भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

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३४४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ११

स्यादेतत्—कार्यस्य चेत्कारणाधीनत्वमम्बरान्तधृतिरभ्युपगम्यते, प्रधानकार- णवादिनोऽपीयमुपपद्यते । कथमम्बरान्तधृतेर्ब्रह्मत्वप्रतिपत्तिरिति ? अत उत्तरं पठति —

सा च प्रशासनात् ॥ ११ ॥

सा चाम्बरान्तधृतिः परमेश्वरस्यैव कर्म । कस्मात् ? प्रशासनात् । प्रशासनं


भामती

नेन सूत्रेण परमात्मैवाक्षरमिति सिद्धान्तयन्ति, तैरम्बरान्तधृतेरित्यनेन कथं प्रधानं निराक्रियत इति वाच्यम् । अथ नाधिकरणत्वमात्रं धृतिः अपि तु प्रशासनाधिकरणता । तथा च श्रुतिः— 'एतस्य वाक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः' इति । तथाप्यम्बरान्तधृतेरित्यनर्थकम् , एतावद्वक्तव्यम्— अक्षरं प्रशासनादिति । एतावत्तैव प्रधाननिराकरणसिद्धेः । तस्माद्वर्णाक्षरतानिरिक्रियेवास्यार्थः । न च स्थूलादीनां वर्णेष्वप्राप्तेरस्थूलमित्यादिनिषेधानुपपत्तेर्वर्णेषु शङ्कव नास्तीति वाच्यम् , नहावश्यं प्राप्तिपूर्वका एव प्रतिषेधा भवन्ति, अप्राप्तेष्वपि नित्यानुवादानां दर्शनात् । यथा नान्तरिक्षे न दिवीत्यग्निनयननिषेधा- नुवादः । तस्माद् यत्किञ्चिदेतत् ॥ १० ॥ प्रशासनमाज्ञा चेतनधर्मो नाचेतने प्रधाने वाऽव्याकृते वा सम्भवति । न च मुख्यार्थसम्भवे कूलं


भामती-व्याख्या

(रूढ़) कोई अर्थ लोक में प्रसिद्ध नहीं, अतः 'न क्षरति'—इस प्रकार योगार्थरूप परब्रह्म ही विश्व का आधार सिद्ध होता है।

श्री भास्कराचार्य ने इस अधिकरण में शांकर मतानुसार किए गए पूर्वपक्ष का खण्डन करते हुए प्रधान (प्रकृति) तत्त्व को पूर्वपक्ष में प्रस्तुत किया है—"केचिदक्षरशब्दस्य वर्णे प्रसिद्धत्वादक्षरमोंकार इति पूर्वपक्षयन्ति वैयाकरणदर्शनं च स्फोटशब्द इत्यवतार्य गकारादि वर्णा एव शब्दा इति व्यवस्थापयन्ति । तदेतदधिकरणेनासम्बद्धम् । प्रधानस्य तु युज्यत, विकारधर्माणं कारणप्रसक्तेः" (भास्कर० पृ० ५४) । वह भास्कीय प्रस्तुतीकरण उचित नहीं, क्योंकि "अम्बरान्तधृतेः"—इस हेतु के द्वारा प्रधानतत्त्व का निराकरण क्योंकर होगा ? क्योंकि अम्बरान्त भूत-वर्ग की धारकता प्रधान में भी उपपन्न है।

भास्कराचार्य ने जो "सा च प्रशासनात्" (ब्र. सू. १।३।११) इस सूत्र के द्वारा प्रधान का निराकरण करते हुए कहा है—"एतस्यैवाक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः (बृह. उ. ३।८।९) इति प्रशासनमाज्ञापयितृत्वं चेतनधर्मः"। वह कहना भी उचित नहीं, क्योंकि इस प्रकार अम्बरान्तधृति का अर्थ यदि प्रशासनाधिकरणता मान लिया जाता है, तब भी "अम्बरान्तधृतेः"—यह सूत्रांश अनर्थक हो जाता है, तब तो "अक्षरं प्रशासनात्"— ऐसा एक सूत्र बना देना चाहिए था, इतनेमात्र से प्रधान-तत्त्व का निराकरण सम्पन्न हो जाता । अतः वर्णात्मक अक्षर का निराकरण करना ही यहाँ उचित है, प्रधान का नहीं।

भास्कराचार्य ने जो कहा है कि "'अस्थूलादि च तस्मिन्नुपपत्तेः" अर्थात् वर्णात्मक अक्षर में स्थूलत्वादि प्रसक्त (प्राप्त) ही नहीं, तब 'अस्थूलमनणु" (बृह. उ. ३।८।८) इत्यादि वाक्यों के द्वारा वर्णात्मक अक्षर में स्थूलत्वादि का प्रतिषेध अप्रसक्त-प्रतिषेध होने के कारण अनुपपन्न है। वह कहना भी उचित नहीं क्योंकि निषेध सदैव प्राप्तिपूर्वक ही होता है— ऐसा कोई नियम नहीं, अप्राप्त-स्थल पर भी प्राप्त नित्य निषेध का अनुवाद देखा जाता है, जैसे कि इष्टिका-चयन के सन्दर्भ में कहा गया है—"नान्तरिक्षे न दिवि" अर्थात् अग्निचयन कर्म के लिए जो श्येन पक्षी के आकार का स्थण्डिल बनाया जाता है, उसके लिए 'अन्तरिक्ष (आकाश) और द्यु में ईंट की चुनाई नहीं करनी चाहिए'—ऐसा निषेध अप्रसक्त-प्रतिषेध

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