भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. १९
न्तरम्। तथा शरीरव्यपाश्रयस्यैव जीवस्य शरीरात्समुत्थानं संभवति। यथाकाशव्यपा- श्रयाणां वाय्वादीनामाकाशात्समुत्थानं, तद्वत्। यथा चादृष्टोऽपि लोके परमेश्वरविषय आकाशशब्दः परमेश्वरधर्मसमभिव्याहारात् 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता' इत्येवमादौ परमेश्वरविषयोऽभ्युपगतः, एवं जीवविषयोऽपि भविष्यति। तस्मादितर- परामर्शात् 'दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश' इत्यत्र स एव जीव उच्यत इति चेत्, नैतदेवं स्यात्; कस्मात्? असंभवात्। नहि जीवो बुद्ध्याद्युपाधिपरिच्छेदाभिमानी सन्नाका- शेनोपमीयेत। नचोपाधिधर्मानभिमन्यमानस्यापहतपाप्मत्वादयो धर्माः संभवन्ति। प्रपञ्चितं चतत्प्रथमसूत्रे। अतिरेकाशङ्कापरिहारायात्र तु पुनरुपन्यस्तम्। पठिष्यति चोपरिष्टात् 'अन्यार्थश्च परामर्शः' (ब्र० १।३।२०) इति ॥ १८ ॥
उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १९ ॥
इतरपरामर्शाद्या जीवाशङ्का जाता साऽसंभवान्निराकृता। अथेदानीं मृतस्येवामृतसेकात्पुनः समुत्थानं जीवाशङ्कायाः क्रियते—उत्तरस्मात्प्राजापत्याद्वा- क्यात्। तत्र हि 'य आत्माऽपहतपाप्मा' इत्यपहतपाप्मत्वादिगुणकमात्मानमन्वेष्टव्यं विजिज्ञासितव्यं च प्रतिज्ञाय 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा' (छा० ८।७।४)
भामती
सादसमुत्थानाभ्यां दहराकाशो जीवः कस्मान्नावगम्यते? तस्मान्नास्ति विनिगमनेति शङ्कार्थः। ॥ नासंभ- वात् ॥। सम्प्रसादसमुत्थानाभ्यां हि जीवपरामर्शो न जीवपरः, किन्तु तदीयतात्त्विकरूपब्रह्मभावपरः। तथा चैष परामर्शो ब्रह्मण एवेति न सम्प्रसावसमुत्थाने जीवलिङ्गम्, अपि तु ब्रह्मण एव तादर्थ्यादित्यग्रे वक्ष्यते। आकाशोपमानावयस्तु ब्रह्मण्यव्यभिचारिन्नश्च ब्रह्मपराश्चेत्यस्ति विनिगमनेत्यर्थः ॥ १८ ॥
दहराकाशमेव प्रकृत्योपाख्यायते – यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् तमात्मानं विविदिषन्तौ सुरासुरराजाविन्द्रविरोचनौ समित्पाणी प्रजापतिं परिवसितुमाजग्मतुः। आगत्य च द्वात्रिंशतं वर्षाणि तत्परिचरणपरौ ब्रह्मचर्य्यमूषतुः। अथैतौ प्रजापतिरुवाच—किं कामाविहस्थौ युवा- मिति। तावूचतुः—य आत्माऽपहतपाप्मा तमावां विविदिषाव इति। ततः प्रजापतिरुवाच—य एषोऽक्षणि
भामती-व्याख्या
दहराकाश की जीवरूपता ज्ञात होती है। किसी एक पक्ष को सिद्ध करनेवाली विनिगमक युक्ति उपलब्ध नहीं—यह सूत्र में प्रदर्शित शङ्का का अर्थ है।
उक्त शङ्का का निरास करते हुए सूत्रकार ने कहा है—"न, असम्भवात्"। इसका आशय यह है कि सम्प्रसाद और समुत्थान के द्वारा जो जीव का परामर्श किया जाता है, वह उसके सोपाधिक स्वरूप का बोध कराने के लिए नहीं, अपितु उसकी तात्त्विक ब्रह्मरूपता का ज्ञान कराने के लिए ही है। फलतः सम्प्रसाद और समुत्थान का निर्देश ब्रह्मपरक ही है, क्योंकि ब्रह्म की अवगति में ही उसका पर्यवसान है—यह आगे कहा जायगा। आकाशोपमादि का निर्देश दहराकाश की ब्रह्मरूपता में विनिगमक है ॥ १८ ॥
दहराकाश के प्रकरण में ही कहा गया है —"यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् तमात्मानं विविदिषन्तौ सुरासुरराजौ इन्द्रविरोचनौ समित्पाणी प्रजापतिं परिवसितुमाजग्मतुः" (छां. ८।७।२) अर्थात् जिस आत्मा के ज्ञान से सभी लोकों और सभी कामों (फलों) की प्राप्ति होती है, उस आत्मा की विविदिषा से सुरराज इन्द्र और असुरराज विरोचन दोनों अपने हाथों में समिधादि उपहार लेकर प्रजापति की सेवा में पहुँचे। प्रजापति के चरणों में बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते रहे। एक दिन प्रजापति ने पूछ लिया कि आपलोग किस कामना से यहाँ हमारी सेवा कर रहे हैं? तब वे दोनों बोले कि जो आत्मा समस्त पापों से विनिर्मुक्त है, उसको हम जानना चाहते हैं। प्रजापति ने उत्तर में