भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६१

इतरपरामर्शात्स इति चेन्नासंभवात् ॥ १८ ॥

यदि वाक्यशेषबलेन दहर इति परमेश्वरः परिगृह्येतास्तीतरस्यापि जीवस्य वाक्यशेषे परामर्शः—'अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाच' (छा० ८।३।४) इति । अत्र हि संप्रसादशब्दः श्रुत्यन्तरे सुषुप्तावस्थायां दृष्टत्वात्तदवस्थावन्तं जीवं शक्नोत्युपस्थापयितुं नार्था-

भामती

भवति गङ्गायाः कूले विवक्षिते गङ्गायां घोषेति प्रयोगः । तत्किमिदानीं पौर्णमास्यां पौर्णमास्या यजेतामावास्यायाममावास्ययेत्यसाधुर्वैदिकः प्रयोगः ? न च पौर्णमास्यमावास्याशब्दावाग्नेयादिषु मुख्यौ । यच्चोक्तं यत्र शब्दादनधिगतार्थप्रतीतिस्तत्र लक्षणा, यत्र पुनरन्यतोऽर्थे निश्चिते शब्दप्रयोगस्तत्र वाचकत्वमेवेति । तदयुक्तम्, उभयस्यापि व्यभिचारात्- सोमेन यजेतेति शब्दादर्थः प्रतीयते, न चात्र कस्यचिल्लाक्षणिकत्वमृते वाक्यार्थात् । न च 'य एवं विद्वान् पौर्णमासीं यजते य एवं विद्वानमावास्याम्' इत्यत्र पौर्णमास्यमावास्याशब्दौ न लाक्षणिकौ । तस्मात्कौकचिदेतदिति ॥ १७ ॥

सम्यक् प्रसीदत्यस्मिन् जीवो विषयेन्द्रियसंयोगजनितं कालुष्यं जहातीति सुषुप्तिः । सम्प्रसादो जीवस्यावस्थाभेदः, न ब्रह्मणः । तथा शरीरात्समुत्थानमपि शरीराश्रयस्य जीवस्य, न त्वनाश्रयस्य ब्रह्मणः । तस्माद्यथा पूर्वोक्तैर्वाक्यशेषगतैर्लिङ्गैर्ब्रह्मावगम्यते दहराकाशः, एवं वाक्यशेषगताभ्यामेव सम्प्र-

भामती-व्याख्या

( भेद ) प्रदर्शित हो जाने से ब्रह्म में 'आकाश' पद की लक्षणा कैसे हो सकेगी ?

समाधान—'सर्वत्र लक्षणा-स्थल पर लक्ष्यार्थ का पृथक् निर्देश नहीं होना चाहिए'—ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि "दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत"—यहाँ पर एक 'आग्नेय' और दो 'ऐन्द्र'- इन तीन यागों के लिए 'दर्श' पद और आग्नेय, उपांशु एवं अग्नीषोमीय—इन तीन कर्मों के लिए 'पूर्णमास' शब्द लक्षणा वृत्ति से प्रयुक्त है । "अमावास्यायाममावस्यया यजेत" (आप. प. २।१९) और "पौर्णमास्यां पौर्णमास्या यजेत"—यहाँ पर 'अमावास्या' पद की अमावास्या काल-सम्बन्ध और 'पौर्णमास' पद की पौर्णमास काल-सम्बन्ध में जो लक्षणा की जाती है, वह उपपन्न न हो सकेगी, क्योंकि अमावास्या और पौर्णमासी शब्दों के द्वारा उक्त काल-सम्बन्ध पृथक् निर्दिष्ट है । फलतः 'आकाश' पद की ब्रह्म में लक्षणा वृत्ति का कोई बाधक सम्भव नहीं ।

यह जो कहा जाता है कि जहाँ पर शब्द के द्वारा अनधिगत अर्थ की प्रतीति होती है, वहाँ लक्षणा और जहाँ अन्य प्रमाण से अवगत अर्थ में शब्द का प्रयोग होता है, वहाँ वाचकता ( मुख्य वृत्ति ) होती है । वह कहना भी संगत नहीं, क्योंकि उक्त दोनों नियमों में व्यभिचार उपलब्ध होता है—"सोमेन यजेत" (तै. सं. ३।२।२) इत्यादि स्थलों पर सोमलतारूप अनधिगत अर्थ की प्रतीति होने पर भी किसी पद को लाक्षणिक नहीं माना जाता, केवल वाक्यार्थ ही लक्ष्यमाण होता है । "य एवंविद्वान् पौर्णमासीं यजते, य एवंविद्वानमावास्यां यजते" ( तै. सं. १।६।६।१ ) इत्यादि स्थलों पर "यदाग्नेयोऽष्टाकपालः" ( तै. सं. २।६।३।३ ) इत्यादि वाक्यों के द्वारा अधिगत आग्नेयादि कर्मों में भी लक्षणा ही मानी जाती है, वाच्यता या मुख्य वृत्ति नहीं ॥ १७ ॥

'सम्यक् प्रसीदत्यस्मिन् जीवः'—ऐसी व्युत्पत्ति के द्वारा 'सम्प्रसाद' शब्द जीव की ही सुषुप्ति अवस्था का वाचक है, ब्रह्म की नहीं । शरीर से समुत्थान ( विवेकज्ञान ) भी जीव को ही होता है, अनाश्रयभूत ब्रह्म का नहीं । अतः जैसे पूर्वोक्त वाक्यशेषों के द्वारा दहराकाश की ब्रह्मरूपता अवगत होती है, वैसे ही वाक्यशेषावगत सम्प्रसाद और समुत्थान के द्वारा

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