भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६३

भामती

पुरुषो दृश्यते एष आत्माऽपहतपाप्मत्वादिगुणः, यद्विज्ञानात्सर्वलोककामावाप्तिः। एतदमृतमभयम् । अथैतच्छ्रुत्वैतावप्रक्षीणकल्मषावरणतया छायापुरुषं जगृहतुः । प्रजापतिञ्च पप्रच्छतुः—अथ योऽयं भगवोऽप्सु दृश्यते यथादर्शं यश्च खङ्गादौ कतम एतेष्वसावथ बैक एव सर्वेष्विति ? तमेतयोः श्रुत्वा प्रश्नं प्रजापतिर्बन्ताहो सुदूरमृवृद्धान्तावेतो, अस्माभिरक्षिस्यान आत्मोपदिष्टः, एतो च छायापुरुषं प्रतिपन्नौ, तद्यदि वयं भ्रान्तौ स्थ इति ब्रूमस्ततः स्वात्मनि समारोपितपाण्डित्यबहुमानौ विमानितौ सन्तौ दौर्मनस्येन यथावदुपदेशं न गृह्णीयाताम् , इत्यनयोराशयमनुरुध्य यथार्थं ग्राहयिष्याम इत्यभिसन्धिमान् प्रत्युवाच । उदशरावे आत्मानमवेक्षेयाम्स्मिन्द्यत्पश्यथस्तद्ब्रूतमिति । तौ च दृष्ट्वा सन्तुष्टहृदयौ नाब्रूताम् । अथ प्रजापतिरेतौ विपरीतग्राहिणौ मा भूतामित्याशयवान्प्रच्छ— किमत्रापश्यतमिति । तौ होचतुः । यथैवावामतिचिरब्रह्मचर्यचरणसमुपजातायतनखलोमादिमन्तावेवमावयोः प्रतिरूपकं नखलोमादिमदुदशरावेऽपश्यावेति । पुनरेतयोश्छायात्मविभ्रममपनिनोषुर्यथैव हि छायापुरुष उपजनापायधर्मा भेदेनावगम्यमान आत्मलक्षणबिरहान्नात्मैवेबमेवेदं शरीरं नात्मा, किन्तु ततो भिन्नमित्यन्वयव्यतिरेकाभ्यामेतौ जानीयातामित्याशयवान् प्रजापतिरुवाच । साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वा पुनरुदशरावे पश्यतमात्मानम्, यच्चात्र पश्यथस्तद् ब्रूतमिति । तौ च साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ छिन्ननखलोमानौ भूत्वा तथैव चक्रतुः ।

भामती-व्याख्या

कहा—" 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' अर्थात् यह जो आँख में प्रतिबिम्ब पुरुष दिखाई देता है, यह वह निष्पाप आत्मा है, जिसके ज्ञान से सभी लोकों की प्राप्ति होती है, यह अमृत और अभय पद है । प्रजापति के उस उपदेश के अनुसार इन्द्र और विरोचन दोनों ने उस छायापुरुष को आत्मा मान लिया और प्रजापति से फिर पूछा कि 'भगवन् यह जो जल में, आदर्श (दर्पण) में और जो खङ्गादि स्वच्छ पदार्थों में छायापुरुष दिखाई देता है, इन सबमें कोई एक ही वह आत्मा है ? अथवा सभी में एक ही है ?' उन दोनों के इस प्रश्न को सुनकर प्रजापति ने अपने मन में कहा कि बड़े खेद की बात है कि ये दोनों भ्रम मे पड़ कर लक्ष्य से दूर चले गये । हमने अक्षिरूप उपाधि के माध्यम से आत्मा का उपदेश किया था, किन्तु ये लोग तो छाया पुरुष को ही आत्मा मान बैठे । अब इनको हम यदि यह कहते हैं कि आपलोग भ्रान्त हो गए । तब इन लोगों ने जो अपने में पाण्डित्य और बहुमान का आरोप ( अभिमान ) पर रखा है, उसको ठेस पहुँचती है और हममें दौर्मनस्य ( हीन भावना या अश्रद्धा ) उत्पन्न हो जाने के कारण ये हमारा कोई भी उपदेश न सुनेंगे । अतः इनके आशय के अनुरूप ही यथार्थ लक्ष्य का ग्रहण कराएँगे । ऐसा गुप्त भाव मन में रख कर प्रजापति ने उनको सुनाकर कहा—आप लोग जल से भरे प्याले में आत्मा को देखें, वहाँ क्या दिखाई देता है ? कहिए । उन दोनों ने जल में जो देखा, उसमें ही सन्तुष्ट थे, अतः वे कुछ नहीं बोले । प्रजापति ने सोचा कि कहीं ये कुछ विपरीत ही न समझ बैठें, अतः पूछा—जल में क्या देखा ? उत्तर में वे दोनों बोले—जैसे हम लोग बहुत समय तक ब्रह्मचर्य व्रत पालन करते-करते बड़े-बड़े नख और बालों वाले हो गए हैं, वैसा ही जल में प्रतिबिम्ब देख रहे हैं । प्रजापति ने पुनः छाया में आत्मत्व-भ्रम को दूर करने की इच्छा से मन में सोचा कि जैसे छायापुरुष उत्पत्ति-विनाशशाली धर्मों के भेद से भिन्न प्रतीयमान होने के कारण आत्मा नहीं, वैसे ही यह शरीर भी आत्मा नहीं, अपितु उससे भिन्न है—इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा ये (इन्द्र और विरोचन) दोनों वास्तविक आत्मा को जान लें—ऐसी शुभाशंसा मन में रख कर प्रजापति ने कहा—यदि कोई दो यत्न पुरुष बढ़े नख और लोमादि कटा कर अपने को बहुमूल्य अलङ्कारों से अलंकृत एवं सज-ध दर्पण के सामने खड़े होकर अपना प्रतिबिम्ब देखें, तो वे क्या देखेंगे ? इसका उत्तर उन दोनों