ्कां व्यावर्तयदहराकाशप्राशावेवावतिष्ठते, न च दहराकाशो ब्रह्मणो लोकः, किन्तु तद्ब्रह्मेति। ब्रह्म च तल्लोकश्चेति कर्मधारयः सिद्धो भवति। लोक्यत इति लोकः। हृत्पुण्डरीकस्थः खल्वयं लोक्यते। यत् खलु पुण्डरीकस्थमन्तःकरणं तस्मिन्विशुद्धे प्रत्याहृते- तरकरणानां योगिनां निर्मल इवोदके चन्द्रमसो विम्बमतिस्वच्छं चतन्यं ज्योतिःस्वरूपं ब्रह्मावलोक्यत इति ॥ १५ ॥

सोत्रो धृतिशब्दो भाववचनः। धृतेश्च परमेश्वर एव दहराकाशः। कुतः? अस्य धारणलक्षणस्य महिम्नोऽस्मिन्नेवेश्वर एव श्रुत्यन्तरेषूपलब्धेः। निगदव्याख्यानमस्य भाष्यम् ॥ १६ ॥


भामती-व्याख्या

'निषादश्वासौ स्थपतिः'—इस प्रकार कर्मधारय समास मानना उचित है। 'ब्रह्मलोक' शब्द में भी 'ब्रह्मणः लोको ब्रह्मलोकः'—ऐसा षष्ठी-तत्पुरुष समास न मान कर ब्रह्म च तल्लोकश्च ब्रह्मलोकः'—ऐसा कर्मधारय ही मानना न्याय-संगत है। इसी न्याय का उपोद्वलक लिङ्ग प्रमाण सूत्रकार ने प्रस्तुत किया है कि अहरहर्ब्रह्मलोक-गमन यह सिद्ध कर रहा है कि यहाँ 'ब्रह्मलोक' शब्द से कर्मधारयमूलक ब्रह्मरूप लोक का ग्रहण किया गया है। 'लोक्यत इति लोकः'—इस व्युत्पत्ति के अनुसार ब्रह्म को भी 'लोक' शब्द से अभिहित किया जा सकता है, क्योंकि वह हृत्पुण्डरीक में आलोकित है। हृदय कमल में जो अवस्थित अन्तःकरण है, उसके विशुद्ध हो जाने पर जो लोग बाह्य करणों (इन्द्रियों) को उनके विषय से हटाकर आत्मप्रवण कर लेते हैं, ऐसे योगिजनों के द्वारा निर्मल एवं स्थिर जल में स्वच्छ चन्द्र-प्रतिबिम्ब के समान अपने अन्तःकरण में चैतन्य-ज्योतिस्वरूप ब्रह्म अवलोकित होता है ॥ १५ ॥

'धृतेश्च महिम्नः' इस सूत्र में प्रयुक्त 'धृति' शब्द 'धृञ् धारणे' धातु से 'स्त्रियां क्तिन्' (पा. सू. ३।३।९४) इस सूत्र के द्वारा भावार्थक 'क्तिन्' प्रत्यय करने पर निष्पन्न हुआ है। दहराकाश में द्यु और पृथिव्यादि की धृति (वृत्तिता) दहराकाश को परमेश्वर

३६० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ १ पा. ३ सू. १७

प्रसिद्धेश्च ॥ १७ ॥

इतश्च परमेश्वर एव ‘दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः' इत्युच्यते । यत्कारणमाकाशशब्दः परमेश्वरे प्रसिद्धः । 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता' (छा० ८।१४।१), 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' (छा० १।९।१), इत्यादिप्रयोगदर्शनात् । जीवे तु न क्वचिदाकाशशब्दः प्रयुज्यमानो दृश्यते । भूताकाशस्तु सत्यामप्याकाशशब्दप्रसिद्धावुपमानोपमेयभावाद्यसंभवाच्च ग्रहीतव्य इत्युक्तम् ॥ १७ ॥

भामती न चेयमाकाशशब्दस्य ब्रह्मणि लक्ष्यमाणविभुत्वादिगुणयोगाद् वृत्तिः साम्प्रतिकी । यथा रथाङ्गनामा चक्रवाक इति लक्षणा, किन्त्वत्यन्तनिगूढेति सूत्रार्थः । ये त्वाकाशशब्दो ब्रह्मण्यपि मुख्य एव नभोवदित्याचक्षते, तैरन्यायश्चानेकार्थत्वमिति चानन्यलभ्यः शब्दार्थ इति च मीमांसकानां मुद्राभेदः कृतः । लभ्यते ह्याकाशशब्दाद्विभुत्वादिगुणयोगेनापि ब्रह्म । न च ब्रह्मण्येव मुख्यो नभसि तु तेनैव गुणयोगेन वर्त्स्यतीति वाच्यम् । लोकाधीनावधारणत्वेन शब्दार्थसम्बन्धस्य वैदिकपदार्थप्रत्ययस्य तत्पूर्वकत्वात् । ननु 'यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः' इति व्यतिरेकनिर्देशान्न लक्षणा युक्ता । न हि

भामती-व्याख्या सिद्ध कर रही है, क्योंकि विश्व की धृति परमेश्वर में ही प्रतिपादित है—"एतस्य वा प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः" (बृह. उ. ३।८।७) । शेष भाष्य अत्यन्त सुगम है ॥१६॥

सूत्रकार ने जो 'आकाश' शब्द की प्रसिद्धि ब्रह्म में बताई है, वहाँ 'प्रसिद्धि' शब्द का अर्थ लक्षणा है। लक्षणा भी दो प्रकार की होती है—(१) साम्प्रतिकी और (२) निरूढ़ लक्षणा। जैसे 'रथाङ्ग' शब्द की चक्रवाक पक्षी में लक्ष्यमाण 'चक्र' शब्द से अविनाभूत चक्रवाक शब्द के योग से साम्प्रतिकी (आधुनिक) लक्षणा होती है, वैसे ही 'आकाश' शब्द की स्वाभिधेय आकाशगत विभुत्व गुण के योग से ब्रह्म में आधुनिक लक्षणा नहीं, अपितु अनादि तात्पर्यावगाहिनी निरूढ लक्षणा मानी जाती है।

जिन आचार्यों का कहना है कि 'आकाश' पद की नभ में जैसे मुख्य (अभिधा) वृत्ति होती है, वैसे ही ब्रह्म में भी मानी जाती है। वे आचार्य मीमांसकों की इन अनुल्लङ्घनीय मर्यादाओं का स्पष्ट उल्लङ्घन कर डालते हैं कि 'अन्यायश्चानेकार्थत्वम्' (अनेक अर्थों में एक शब्द की मुख्य वृत्ति मानना अनुचित है) और "अनन्यलभ्यः शब्दार्थः" [शाबर भा. पृ. ९२ पर भाष्यकार ने कहा है कि जो अर्थ लक्षणादि अन्य वृत्तियों से लब्ध हो जाता है, उस अर्थ में अभिधा वृत्ति नहीं मानी जाती]। आकाश की लक्षणा वृत्ति से ब्रह्म का बोध हो जाता है, क्योंकि लक्षणा का नियामक आकाशवृत्तिविभुत्ववत्स्वरूप शक्य-सम्बन्ध ब्रह्म में विद्यमान है, अतः ब्रह्म में 'आकाश' पद की अभिधा वृत्ति मानने की आवश्यकता नहीं। 'आकाश' पद की ब्रह्म में ही मुख्य वृत्ति और नभ में ब्रह्मवृत्ति विभुत्व गुण के योग से लक्षणा वृत्ति क्यों न मान ली जाय ? इस प्रश्न का भी मण्डन मिश्र के शब्दों में इस प्रकार है—"लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः (ब्र. सि. पृ. ) । लोक-व्यवहार में 'आकाश' शब्द कभी भी ब्रह्म का अभिधायक नहीं माना जाता, अतः 'आकाश' शब्द की मुख्य वृत्ति ब्रह्म में क्योंकर बनेगी ?

शङ्का—'गङ्गायां घोषः'—इत्यादि स्थलों पर गङ्गा और तट पदार्थ का 'गङ्गा इव गङ्गा'—इस प्रकार सादृश्यमूलक भेद निर्दिष्ट न होने के कारण 'गङ्गा' पद की तट में लक्षणा हो जाती है, किन्तु दहराकाश में आकाश का भेदमूलक सादृश्य दिखाया गया है—"यावान् वाऽयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः"। अतः दहराकाशरूप ब्रह्म में आकाश का व्यतिरेक

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६१

इतरपरामर्शात्स इति चेन्नासंभवात् ॥ १८ ॥

यदि वाक्यशेषबलेन दहर इति परमेश्वरः परिगृह्येतास्तीतरस्यापि जीवस्य वाक्यशेषे परामर्शः—'अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाच' (छा० ८।३।४) इति । अत्र हि संप्रसादशब्दः श्रुत्यन्तरे सुषुप्तावस्थायां दृष्टत्वात्तदवस्थावन्तं जीवं शक्नोत्युपस्थापयितुं नार्था-

भामती

भवति गङ्गायाः कूले विवक्षिते गङ्गायां घोषेति प्रयोगः । तत्किमिदानीं पौर्णमास्यां पौर्णमास्या यजेतामावास्यायाममावास्ययेत्यसाधुर्वैदिकः प्रयोगः ? न च पौर्णमास्यमावास्याशब्दावाग्नेयादिषु मुख्यौ । यच्चोक्तं यत्र शब्दादनधिगतार्थप्रतीतिस्तत्र लक्षणा, यत्र पुनरन्यतोऽर्थे निश्चिते शब्दप्रयोगस्तत्र वाचकत्वमेवेति । तदयुक्तम्, उभयस्यापि व्यभिचारात्- सोमेन यजेतेति शब्दादर्थः प्रतीयते, न चात्र कस्यचिल्लाक्षणिकत्वमृते वाक्यार्थात् । न च 'य एवं विद्वान् पौर्णमासीं यजते य एवं विद्वानमावास्याम्' इत्यत्र पौर्णमास्यमावास्याशब्दौ न लाक्षणिकौ । तस्मात्कौकचिदेतदिति ॥ १७ ॥

सम्यक् प्रसीदत्यस्मिन् जीवो विषयेन्द्रियसंयोगजनितं कालुष्यं जहातीति सुषुप्तिः । सम्प्रसादो जीवस्यावस्थाभेदः, न ब्रह्मणः । तथा शरीरात्समुत्थानमपि शरीराश्रयस्य जीवस्य, न त्वनाश्रयस्य ब्रह्मणः । तस्माद्यथा पूर्वोक्तैर्वाक्यशेषगतैर्लिङ्गैर्ब्रह्मावगम्यते दहराकाशः, एवं वाक्यशेषगताभ्यामेव सम्प्र-

भामती-व्याख्या

( भेद ) प्रदर्शित हो जाने से ब्रह्म में 'आकाश' पद की लक्षणा कैसे हो सकेगी ?

समाधान—'सर्वत्र लक्षणा-स्थल पर लक्ष्यार्थ का पृथक् निर्देश नहीं होना चाहिए'—ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि "दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत"—यहाँ पर एक 'आग्नेय' और दो 'ऐन्द्र'- इन तीन यागों के लिए 'दर्श' पद और आग्नेय, उपांशु एवं अग्नीषोमीय—इन तीन कर्मों के लिए 'पूर्णमास' शब्द लक्षणा वृत्ति से प्रयुक्त है । "अमावास्यायाममावस्यया यजेत" (आप. प. २।१९) और "पौर्णमास्यां पौर्णमास्या यजेत"—यहाँ पर 'अमावास्या' पद की अमावास्या काल-सम्बन्ध और 'पौर्णमास' पद की पौर्णमास काल-सम्बन्ध में जो लक्षणा की जाती है, वह उपपन्न न हो सकेगी, क्योंकि अमावास्या और पौर्णमासी शब्दों के द्वारा उक्त काल-सम्बन्ध पृथक् निर्दिष्ट है । फलतः 'आकाश' पद की ब्रह्म में लक्षणा वृत्ति का कोई बाधक सम्भव नहीं ।

यह जो कहा जाता है कि जहाँ पर शब्द के द्वारा अनधिगत अर्थ की प्रतीति होती है, वहाँ लक्षणा और जहाँ अन्य प्रमाण से अवगत अर्थ में शब्द का प्रयोग होता है, वहाँ वाचकता ( मुख्य वृत्ति ) होती है । वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि उक्त दोनों नियमों में व्यभिचार उपलब्ध होता है—"सोमेन यजेत" (तै. सं. ३।२।२) इत्यादि स्थलों पर सोमलतारूप अनधिगत अर्थ की प्रतीति होने पर भी किसी पद को लाक्षणिक नहीं माना जाता, केवल वाक्यार्थ ही लक्ष्यमाण होता है । "य एवंविद्वान् पौर्णमासीं यजते, य एवंविद्वानमावास्यां यजते" ( तै. सं. १।६।६।१ ) इत्यादि स्थलों पर "यदाग्नेयोऽष्टाकपालः" ( तै. सं. २।६।३।३ ) इत्यादि वाक्यों के द्वारा अधिगत आग्नेयादि कर्मों में भी लक्षणा ही मानी जाती है, वाच्यता या मुख्य वृत्ति नहीं ॥ १७ ॥

'सम्यक् प्रसीदत्यस्मिन् जीवः'—ऐसी व्युत्पत्ति के द्वारा 'सम्प्रसाद' शब्द जीव की ही सुषुप्ति अवस्था का वाचक है, ब्रह्म की नहीं । शरीर से समुत्थान ( विवेकज्ञान ) भी जीव को ही होता है, अनाश्रयभूत ब्रह्म का नहीं । अतः जैसे पूर्वोक्त वाक्यशेषों के द्वारा दहराकाश की ब्रह्मरूपता अवगत होती है, वैसे ही वाक्यशेषावगत सम्प्रसाद और समुत्थान के द्वारा

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