भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. १५
(छा० ८।३।२) इति। तत्र प्रकृतं दहरं ब्रह्मलोकशब्देनाभिधाय तद्विषया गतिः प्रजाशब्दवाच्यानां जीवानामाभिधीयमाना दहरस्य ब्रह्मतां गमयति। तथा ह्यहरहर्जीवानां सुषुप्तावस्थायां ब्रह्मविषयं गमनं दृष्टं श्रुत्यन्तरे 'सता सोम्य तदा संपन्नो भवति' (छा० ६।८।१) इत्येवमादौ। लोकेऽपि किल गाढं सुषुप्तमाचक्षते-'ब्रह्मीभूतो ब्रह्मतां गतः' इति। तथा ब्रह्मलोकशब्दोऽपि प्रकृते दहरे प्रयुज्यमानो जीवभूताकाश-शङ्कां निवर्तयन्ब्रह्मतामस्य गमयति। ननु कमलासनलोकमपि ब्रह्मलोकशब्दो गमयेत्। गमयेद्यदि ब्रह्मणो लोक इति षष्ठीसमासवृत्त्या व्युत्पाद्येत, सामानाधिकरण्यवृत्त्या
भामती
इत्यभिसन्धिमती साऽऽदृतमिव सस्नेहमिव श्रुतिः प्रवर्तते—'इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति' इति। स्वापकाले हि सर्वं एवायं विद्वानविद्वांश्च जीवलोको हृत्पुण्डरीकाश्रयं दहराकाशाख्यं ब्रह्मलोकं प्राप्तोऽप्यनाद्यविद्यातमःपटलपिहितदृष्टितया ब्रह्मभूयमापन्नोऽहमस्मीति न वेद सोऽयं ब्रह्मलोक-शब्दस्तद्गतिश्च प्रत्यहं जीवलोकस्य दहराकाशस्यैव ब्रह्मरूपलोकतामाहतुः। तदेतदाह भाष्यकारः ॐ इतश्च परमेश्वर एव दहरो यस्माद्दहरवाक्यशेषः इति ॐ। तदेनेन गतिशब्दो व्याख्यातो 'तथाहि दृष्टम्' इति सूत्रावयवं व्याचष्टे ॐ तथाह्यहरहर्जीवानाम् इति ॐ। वेदे च लोके च ॐ दृष्टम् ॐ। यद्यपि सुषुप्तस्य ब्रह्मभावे लौकिकं न प्रमाणान्तरमस्ति, तथापि वैदिकीमेव प्रसिद्धिं स्थापयितुमुच्यते ॐ ईदृशी नामेयं वैदिकी प्रसिद्धिर्यल्लोकेऽपि गीयते इति ॐ: यथा श्रुत्यन्तरे यथा च लोके तथेह ब्रह्मलोकशब्दो-पीति योजना। 'लिङ्गं च' इति सूत्रावयवव्याख्यानं चोद्यमुखेनावतारयति ॐ ननु कमलासनलोकमपि इति ॐ। परिहरति ॐ गमयेद्यदि ब्रह्मणो लोकः इति ॐ। अत्र तावन्निषादस्थपतिन्यायेन षष्ठीसमासात् कर्मधारयो बलीयानिति स्थितमेव, तथापीह षष्ठीसमासनिराकरणेन कर्मधारयस्थापनाय लिङ्गमप्यधिक-
भामती-व्याख्या
वेष्टित सुवर्ण-खण्डों के ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी पत्थर के टुकड़े समझ कर उनका ग्रहण नहीं कर पाते—ऐसा श्रुति कहती है "इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति" (छां. ८।३।१)। यद्यपि सुषुप्ति अवस्था में यह (विद्वान् से लेकर अविद्वान् तक) समग्र जीव-वर्ग प्रत्येक दिन हृदय कमल में अवस्थित दहराकाशसंज्ञक ब्रह्म को प्राप्त करके भी अनादि अविद्यारूप तमःपटल से दृष्टि अवरुद्ध होने के कारण 'अहं ब्रह्म'—इस प्रकार का ज्ञान नहीं कर पाता। 'ब्रह्मलोक' शब्द एवं 'ब्रह्मलोक की प्राप्ति' ये दोनों दहराकाश को ही ब्रह्मलोक सिद्ध कर रहे हैं, भाष्यकार का यही कहना है—"इतश्च परमेश्वर एव दहरो यस्माद् दहरवाक्यशेषे परमेश्वरस्यैव प्रतिपादकौ गतिशब्दौ भवतः" इस भाष्य के द्वारा सूत्रस्थ गति (ब्रह्मलोक प्राप्ति) और शब्द ('ब्रह्मलोक' शब्द) की व्याख्या की गई, अब 'तथा हि दृष्टम्'—इसकी व्याख्या की जाती है—"तथा ह्याहरहर्जीवानां सुषुप्त्यवस्थायां ब्रह्मविषयं गमनं दृष्टम्"। अर्थात् लोक और वेद में वैसा ही देखा जाता है। यद्यपि सुषुप्त जीव की ब्रह्मरूपता में लौकिक कोई प्रमाणान्तर उपलब्ध नहीं, तथापि वैदिक प्रसिद्धि की स्थापना में कहा जाता है कि यह वैदिक प्रसिद्ध है कि लोक में भी वैसा ही माना जाता है। जैसा अन्य श्रुतियों और लोक में प्रसिद्ध है, वैसा ही यह 'ब्रह्मलोक' शब्द भी दहराकाश के लिए प्रयुक्त होकर उसकी जीवरूपता का निराकरण करता है। सूत्र के 'लिङ्गं च'—इस शब्द की व्याख्या आक्षेपपूर्वक प्रस्तुत की जा रही है—"ननु कमलासनलोकमपि ब्रह्मलोकशब्दो गमयेत्।" इस आक्षेप का परिहार किया जाता है—"गमयेद् यदि ब्रह्मणो लोक इति षष्ठीसमासवृत्त्या व्युत्पाद्येत"। 'स्थपतिर्निषादः स्याच्छब्दसामर्थ्यात्' (जै. सू. ६।१।५१) इस सूत्र में यह स्थिर किया गया है कि 'निषादानां स्थपतिः'—इस प्रकार षष्ठी-तत्पुरुष की अपेक्षा