भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३४८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. १३ |
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त्मैवायँ सम्यग्दर्शनविषयभूत ईक्षितिकर्मत्वेन व्यपदिष्ट इति गम्यते । स एव चेह पर- पुरुषशब्दाभ्यामभिध्यातव्यः प्रत्यभिज्ञायते । नन्वभिध्याने परः पुरुष उक्तः, ईक्षणे तु परात्परः, कथमितर इतरत्र प्रत्यभिज्ञायत इति ? अत्रोच्यते—परपुरुषशब्दौ तावदुभ- यत्र साधारणौ । नचात्र जीवघनशब्देन प्रकृतोऽभिध्यातव्यः परः पुरुषः परामृश्यते, येन तस्मात्परात्परोऽयमीक्षितव्यः पुरुषोऽन्यः स्यात् । कस्तर्हि जीवघन इति ? उच्यते—घनो मूर्तिः । जीवलक्षणो घनो जीवघनः । सैन्धवखिल्यवद्यः परमात्मनो जीवरूपः खिल्यभाव उपाधिकृतः परश्च विषयेन्द्रियेभ्यः सोऽत्र जीवघन इति । अपर आह—'स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम्' इत्यतीतानन्तरवाक्यनिर्दिष्टो यो ब्रह्मलोकः परश्च लोकान्तरेभ्यः सोऽत्र जीवघन इत्युच्यते । जीवानां हि सर्वेषां करणप-
भामती
समारोपितगोचरो भवेत् । न चासत्यपवादे शक्य उत्सर्गस्त्यक्तुम् । तथा चास्य तत्त्वविषयत्वात्तत्कारणस्य ध्यानस्यापि तत्त्वविषयत्वम् । अपि च वाक्यशेषेणैकवाक्यत्वसम्भवे न वाक्यभेदो युज्यते । सम्भवति च परपुरुषविषयत्वेनार्थप्रत्यभिज्ञानात् समभिव्याहाराच्चैकवाक्यता । तदनुरोधेन च परात् पर इत्यत परादिति जीवघनविषयं द्रष्टव्यम् । तस्मात्तु परः पुरुषो ध्यातव्यश्च द्रष्टव्यश्च भवति । तदिदमुक्तम् ❄ न चात्र जीवघनशब्देन प्रकृतोऽभिध्यातव्यः परः पुरुषः परामृश्यते ❄। किन्तु जीवघनात् परात् परो यो ध्यातव्यो द्रष्टव्यश्च तमेव कथयितुं जीवघनो जीवः खिल्यभावमुपाधिवशादापन्नः स उच्यते । स साम- भिरुन्नीयते ब्रह्मलोकमित्यनन्तरवाक्यनिर्दिष्टो ब्रह्मलोको वा जीवघनः । स हि समस्तकरणात्मनः सूत्रात्मनो
भामती-व्याख्या
है और साक्षात्कार ध्यान का फल है । यह जो कहा जाता है कि साक्षात्कार तात्त्विक वस्तु को विषय करता है, वह एक औत्सर्गिक ( सामान्य ) नियम है, कहीं-कहीं बाधक प्रमाण के उपस्थित हो जाने पर उस नियम का अपवाद भी हो जाने से साक्षात्कार अतत्त्वविषयक ( समारोपित-विषयक ) भी हो जाता है किन्तु अपवाद के न होने पर औत्सर्गिक नियम का त्याग नहीं किया जा सकता । प्रकृत में कोई बाधक उपलब्ध नहीं, अतः साक्षात्कार ( ईक्षण ) सत्य वस्तु ( निर्गुण ब्रह्म ) को विषय करता है, अतः साक्षात्कार का कारणीभूत ध्यान भी तत्त्वविषयक ही होगा ।
दूसरी बात यह भी है कि किसी वाक्य की अपने वाक्य-शेष के साथ एकवाक्यता के सम्भव होने पर वाक्य-भेद युक्ति-युक्त नहीं माना जाता । ईक्षण और अभिध्यान में परमपुरुष- विषयकत्व की प्रत्यभिज्ञा हो रही है एवं ईक्षण और ध्यान का समभिव्याहार ( एक वाक्य में निर्देश ) भी है । कथित विषय-प्रत्यभिज्ञान एवं ईक्षण और ध्यान के समभिव्याहार के अनुरोध से 'परात्परम्'—यहाँ पर 'परात्' का अर्थ 'जीवघनात्' ऐसा ही पर्यवसित होता है, क्योंकि वाक्यशेष में कहा है—'स एतस्माज्जीवघनात् परात्परम्' । फलतः परमपुरुष ( निर्गुण ब्रह्म ) ही यहाँ ध्यातव्य और द्रष्टव्यरूप से प्रस्तुत किया गया है । भाष्यकार ने यही कहा है—"न चात्र जीवघनशब्देन प्रकृतोऽभिधातव्यः परः पुरुषः परामृश्यते ।" अर्थात् यहाँ 'जीवघन' शब्द के द्वारा प्रकृत ध्यातव्य पुरुष का ग्रहण नहीं किया गया कि द्रष्टव्य पुरुष उस ( ध्यातव्य ) से भिन्न सिद्ध होता । किन्तु जो जीवघन इन्द्रियादि से पर है, उससे भी परे ध्यातव्य और द्रष्टव्य तत्त्व का निर्देश करने के लिए जीवघन को ध्यातव्य वस्तु ( ब्रह्म ) के खिल्यभाव ( अल्परूप या अंशात्मक ) कहा गया है । उपाधि के द्वारा जीव में खिल्यभाव ( स्वल्पीभाव ) प्राप्त हुआ है । अथवा "स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम्"—इस पूर्ववर्ती वाक्य निर्दिष्ट ब्रह्मलोक को 'जीवघन' कहा है, क्योंकि वह ( ब्रह्मलोक ) लोकान्तर से पर एवं