भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ १ पा. ३ सू. १७
प्रसिद्धेश्च ॥ १७ ॥
इतश्च परमेश्वर एव ‘दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः' इत्युच्यते । यत्कारणमाकाशशब्दः परमेश्वरे प्रसिद्धः । 'आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता' (छा० ८।१४।१), 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' (छा० १।९।१), इत्यादिप्रयोगदर्शनात् । जीवे तु न क्वचिदाकाशशब्दः प्रयुज्यमानो दृश्यते । भूताकाशस्तु सत्यामप्याकाशशब्दप्रसिद्धावुपमानोपमेयभावाद्यसंभवाच्च ग्रहीतव्य इत्युक्तम् ॥ १७ ॥
भामती न चेयमाकाशशब्दस्य ब्रह्मणि लक्ष्यमाणविभुत्वादिगुणयोगाद् वृत्तिः साम्प्रतिकी । यथा रथाङ्गनामा चक्रवाक इति लक्षणा, किन्त्वत्यन्तनिगूढेति सूत्रार्थः । ये त्वाकाशशब्दो ब्रह्मण्यपि मुख्य एव नभोवदित्याचक्षते, तैरन्यायश्चानेकार्थत्वमिति चानन्यलभ्यः शब्दार्थ इति च मीमांसकानां मुद्राभेदः कृतः । लभ्यते ह्याकाशशब्दाद्विभुत्वादिगुणयोगेनापि ब्रह्म । न च ब्रह्मण्येव मुख्यो नभसि तु तेनैव गुणयोगेन वर्त्स्यतीति वाच्यम् । लोकाधीनावधारणत्वेन शब्दार्थसम्बन्धस्य वैदिकपदार्थप्रत्ययस्य तत्पूर्वकत्वात् । ननु 'यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः' इति व्यतिरेकनिर्देशान्न लक्षणा युक्ता । न हि
भामती-व्याख्या सिद्ध कर रही है, क्योंकि विश्व की धृति परमेश्वर में ही प्रतिपादित है—"एतस्य वा प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः" (बृह. उ. ३।८।७) । शेष भाष्य अत्यन्त सुगम है ॥१६॥
सूत्रकार ने जो 'आकाश' शब्द की प्रसिद्धि ब्रह्म में बताई है, वहाँ 'प्रसिद्धि' शब्द का अर्थ लक्षणा है। लक्षणा भी दो प्रकार की होती है—(१) साम्प्रतिकी और (२) निरूढ़ लक्षणा। जैसे 'रथाङ्ग' शब्द की चक्रवाक पक्षी में लक्ष्यमाण 'चक्र' शब्द से अविनाभूत चक्रवाक शब्द के योग से साम्प्रतिकी (आधुनिक) लक्षणा होती है, वैसे ही 'आकाश' शब्द की स्वाभिधेय आकाशगत विभुत्व गुण के योग से ब्रह्म में आधुनिक लक्षणा नहीं, अपितु अनादि तात्पर्यावगाहिनी निरूढ लक्षणा मानी जाती है।
जिन आचार्यों का कहना है कि 'आकाश' पद की नभ में जैसे मुख्य (अभिधा) वृत्ति होती है, वैसे ही ब्रह्म में भी मानी जाती है। वे आचार्य मीमांसकों की इन अनुल्लङ्घनीय मर्यादाओं का स्पष्ट उल्लङ्घन कर डालते हैं कि 'अन्यायश्चानेकार्थत्वम्' (अनेक अर्थों में एक शब्द की मुख्य वृत्ति मानना अनुचित है) और "अनन्यलभ्यः शब्दार्थः" [शाबर भा. पृ. ९२ पर भाष्यकार ने कहा है कि जो अर्थ लक्षणादि अन्य वृत्तियों से लब्ध हो जाता है, उस अर्थ में अभिधा वृत्ति नहीं मानी जाती]। आकाश की लक्षणा वृत्ति से ब्रह्म का बोध हो जाता है, क्योंकि लक्षणा का नियामक आकाशवृत्तिविभुत्ववत्स्वरूप शक्य-सम्बन्ध ब्रह्म में विद्यमान है, अतः ब्रह्म में 'आकाश' पद की अभिधा वृत्ति मानने की आवश्यकता नहीं। 'आकाश' पद की ब्रह्म में ही मुख्य वृत्ति और नभ में ब्रह्मवृत्ति विभुत्व गुण के योग से लक्षणा वृत्ति क्यों न मान ली जाय ? इस प्रश्न का भी मण्डन मिश्र के शब्दों में इस प्रकार है—"लोकावगतसामर्थ्यः शब्दो वेदेऽपि बोधकः (ब्र. सि. पृ. ) । लोक-व्यवहार में 'आकाश' शब्द कभी भी ब्रह्म का अभिधायक नहीं माना जाता, अतः 'आकाश' शब्द की मुख्य वृत्ति ब्रह्म में क्योंकर बनेगी ?
शङ्का—'गङ्गायां घोषः'—इत्यादि स्थलों पर गङ्गा और तट पदार्थ का 'गङ्गा इव गङ्गा'—इस प्रकार सादृश्यमूलक भेद निर्दिष्ट न होने के कारण 'गङ्गा' पद की तट में लक्षणा हो जाती है, किन्तु दहराकाश में आकाश का भेदमूलक सादृश्य दिखाया गया है—"यावान् वाऽयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः"। अतः दहराकाशरूप ब्रह्म में आकाश का व्यतिरेक