भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| अक्षरस्य ब्रह्मत्वम् ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ३४३ |
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भामती
संज्ञा तु गृहीतसम्बन्धैरत्यन्ताभ्यासात् पिण्डाभिनिवेशिन्येव संस्कारोद्बोधसम्पातायाता स्मर्यते । यथाहूः—
'यत्तत्संज्ञास्मरणं तत्र न तदप्यन्यहेतुकम् ।
पिण्ड एव हि दृष्टः सन् संज्ञां स्मारयितुं क्षमः ॥
संज्ञा हि स्मर्यमाणापि प्रत्यक्षत्वं न बाधते ।
संज्ञिनः सा तटस्था हि न रूपाच्छादनक्षमा ॥' इति ।
न च वर्णातिरिक्ते स्फोटात्मनि अलौकिकेऽक्षरपदप्रसिद्धिरस्ति लोके । न चैष प्रामाणिक इत्युपरिष्टात् प्रवेदयिष्यते । निरूपितं चास्माभिस्तत्त्वबिन्दौ । तस्माच्छ्रोत्रग्राह्याणां वर्णानामम्बराद्यधृतेरनुपपत्तेः समुदायप्रसिद्धिबाधनाद् अवयवप्रसिद्ध्या परमात्मैवाक्षरमिति सिद्धम् । ये तु प्रधानं पूर्वपक्षयित्वाऽ-
भामती-व्याख्या
जो सम्पादक ने लिखा है—"संज्ञा तु पिण्डाभिनिवेशिन्येव— इत्यत्र पिण्डानिवेशिन्येव इति युक्तमाभाति" । वह अत्यन्त युक्ति-युक्त है, क्योंकि न्यायवार्तिक की तात्पर्यटीका में वैसा ही सन्दर्भ उपलब्ध है ] । पिण्ड को देखकर उसकी संज्ञा का स्मरण उन व्यक्तियों के द्वारा किया जाता है, जिन्होंने संज्ञा और संज्ञी की सङ्गति का ग्रहण पहले कर रखा है । इस सङ्गति-ग्रहण से जनित संस्कार जब-जब उद्बुद्ध होते हैं, तब-तब संज्ञा का स्मरण होता रहता है, अत एव संज्ञीरूप पिण्ड को ही वृद्ध न्यायाचार्यों ने संज्ञा का स्मारक माना है—
यत् संज्ञास्मरणं तत्र न तदप्यन्यहेतुकम् ।
पिण्ड एव हि दृष्टः सन् संज्ञां स्मारयितुं क्षमः ॥
संज्ञा हि स्मर्यमाणापि प्रत्यक्षत्वं न बाधते ।
संज्ञिनः सा तटस्था हि न रूपाच्छादनक्षमा ॥
[ किसी पिण्ड को देखकर जो उसकी संज्ञा (वाचक शब्द) का स्मरण होता है, वह भी पिण्डगत शब्द-तादात्म्यापत्तिरूप हेतु से जनित नहीं होता कि उसका गमक हो जाता । सन्निहित पिण्ड ही प्रत्यक्ष होकर उस संज्ञा का स्मरण कराने में सक्षम होता है । स्मर्यमाण संज्ञा पिण्ड की प्रत्यक्षता का बाधक नहीं, संज्ञा तटस्थ (विषय में निविष्ट न) होने के कारण विषय के स्वरूप की आच्छादिका (व्यवसायिका) नहीं होती । फलतः पिण्डविषयक सविकल्पक में भी अभिलाप-संसर्ग-विषयकत्वरूप पारिभाषिक कल्पना का अभाव होने के कारण प्रस्तुत लक्षण घट जाता है, जो कि बौद्धों के लिए अनिष्ट और नैयायिकादि के लिए अभीष्ट है ] ।
वर्णों से अतिरिक्त स्फोटनाम के अलौकिक शब्द के लिए तो लोक में कहीं भी 'अक्षर' पद का व्यवहार नहीं होता और स्फोट कोई प्रामाणिक पदार्थ भी नहीं—यह आगे चलकर कहा जायगा और हम (वाचस्पति मिश्र) ने तत्त्वबिन्दु में स्फोट की अप्रामाणिकता पर पुष्कल प्रकाश डाला है—
मीयमानपरित्यागो बाधके नासति स्फुटे ।
दृष्टात् कार्योपपत्तौ नादृष्टपरिकल्पना ॥ ( त० बिन्दु० पृ० ८ )
[ अर्थात् जब तक कोई प्रबल बाधक उपलब्ध न हो, तब तक प्रमीयमान् (प्रमाण-सिद्ध) वर्णात्मक शब्द का परित्याग नहीं किया जा सकता । अनुभव-सिद्ध वर्णरूप दृष्ट साधन से ही जब अर्थावबोधरूप कार्य सम्पन्न हो जाता है, तब स्फोटरूप अदृष्ट (अननुभूयमान) पदार्थ की कल्पना नहीं की जा सकती ] । परिशेषतः श्रोत्र के द्वारा गृहीत होनेवाले वर्णात्मक अक्षर में पृथिव्यादि आकाशान्त भूत-वर्ग का धारण सम्भव नहीं, एवं 'अक्षर' पद का समुदाय-प्रसिद्ध