भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ३५७
'अस्मिन्कामाः समाहिताः', 'एष आत्माऽपहतपाप्मा' इति हि प्रकृतं द्यावापृथिव्यादि समाधानाधारमाकाशमाकृष्य 'अथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान्कामान्' इति समुच्चयार्थेन चशब्देनात्मानं कामाधारमाश्रितांश्च कामान्विज्ञेयान्वाक्यशेषो दर्शयति। तस्माद्वाक्योपक्रमेऽपि दहर एवाकाशो हृदयपुण्डरीकाधिष्ठानः सहान्तःस्थैः समाहितैः पृथिव्यादिभिः सत्यैश्च कामैर्विज्ञेय उक्त इति गम्यते। स चोक्तेभ्यो हेतुभ्यः परमेश्वर इति ॥ १४ ॥
गतिशब्दाभ्यां तथाहि दृष्टं लिङ्गं च ॥ १५ ॥
दहरः परमेश्वर उत्तरेभ्यो हेतुभ्य इत्युक्तम्। त एवोत्तरे हेतव इदानीं प्रपञ्च्यन्ते। इतश्च परमेश्वर एव दहरः, यस्माद् दहरवाक्यशेषे परमेश्वरस्यैव प्रतिपादकौ गतिशब्दौ भवतः- 'इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति'
भामती
धारौ तावेव परामृश्येते इत्यत आह ॐ अस्मिन् कामाः समाहिताः ॐ प्रतिष्ठिताः। ॐ एष आत्मापहतपाप्मा इति ॐ । ॐ अनेन प्रकृतं द्यावापृथिवीसमाधानाधारमाकाशमाकृष्य ॐ । द्यावापृथिव्याद्यभिधानव्यवहितमपीति शेषः। ननु सत्यकामज्ञानस्यैतत् फलं, तदनन्तरं निर्देशाद् , न तु दहराकाशवेदनस्येत्यत आह ॐ समुच्चयार्थेन चशब्देन इति ॐ । अस्मिन् कामा इति च एष इति चैकवचनान्तं न द्वे द्यावापृथिव्यौ पराम्रष्टुमर्हतीति दहराकाश एव परामृष्टव्य इति समुदायार्थः। तदनेन क्रमेण तस्मिन्यदन्तरित्यत्र तच्छब्दोऽनन्तरमप्याकाशमतिलङ्घ्य हृत्पुण्डरीकं परामृशतीत्युक्तं भवति। तस्मिन् हृत्पुण्डरीके यदन्तराकाशं तदन्वेष्टव्यमित्यर्थः ॥ १४ ॥
उत्तरेभ्य इत्यस्य प्रपञ्चः। एतमेव दहराकाशं प्रक्रम्य बताहो कष्टमिदं वर्तते जन्तूनां तत्त्वावबोधविकालानां यदेभिः स्वाधीनमपि ब्रह्म न प्राप्यते। तद्यथा चिरन्तननिरूढनिबिडमलपिहितानां कलधौतशकलानां पथि पतितानामुपर्यधुपरि सञ्चरद्भिरपि पान्थैरर्थनायद्भिर्प्रावखण्डनिवहविभ्रमेणैतानि नोपादीयन्त
भामती-व्याख्या
यह जो कहा गया कि द्युलोक और पृथिवी में ही आत्मरूपता पर्यवसित होगी, अतः इन्हीं के द्वारा आत्मा वैसे ही अभिलक्षित होगा, जैसे आकाश शब्द के द्वारा। इस प्रकार आकाश में आधृत द्यु और पृथिवी ही 'आकाश' पद से परामृष्ट (गृहीत) होगे। वह कहना उचित नहीं, क्योंकि "अस्मिन् कामाः समाहिताः" (इसी दहराकाश में समस्त कामनाएँ लगी हैं)। यह आत्मा निष्पाप है, इसी में स्वर्ग से लेकर पृथिवी तक के समस्त लोक अवस्थित हैं। द्यु पृथिव्यादि के इस निरूपण का व्यवधान होने पर भी उनके आधारभूत दहराकाश की अनुवृत्ति कर "एतांश्च सत्यान् कामान्" इस वाक्य में प्रयुक्त समुच्चयार्थक 'च' शब्द के द्वारा आत्मा और आत्माश्रित कामनाओं की विज्ञेयता प्रतिपादित की गई है। तात्पर्य यह है कि उक्त श्रुति मे प्रयुक्त 'अस्मिन्' और 'एषः'- इन एकवचनान्त शब्दों के द्वारा द्यु और पृथिवी—इन दो पदार्थों का परामर्श सम्भव नहीं, अतः दहराकाश ही ग्राह्य है। इस प्रकार 'तस्मिन्' यहाँ 'तत्' पद अनन्तरोक्त आकाश को छोड़ कर पुण्डरीक का उपस्थापक है, अतः उस (हृत्पुण्डरीक) में अवस्थित आकाश (दहराकाश) ही अन्वेष्टव्य सिद्ध होता है ॥ १४ ॥
चौदहवें सूत्र में उपन्यस्त 'उत्तरेभ्यः'---इस पद का व्याख्या-प्रपञ्च ही "गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं च"—इस सूत्र के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इसी दहराकाश को इङ्गित करते हुए कहा गया है कि 'अत्यन्त खेद है कि तत्त्वज्ञान से वञ्चित अज्ञानी जीवों के द्वारा स्वरूपभूत ब्रह्म की प्राप्ति वैसे ही नहीं की जाती, जैसे कि चिरन्तन मल की मोटी पर्त में