भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३५५

कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते' (छा० ८।१।६) इति च कर्मणामन्तवत्फलत्वमुक्त्वा 'अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामाँ- स्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति' इति प्रकृतदहराकाशविज्ञानस्यानन्तफलत्वं वदन् परमात्मत्वमस्य सूचयति। यदप्येतदुक्तं, - न दहरस्याकाशस्यान्वेष्टव्यत्वं विजि- ज्ञासितव्यत्वं च श्रुतं; परविशेषणत्वेनोपादानादिति, अत्र ब्रूमः - यद्याकाशो नान्वेष्टव्य- त्वेनोक्तः स्यात्, 'यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः' इत्याद्याकाश- स्वरूपप्रदर्शनं नोपयुज्येत। नन्वेतदप्यन्तर्वर्तिवस्तुसद्भावप्रदर्शनायैव प्रदर्श्यते। 'तं


भामती

कथञ्चिद्भेदविवक्षया जीवे व्याख्यायन्ते। न चेह ब्रह्मणो बाधकं प्रमाणं साधकं वाऽस्ति जीवस्य। ब्रह्म- पुरव्यपदेशश्चोपपादितो ब्रह्मोपलब्धिस्थानतया। अर्भकौकस्त्वं चोक्तम्। तस्मात् सति सम्भवे ब्रह्मणि तल्लिङ्गानां नाब्रह्मणि व्याख्यानमुचितमिति ब्रह्मैव दहराकाशो न जीवभूताकाशाविति। श्रवणमननमनु- विद्य ब्रह्मानुभूय चरणं चारस्तेषां कामेषु चरणं भवतीत्यर्थः। स्यादेतद् - दहराकाशस्यान्वेष्यत्वे सिद्धे तत्र विचारो युज्यते, न तु तदन्वेष्टव्यम्, अपि तु तदाधारमन्यदेव किञ्चिदित्युकमित्यनुभाषते। ॐ यदप्ये- तद् इति ॐ। अनुभाषितं दूषयति ॐ अत्र ब्रूमः इति ॐ। यद्याकाशाधारमन्यदन्वेष्टव्यं भवेत्तदेवोपरि


भामती-व्याख्या

होता है। ब्रह्म के असाधारण धर्मों का जीव में किसी-न-किसी प्रकार तब समन्वय किया जा सकता था, जब कि यहाँ ब्रह्म का कोई प्रबल बाधक और जीव का साधक प्रमाण उपलब्ध होता, किन्तु यहाँ कोई वैसा प्रमाण उपलब्ध नहीं। 'ब्रह्मपुर' शब्द का ब्रह्मोपलब्धिपरत्वेन उपपादन किया जा चुका है। दहराकाश के समान एक स्वल्प या संकुल स्थान में ब्रह्म के रहने का भी उपपादन पहले "अर्भकौकस्त्वात्" (ब्र. सू. १।२।७) इस सूत्र में कहा जा चुका है। ब्रह्म के असाधारण धर्मों का समन्वय जब ब्रह्म में हो सकता है, तब ब्रह्म से भिन्न जीवादि में किसी-न-किसी प्रकार आयोजन उचित नहीं, फलतः ब्रह्म ही दहराकाश है, भूताकाश या जीव नहीं।

दहराकाश की उपासना का अनन्त फल श्रुत है—"अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्ति, एतांश्च सत्यान् कामान् तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति" (छां. ८।१।६)। अनुविद्य का अर्थ है—'अनु पश्चाद् विदित्वा' अर्थात् श्रवण और मनन के पश्चात् ब्रह्मात्मत्व का अनुभव (साक्षात्कार) करके। भाष्यकार ने भी ऐसा ही कहा है—"शास्त्राचार्योपदेशमनुविद्य स्वात्मसंवेद्यतामापाद्य" (छां. भा. पृ. ४४६)। 'कामचारः' का अर्थ है—कामेषु [काम्येषु (विषयेषु) चारः (उपलब्धिः)] अर्थात् यथेष्ट विषय की प्राप्ति या स्वातन्त्र्य।

शङ्का—दहराकाश में अन्वेषणीयत्व सिद्ध हो जाने पर ही उसके विषय में विचार करना उचित था किन्तु दहराकाश में अन्वेष्टव्यत्व प्रतिपादित न होकर उससे भिन्न उसमें रहनेवाले किसी अन्य तत्त्व को अन्वेष्टव्य और विजिज्ञास्य कहा गया है—"तस्मिन् यदन्तः तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यम्"।

समाधान—उक्त शङ्का का अनुवाद करके भाष्यकार "यदप्येतद्"—इत्यादि वाक्य से अनुवाद करके निरास कर रहे हैं—"अत्र ब्रूमः"। अर्थात् दहराकाश ही अन्वेष्टव्य है, उससे अन्य नहीं, क्योंकि यदि अन्य कोई तत्त्व अन्वेषणीय होता, तब आगे चलकर श्रुति उसका व्युत्पादन करती, किन्तु व्युत्पादन किया गया है दहराकाश का—"यावान् वा अयमाकाशः, तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः"। यह दहराकाश का निरूपण यह सिद्ध कर रहा है कि यही विचारणीय है।

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