भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 365

ईक्षणीयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३४७

इत्येवं प्राप्तेऽभिधीयते परमेव ब्रह्महाभिध्यातव्यमुपदिश्यते । कस्मात् ? ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् । ईक्षतिर्दर्शनम् । दर्शनव्याप्यमी क्षतिकर्म । ईक्षतिकर्मत्वेनास्याभि-ध्यातव्यस्य पुरुषस्य वाक्यशेषे व्यपदेशो भवति—'स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते' इति । तत्राभिध्यायतेरतथाभूतमपि वस्तु कर्म भवति; मनोरथकल्पित-स्याप्यभिध्यायतिकर्मत्वात् । ईक्षतेस्तु तथाभूतमेव वस्तु लोके कर्म दृष्टमित्यतः परमा-

भामती

यत्त्वेन प्रसिद्धेः परस्यैव ब्रह्मणस्तथाभावाद् ध्यायतेश्च तेन समानविषयत्वात्परब्रह्मविषयमेव ध्यानमिति साम्प्रतम्, समानविषयत्वस्यासिद्धेः परो हि पुरुषो ध्यानविषयः, परात्परस्तु दर्शनविषयः । न च तत्त्वविषयमेव सर्वत्र दर्शनम्, अनृतविषयस्यापि तस्य दर्शनात् । न च मननं दर्शनं, तच्च तत्त्वविषय-मेवेति साम्प्रतम्, मननाङ्गेन तत्र तत्र दर्शनस्य निर्देशाद् । न च मननमपि तर्कपरनामावश्यं तत्त्व-विषयम् , यथाहुः—'तर्कोऽप्रतिष्ठः' इति । तस्मादपरमेव ब्रह्मेह ध्येयम् । तस्य च परत्वं शरीरापेक्षयेति । एवं प्राप्ते उच्यते ।

ईक्षणध्यानयोरेकः कार्यकारणभूतयोः ।
अर्थ औत्सर्गिकं तत्त्वविषयत्वं तयेश्च तेः ॥

ध्यानस्य हि साक्षात्कारः फलम् । साक्षात्कारश्चोत्सर्गतस्तत्त्वविषयः । क्वचित्तु बाधकोपनिपाते


भामती-व्याख्या

का ही ध्यान विहित है, उसका ही फल ब्रह्मलोक है।

**शङ्का—**उक्त वाक्य के अन्त में कहा है—"एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते"। ईक्षण (दर्शन) लोक में परमार्थ विषयक ही प्रसिद्ध है, अतः परब्रह्म का ही ईक्षण न्याय-प्राप्त है, उसी ईक्षणीय ब्रह्म का ही वाक्य के आरम्भ में ध्यान-विधान मानना होगा।

**समाधान—**ईक्षण और ध्यान में यह समानविषयता सम्भव नहीं, अपितु अर्थ-भेद (विषय-भेद) है, क्योंकि पर पुरुष (हिरण्यगर्भ) ध्यान का विषय और परात्पर ब्रह्म ईक्षण (दर्शन) का विषय होता है, अतः वाक्य के उपसंहार में दर्शनविषयत्वेन परब्रह्म का प्रतिपादन होने पर भी आरम्भ में ध्यान-विषयत्वेन अपर ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) का ही ग्रहण करना चाहिए। दूसरी बात यह भी है कि 'सत्यार्थविषयक ही सर्वत्र दर्शन विहित होता है'—ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि 'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्नि-गूढाम्' (श्वेता. १।३) इत्यादि वाक्यों में प्रकृति-जैसे अनृत (असत्य या बाधित) विषय का भी दर्शन अभिहित है। दर्शन के हेतुभूत मनन-ध्यानादि का भी तत्त्वविषयक होना अनिवार्य नहीं, क्योंकि मनन नाम है तर्क का और तर्क के विषय में कहा गया है—"तर्कोऽ-प्रतिष्ठः" (म. भा. ३।३१३।११७) अर्थात् तर्क अतत्त्वविषयक भी होता है, अत उसे एक विषय पर प्रतिष्ठित नहीं कहा जाता। यह जो कहा गया है कि "परं पुरुषमभिध्यायीत"—यहाँ हिरण्यगर्भरूप ध्येय ब्रह्म में भी परत्व का सामञ्जस्य इस प्रकार हो जाता है कि हिरण्यगर्भरूप सूत्रात्मा स्थूल शरीर (विराट्) की अपेक्षा पर है। शरीर की अपेक्षा प्राण पर है और हिरण्यगर्भ समष्टि प्राण का अभिमानी है।

सिद्धान्त—
ईक्षणध्यानयोरेकः कार्यकारणभूतयोः ।
अर्थ औत्सर्गिकं तत्त्वविषयत्वं तथेक्षतेः ॥

ईक्षण (साक्षात्कार) और ध्यान का कार्यकारणभाव माना जाता है। ध्यान कारण

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 365, कुल 639 में से · BharatKosha