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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

३५८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. १५

(छा० ८।३।२) इति। तत्र प्रकृतं दहरं ब्रह्मलोकशब्देनाभिधाय तद्विषया गतिः प्रजाशब्दवाच्यानां जीवानामाभिधीयमाना दहरस्य ब्रह्मतां गमयति। तथा ह्यहरहर्जीवानां सुषुप्तावस्थायां ब्रह्मविषयं गमनं दृष्टं श्रुत्यन्तरे 'सता सोम्य तदा संपन्नो भवति' (छा० ६।८।१) इत्येवमादौ। लोकेऽपि किल गाढं सुषुप्तमाचक्षते-'ब्रह्मीभूतो ब्रह्मतां गतः' इति। तथा ब्रह्मलोकशब्दोऽपि प्रकृते दहरे प्रयुज्यमानो जीवभूताकाश-शङ्कां निवर्तयन्ब्रह्मतामस्य गमयति। ननु कमलासनलोकमपि ब्रह्मलोकशब्दो गमयेत्। गमयेद्यदि ब्रह्मणो लोक इति षष्ठीसमासवृत्त्या व्युत्पाद्येत, सामानाधिकरण्यवृत्त्या


भामती

इत्यभिसन्धिमती साऽऽदृतमिव सस्नेहमिव श्रुतिः प्रवर्तते—'इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति' इति। स्वापकाले हि सर्वं एवायं विद्वानविद्वांश्च जीवलोको हृत्पुण्डरीकाश्रयं दहराकाशाख्यं ब्रह्मलोकं प्राप्तोऽप्यनाद्यविद्यातमःपटलपिहितदृष्टितया ब्रह्मभूयमापन्नोऽहमस्मीति न वेद सोऽयं ब्रह्मलोक-शब्दस्तद्गतिश्च प्रत्यहं जीवलोकस्य दहराकाशस्यैव ब्रह्मरूपलोकतामाहतुः। तदेतदाह भाष्यकारः ॐ इतश्च परमेश्वर एव दहरो यस्माद्दहरवाक्यशेषः इति ॐ। तदेनेन गतिशब्दो व्याख्यातो 'तथाहि दृष्टम्' इति सूत्रावयवं व्याचष्टे ॐ तथाह्यहरहर्जीवानाम् इति ॐ। वेदे च लोके च ॐ दृष्टम् ॐ। यद्यपि सुषुप्तस्य ब्रह्मभावे लौकिकं न प्रमाणान्तरमस्ति, तथापि वैदिकीमेव प्रसिद्धिं स्थापयितुमुच्यते ॐ ईदृशी नामेयं वैदिकी प्रसिद्धिर्यल्लोकेऽपि गीयते इति ॐ: यथा श्रुत्यन्तरे यथा च लोके तथेह ब्रह्मलोकशब्दो-पीति योजना। 'लिङ्गं च' इति सूत्रावयवव्याख्यानं चोद्यमुखेनावतारयति ॐ ननु कमलासनलोकमपि इति ॐ। परिहरति ॐ गमयेद्यदि ब्रह्मणो लोकः इति ॐ। अत्र तावन्निषादस्थपतिन्यायेन षष्ठीसमासात् कर्मधारयो बलीयानिति स्थितमेव, तथापीह षष्ठीसमासनिराकरणेन कर्मधारयस्थापनाय लिङ्गमप्यधिक-


भामती-व्याख्या

वेष्टित सुवर्ण-खण्डों के ऊपर-ऊपर विचरते हुए भी पत्थर के टुकड़े समझ कर उनका ग्रहण नहीं कर पाते—ऐसा श्रुति कहती है "इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति" (छां. ८।३।१)। यद्यपि सुषुप्ति अवस्था में यह (विद्वान् से लेकर अविद्वान् तक) समग्र जीव-वर्ग प्रत्येक दिन हृदय कमल में अवस्थित दहराकाशसंज्ञक ब्रह्म को प्राप्त करके भी अनादि अविद्यारूप तमःपटल से दृष्टि अवरुद्ध होने के कारण 'अहं ब्रह्म'—इस प्रकार का ज्ञान नहीं कर पाता। 'ब्रह्मलोक' शब्द एवं 'ब्रह्मलोक की प्राप्ति' ये दोनों दहराकाश को ही ब्रह्मलोक सिद्ध कर रहे हैं, भाष्यकार का यही कहना है—"इतश्च परमेश्वर एव दहरो यस्माद् दहरवाक्यशेषे परमेश्वरस्यैव प्रतिपादकौ गतिशब्दौ भवतः" इस भाष्य के द्वारा सूत्रस्थ गति (ब्रह्मलोक प्राप्ति) और शब्द ('ब्रह्मलोक' शब्द) की व्याख्या की गई, अब 'तथा हि दृष्टम्'—इसकी व्याख्या की जाती है—"तथा ह्याहरहर्जीवानां सुषुप्त्यवस्थायां ब्रह्मविषयं गमनं दृष्टम्"। अर्थात् लोक और वेद में वैसा ही देखा जाता है। यद्यपि सुषुप्त जीव की ब्रह्मरूपता में लौकिक कोई प्रमाणान्तर उपलब्ध नहीं, तथापि वैदिक प्रसिद्धि की स्थापना में कहा जाता है कि यह वैदिक प्रसिद्ध है कि लोक में भी वैसा ही माना जाता है। जैसा अन्य श्रुतियों और लोक में प्रसिद्ध है, वैसा ही यह 'ब्रह्मलोक' शब्द भी दहराकाश के लिए प्रयुक्त होकर उसकी जीवरूपता का निराकरण करता है। सूत्र के 'लिङ्गं च'—इस शब्द की व्याख्या आक्षेपपूर्वक प्रस्तुत की जा रही है—"ननु कमलासनलोकमपि ब्रह्मलोकशब्दो गमयेत्।" इस आक्षेप का परिहार किया जाता है—"गमयेद् यदि ब्रह्मणो लोक इति षष्ठीसमासवृत्त्या व्युत्पाद्येत"। 'स्थपतिर्निषादः स्याच्छब्दसामर्थ्यात्' (जै. सू. ६।१।५१) इस सूत्र में यह स्थिर किया गया है कि 'निषादानां स्थपतिः'—इस प्रकार षष्ठी-तत्पुरुष की अपेक्षा

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३५९

तु व्युत्पाद्यमानो ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोक इति परमेव ब्रह्म गमयिष्यति। एवमेव चाहरह- र्ब्रह्मलोकगमनं दृष्टं ब्रह्मलोकशब्दस्य सामानाधिकरण्यवृत्तिपरिग्रहे लिङ्गम्। न ह्यहरह- रिमाः प्रजाः कार्यब्रह्मलोकं सत्यलोकाख्यं गच्छन्तीति शक्यं कल्पयितुम् ॥ १५ ॥

धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॥ १६ ॥

धृतेश्च हेतोः परमेश्वर एवायं दहरः। कथम्? 'दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः' इति हि प्रकृ- त्याकाशौपम्यपूर्वकं तस्मिन्सर्वसमाधानमुक्त्वा तस्मिन्नेव चात्मशब्दं प्रयुज्यापहतपा- प्मत्वादिगुणयोगं चोपदिश्य तमेवानतिवृत्तप्रकरणं निर्दिशति—'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसंभेदाय' (छा० ८।४।१) इति। तत्र विधृतिरित्यात्मशब्द- सामानाधिकरण्याद्विधारयितोच्यते; किंचः कर्तरि स्मरणात्। यथोदकसंतानस्य विधारयिता लोके सेतुः क्षेत्रसंपदामसंभेदाय, एवमयमात्मैषामध्यात्म्यादिभेदभिन्नानां लोकानां वर्णाश्रमादीनां च विधारयिता सेतुरसंभेदायासंकरायेति। एवमिह प्रकृते दहरे विधारणलक्षणं महिमानं दर्शयति। अयं च महिमा परमेश्वर एव श्रुत्यन्तरादुप- लभ्यते 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः' इत्यादेः। तथान्यत्रापि निश्चिते परमेश्वरवाक्ये श्रूयते 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय' इति। एवं धृतेश्च हेतोः परमेश्वर एवायं दहरः ॥ १६ ॥

भामती

मस्तीति तदप्युक्तं सूत्रकारेण। तथाहि लोकवेदप्रसिद्धाहरहर्ब्रह्मलोकप्राप्त्यभिधानमेव लिङ्गं कमलासन- लोकप्राप्तेर्विपक्षादसम्भवाद्व्यावर्त्तमानं षष्ठीसमासाशङ्कां व्यावर्तयदहराकाशप्राशावेवावतिष्ठते, न च दहराकाशो ब्रह्मणो लोकः, किन्तु तद्ब्रह्मेति। ब्रह्म च तल्लोकश्चेति कर्मधारयः सिद्धो भवति। लोक्यत इति लोकः। हृत्पुण्डरीकस्थः खल्वयं लोक्यते। यत् खलु पुण्डरीकस्थमन्तःकरणं तस्मिन्विशुद्धे प्रत्याहृते- तरकरणानां योगिनां निर्मल इवोदके चन्द्रमसो विम्बमतिस्वच्छं चतन्यं ज्योतिःस्वरूपं ब्रह्मावलोक्यत इति ॥ १५ ॥

सोत्रो धृतिशब्दो भाववचनः। धृतेश्च परमेश्वर एव दहराकाशः। कुतः? अस्य धारणलक्षणस्य महिम्नोऽस्मिन्नेवेश्वर एव श्रुत्यन्तरेषूपलब्धेः। निगदव्याख्यानमस्य भाष्यम् ॥ १६ ॥


भामती-व्याख्या

'निषादश्वासौ स्थपतिः'—इस प्रकार कर्मधारय समास मानना उचित है। 'ब्रह्मलोक' शब्द में भी 'ब्रह्मणः लोको ब्रह्मलोकः'—ऐसा षष्ठी-तत्पुरुष समास न मान कर ब्रह्म च तल्लोकश्च ब्रह्मलोकः'—ऐसा कर्मधारय ही मानना न्याय-संगत है। इसी न्याय का उपोद्वलक लिङ्ग प्रमाण सूत्रकार ने प्रस्तुत किया है कि अहरहर्ब्रह्मलोक-गमन यह सिद्ध कर रहा है कि यहाँ 'ब्रह्मलोक' शब्द से कर्मधारयमूलक ब्रह्मरूप लोक का ग्रहण किया गया है। 'लोक्यत इति लोकः'—इस व्युत्पत्ति के अनुसार ब्रह्म को भी 'लोक' शब्द से अभिहित किया जा सकता है, क्योंकि वह हृत्पुण्डरीक में आलोकित है। हृदय कमल में जो अवस्थित अन्तःकरण है, उसके विशुद्ध हो जाने पर जो लोग बाह्य करणों (इन्द्रियों) को उनके विषय से हटाकर आत्मप्रवण कर लेते हैं, ऐसे योगिजनों के द्वारा निर्मल एवं स्थिर जल में स्वच्छ चन्द्र-प्रतिबिम्ब के समान अपने अन्तःकरण में चैतन्य-ज्योतिस्वरूप ब्रह्म अवलोकित होता है ॥ १५ ॥

'धृतेश्च महिम्नः' इस सूत्र में प्रयुक्त 'धृति' शब्द 'धृञ् धारणे' धातु से 'स्त्रियां क्तिन्' (पा. सू. ३।३।९४) इस सूत्र के द्वारा भावार्थक 'क्तिन्' प्रत्यय करने पर निष्पन्न हुआ है। दहराकाश में द्यु और पृथिव्यादि की धृति (वृत्तिता) दहराकाश को परमेश्वर

३६० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ १ पा. ३ सू. १७

प्रसिद्धेश्च ॥ १७ ॥

इतश्च परमेश्वर एव ‘दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः' इत्युच्यते । यत्कारणमाकाशशब्दः परमेश्वरे प्रसिद्धः । 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता' (छा० ८।१४।१), 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' (छा० १।९।१), इत्यादिप्रयोगदर्शनात् । जीवे तु न क्वचिदाकाशशब्दः प्रयुज्यमानो दृश्यते । भूताकाशस्तु सत्यामप्याकाशशब्दप्रसिद्धावुपमानोपमेयभावाद्यसंभवाच्च ग्रहीतव्य इत्युक्तम् ॥ १७ ॥

भामती न चेयमाकाशशब्दस्य ब्रह्मणि लक्ष्यमाणविभुत्वादिगुणयोगाद् वृत्तिः साम्प्रतिकी । यथा रथाङ्गनामा चक्रवाक इति लक्षणा, किन्त्वत्यन्तनिगूढेति सूत्रार्थः । ये त्वाकाशशब्दो ब्रह्मण्यपि मुख्य एव नभोवदित्याचक्षते, तैरन्यायश्चानेकार्थत्वमिति चानन्यलभ्यः शब्दार्थ इति च मीमांसकानां मुद्राभेदः कृतः । लभ्यते ह्याकाशशब्दाद्विभुत्वादिगुणयोगेनापि ब्रह्म । न च ब्रह्मण्येव मुख्यो नभसि तु तेनैव गुणयोगेन वर्त्स्यतीति वाच्यम् । लोकाधीनावधारणत्वेन शब्दार्थसम्बन्धस्य वैदिकपदार्थप्रत्ययस्य तत्पूर्वकत्वात् । ननु 'यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः' इति व्यतिरेकनिर्देशान्न लक्षणा युक्ता । न हि

भामती-व्याख्या सिद्ध कर रही है, क्योंकि विश्व की धृति परमेश्वर में ही प्रतिपादित है—"एतस्य वा प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः" (बृह. उ. ३।८।७) । शेष भाष्य अत्यन्त सुगम है ॥१६॥

सूत्रकार ने जो 'आकाश' शब्द की प्रसिद्धि ब्रह्म में बताई है, वहाँ 'प्रसिद्धि' शब्द का अर्थ लक्षणा है। लक्षणा भी दो प्रकार की होती है—(१) साम्प्रतिकी और (२) निरूढ़ लक्षणा। जैसे 'रथाङ्ग' शब्द की चक्रवाक पक्षी में लक्ष्यमाण 'चक्र' शब्द से अविनाभूत चक्रवाक शब्द के योग से साम्प्रतिकी (आधुनिक) लक्षणा होती है, वैसे ही 'आकाश' शब्द की स्वाभिधेय आकाशगत विभुत्व गुण के योग से ब्रह्म में आधुनिक लक्षणा नहीं, अपितु अनादि तात्पर्यावगाहिनी निरूढ लक्षणा मानी जाती है।

जिन आचार्यों का कहना है कि 'आकाश' पद की नभ में जैसे मुख्य (अभिधा) वृत्ति होती है, वैसे ही ब्रह्म में भी मानी जाती है। वे आचार्य मीमांसकों की इन अनुल्लङ्घनीय मर्यादाओं का स्पष्ट उल्लङ्घन कर डालते हैं कि 'अन्यायश्चानेकार्थत्वम्' (अनेक अर्थों में एक शब्द की मुख्य वृत्ति मानना अनुचित है) और "अनन्यलभ्यः शब्दार्थः" [शाबर भा. पृ. ९२ पर भाष्यकार ने कहा है कि जो अर्थ लक्षणादि अन्य वृत्तियों से लब्ध हो जाता है, उस अर्थ में अभिधा वृत्ति नहीं मानी जाती]। आकाश की लक्षणा वृत्ति से ब्रह्म का बोध हो जाता है, क्योंकि लक्षणा का नियामक आकाशवृत्तिविभुत्ववत्स्वरूप शक्य-सम्बन्ध ब्रह्म में विद्यमान है, अतः ब्रह्म में 'आकाश' पद की अभिधा वृत्ति मानने की आवश्यकता नहीं। 'आकाश' पद की ब्रह्म में ही मुख्य वृत्ति और नभ में ब्रह्मवृत्ति विभुत्व गुण के योग से लक्षणा वृत्ति क्यों न मान ली जाय ? इस प्रश्न का भी मण्डन मिश्र के शब्दों में इस प्रकार है—"लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः (ब्र. सि. पृ. ) । लोक-व्यवहार में 'आकाश' शब्द कभी भी ब्रह्म का अभिधायक नहीं माना जाता, अतः 'आकाश' शब्द की मुख्य वृत्ति ब्रह्म में क्योंकर बनेगी ?

शङ्का—'गङ्गायां घोषः'—इत्यादि स्थलों पर गङ्गा और तट पदार्थ का 'गङ्गा इव गङ्गा'—इस प्रकार सादृश्यमूलक भेद निर्दिष्ट न होने के कारण 'गङ्गा' पद की तट में लक्षणा हो जाती है, किन्तु दहराकाश में आकाश का भेदमूलक सादृश्य दिखाया गया है—"यावान् वाऽयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः"। अतः दहराकाशरूप ब्रह्म में आकाश का व्यतिरेक

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६१

इतरपरामर्शात्स इति चेन्नासंभवात् ॥ १८ ॥

यदि वाक्यशेषबलेन दहर इति परमेश्वरः परिगृह्येतास्तीतरस्यापि जीवस्य वाक्यशेषे परामर्शः—'अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाच' (छा० ८।३।४) इति । अत्र हि संप्रसादशब्दः श्रुत्यन्तरे सुषुप्तावस्थायां दृष्टत्वात्तदवस्थावन्तं जीवं शक्नोत्युपस्थापयितुं नार्था-

भामती

भवति गङ्गायाः कूले विवक्षिते गङ्गायां घोषेति प्रयोगः । तत्किमिदानीं पौर्णमास्यां पौर्णमास्या यजेतामावास्यायाममावास्ययेत्यसाधुर्वैदिकः प्रयोगः ? न च पौर्णमास्यमावास्याशब्दावाग्नेयादिषु मुख्यौ । यच्चोक्तं यत्र शब्दादनधिगतार्थप्रतीतिस्तत्र लक्षणा, यत्र पुनरन्यतोऽर्थे निश्चिते शब्दप्रयोगस्तत्र वाचकत्वमेवेति । तदयुक्तम्, उभयस्यापि व्यभिचारात्- सोमेन यजेतेति शब्दादर्थः प्रतीयते, न चात्र कस्यचिल्लाक्षणिकत्वमृते वाक्यार्थात् । न च 'य एवं विद्वान् पौर्णमासीं यजते य एवं विद्वानमावास्याम्' इत्यत्र पौर्णमास्यमावास्याशब्दौ न लाक्षणिकौ । तस्मात्कौकचिदेतदिति ॥ १७ ॥

सम्यक् प्रसीदत्यस्मिन् जीवो विषयेन्द्रियसंयोगजनितं कालुष्यं जहातीति सुषुप्तिः । सम्प्रसादो जीवस्यावस्थाभेदः, न ब्रह्मणः । तथा शरीरात्समुत्थानमपि शरीराश्रयस्य जीवस्य, न त्वनाश्रयस्य ब्रह्मणः । तस्माद्यथा पूर्वोक्तैर्वाक्यशेषगतैर्लिङ्गैर्ब्रह्मावगम्यते दहराकाशः, एवं वाक्यशेषगताभ्यामेव सम्प्र-

भामती-व्याख्या

( भेद ) प्रदर्शित हो जाने से ब्रह्म में 'आकाश' पद की लक्षणा कैसे हो सकेगी ?

समाधान—'सर्वत्र लक्षणा-स्थल पर लक्ष्यार्थ का पृथक् निर्देश नहीं होना चाहिए'—ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि "दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत"—यहाँ पर एक 'आग्नेय' और दो 'ऐन्द्र'- इन तीन यागों के लिए 'दर्श' पद और आग्नेय, उपांशु एवं अग्नीषोमीय—इन तीन कर्मों के लिए 'पूर्णमास' शब्द लक्षणा वृत्ति से प्रयुक्त है । "अमावास्यायाममावस्यया यजेत" (आप. प. २।१९) और "पौर्णमास्यां पौर्णमास्या यजेत"—यहाँ पर 'अमावास्या' पद की अमावास्या काल-सम्बन्ध और 'पौर्णमास' पद की पौर्णमास काल-सम्बन्ध में जो लक्षणा की जाती है, वह उपपन्न न हो सकेगी, क्योंकि अमावास्या और पौर्णमासी शब्दों के द्वारा उक्त काल-सम्बन्ध पृथक् निर्दिष्ट है । फलतः 'आकाश' पद की ब्रह्म में लक्षणा वृत्ति का कोई बाधक सम्भव नहीं ।

यह जो कहा जाता है कि जहाँ पर शब्द के द्वारा अनधिगत अर्थ की प्रतीति होती है, वहाँ लक्षणा और जहाँ अन्य प्रमाण से अवगत अर्थ में शब्द का प्रयोग होता है, वहाँ वाचकता ( मुख्य वृत्ति ) होती है । वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि उक्त दोनों नियमों में व्यभिचार उपलब्ध होता है—"सोमेन यजेत" (तै. सं. ३।२।२) इत्यादि स्थलों पर सोमलतारूप अनधिगत अर्थ की प्रतीति होने पर भी किसी पद को लाक्षणिक नहीं माना जाता, केवल वाक्यार्थ ही लक्ष्यमाण होता है । "य एवंविद्वान् पौर्णमासीं यजते, य एवंविद्वानमावास्यां यजते" ( तै. सं. १।६।६।१ ) इत्यादि स्थलों पर "यदाग्नेयोऽष्टाकपालः" ( तै. सं. २।६।३।३ ) इत्यादि वाक्यों के द्वारा अधिगत आग्नेयादि कर्मों में भी लक्षणा ही मानी जाती है, वाच्यता या मुख्य वृत्ति नहीं ॥ १७ ॥

'सम्यक् प्रसीदत्यस्मिन् जीवः'—ऐसी व्युत्पत्ति के द्वारा 'सम्प्रसाद' शब्द जीव की ही सुषुप्ति अवस्था का वाचक है, ब्रह्म की नहीं । शरीर से समुत्थान ( विवेकज्ञान ) भी जीव को ही होता है, अनाश्रयभूत ब्रह्म का नहीं । अतः जैसे पूर्वोक्त वाक्यशेषों के द्वारा दहराकाश की ब्रह्मरूपता अवगत होती है, वैसे ही वाक्यशेषावगत सम्प्रसाद और समुत्थान के द्वारा

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३६२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. १९

न्तरम्। तथा शरीरव्यपाश्रयस्यैव जीवस्य शरीरात्समुत्थानं संभवति। यथाकाशव्यपा- श्रयाणां वाय्वादीनामाकाशात्समुत्थानं, तद्वत्। यथा चादृष्टोऽपि लोके परमेश्वरविषय आकाशशब्दः परमेश्वरधर्मसमभिव्याहारात् 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता' इत्येवमादौ परमेश्वरविषयोऽभ्युपगतः, एवं जीवविषयोऽपि भविष्यति। तस्मादितर- परामर्शात् 'दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश' इत्यत्र स एव जीव उच्यत इति चेत्, नैतदेवं स्यात्; कस्मात्? असंभवात्। नहि जीवो बुद्ध्याद्युपाधिपरिच्छेदाभिमानी सन्नाका- शेनोपमीयेत। नचोपाधिधर्मानभिमन्यमानस्यापहतपाप्मत्वादयो धर्माः संभवन्ति। प्रपञ्चितं चतत्प्रथमसूत्रे। अतिरेकाशङ्कापरिहारायात्र तु पुनरुपन्यस्तम्। पठिष्यति चोपरिष्टात् 'अन्यार्थश्च परामर्शः' (ब्र० १।३।२०) इति ॥ १८ ॥

उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १९ ॥

इतरपरामर्शाद्या जीवाशङ्का जाता साऽसंभवान्निराकृता। अथेदानीं मृतस्येवामृतसेकात्पुनः समुत्थानं जीवाशङ्कायाः क्रियते—उत्तरस्मात्प्राजापत्याद्वा- क्यात्। तत्र हि 'य आत्माऽपहतपाप्मा' इत्यपहतपाप्मत्वादिगुणकमात्मानमन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं च प्रतिज्ञाय 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा' (छा० ८।७।४)


भामती

सादसमुत्थानाभ्यां दहराकाशो जीवः कस्मान्नावगम्यते? तस्मान्नास्ति विनिगमनेति शङ्कार्थः। ॥ नासंभ- वात् ॥। सम्प्रसादसमुत्थानाभ्यां हि जीवपरामर्शो न जीवपरः, किन्तु तदीयतात्त्विकरूपब्रह्मभावपरः। तथा चैष परामर्शो ब्रह्मण एवेति न सम्प्रसावसमुत्थाने जीवलिङ्गम्, अपि तु ब्रह्मण एव तादर्थ्यादित्यग्रे वक्ष्यते। आकाशोपमानावयस्तु ब्रह्मण्यव्यभिचारिन्नश्च ब्रह्मपराश्चेत्यस्ति विनिगमनेत्यर्थः ॥ १८ ॥

दहराकाशमेव प्रकृत्योपाख्यायते – यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् तमात्मानं विविदिषन्तौ सुरासुरराजाविन्द्रविरोचनौ समित्पाणी प्रजापतिं परिवसितुमाजग्मतुः। आगत्य च द्वात्रिंशतं वर्षाणि तत्परिचरणपरौ ब्रह्मचर्य्यमूषतुः। अथैतौ प्रजापतिरुवाच—किं कामाविहस्थौ युवा- मिति। तावूचतुः—य आत्माऽपहतपाप्मा तमावां विविदिषाव इति। ततः प्रजापतिरुवाच—य एषोऽक्षणि


भामती-व्याख्या

दहराकाश की जीवरूपता ज्ञात होती है। किसी एक पक्ष को सिद्ध करनेवाली विनिगमक युक्ति उपलब्ध नहीं—यह सूत्र में प्रदर्शित शङ्का का अर्थ है।

उक्त शङ्का का निरास करते हुए सूत्रकार ने कहा है—"न, असम्भवात्"। इसका आशय यह है कि सम्प्रसाद और समुत्थान के द्वारा जो जीव का परामर्श किया जाता है, वह उसके सोपाधिक स्वरूप का बोध कराने के लिए नहीं, अपितु उसकी तात्त्विक ब्रह्मरूपता का ज्ञान कराने के लिए ही है। फलतः सम्प्रसाद और समुत्थान का निर्देश ब्रह्मपरक ही है, क्योंकि ब्रह्म की अवगति में ही उसका पर्यवसान है—यह आगे कहा जायगा। आकाशोपमादि का निर्देश दहराकाश की ब्रह्मरूपता में विनिगमक है ॥ १८ ॥

दहराकाश के प्रकरण में ही कहा गया है —"यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् तमात्मानं विविदिषन्तौ सुरासुरराजौ इन्द्रविरोचनौ समित्पाणी प्रजापतिं परिवसितुमाजग्मतुः" (छां. ८।७।२) अर्थात् जिस आत्मा के ज्ञान से सभी लोकों और सभी कामों (फलों) की प्राप्ति होती है, उस आत्मा की विविदिषा से सुरराज इन्द्र और असुरराज विरोचन दोनों अपने हाथों में समिधादि उपहार लेकर प्रजापति की सेवा में पहुँचे। प्रजापति के चरणों में बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते रहे। एक दिन प्रजापति ने पूछ लिया कि आपलोग किस कामना से यहाँ हमारी सेवा कर रहे हैं? तब वे दोनों बोले कि जो आत्मा समस्त पापों से विनिर्मुक्त है, उसको हम जानना चाहते हैं। प्रजापति ने उत्तर में

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६३

भामती

पुरुषो दृश्यते एष आत्माऽपहतपाप्मत्वादिगुणः, यद्विज्ञानात्सर्वलोककामावाप्तिः। एतदमृतमभयम् । अथैतच्छ्रुत्वैतावप्रक्षीणकल्मषावरणतया छायापुरुषं जगृहतुः । प्रजापतिञ्च पप्रच्छतुः—अथ योऽयं भगवोऽप्सु दृश्यते यथादर्शं यश्च खङ्गादौ कतम एतेष्वसावथ बैक एव सर्वेष्विति ? तमेतयोः श्रुत्वा प्रश्नं प्रजापतिर्बन्ताहो सुदूरमृवृद्धान्तावेतो, अस्माभिरक्षिस्यान आत्मोपदिष्टः, एतो च छायापुरुषं प्रतिपन्नौ, तद्यदि वयं भ्रान्तौ स्थ इति ब्रूमस्ततः स्वात्मनि समारोपितपाण्डित्यबहुमानौ विमानितौ सन्तौ दौर्मनस्येन यथावदुपदेशं न गृह्णीयाताम् , इत्यनयोराशयमनुरुध्य यथार्थं ग्राहयिष्याम इत्यभिसन्धिमान् प्रत्युवाच । उदशरावे आत्मानमवेक्षेयाम्स्मिन्द्यत्पश्यथस्तद्ब्रूतमिति । तौ च दृष्ट्वा सन्तुष्टहृदयौ नाब्रूताम् । अथ प्रजापतिरेतौ विपरीतग्राहिणौ मा भूतामित्याशयवान्प्रच्छ— किमत्रापश्यतमिति । तौ होचतुः । यथैवावामतिचिरब्रह्मचर्यचरणसमुपजातायतनखलोमादिमन्तावेवमावयोः प्रतिरूपकं नखलोमादिमदुदशरावेऽपश्यावेति । पुनरेतयोश्छायात्मविभ्रममपनिनोषुर्यथैव हि छायापुरुष उपजनापायधर्मा भेदेनावगम्यमान आत्मलक्षणबिरहान्नात्मैवेबमेवेदं शरीरं नात्मा, किन्तु ततो भिन्नमित्यन्वयव्यतिरेकाभ्यामेतौ जानीयातामित्याशयवान् प्रजापतिरुवाच । साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वा पुनरुदशरावे पश्यतमात्मानम्, यच्चात्र पश्यथस्तद् ब्रूतमिति । तौ च साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ छिन्ननखलोमानौ भूत्वा तथैव चक्रतुः ।

भामती-व्याख्या

कहा—" 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' अर्थात् यह जो आँख में प्रतिबिम्ब पुरुष दिखाई देता है, यह वह निष्पाप आत्मा है, जिसके ज्ञान से सभी लोकों की प्राप्ति होती है, यह अमृत और अभय पद है । प्रजापति के उस उपदेश के अनुसार इन्द्र और विरोचन दोनों ने उस छायापुरुष को आत्मा मान लिया और प्रजापति से फिर पूछा कि 'भगवन् यह जो जल में, आदर्श (दर्पण) में और जो खङ्गादि स्वच्छ पदार्थों में छायापुरुष दिखाई देता है, इन सबमें कोई एक ही वह आत्मा है ? अथवा सभी में एक ही है ?' उन दोनों के इस प्रश्न को सुनकर प्रजापति ने अपने मन में कहा कि बड़े खेद की बात है कि ये दोनों भ्रम मे पड़ कर लक्ष्य से दूर चले गये । हमने अक्षिरूप उपाधि के माध्यम से आत्मा का उपदेश किया था, किन्तु ये लोग तो छाया पुरुष को ही आत्मा मान बैठे । अब इनको हम यदि यह कहते हैं कि आपलोग भ्रान्त हो गए । तब इन लोगों ने जो अपने में पाण्डित्य और बहुमान का आरोप ( अभिमान ) पर रखा है, उसको ठेस पहुँचती है और हममें दौर्मनस्य ( हीन भावना या अश्रद्धा ) उत्पन्न हो जाने के कारण ये हमारा कोई भी उपदेश न सुनेंगे । अतः इनके आशय के अनुरूप ही यथार्थ लक्ष्य का ग्रहण कराएँगे । ऐसा गुप्त भाव मन में रख कर प्रजापति ने उनको सुनाकर कहा—आप लोग जल से भरे प्याले में आत्मा को देखें, वहाँ क्या दिखाई देता है ? कहिए । उन दोनों ने जल में जो देखा, उसमें ही सन्तुष्ट थे, अतः वे कुछ नहीं बोले । प्रजापति ने सोचा कि कहीं ये कुछ विपरीत ही न समझ बैठें, अतः पूछा—जल में क्या देखा ? उत्तर में वे दोनों बोले—जैसे हम लोग बहुत समय तक ब्रह्मचर्य व्रत पालन करते-करते बड़े-बड़े नख और बालों वाले हो गए हैं, वैसा ही जल में प्रतिबिम्ब देख रहे हैं । प्रजापति ने पुनः छाया में आत्मत्व-भ्रम को दूर करने की इच्छा से मन में सोचा कि जैसे छायापुरुष उत्पत्ति-विनाशशाली धर्मों के भेद से भिन्न प्रतीयमान होने के कारण आत्मा नहीं, वैसे ही यह शरीर भी आत्मा नहीं, अपितु उससे भिन्न है—इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा ये (इन्द्र और विरोचन) दोनों वास्तविक आत्मा को जान लें—ऐसी शुभाशंसा मन में रख कर प्रजापति ने कहा—यदि कोई दो यत्न पुरुष बढ़े नख और लोमादि कटा कर अपने को बहुमूल्य अलङ्कारों से अलंकृत एवं सज-ध दर्पण के सामने खड़े होकर अपना प्रतिबिम्ब देखें, तो वे क्या देखेंगे ? इसका उत्तर उन दोनों

३६४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. १९

इति ब्रुवन्नक्षिस्थं द्रष्टारं जीवमात्मानं निर्दिशति । 'एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि' ( छा० ८।९।३ ) इति च तमेव पुनः पुनः परामृश्य 'य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मा' ( छा० ८।१०।१ ) इति 'तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मा' ( छा० ८।६।३ ) इति च जीवमेवावस्थान्तरगतं व्याचष्टे । तस्यैव चापहतपा-

भामती

पुनश्च प्रजापतिना पृष्टौ तामेव छायामात्मान ऊचतुः । तदुपश्रुत्य प्रजापतिरहो बताद्यापि न प्रशान्त- एनयोर्विभ्रमः, तद्यथाभिमतमेवात्मतत्त्वं कथयामि तावत् । कालेन कल्मषे क्षीणेऽस्मद्वचनसन्दर्भपौर्वा- पर्यालोचनयाऽऽत्मतत्त्वं प्रतिपत्स्येते स्वयमेवेति मत्वोवाच — एष आत्मेतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति । तयो- विरोचनो देहानुपातित्वाच्छायाया देह एवात्मतत्त्वमिति मत्वा निजसदनमागत्य तथैवासुरानुपदिदेश । देवेन्द्रस्त्वप्राप्तनिजसदनोऽध्वन्येव किञ्चिद्विरलकल्मषतया छायात्मनि शरीरगुणदोषानुविधायिनि तं तं दोषं परिभावयन् नाहमत्र छायात्मदर्शने भोग्यं पश्यामीति प्रजापतिसमीपं समित्पाणिः पुनरेवेयाय । आगतश्च प्रजापतिनाऽऽगमनकारणं पृष्टः पथि परिभावितं जगाद । प्रजापतिस्तु सुव्याख्यातमप्यात्मतत्त्व- मक्षीणकल्मषावरणतया नाग्रहीस्तत् पुनरपि तत्क्षयाय चरापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमथ प्रक्षीणकल्मषाय ते अहमेतमेवात्मानं भूयोऽनुव्याख्यास्यामीत्यवोचत् । स च तथा चरितब्रह्मचर्यः सुरेन्द्रः प्रजापतिमुपससाद । उपसन्नाय चास्मै प्रजापतिर्व्याचष्टे, य आत्माऽपहतपाप्मादिलक्षणोऽक्षिणि दर्शितः

भामती-व्याख्या

ने दिया कि भली-भाँति परिष्कृत और अलंकृत व्यक्ति अपना प्रतिबिम्ब भी वैसा ही देखेंगे । उस उत्तर को सुन कर प्रजापति ने अपने मन में कहा कि बड़े खेद का विषय है कि अभी भी इन दोनों का भ्रम दूर नहीं हुआ, अतः फिर प्रयत्न करना चाहिए कि अभिमत आत्मतत्त्व को जान लें। इनका कल्मष ( ज्ञान-प्रतिबन्धक पाप ) निवृत्त होने पर स्वयं ही हमारे उपदेश के पूर्वापर सन्दर्भ की आलोचना कर आत्मज्ञान प्राप्त कर लेंगे—ऐसा सोच कर प्रजापति ने कहा—"एष आत्मा, एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति' । इस उपदेश को दोनों ने सुना । उनमें से विरोचन ने छाया में देह का अनुवर्तन देख कर देह को ही आत्मतत्त्व मान लिया और अपने घर लौट कर अपनी असुर प्रजा को वैसा ही उपदेश दिया किन्तु देवराज इन्द्र का अपने घर पहुँचने से पहले मार्ग में ही प्रजापति के उपदेश की अनुचिन्तना करते-करते कुछ अन्तःकालुष्य क्षीण हो गया, उसने छायात्मा में शरीर के गुण-दोषों का अनुविधान देखा और उस पक्ष में दोषों की उद्भावना प्रबल हो गई और अन्तःप्रेरणा हुई कि छायापुरुष का पक्ष कल्याणप्रद नहीं, अतः पुनः प्रजापति की सेवा में समित्पाणि होकर इन्द्र उपस्थित हो गया । प्रजापति के द्वारा पुनः आगमन का कारण पूछे जाने पर इन्द्र ने मार्ग में अपनी समस्त उधेड़- बुन की पूरी गाथा कह सुनाई । प्रजापति ने कहा कि आपका ज्ञान-प्रतिबन्धकीभूत अन्तः कालुष्य निवृत्त न होने के कारण आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके, अतः उस पाप का क्षय करने के लिए फिर और बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करें । प्रतिबन्धकीभूत पाप की निवृत्ति हो जाने पर पुनः आत्मतत्त्व का उपदेश करेंगे । इन्द्र ने वैसा ही किया । प्रजापति ने अपनी शरण में आए हुए इन्द्र को उपदेश दिया कि 'जो निष्पापादिरूप परमात्मा नेत्र में दिखाया था, वही स्वप्न में अपने विस्तृत पुत्र, पौत्र और स्त्री के साथ स्वप्नोचित भोग भोगता हुआ विहरण करता है ।' प्रजापति के द्वारा निर्दिष्ट स्वप्न-पुरुष को भी आत्मा समझने में इन्द्र को भय बना रहा । यद्यपि यह ( स्वप्नपुरूष ) छायापुरुष के समान शरीर के धर्मों का अनुवर्तन नहीं करता, तथापि शोक-भयादि विविध बाधाओं से वह भी उन्मुक्त नहीं— ऐसा इन्द्र के कहने पर प्रजापति ने कहा—यदि अब भी आप को ज्ञान नहीं हुआ, तब और

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६५

भामती

सोऽयं य एष स्वप्ने महीयमानो वनितादिभिरनेकधा स्वप्नोपभोगान् भुञ्जानो विहरतीति । अस्मिन्नपि देवेन्द्रो भयं ददर्श । यद्यप्ययं छायापुरुषवन्न शरीरधर्माननुपतति, तथापि शोकभयादिविविधबाधानुभवान्न तत्राप्यस्ति स्वस्तिप्राप्तिरित्युक्तवति मघवति पुनरपराणि चर द्वात्रिंशतं वर्षाणि स्वच्छं ब्रह्मचर्यमिदानीमप्यक्षीणकल्मषोऽसीत्यूचे प्रजापतिः । अथास्मिन्नेवङ्कारमुपसन्ने मघवति प्रजापतिरुवाच—य एष आत्माऽपहतपाप्मादिगुणो दर्शितोऽक्षिणि च स्वप्ने च स एष यो विषयेन्द्रियसंप्रयोगविरहात्प्रसन्नः सुषुप्तावस्थायामिति । अत्रापि नेन्द्रो निर्ववार । यथा हि जाग्रद्वा स्वप्नगतो वाऽयमहमस्मीति इमानि भूतानि चेति विजानाति नैवं सुषुप्तः किञ्चिदपि वेदयते तदा खल्वयमचेतयमानोऽभावं प्राप्त इव भवति । तदिह का निर्वृत्तिरिति । एवमुक्तवति मघवति वताद्यापि न ते कल्मषक्षयोऽभूत् । तत् पुनरपराणि चर पञ्च वर्षाणि ब्रह्मचर्यमित्यवोचत्प्रजापतिः । तदेवमस्य मघोनस्त्रिभिः पर्यायैर्व्यतीताः षण्णवतिर्वर्षाणि । चतुर्थे च पर्याये पञ्च वर्षाणीत्येकोत्तरं शतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यं चरतः सहस्राक्षस्य सम्पदिरे । अथास्मै ब्रह्मचर्यसंपदुन्मृदितकल्मषाय मघवते य एषोऽक्षणि यश्च स्वप्ने यश्च सुषुप्तावनुस्यूत एष आत्माऽपहतपाप्मादिगुणो दर्शितः तमेव मघवन् मर्त्यं वै शरीरमित्यादिना विस्पष्टं व्याचष्ट प्रजापतिः ।

अयमस्याभिसन्धिः—यावत् किञ्चित् सुखं दुःखमागमपायि तत् सर्वं शरीरेन्द्रियान्तःकरणसम्बन्धि, न त्वात्मनः । स पुनरेतानेव शरीरादीन् अनाद्यविद्यावासनावशादात्मत्वेनाभिप्रतीतस्तद्गतेन सुखदुःखेन तद्वन्तमात्मानमनुमन्यमानोऽनुतप्यते । तदा स्वयमपहतपाप्मादिलक्षणमुदासीनमात्मानं देहादिभ्यो विविक्तमनुभवति, अथास्य शरीरवतोऽप्यशरीरस्य न देहादिधर्मसुखदुःखप्रसङ्गोऽस्तीति नानु तप्यते,

भामती-व्याख्या

बत्तीस वर्ष का ब्रह्मचर्य-वास धारण करें, क्योंकि आपके अन्तस्तल का मल और विक्षेप अभी तक निवृत्त नहीं हुआ है। इन्द्र ने वैसा ही किया। विधिवत् उपसन्न (शरणागत) इन्द्र को प्रजापति ने उपदेश दिया कि जो अपहतपाप्मत्वादि गुणों से युक्त आत्मा आँख (जाग्रत् अवस्था) में और स्वप्न अवस्था में प्रदर्शित किया गया, वही यह आत्मा सुषुप्ति अवस्था में विषय और इन्द्रियों के सम्बन्ध से रहित हो जाने के कारण सुप्रसन्न हो जाता है। सुषुप्ति अवस्था की इस साधारण जन-सुलभ अनुभूति से भी इन्द्र को निर्वृत्ति (सुख-शान्ति) नहीं हुई। उसने कहा—'जैसे जाग्रत् और स्वप्न अवस्था में 'अहमस्मि' एवं 'इमानि भूतानि'—ऐसी अनुभूति होती है, सुषुप्ति अवस्था में तो वह भी अनुभूति नहीं होती, क्योंकि इस अवस्था में पुरुष खो जाता विलुप्त-सा हो जाता है, तब यहाँ क्या सुख-शान्ति है?' ऐसा सुनकर प्रजापति ने कहा कि 'महान् खेद है कि अभी भी आपका कल्मष (पाप) समाप्त नहीं हुआ, अतः और पाँच वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत धारण करें। इस प्रकार पहले तीन पर्यायों में इन्द्र के ३२ × ३ = ९६ छान्नवे वर्ष बीत चुके थे, चौथे पर्याय में पाँच वर्ष, सब मिला कर एक सौ एक वर्ष हो गए। तब जाकर उसके सकल कल्मष (प्रतिबन्धक पाप) प्रक्षीण हुए, प्रजापति का उपदेशामृत पान किया—'जो आत्मा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति में अपहतपाप्मत्वादि गुणों से युक्त सर्वत्र अनुस्यूत प्रतीत होता है, हे इन्द्र! "मर्त्यं वा इदं शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति, अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः" (छां. ८।१२।१)। तात्पर्य यह है कि जो कुछ भी सुख और दुःख आगमपायी (आने-जानेवाला विनश्वर) है, वह सब शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण से ही सम्बन्धित है, आत्मा से नहीं। वह आत्मा अनादि अविद्या-वासनाओं के आधार पर शरीरादि अनात्म पदार्थों को अपना ही स्वरूप मान कर शरीरादि के सुख-दुःखों को अपना ही सुख-दुःख मान कर सन्तप्त होता रहता है। वही आत्मा जब अपने को अपहतपाप्मत्वादि-स्वरूप उदासीन (तटस्थ) और देहादि से असङ्ग अनुभव

३६६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. १९

प्मत्वादि दर्शयति—‘एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म’ इति। नाह खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि’ ( छा० ८।११।१, २) इति च सुषुप्तावस्थायां दोषमुपलभ्य ‘एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्मात्’ इति चोपक्रम्य, शरीरसम्बन्धनिन्दापूर्वकं ‘एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः’ इति जीवमेव शरीरात्समुत्थितमुत्तमपुरुषं दर्शयति। तस्मादस्ति संभवो जीवे पारमेश्वराणां धर्माणां। अतः ‘दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः’ इति जीव एवोक्त इति चेत्कश्चिद् ब्रूयात्। तं प्रति ब्रूयात् ‘आविर्भूतस्वरूपस्तु’ इति।

भामती

केवलमयं निजे चैतन्यान्दघने रूपे व्यवस्थितः समस्तलोककामान् प्राप्तो भवति। एतस्यैव हि परमानन्दस्य मात्राः सर्वे कामाः, दुःखं त्वविद्यानिर्माणमिति न विद्वानाप्नोति। अशीलितोपनिषदां व्यामोह इव जायते, तेषामनुग्रहायेदमुपाख्यानमवर्तयम् ॥ एवं व्यवस्थित उत्तराद्वाक्यसन्दर्भात् प्राजापत्यादक्षणि च स्वप्ने च सुषुप्ते च चतुर्थे च पर्याये एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरादुत्थायेति जीवात्मैवापहतपाप्माविगुणः श्रुत्योच्यते। नो खलु परस्याक्षिस्यानं सम्भवति, नापि स्वप्नाद्यवस्थायोगः, नापि शरीरात् समुत्थानम्। तस्माद्यस्यैतत् सर्वं सोऽपहतपाप्मादिगुणः श्रुत्योक्तः। जीवस्य चैतत् सर्वमिति स एवापहतपाप्मादिगुणः श्रुत्योक्त इति नापहतपाप्मादिभिः परं ब्रह्म गम्यते। ननु जीवस्यापहतपाप्मत्वादयो न सम्भवन्तीत्युक्तम्। वचनाद्भविष्यन्ति। किमिव वचनं न कुर्यात् ? नास्ति वचनस्यातिभारः। न च मानान्तरविरोधः। नहि जीवः पाप्मादिस्वभावः, किन्तु वाग्बुद्धिशरीरारम्भसम्भवोऽस्य पाप्मादिः शरीराद्ध्यभावे न भवति धूम इव धूमध्वजाभाव इति शङ्कार्थः।

भामती-व्याख्या

करता है, वह शरीर रहते हुए भी अशरीर होकर देहादि के सुख-दुःखों से रहित और विविक्त मानता और सन्ताप से उन्मुक्त हो जाता है। वह अपने विशुद्ध चैतन्यान्द स्वरूप में व्यवस्थित होकर समस्त लोकों और फलों को पा लेता है। इस परमानन्दघन की ही सुख-कणिकाएँ निखिल कर्मों और उपासनाओं से जनित फलों में उपलब्ध होती है। दुःख अविद्या का कार्य होने के कारण विद्वान् पुरुष का स्पर्श नहीं कर सकता।

अशीलितोपनिषदां व्यामोह इह जायते ।
तेषामनुग्रहायैदमुपाख्यानमवर्तयम् ॥

'श्रुत्युक्त इन्द्र, विरोचनादि का उपाख्यान सरल शब्दों में इस लिए हम (वाचस्पति मिश्र) ने कह दिया है कि जो लोग उपनिषत् ग्रन्थों का समुचित अनुशीलन नहीं कर पाते, उन्हें कई स्थलों पर व्यामोह (भ्रम) हो जाता है, जिससे वे वास्तविक रहस्य तक नहीं पहुँच पाते।'

पूर्वपक्षी का आशय यह है कि अक्षि, स्वप्न और सुषुप्ति में जिस आत्मतत्त्व का वर्णन कर "एष सम्प्रसादो शरीरात् समुत्थाय'—इत्यादि वाक्यों से जिसकी विशेषताएँ वर्णित की हैं, वह जीवात्मा ही अपहतपाप्मादि गुणोंवाला श्रुति-प्रतिपादित है, परमात्मा नहीं, क्योंकि परमात्मा का न तो अक्षिस्यान हो सकता है, न स्वप्नादि अवस्था से सम्बन्ध और न शरीर से समुत्थान। फलतः अपहतपाप्मत्वादि गुणों के द्वारा परब्रह्म की अवगति नहीं हो सकती। 'जीव में अपहतपाप्मत्वादि गुण समझस क्योंकर होंगे ?' ऐसी शङ्का नहीं कर सकते, क्योंकि श्रुति वचन के द्वारा उसका जीव में सामञ्जस्य हो जायगा। प्रमाण वचन क्या नहीं कर सकता 'नास्ति वचनस्यातिभारः' शब्द की प्रतिपादन और उपपादन की शक्ति असीम है, उसके लिए कुछ असम्भव नहीं। जीव में अपहतपाप्मत्वादि गुणों के प्रतिपादन का कोई प्रमाणान्तर विरोधी भी नहीं, क्योंकि किसी प्रमाण के द्वारा जीव में पाप्मादिस्वभावता सिद्ध

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६७

तुशब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः। नोत्तरस्मादपि वाक्यादिह जीवस्याशङ्का संभवतीत्यर्थः। कस्मात्? यतस्तत्राप्याविर्भूतस्वरूपो जीवो विवक्ष्यते। आविर्भूतं स्वरूपमस्येत्याविर्भूत-स्वरूपः। भूतपूर्वगत्या जीववचनम्। एतदुक्तं भवति - 'य एषोऽक्षिणि' इत्यक्षिलक्षितं द्रष्टारं निर्दिश्योदशरावब्राह्मणेनैनं शरीरात्मताया व्युत्थाप्य 'एतं त्वेव ते' इति पुनःपुनः तमेव व्याख्येयत्वेनाकृष्य स्वप्नसुषुप्तोपन्यासक्रमेण 'परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इति यदस्य पारमार्थिकं स्वरूपं परं ब्रह्म तद्रूपतयैनं जीवं व्याचष्टे, न जैवेन रूपेण। यत्तत्परं ज्योतिरुपसंपत्तव्यं श्रुतं तत्परं ब्रह्म। तच्चापहतपाप्मत्वादि-धर्मकं, तदेव च जीवस्य पारमार्थिकं स्वरूपं 'तत्त्वमसि' इत्यादिशास्त्रेभ्यः, नेतरदुपा-धिकल्पितम्। यावदेव हि स्थाणाविव पुरुषबुद्धिं द्वैतलक्षणामविद्यां निवर्तयन्कूटस्थ-नित्यदृक्स्वरूपमात्मानमहं ब्रह्मास्मीति न प्रतिपद्यते, तावज्जीवस्य जीवत्वम्। यदा तु देहेन्द्रियमनोबुद्धिसंघाताद् व्युत्थाप्य श्रुत्या प्रतिबोध्यते, नासि त्वं देहेन्द्रिय-मनोबुद्धिसंघातः, नासि संसारी, किं तर्हि? तद्यत्सत्यं स आत्मा चैतन्यमात्र-स्वरूपस्तत्त्वमसीति, तदा कूटस्थनित्यदृक्स्वरूपमात्मानं प्रतिबुद्ध्यास्माच्छरीराद्यभि-


भामती

निराकरोति ॐ तं प्रतिब्रूयात् , आविर्भूतस्वरूपस्तु ॐ । अयमभिसन्धिः - पौर्वापर्यपर्यालोच-नया तावदुपनिषदां शुद्धबुद्धमुक्तमेकमप्रपञ्चं ब्रह्म तदतिरिक्तं च सर्वं तद्विवर्तो रज्जोरिव भुजङ्ग इत्यत्र तात्पर्यमवगम्यते। तथा च जीवोऽप्यविद्याकल्पितदेहेन्द्रियाद्युपहितं रूपं ब्रह्मणो न तु स्वाभाविकः। एवं च नापहतपाप्मत्वादयस्तस्मिन्नविद्योपाधौ सम्भविनः। आविर्भूतब्रह्मरूपे तु निरुपाधौ सम्भवन्तो ब्रह्मण एव न जीवस्य। एवञ्च ब्रह्मैवापहतपाप्मादिगुणं श्रुत्युक्तमिति तदेव दहराकाशो न जीव इति। स्यादे-तत् — स्वरूपाविर्भावः चेत् ब्रह्मैव न जीवः, र्तहि विप्रतिषिद्धमिदमभिधीयते, जीव आविर्भूतस्वरूप इष्यत आह ॐ भूतपूर्वगत्या इति ॐ । ॐ उदशरावब्राह्मणेन इति ॐ । यथैव हि मघोनः प्रतिबिम्बान्य उदशराब उपजनापायधर्मकाण्यात्मलक्षणविरहान्नात्मा, एवं देहेन्द्रियाद्यप्युपजनापायधर्मकं नात्मेत्युदशराबदृष्टान्तेन


भामती-व्याख्या

नहीं की गई, पाप्मादि तो जीव के वाक्, बुद्धि और शरीर की क्रियाओं से उत्पन्न होते हैं, शरीरादि का अभाव हो जाने पर पाप्मादि का भी अभाव हो जाता है।

पूर्वपक्ष का निराकरण किया जाता है—"तं प्रति ब्रूयात्, आविर्भूतस्वरूपस्तु"। आशय यह है कि पूर्वापरवाक्यों की आलोचना से उपनिषत् ग्रन्थों का तात्पर्य यही निश्चित होता है कि एकमात्र ब्रह्म शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और निष्प्रपञ्चैकस्वभाव सत्य है। उससे भिन्न समस्त प्रपञ्च ब्रह्म का वैसे ही विवर्त है, जैसे रज्जु का सर्प। जीव भी अविद्या-कल्पित देह, इन्द्रियादि उपाधियों से संवलित ब्रह्म का रूप है, स्वाभाविक नहीं; अतः उस अविद्योपाधिक जीव में अपहतपाप्मत्वादि गुण सम्भव नहीं। जब जीव अविद्या-रहित होकर ब्रह्म के रूप में अविर्भूत हो जाता है, तब वे गुण सम्भावित होकर ब्रह्म के ही कहे जाते हैं, जीव के नहीं। श्रुति ने अपहतपाप्मत्वादि गुण ब्रह्म के ही बताए हैं, अतः ब्रह्म ही दहराकाश है, जीव नहीं।

'आविर्भूतस्वरूपः' का अर्थ है—आविर्भूतं स्वरूपं यस्य, स आविर्भूतस्वरूपः—इस प्रकार अन्य पदार्थ ब्रह्म या परमेश्वर सिद्ध होता है, अतः 'आविर्भूतस्वरूपः परमेश्वरः'—ऐसा कहना था, किन्तु 'आविर्भूतस्वरूपो जीवः'—ऐसा क्यों कहा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"भूतपूर्वगत्या जीववचनम्"। ब्रह्म ही अपनी पूर्व (अविद्यावत्ता की) अवस्था में जीव कहलाता है, अतः ब्रह्म को ही पूर्वावस्थापत्ति के दृष्टिकोण से जीव कह दिया गया है। भाष्यकार ने जो कहा है कि "उदशरावब्राह्मणेनैनं शरीरात्मताया व्युत्थाप्य"। उसका आशय यह है कि इन्द्र को उदकादिगत प्रतिबिम्ब दिखा कर यह समझाया गया कि जैसे

३६८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. १९

मानात्समुत्थितःन्स एव कूटस्थनित्यदृक्स्वरूप आत्मा भवति, 'स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मुण्ड० ३।२।९) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तदेव चास्य पारमार्थिकं स्वरूपं येन शरीरात्समुत्थाय स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते । कथं पुनः स्वं च रूपं स्वेनैव च निष्पद्यत इति संभवति कूटस्थनित्यस्य ? सुवर्णादीनां तु द्रव्यान्तरसंपर्कादभिभूतस्वरूपाणामनभिव्यक्तासाधारणविशेषाणां क्षारप्रक्षेपादिभिः शोध्यमानानां स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः स्यात् । तथा नक्षत्रादीनामह्न्यभिभूतप्रकाशानामभिभावकवियोगे रात्रौ स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः स्यात् । न तु तथात्मचैतन्यज्योतिषो नित्यस्य केनचिदभिभवः संभवत्यसंसर्गित्वाद् व्योम्न इव, दृष्टविरोधाच्च । दृष्टिश्रुतिमतिविज्ञातयो हि जीवस्य स्वरूपम् । तच्च शरीरादसमुत्थितस्यापि जीवस्य सदा निष्पन्नमेव दृश्यते । सर्वो हि जीवः पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन् व्यवहारति; अन्यथा व्यवहारानुपपत्तेः । तच्चेच्छरीरात्समुत्थितस्य निष्पद्येत, प्राक्समुत्थानाद् दृष्टो व्यवहारो विरुध्येत । अतः किमात्मकमिदं शरीरात्समुत्थानं, किमात्मिका वा स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिरिति ?

अत्रोच्यते, - प्राग्विवेकविज्ञानोत्पत्तेः शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनोपाधिभिरविविक्तमिव जीवस्य दृष्ट्यादिज्योतिःस्वरूपं भवति । यथा शुद्धस्य स्फटिकस्य स्वाच्छ्यं शौक्ल्यं च स्वरूपं प्राग्विवेकग्रहणाद्रक्तनीलाद्युपाधिभिरविविक्तमिव भवति ।

भामती शरीरात्मतावा व्युत्थानं बाध इति । चोदयति कथं पुनः स्वञ्च रूपम् इति । द्रव्यान्तरसंसृष्टं हि तेनाभिभूतं तस्माद्विविच्यमानं व्यज्यते हेमतारकादि, कूटस्थनित्यस्य पुभरन्धेना - संसृष्टस्य कुतो विवेचनादभिव्यक्तिः । न च संसारावस्थायां जीवोऽनभिव्यक्तः, दृष्ट्यादयो ह्यस्य स्वरूपं, ते च संसारावस्थायां भासन्त इति कथं जीवरूपं न भासत इत्यर्थः । परिहरति प्राग्विवेकज्ञानोत्पत्तेः इति । अयमर्थः । अद्यप्यस्य कूटस्थनित्यस्यान्धसंसर्गो न वस्तुतोऽस्ति । यद्यपि च संसारावस्थायामस्य दृष्ट्यादिरूपञ्चाङ्कोऽस्ति, तथाप्यनिर्वोच्यानाद्यविद्यावशादविद्याकल्पितैरेव देहेन्द्रियादिभिरसंसृष्टमपि संसृष्टमिव विविक्तमप्यविविक्त-

भामती-व्याख्या प्रतिबिम्ब पदार्थ उत्पत्ति-विनाशशील होने के कारण आत्मा नहीं, वैसे ही देह, इन्द्रियादि भी उत्पाद और विनाशरूप धर्मवाले होने के कारण आत्मा नहीं माने जा सकते - इस प्रकार शरीरगत आत्मत्व की धारणा से इन्द्र को व्युत्थित किया (ऊपर उठाया) गया।

आक्षेपवादी आक्षेप करता है- "कथं पुनः स्वं च रूपं स्वेनैव निष्पद्यते ?" आक्षेपवादी का अभिप्राय यह है कि जो पदार्थ किसी द्रव्यान्तर से वेष्टित या संसृष्ट होकर अन्यथा प्रतीत होता हैं, वह द्रव्यान्तर से विविक्त (पृथक्) हो कर अपने रूप में आविर्भूत कहा जाता है, जैसे स्वर्ण खण्ड मिट्टी से एवं नक्षत्र सौर्य तेज से वियुक्त होकर अपने स्वरूप में आविर्भूत माने जाते हैं, किन्तु कूटस्थ नित्य असङ्ग आत्मा का द्रव्यान्तर से सङ्ग वा संसर्ग ही नहीं होता, किसके वियोग में आविर्भूत या अभिव्यक्त होगा ? संसारावस्था में जीव अनभिव्यक्त है-ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि चाक्षुषादि वृत्तियों में अभिव्यक्त चैतन्यरूप दृष्टि, श्रुति और विज्ञाप्ति आदि ही तो जीव का स्वरूप है। संसारावस्था में भी जीव उस रूप से अवभासित ही होता है, अनभिव्यक्त नहीं ।

उक्त आक्षेप का परिहार किया जाता है - "प्राग् विवेकज्ञानोत्पत्तेः"। सारांश यह है कि यद्यपि इस कूटस्थ, नित्य, असङ्ग आत्मा का वस्तुतः अन्य द्रव्य से संसर्ग नहीं होता एवं संसारावस्था में वह दृष्ट्यादि-रूप से अवभासित भी है। तथापि अनिर्वचनीय अनादि अविद्या के सम्बन्ध से एवं अविद्या-द्वारा कल्पित देहेन्द्रियादि से संसृष्ट-जैसा, शुद्ध होता हुआ भी अशुद्ध-

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६९

प्रमाणजनितविवेकग्रहणात्तु पराचीनः स्फटिकः स्वाच्छ्येन शौक्ल्येन च स्वेन रूपे- णाभिनिष्पद्यत इत्युच्यते प्रागपि तथैव सन् । तथा देहाद्युपाध्यविविक्तस्यैव सतो

भामती

मिव वृष्ट्यादिरूपमद्य प्रथते । तथा च देहेन्द्रियादिगतैस्तापादिविभिस्तापादिमदिव भवतीति । उपपादित- ञ्चैतद्विस्तरेणाध्यासभाष्य इति नेहोपपाद्यते । यद्यपि स्फटिकादयो जपाकुसुमादिसन्निहिताः, सन्निधानञ्च संयुक्तसंयोगात्मकम् , तथा च संयुक्ताः, तथापि न साक्षाज्जपादिकुसुमसंयोगिनः इत्येतावता दृष्टान्तता इति । ॐ वेदनाः ॐ हर्षभयशोकादयः । दार्ष्टान्तिके योजयति ॐ तथा देहादि इति ॐ । सम्प्रसादोऽस्मा- च्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत इत्येतद्विभजते ॐ श्रुतिकृतं विवेकविज्ञा- नम् इति ॐ । तदनेन श्रवणमननध्यानाभ्यासाद्विवेकज्ञानमुक्त्वा तस्य विवेकविज्ञानस्य फलं केवलात्म- रूपसाक्षात्कारः, स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः । स च साक्षात्कारो वृत्तिरूपः प्रपञ्चमात्रं प्रविलापयन् स्वयमपि प्रपञ्चरूपत्वात् कतकफलवत् प्रलीयते । तथा च निमृष्टनिखिलप्रपञ्चजालमनुपसंसर्गमपराधीनप्रकाशमात्म- ज्योतिः सिद्धं भवति । तदिदमुक्तं ॐ परं ज्योतिरुपसम्पद्य इति ॐ । अत्र चोपसम्पत्ताबुत्तरकालायामपि

भामती-व्याख्या

जैसा प्रतीत होता है। फलतः देहेन्द्रियादिगत ताप के द्वारा संतप्त-जैसा हो जाता है। अध्यास- भाष्य में इस विषय का उपपादन विस्तार से किया जा चुका है, अतः यहाँ उसका पिष्ट-पेषण नहीं किया जाता।

यद्यपि स्फटिकादि पदार्थ जपाकुसुमादि उपाधियों से सन्निहित हैं और सन्निधान है— संयुक्तसंयोगात्मक [ जपाकुसुम साक्षात् स्फटिक से जुड़ा नहीं, अपितु जिस भूतल पर स्फटिक है, उसके समीप है, अतः स्फटिक-संयुक्त भूतल का संयोग जपाकुसुम के साथ है]। यद्यपि असंसृष्ट आत्मा की पररूपापत्ति और स्वरूपाभिव्यक्ति में जो दृष्टान्त दिया गया है— स्फटिकादि, वह जपाकुसुमादि से संसृष्ट (संयुक्त) होकर ही रक्त और जपाकुसुम के हट जाने पर अपने स्वच्छ शुक्लरूप में अभिव्यक्त होता है, अतः दृष्टान्त और दार्ष्टान्त की एकरूपता उपपन्न नहीं होती। तथापि स्फटिक का जपाकुसुम के साथ स्वसंयुक्तसंयोगरूप परम्परा सम्बन्ध होने पर भी साक्षात् सम्बन्ध न होने के कारण स्फटिक भी साक्षात् असंसृष्ट है, अतः दृष्टान्त और दार्ष्टान्त में असंसृष्टता का समन्वय हो जाता है। 'वेदना' पद से विवक्षित हैं-हर्ष, भय और शोकादि। दृष्टान्त-प्रदर्शन का दार्ष्टान्त में समन्वय किया जाता है—"तथा देहाद्युपाध्यविविक्तस्यैव सतो जीवस्य"। "सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुप- सम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते" (छां. ८।१२।३) इस श्रुति से प्रतिपादित विवेक-विज्ञान को ही शरीर से समुत्थान कहा गया है—"श्रुत्युक्तं विवेकविज्ञानं शरीरात् समुत्थानम्"। इसका निष्कर्ष यह है कि श्रवण, मनन और ध्यान का अभ्यास करने से जो विवेक-विज्ञान उत्पन्न होता है, उसका ही फल है—केवलात्मसाक्षात्कार या स्वरूपेण अभिनिष्पत्ति। वह वृत्तिरूप साक्षात्कार समस्त प्रपञ्च का प्रविलापन करता हुआ स्वयं भी प्रपञ्चान्तर्गत होने के कारण वैसे ही समाप्त हो जाता है, जैसे कतक-रज (रीठे के फल का चूर्ण) जलगत्त पार्थिव कणों को नीचे बिठाता हुआ स्वयं बैठ जाता है। इस प्रकार निखिल प्रपञ्च से रहित सर्वथा अनासक्त, स्वयंप्रकाश ब्रह्मज्योति उपसम्पन्न हो जाती है—यही श्रुति कह रही है— "परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते" (छां. ८।१२।३)। यद्यपि स्वरूपाभिनिष्पत्तिरूप मानस वृत्ति के द्वारा आत्मगत आवरण की निवृत्ति हो जाने के पश्चात् ज्योति की उपसम्पत्ति होती है, अतः 'उपसम्पद्य अभिनिष्पद्यते'—ऐसा विपरीताभिधान उचित नहीं। तथापि 'क्त्वा' प्रत्यय का यहाँ केवल समानकर्तृता में ही वैसा ही प्रयोग किया गया है, जैसा कि 'मुखं

३७०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. १९

जीवस्य श्रुतिकृतं विवेकविज्ञानं शरीरात्समुत्थानम्, विवेकविज्ञानफलं स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः केवलात्मस्वरूपावगतिः । तथा विवेकाविवेकमात्रेणैवात्मनोऽशरीरत्वं सशरीरत्वं च, मन्त्रवर्णात् 'अशरीरं शरीरेषु' (का० १।२।२२) इति, 'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते' (गी० १३।३१) इति च सशरीरत्वाशरीरत्वविशेषाभावस्मरणात् । तस्माद्विवेकविज्ञानाभावादनाविर्भूतस्वरूपः सन् विवेकविज्ञानादाविर्भूतस्वरूप इत्युच्यते, नत्वन्यादृशावाविर्भावानाविर्भावौ स्वरूपस्य संभवतः स्वरूपत्वादेव । एवं मिथ्याज्ञानकृत एव जीवपरमेश्वरयोर्भेदो न वस्तुतः, व्योमवदसङ्गत्वविशेषात् । कुतश्चैतदेवं प्रतिपत्तव्यम् ? यतो 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इत्युपदिश्य 'एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म' इत्युपदिशति । योऽक्षिणि प्रसिद्धो द्रष्टा द्रष्टृत्वेन विभाव्यते सोऽमृताभयलक्षणाद् ब्रह्मणोऽन्यश्चेत्स्यात्, ततोऽमृताभयब्रह्मसामानाधिकरण्यं न स्यात् । नापि प्रतिच्छायात्माऽयमक्षिलक्षितो निर्दिश्यते, प्रजापतेर्मृषावादित्वप्रसङ्गात् । तथा द्विती-


भामती

क्त्वाप्रयोगो मुखं व्यादाय स्वपितीतिवन्मन्तव्यः । यदा च विवेकसाक्षात्कारः शरीरात् समुत्थानं, न तु शरीरापादानकं गमनम्, तदा तत्सशरीरस्यापि सम्भवति प्रारब्धकार्यकर्मक्षयस्य पुरस्तादित्याह ॐ तथा विवेकाविवेकमात्रेण इति ॐ । न केवलं 'स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इत्यादिश्रुतिभ्यो जीवस्य परमात्मनोऽभेदः, प्रजापत्यवाक्यसन्दर्भपर्यालोचनयाप्येवमेव प्रतिपत्तव्यमित्याह ॐ कुतश्चैतदेवं प्रतिपत्तव्यम् इति ॐ । स्यादेतत्—प्रतिच्छायात्मवज्जीवं परमात्मनो वस्तुतो भिन्नमप्यमृताभयात्मत्वेन ग्राहयित्वा पश्चाद् परमात्मानममृताभयादिमन्तं प्रजापतिर्ग्राहयति, न स्वयं जीवस्य परमात्मभावमाचष्टे छायात्मन इवेत्यत आह ॐ नापि प्रतिच्छायात्मायमक्षिलक्षितः इति ॐ । अक्षिलक्षितोऽप्यात्मैवोपदिश्यते


भामती-व्याख्या

व्यादाय स्वपिति ।' [ वाचस्पति मिश्र ने ही न्यायकणिका पृ ४१४ पर कहा है— "स्वापोत्तरकालं हि मुखव्यादानम् । समानकर्तृकतैवाव्यभिचारिणी क्त्वाप्रत्ययार्थः, समानकर्तृकेऽर्थे वर्तमानाच्च धातोर्विधीयमानं य एव पूर्वं प्रयुज्यते तत्रैव क्त्वाप्रत्ययं प्रयुञ्जते लौकिकाः, यथा प्रयोगं चार्थप्रत्ययो भवति” ] ।

'शरीरात् समुत्थानं' का जो शब्दार्थ होता है—शरीरापादानक ( शरीरमपादानं यस्य गमनस्य अर्थात् शरीर को छोड़ कर ) उत्क्रमण, वह शरीर में रहते हुए आत्मा नहीं कर सकता, किन्तु जब विवेक-साक्षात्कार ( शरीरादिभ्यो भिन्नोऽहम्—ऐसे निश्चय ) को समुत्थान पदार्थ माना जाता है, तब शरीर के रहते हुए भी आत्मा शरीर से समुत्थित या अशरीर तब तक कहा जाता रहेगा, जब तक प्रारब्ध कर्म शेष है—"तथा विवेकाविवेकमात्रेणैवात्मनोऽशरीरत्वं सशरीरत्वं च"। केवल "स ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" ( मुण्ड, ३।२।९ ) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा ही जीव और ब्रह्म की अभेद-प्रतिपत्ति नहीं होती, अपितु प्रजापति के वाक्य-सन्दर्भों के पौर्वापर्य की आलोचना से भी वैसी प्रतिपत्ति की जा सकती है, इस प्रकार भाष्यकार कहते हैं—"कुतश्चैवं प्रतिपत्तव्यम्"।

शङ्का—पहले अक्षिपुरुष के रूप में छाया ( प्रतिबिम्ब ) एवं छाया में अमृताभयरूपता का निर्देश किया गया है। इसी प्रकार आगे चल कर स्वप्नपुरुष के रूप में ब्रह्म-भिन्न द्रष्टा ( जीव ) एवं जीव में अमृताभयरूपता का अनुमान प्रस्तुत किया गया है—स्वप्नद्रष्टा अमृताभयस्वरूपः, परमात्मभिन्नत्वात्, अक्षिगतछायावत् । यदि प्रथम पर्याय में अक्षिगत छाया का निर्देश नहीं माना जाता, तब द्वितीय पर्याय-प्रदर्शित स्वप्न-द्रष्टा में अमृताभयरूपता किस दृष्टान्त से सिद्ध होगी ?

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३७१

येऽपि पर्याये 'य एष स्वप्ने महीयमानश्चरति' इति न प्रथमपर्यायनिर्दिष्टादक्षिपुरुषाद् द्रष्टुरन्यो निर्दिष्टः, एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि' इत्युपक्रमात्। किञ्चाहमद्य स्वप्ने हस्तिनमद्राक्षं, नेदानीं तं पश्यामीति दृष्टमेव प्रतिबुद्धः प्रत्याचष्टे, द्रष्टारं तु तमेव प्रत्यभिजानाति 'य एवाहं स्वप्नमद्राक्षं स एवाहं जागरितं पश्यामि' इति। तथा तृतीयेऽपि पर्याये 'नाह खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि इति सुषुप्तावस्थायां विशेषविज्ञानाभावमेव दर्शयति, न विज्ञातारं प्रतिषेधति।

भामती

न छायात्मा। तस्मादसिद्धो दृष्टान्त इत्यर्थः। किञ्च द्वितीयादिष्वपि पर्यायेष्वेतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्या- स्यामीत्युपक्रमात् प्रथमपर्यायनिर्दिष्टो न छायापुरुषोऽपि तु ततोऽन्यो द्रष्टाऽस्त्विति दर्शयत्यन्यथा प्रजापतेः प्रतारकत्वप्रसङ्गादित्यत आह ॐ तथा द्वितीयेऽपि इति ॐ। अथ छायापुरुष एव जीवः कस्मान्न भवति ? तथा च छायापुरुष एवैतमिति परामृश्यत इत्यत आह ॐ किञ्चाहमद्य स्वप्ने हस्तिनम् इति ॐ। ॐ किञ्च इति ॐ। समुच्चयाभिधानं पूर्वोपपत्तिसाहित्यं ब्रूते, तच्च शङ्कानिराकरणद्वारेण। छायापुरुषोऽस्थायी स्थायी चायमात्मा चकास्ति, प्रत्यभिज्ञानादित्यर्थः। ॐ नाह खल्वयमेव इति ॐ। अयं सुषुप्तः। ॐसम्प्रतिॐ सुषुप्तावस्थायाम्। अहमात्मानमहंकारास्पद्मात्मानम्। न जानाति। केन प्रकारेण न जाना- तीत्यत आह ॐ अयमहमस्मीमानि भूतानि च इति ॐ। ॐ यथा जागृति स्वप्ने च इति ॐ। न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते, अविनाशित्वादित्यनेनाविनाशित्वं सिद्धवद्धेतुं कुर्वता सुषुप्तोत्थितस्यात्म-

भामती-व्याख्या

समाधान—उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"नापि प्रतिच्छायात्माऽयमभिलक्षितो निर्दिश्यते"। आशय यह है कि अक्षिपुरुष के रूप में आत्मा का ही निर्देश किया गया है, छाया (प्रतिबिम्ब) का नहीं, अतः छाया में दृष्टान्तता सिद्ध नहीं होती। दूसरी बात यह भी है कि द्वितीयादि पर्यायों में पूर्व-निर्दिष्ट वस्तु के निर्देश की प्रतिज्ञा की गई है—"एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि"। द्वितीयादि पर्यायों में आत्मा का पुनः निर्देश तभी उपपन्न होगा, जब कि प्रथम पर्याय में भी अक्षिपुरुष के रूप में आत्मा का ही निर्देश माना जाय, छाया का नहीं। छाया से भिन्न आत्मा का निर्देश यदि अक्षि में नहीं माना जाता, अपितु प्रजापति के द्वारा छाया को ही आत्मा बताया जाता है, तब प्रजापति में वञ्चकत्व प्रसक्त होता है, क्योंकि आत्मा के जिज्ञासुओं को छायारूप अनात्म पदार्थ में आत्मत्व का उपदेश निरी वञ्चना है, भाष्यकार कहते हैं—"अन्यथा प्रजापतेर्मृषावादित्व- प्रसङ्गात्"। 'छायापुरुष को जीव और उसी का 'एतम्' पद के द्वारा परामर्श क्यों न मान लिया जाय ? इस प्रश्न का उत्तर है—किञ्चाहमद्य स्वप्ने हस्तिनमद्राक्षं नेदानीं तं पश्यामीति दृष्टमेव प्रतिबुद्धः प्रत्याचष्टे द्रष्टारं तु तमेव प्रत्यभिजानीते"। 'किञ्च' पद का वहीं प्रयोग किया जाता है, जहाँ पूर्व-दर्शित उपपत्ति के साथ उपपत्त्यन्तर का समुच्चयाभिधान किया जाय। प्रथम उपपत्ति है—शङ्कापूर्वक छाया-निर्देश का निरास और दूसरी उपपत्ति है—प्रत्यभिज्ञा। छाया-पुरुष अस्थायी है, किन्तु यह आत्मा प्रत्यभिज्ञा प्रमाण के द्वारा स्थायी सिद्ध होता है। "नाह खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानाति—अयमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि"—इस श्रुति का अर्थ यह है कि 'अयं सुषुप्तः, सम्प्रति सुषुप्तावस्थायाम्, अहमात्मानमहंकारास्पद्मात्मानं न जानाति' अर्थात् यह सुषुप्त पुरुष सुषुप्ति अवस्था में अहङ्कारास्पद आत्मा को नहीं जानता। आत्मा को कैसा नहीं जानते ? इस प्रश्न का उत्तर है—"अयमहमस्मि इमानि भूतानि च" अर्थात् जागरण और स्वप्न की अवस्थाओं में जैसा ज्ञान आत्मा और अनात्मा का होता है, सुषुप्ति में वैसा ज्ञान नहीं होता। "न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्"—

३७२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. १९

यत्तु तत्र ‘विनाशमेवापीतो भवति’ इति तदपि विशेषविज्ञानविनाशाभिप्रायमेव न विज्ञातृविनाशाभिप्रायम्, ‘नहि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्’ (बृ० ४।३।३०) इति श्रुत्यन्तरात् । तथा चतुर्थेऽपि पर्याये ‘एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्मात्’ इत्युपक्रम्य ‘मघवन् मर्त्यं वा इदं शरीरम्’ इत्यादिना प्रपञ्चेन शरीराद्युपाधिसंबन्धप्रत्याख्यानेन संप्रसादशब्दोदितं जीवं ‘स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति ब्रह्मस्वरूपापन्नं दर्शयन्न परस्माद् ब्रह्मणोऽमृताभयस्वरूपादन्यं जीवं दर्शयति ।

केचित्तु – परमात्मविवक्षायां ‘एतं त्वेव ते’ इति जीवाकर्षणमन्याय्यं मन्यमाना एतमेव वाक्योपक्रमसूचितमपहतपाप्मत्वादिगुणकमात्मानं ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामीति – कल्पयन्ति । तेषामेतमिति संनिहितालम्बिनी सर्वनामश्रुतिर्विप्रकृष्येत । भूयःश्रुतिश्चोपरोध्येत, पर्यायान्तराभिहितस्य पर्यायान्तरेऽह्यभिधीयमानत्वात् । ‘एतं त्वेव ते’ इति प्रतिज्ञाय प्राक्चतुर्थात्पर्यायादन्यमन्यं व्याचक्षाणस्य प्रजापतेः प्रतारकत्वं प्रसज्येत । तस्माद्यदविद्याप्रत्युपस्थापितमपारमार्थिकं जैवं रूपं कर्तृभोक्तृरागद्वेषादिदोषकलुषितमनेकानर्थयोगि तद्विलयनेन तद्विपरीतमपहतपाप्मत्वादिगुणं परमेश्वरं स्वरूपं विद्यया प्रतिपद्यते, सर्पादिविलयनेनेव रज्ज्वादीन् । अपरे तु वादिनः पारमार्थि-

भामती

प्रत्यभिज्ञानमुक्तम् । य एवाहं जागरित्वा सुप्तः स एवैतर्हि जागर्मीति । आचार्यदेशीयमतमाह ॐ केचित्तु इति ॐ । यदि ह्येतमित्येनेनानन्तरोक्तं चक्षुरधिष्ठानं पुरुषं परामृश्य तस्यात्मत्वमुच्येत ततो न भवेच्छायापुरुषः, न त्वेतदस्ति । वाक्योपक्रमसूचितस्य परमात्मनः परामर्शात् , न खलु जीवात्मनोऽपहतपाप्मत्वादिगुणसम्भव इत्यर्थः । तदेतद् दूषयति ॐ तेषामेतम् इति ॐ । सुबोधम् । मतान्तरमाह ॐ अपरे तु वादिनः इति ॐ । यदि न जीवः कर्त्ता भोक्ता च वस्तुतो भवेत् , ततस्तदाश्रयाः कर्मविधय उपरुध्येरन् । सूत्रकारवचनं च नासम्भवादिति कुप्येत । तत् खलु ब्रह्मणो गुणानां जीवेऽसम्भवमाह । न चाभेदं

भामती-व्याख्या

इस श्रुति के द्वारा अविनाशित्व हेतु को सिद्धवत् मानकर सुषुप्ति से उठे व्यक्ति की यह प्रत्यभिज्ञा प्रस्तुत की गई है कि ‘जो मैं जागते-जागते सुषुप्ति में चला गया था, वही मैं फिर जाग गया हूँ’।

वेदान्त के किसी एकदेशी आचार्य का मत दिखाया जाता है – “केचित् तु”। अक्षिपुरुष-निर्देश के अनन्तर पठित “एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि” – इस श्रुति में ‘एतं’ पद के द्वारा उपक्रमस्थ और बुभुत्सित परमात्मा का ही परामर्श करना चाहिए, अक्षिपुरुषरूप जीव का नहीं, क्योंकि यदि अव्यवहित पूर्व-कथित चक्षुराधिष्ठानक पुरुष का परामर्श करके उसमें आत्मत्व का अभिधान करते, तब छायापुरुष का अभिधान न होता, किन्तु व्यवहितरूपेण वाक्य के उपक्रम में ही निर्दिष्ट परमात्मा का ‘एतं’ पद से परामर्श किया गया है, जीवात्मा का नहीं, क्योंकि जीवात्मा में अपहतपाप्मत्वादि गुण सम्भव नहीं। कथित एकदेशी आचार्य के मत में दोषाभिधान किया जाता है – “तेषामेतमिति सन्निहितालम्बिनी सर्वनामश्रुतिर्विप्रकृष्येत ।” ‘एतत्’ पद समीपतर पदार्थ का परामर्शक होता है, व्यवहित या विप्रकृष्ट पदार्थ का ‘एतं’ पद से परामर्श सर्वथा अनुचित है।

मतान्तर का प्रदर्शन किया जाता है – “अपरे तु वादिनः पारमार्थिकमेव जैवं रूपमिति मन्यन्ते”। इन आचार्यों का आशय यह है कि यदि जीव वस्तुतः कर्त्ता और भोक्ता नहीं होता, तब जीवात्मा के लिए समस्त कर्म-विधान निरर्थक हो जायगा और वेदान्त-सूत्र में जो

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३७३

कमेव चैवं रूपमिति मन्यन्तेऽस्मदीयाश्च केचित् । तेषां सर्वेषामात्मैकत्वसम्यग्दर्श- नप्रतिपक्षभूतानां प्रतिबोधायेदं शारीरकमारब्धम् । एक एव परमेश्वरः कूटस्थनित्यो विज्ञानधातुरविद्यया मायया मायाविवदनेकधा विभाव्यते नान्यो विज्ञानधातुरस्तीति । यच्चेदं परमेश्वरवाक्ये जीवमाशङ्क्य प्रतिषेधति सूत्रकारः - नासंभवात् ( ब्र० १।३।१८) इत्यादिना । तत्रायमभिप्रायः - नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावे कूटस्थनित्ये एकस्मिन्नसङ्गे परमात्मनि तद्विपरीतं जैवं रूपं व्योम्नीव तलमलादि परिकल्पितम् । तदात्मैकत्व- प्रतिपादनपरैर्वाक्यैर्न्यायोपेतैर्द्वैतवादप्रतिषेधैश्चापनेष्यामीति परमात्मनो जीवादन्यत्वं द्रढयति । जीवस्य तु न परस्मादन्यत्वं प्रतिपिपादयिषति किं त्वनुवदत्येवाविद्या- कल्पितं लोकप्रसिद्धं जीवभेदम् । एवं हि स्वाभाविककर्तृत्वभोक्तृत्वानुवादेन प्रवृत्ताः कर्मविधयो न विरुध्यन्त इति मन्यते । प्रतिपाद्यं तु शास्त्रार्थमात्मैकत्वमेव दर्शयति- 'शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्' ( ब्र० १।१।३०) इत्यादिना । वर्णितश्चास्माभिर्वि- द्वदविद्वद्भेदेन कर्मविधिविरोधपरिहारः ॥ १९ ॥

अन्यार्थश्च परामर्शः ॥ २० ॥

अथ यो दहरवाक्यशेषे जीवपरामर्शो दर्शितः - 'अथ य एष संप्रसादः' ( छा० ८।३।४ ) इत्यादिः, स दहरे परमेश्वरे व्याख्यायमाने न जीवोपासनोपदेशो न प्रकृत-

भामती

ब्रह्मणो जीवानां ब्रह्मगुणानामसम्भवो जीवेष्विति तेषामभिप्रायः । तेषां वादिनां शारीरकेणैवोत्तरं दत्तम्, तथाहि—पौर्वापर्यपर्यालोचनया वेदान्तानामेकमद्वयमात्मतत्त्वं, जीवास्त्वविद्योपाधानकल्पिता इत्यत्र तात्पर्यमवगम्यते । न च वस्तुसतो ब्रह्मणो गुणाः समारोपितेषु जीवेषु सम्भवन्ति । नो खलु वस्तुसत्या रज्ज्वा धर्माः सेद्ध्व्यादयः समारोपिते भुजङ्गे सम्भविनः । न च समारोपितो भुजङ्गो रज्ज्वा भिन्नः । तस्मान्न सूत्रव्याकोपः । अविद्याकल्पितञ्च कर्तृत्वभोक्तृत्वं यथा लोकसिद्धमुपाश्रित्य कर्मविधयः प्रवृत्ताः श्येनादिविधय इव निषिद्धेऽपि 'न हिंस्यात्सर्वा भूतानि' इति साध्यांशेऽभिचारेऽतिक्रान्तनिषेधं पुरुषमधिकृत्याविद्यावत्पुरुषाश्रयत्वाच्छास्त्रस्येत्युक्तम् । तदिदमाह ॐ तेषां सर्वेषाम् इति ॐ ॥१९॥ ननु ब्रह्म चेदत्र

भामती-व्याख्या

कहा गया है—"नासम्भवात्" ( ब्रा. सू. १।३।१८ )। वह भी असंगत हो जायगा, क्योंकि इस सूत्र-खण्ड के द्वारा ब्रह्म के अकर्तृत्वादि धर्मों का जीव में असम्भव प्रतिपादित है । ब्रह्म से जीवों का अभेद मानने पर ब्रह्म के गुणों का जीव में असंभव नहीं हो सकता । इस मत का निराकरण करते हुए कहा गया है—"तेषां प्रतिबोधाय शारीरकमारब्धम्" । सारांश यह है कि वेदान्त-वाक्यों के पौर्वापर्य की आलोचन करने पर उनका तात्पर्य एक, अद्वय आत्मतत्त्व में स्थिर होता है और अविद्यारूप उपाधि के द्वारा उसी में जीवभाव की कल्पना हो जाती है। ब्रह्म के वास्तविक गुणों का समन्वय काल्पनिक जीव में सम्भव नहीं हो सकता, क्योंकि रज्जु के वास्तविक ग्राह्यत्वादि गुण आरोपित सर्प में सम्भव नहीं होते । अनारोपित रज्जु से भिन्न भी नहीं होता, अतः 'नासम्भवात्'—इस सूत्रांश का विरोध उपस्थित नहीं होता । अविद्या-कल्पित कर्तृत्व-भोक्तृत्व को लेकर लोक-प्रसिद्ध आत्मा के लिए कर्म-विधानों का वैसे ही औचित्य हो जाता है, जैसे "न हिंस्यात् सर्वा भूतानि" ( कूर्मपु. उत्तर. १६। ) इत्यादि वाक्यों के द्वारा निषिद्ध साध्यरूप हिंसा के साधन-विधान—"श्येनेनाभिचरन् यजेत" ( षड्विंश. १।८ ) इत्यादि । विधि-शास्त्रों की प्रवृत्ति तो अज्ञानी पुरुषों को लेकर मानी गई है—"अविद्यावद्विषयाणि शास्त्राणि च" ( शां. भा. १।१।१ ) ॥ १९॥

यदि ब्रह्म ही दहराकाश है, तब 'सम्प्रसाद' पद के द्वारा जीव का परामर्श किस

३७४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. २२

विशेषोपदेश इत्यनर्थकत्वं प्राप्नोतीति, अत आह—अन्यार्थोऽयं जीवपरामर्शो न जीवस्वरूपपर्यवसायी । किं तर्हि ? परमेश्वरस्वरूपपर्यवसायी । कथम् ? संप्रसादशब्दोदितो जीवो जागरितव्यवहारे देहेन्द्रियपञ्जराध्यक्षो भूत्वा तद्वासनानिर्मितांश्च स्वप्नान्नाडीचरोऽनुभूय श्रान्तः शरणं प्रेप्सुरुभयरूपादपि शरीराभिमानात्समुत्थाय सुषुप्तावस्थायां परं ज्योतिराकाशशब्दितं परं ब्रह्मोपसंपद्य विशेषविज्ञानत्वं च परित्यज्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते । यदस्योपसंपत्तव्यं परं ज्योतिर्येन स्वेन रूपेणायमभिनिष्पद्यते स एष आत्माऽपहतपाप्मत्वादिगुण उपास्य इत्येवमर्थोऽयं जीवपरामर्शः परमेश्वरवादिनोऽप्युपपद्यते ॥ २० ॥

अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ॥ २१ ॥

यदप्युक्तम् 'दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः' इत्याकाशस्याल्पत्वं श्रूयमाणं परमेश्वरे नोपपद्यते, जीवस्य त्वराग्रोपमितस्याल्पत्वमवकल्पत इति, तस्य परिहारो वक्तव्यः । उक्तो ह्यस्य परिहारः परमेश्वरस्यापेक्षिकमल्पत्वमवकल्पत इति 'अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च' ( ब्र० १।२।७ ) इत्यत्र । स एवेह परिहारोऽनुसंधातव्य इति सूचयति । श्रुत्यैव चेदमल्पत्वं प्रत्युक्तं प्रसिद्धेनाकाशेनोपमिमानया 'यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः' इति ॥ २१ ॥


( ६ अनुकृत्यधिकरणम् । सू० २२–२३ )

अनुकृतेस्तस्य च ॥ २२ ॥

'न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' ( मु० २।२।१० ) इति समामनन्ति । यत्र यं भान्तमनुभाति सर्वं यस्य च भासा सर्वमिदं विभाति, स किं तेजोधातुः कश्चि-

भामती वक्तव्यं कृतं जीवपरामर्शनेत्युक्तमित्यत आह—अन्यार्थश्च परामर्शः जीवस्योपाधिकल्पितस्य ब्रह्मभाव उपदेष्टव्यः, न चासौ जीवमपरामृश्य शक्य उपदेष्टुमिति तिसृष्ववस्थासु जीवः परामृष्टस्तद्भावप्रविलयनं तस्य पारमार्थिकं ब्रह्मभावं दर्शयितुमित्यर्थः ॥ २० ॥ निगदव्याख्यातेन भाष्येण व्याख्यातम् ॥ २१ ॥

भामती-व्याख्या लिए ? इस प्रश्न का उत्तर है—"अन्यार्थश्च परामर्शः"। उपाधि-कल्पित जीव में ब्रह्मरूपता का उपदेश तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि जीव का परामर्श न किया जाय, अतः जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं में जीव का परामर्श किया गया है कि जीवभाव का प्रविलयन और पारमार्थिक ब्रह्मभाव का सामञ्जस्य किया जा सके ॥ २० ॥

यह जो कहा गया है कि "दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः'—इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित दहरत्व (अल्पत्व) का समन्वय ब्रह्म में क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर पहले ही दिया जा चुका है—"अर्भकौकस्त्वात् तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न, निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च" (ब्र. सू. १।२।७) अर्थात् व्यापकीभूत ब्रह्म का उपलब्धि हृदय अल्प है ॥ २१ ॥

विषय—"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्, नेमा विद्युतो भान्ति, कुतोऽयमग्नि । तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्" (मुण्ड. २।२।१०) ।

सन्देह—उक्त श्रुति से प्रतिपादित भासक पदार्थ क्या सूर्यादि से भिन्न कोई तेजोधातु है ? अथवा ब्रह्मज्योति ?

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३७५

द्रुत प्राज्ञ आत्मेति विचिकित्सायां तेजोधातुरिति तावत्प्राप्तम् । कुतः ? तेजोधातूनामेव सूर्यादीनां भानप्रतिषेधात् । तेजःस्वभावकं हि चन्द्रतारकादि तेजःस्वभावक एव सूर्ये भासमानेऽहनि न भासत इति प्रसिद्धम् । तथा सह सूर्येण सर्वमिदं चन्द्रतारकादि यस्मिन्न भासते, सोऽपि तेजःस्वभाव एव कश्चिदित्यवगम्यते । अनुभानमपि तेजःस्वभावक एवोपपद्यते, समानस्वभावकेष्वनुकारदर्शनात्, गच्छन्तमनुगच्छतीतिवत् । तस्मात्तेजोधातुः कश्चित् ।

भामती

अभानं तेजसो दृष्टं सति तेजोऽन्तरे यतः ।
तेजो धात्वन्तरं तस्मादनुकाराच्च गम्यते ॥

वलीयसा हि सौर्येण तेजसा मन्दं तेजश्चन्द्रतारकाद्यभिभूयमानं दृष्टं, न तु तेजसोऽन्येन । येऽपि पिधायकाः प्रदीपस्य गृहघटादयो न ते स्वभासा प्रदीपं भासयितुमीशते । श्रूयते च 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इति । सर्वशब्दः प्रकृतसूर्याद्यपेक्षः । न चातुल्यरूपेणानुभानमित्यनुकारः सम्भवति । नहि गावो वराहानुधावन्तीति कृष्णविहङ्गानुधावनमुपपद्यते गवाम्, अपि तु तादृशशूकरानुधावनम् । तस्माद्यद्यपि 'यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतम्' इति ब्रह्म प्रकृतं, तथाप्यभिभवानुकारसामर्थ्यलक्षणेन लिङ्गेन प्रकरणबाधया तेजो धातुरवगम्यते, न तु ब्रह्म, लिङ्गानुपपत्तेः । तत्र तं तस्येति च सर्वनामपदानि प्रदर्शनीयमेवावचक्षयन्ति । न च तच्छब्दः पूर्वोक्तपरामर्शीति नियमः समस्ति । न हि 'तेन रक्तं रागात्' 'तस्यापत्यम्' इत्यादौ पूर्वोक्तं किञ्चिदस्ति । तस्मात्प्रमाणान्तराप्रतीतमपि तेजोऽन्तरमलौकिकं शब्दादुपास्यत्वेन गम्यते ।


भामती-व्याख्या

पूर्वपक्ष—

अभानं तेजसो दृष्टं सति तेजोऽन्तरे यतः ।
तेजोधात्वन्तरं तस्मादनुकाराच्च गम्यते ॥

चन्द्र, नक्षत्रादि का अभिभव तज्जातीय सूर्यरूप तेज से ही देखा जाता है, अन्यजातीय धातु से नहीं। प्रदीपादि प्रकाश के आवरक जो गृह, घटादि पदार्थ देखे जाते हैं, वे अपने प्रकाश से प्रदीपादि का प्रकाश नहीं करते, किन्तु प्रकृत में “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति”—ऐसा कहा गया है। यहाँ 'सर्व' पद के द्वारा लोक-प्रसिद्ध सूर्यादि समस्त भासक पदार्थों का संग्रह किया गया है। “तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्”—यहाँ जिस मूल भासक ज्योति का अनुभान या अनुकरण सूर्यादि में प्रतिपादित है, वह भास्यभूत सूर्यादि का समानरूप (सजातीय) ही होना चाहिए, विरूप (विजातीय) नहीं, जैसे कि एक गौ दूसरी गौ या वराहादि का ही अनुगम कर सकती है, काले पक्षियों का नहीं। अतः यद्यपि “यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतम्” (मुण्ड. २।२।५) इस वाक्य से प्रतिपादित ब्रह्म प्रक्रान्त है, तथापि अभिभव और अनुभानात्मक सामर्थ्यरूप लिङ्ग प्रमाण के द्वारा प्रकरण का बाध करके सजातीय भासक तेजो धातु की ही अवगति होती है, ब्रह्म की नहीं। अन्यथा लिङ्ग प्रमाण की अनुपपत्ति हो जायगी। 'तत्र', 'तं' और 'तस्य'—ये सर्वनाम पद भी प्रदर्शनीय तेजो धातु के ही परामर्शक हो जाएँगे। 'तत्' शब्द पूर्वोक्त का ही परामर्शी होता है—ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि “तेन रक्तं रागात्” (पा. सू. ४।२।१) और “तस्यापत्यम्” (पा. सू. ४।१।९२) इत्यादि सूत्रों में प्रयुक्त 'तत्' पद के द्वारा किसी पूर्व-चर्चित पदार्थ का ग्रहण नहीं किया जाता। अतः किसी प्रमाणान्तर से अप्रतीत भी अलौकिक तेजोऽन्तर उपास्यत्वेन तदादि शब्दों के द्वारा अवगमित है।

३७६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. २२

इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः—प्राज्ञ एवात्मा भवितुमर्हति। कस्मात्? अनुकृतेः। अनुकरणमनुकृतिः। यदेतत् 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्' इत्यनुभानं, तत्प्राज्ञपरिग्रहेऽवकल्पते। 'भारूपः सत्यसंकल्पः' (छा० ३।१४।२) इति हि प्राज्ञमात्मानमामनन्ति। न तु तेजोधातुं कांचत्सूर्यादयोऽनुभान्तीति प्रसिद्धम्। समत्वाच्च तेजोधातूनां सूर्यादीनां न तेजोधातुमम्यं प्रत्यपेक्षास्ति, यं भान्तमनुभायुः। नहि प्रदीपः प्रदीपान्तरमनुभाति।

यदप्युक्तं—समानस्वभावकेष्वनुकारो दृश्यत इति। नायमेकान्तो नियमः,


भामती

इति प्राप्ते। उच्यते — ब्रह्मण्येव हि तल्लिङ्गं न तु तेजस्यलौकिके। तस्माच्च तदुपास्यत्वं ब्रह्म ज्ञेयं तु गम्यते ॥

तमेव भान्तमित्यत्र किमलौकिकं तेजः कल्पयित्वा सूर्यादीनामनुभानमुपपाद्यताम् , किंवा भारूपः सत्यसङ्कल्प इति श्रुत्यन्तरसिद्धेन ब्रह्मणो भानेन सूर्यादीनां भानमुपपाद्यतामिति विशये न श्रुतसम्भवेऽश्रुतस्य कल्पना युज्यत इत्यप्रसिद्धं नालौकिकमुपास्यं तेजो युज्यते, अपि तु श्रुतिप्रसिद्धं ब्रह्मैव ज्ञेयमिति, तदेतदाह ॐ प्राज्ञ एवात्मा भवितुमर्हति ॐ। विरोधमाह ॐ समत्वाच्च इति ॐ। ननु स्वप्रतिभाने सूर्यादयश्चक्षुषं तेजोपेक्षन्ते, नह्यन्धैनेते दृश्यन्ते। तथा तदेव चाक्षुषं तेजो बाह्यसौर्यादितेजआप्यायितं रूपादि प्रकाशयति नानाप्यायितम्, अन्धकारेऽपि रूपदर्शनप्रसङ्गादित्यत आह ॐयं भान्तमनुभायुरिति ॐ। न हि तेजोऽन्तरस्य तेजोऽन्तरापेक्षां व्यासेधामः, किन्तु तद्द्वानमनुभानम्। न च लोचनभानमनुभान्ति सूर्यादयस्तद्विदुमुक्तम् ॐ नहि प्रदीप इति ॐ। पूर्वपक्षमनुभाष्य व्यभिचारमाह ॐ यदप्युक्तम् इति ॐ।


भामती-व्याख्या

सिद्धान्त— ब्रह्मण्येव हि तल्लिङ्गं न तु तेजस्यलौकिके। तस्मान्न तदुपास्यत्वं ब्रह्म ज्ञेयं तु गम्यते ॥

"तमेव भान्तम्"—यहाँ क्या अलौकिक तेज की कल्पना करके सूर्यादिगत अनुभाव का उपपादन किया जाय ? अथवा "भारूपः सत्यसङ्कल्पः" (छां. ३।१४।२) इत्यादि अन्य श्रुतियों में प्रसिद्ध ब्रह्म के भान का ही सूर्यादि में अनुभान सम्पन्न किया जाय ? इस प्रकार का सन्देह उपस्थित होने पर श्रुत (श्रुति-प्रतिपादित) पदार्थ की उपलब्धि सम्भव होते हुए अश्रुत पदार्थ की कल्पना उचित नहीं मानी जाती, अतः यहाँ अत्यन्त अप्रसिद्ध अलौकिक तेजो धातु को उपास्य मानना उचित नहीं, अपितु श्रुति-प्रसिद्ध ब्रह्म-ज्योति ही ज्ञेय है, यही भाष्यकार ने कहा है—"प्राज्ञ एवात्मा भवितुमर्हति"। अर्थात् जगत् की मौलिक भासक ब्रह्म ज्योति ही है, क्योंकि "तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्"—इत्यादि श्रुतियों से प्रतिपादित अनुकरणीय भान की उपपत्ति उसी में ही सम्भव है। ब्रह्म ज्योति से ही अनुप्राणित होकर सूर्यादि जगत् के अनुभासक माने जाते हैं। अलौकि तेजोऽन्तर के द्वारा सूर्यादि अनुप्राणित नहीं हो सकते, क्योंकि दोनों समान तैजस पदार्थ हैं, अतः कौन किसकी अपेक्षा करेगा—इसमें विनिगमना सम्भव नहीं, भाष्यकार कहते हैं—"समत्वाच्च तेजोधातूनां सूर्यादीनां न तेजोधातुमम्यं प्रत्यपेक्षाऽस्ति"।

यह जो शङ्का होती है कि सूर्यादि को अपना प्रतिभान कराने में चक्षुरादिरूप तेजोऽन्तर की अपेक्षा देखी जाती है, क्योंकि अन्धे व्यक्ति सूर्यादि को नहीं देख सकते। उसी प्रकार चाक्षुष तेज भी बाह्य सूर्यादि प्रकाशों की सहायता से ही रूपादि का प्रकाशक होता

सर्वभासकस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३७७

भिन्नस्वभावकेष्वपि ह्यनुकारो दृश्यते । यथा सुतप्तोऽयःपिण्डोऽग्न्यनुकृतिरग्निं दहन्त- मनुदहति, भौमं वा रजो वायुं वहन्तमनुवहतीति । 'अनुकृतेः' इत्यनुभानमसूसूचत् । 'तस्य च' इति चतुर्थं पादमस्य श्लोकस्य सूचयति । 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इति, तद्धेतुकं भानं सूर्यादेरुच्यमानं प्राज्ञमात्मानं गमयति । 'तद्देवा ज्योतिषां ज्योति- रायुर्होपासतेऽमृतम्' (बृ० ४।४।१६) इति हि प्राज्ञमात्मानमामनन्ति, तेजोऽन्तरेण सूर्यादितेजो विभातीत्यप्रसिद्धं विरुद्धं च, तेजोऽन्तरेण तेजोऽन्तरस्य प्रतिघातात् । अथवा—न सूर्यादीनामेव श्लोकपरिपठितानामिदं तद्धेतुकं विभानमुच्यते । किं तर्हि ? 'सर्वमिदम्' इत्यविशेषश्रुतेः सर्वस्यैवास्य नामरूपक्रियाकारकफलजातस्य याऽभिव्यक्तिः सा ब्रह्मज्योतिःसत्तानिमित्ता । यथा सूर्यादिज्योतिःसत्तानिमित्ता सर्वस्य रूपजातस्या- भिव्यक्तिस्तद्वत् । 'न तत्र सूर्यो भाति' इति च 'तत्र' शब्दमाहरन्प्रकृतग्रहणं दर्शयति ।

भामती

एतदुक्तं भवति — यदि स्वरूपसाम्याभावमभिप्रेत्यानुकारो निराक्रियते, तदा व्यभिचारः । अथ क्रियासा- म्याभावं, सोऽसिद्धः । अस्ति हि वायुरजसोः स्वरूपविसदृशयोरपि नियतदिग्देशवहनक्रियासाम्यम् । वह्न्ययःपिण्डयोस्तु यद्यपि दहनक्रिया न भिद्यते तथापि द्रव्यभेदेन क्रियाभेदं कल्पयित्वा क्रियासादृश्यं व्याख्येयम् । तदेवमनुकृतेरिति विभज्य तस्य चेति सूत्रावयवं विभजते ॐ तस्य च इति ॐ । ॐ चतुर्थं इति ॐ । ॐ ज्योतिषाम् ॐ सूर्यादीनाम् । ॐ ब्रह्म ज्योतिः ॐ प्रकाशकमित्यर्थः । तेजोऽन्तरेणानिन्द्रिय- भावमापन्नेन सूर्यादितेजो विभातीत्यप्रसिद्धम् । सर्वशब्दस्य हि स्वरसतो निःशेषाभिधानं वृत्तिः । सा तेजोधातावलोकिके रूपमात्रप्रकाशके सङ्कुचेत् । ब्रह्मणि तु निःशेषजगदवभासके न सर्वशब्दस्य वृत्तिः सङ्कुचतीति । ॐ तत्र शब्दमाहरन् इति ॐ । सर्वत्र खल्वयं तच्छब्दः पूर्वोक्तपरामर्शी । 'तेन रक्तं रागात्'

भामती-व्याख्या

है, अन्यथा अन्धकार में भी चक्षु के द्वारा रूप-दर्शन क्यों नहीं होता ? उस शङ्का का निरास किया जाता है—"यं भान्तमनुभायुः"। यहाँ तेजोऽन्तर को तेजोऽन्तर की अपेक्षा का निरास नहीं किया जाता, अपितु उसके भान और अनुभान का । आँखों के भासकत्व का अनुकरण (अनुभासकत्व) सूर्यादि में उपलब्ध नहीं होता, यही भाष्यकार कहते हैं—"न हि प्रदीपः प्रदीपान्तरमनुभाति"। पूर्वपक्षी के द्वारा कथित नियम में व्यभिचार प्रदर्शित करते हैं— "यदप्युक्तं समानस्वभावकेष्वनुकारो दृश्यते इति, नायमेकान्तो नियमः"। आशय यह है कि स्वरूप-साम्य न होने के कारण अनुकरण का निराकरण किया जाता है, तब व्यभिचार है और यदि क्रिया का साम्याभाव होने के कारण विश्व के पदार्थों में अनुकार का निरास किया जाता है, तब असिद्धि है, क्योकि वायु और धूलिकणों में वैसा सादृश्य न रहने पर भी क्रिया- साम्य उपलब्ध होता है। अग्नि और अयःपिण्ड में यद्यपि दहन क्रिया भिन्न नहीं, तथापि द्रव्य के भेद से क्रियाभेद की कल्पना करके क्रिया-साम्य की व्याख्या की जा सकती है।

'अनुकृतेः'—इस सूत्र-खण्ड की व्याख्या करके 'तस्य च'— इस सूत्रांश की व्याख्या की जाती है—"तस्य चेति चतुर्थं पादमस्य श्लोकस्य सूचयति।" "ज्योतिषां ज्योति।"—इस श्रुति-वाक्य का अर्थ है—सूर्यादि ज्योतियों की प्रकाशक ब्रह्मज्योति है। भाष्यकार ने जो कहा है—"तेजोऽन्तरेण सूर्यादितेजो विभातीत्यप्रसिद्धम्"। वहाँ तेजोऽन्तरेण का 'इन्द्रियत्वमना- पन्नेन'—ऐसा विशेषण लगाना आवश्यक है, क्योंकि इन्द्रियभावापन्न चक्षुरूप तेजोन्तर से सूर्यादि तेजोन्तर का विभान लोक-प्रसिद्ध है। अलौकिक तेजोधातु का ग्रहण करने पर निःशेषाभिधायक 'सर्व' शब्द का रूपमात्र-प्रकाशक अर्थ में सङ्कोच करना पड़ता है, किन्तु ब्रह्म का उपादान करने पर 'सर्व' शब्द की वृत्ति में किसी प्रकार का सङ्कोच नहीं करना

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