भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३६४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. १९

इति ब्रुवन्नक्षिस्थं द्रष्टारं जीवमात्मानं निर्दिशति । 'एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि' ( छा० ८।९।३ ) इति च तमेव पुनः पुनः परामृश्य 'य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मा' ( छा० ८।१०।१ ) इति 'तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मा' ( छा० ८।६।३ ) इति च जीवमेवावस्थान्तरगतं व्याचष्टे । तस्यैव चापहतपा-

भामती

पुनश्च प्रजापतिना पृष्टौ तामेव छायामात्मान ऊचतुः । तदुपश्रुत्य प्रजापतिरहो बताद्यापि न प्रशान्त- एनयोर्विभ्रमः, तद्यथाभिमतमेवात्मतत्त्वं कथयामि तावत् । कालेन कल्मषे क्षीणेऽस्मद्वचनसन्दर्भपौर्वा- पर्यालोचनयाऽऽत्मतत्त्वं प्रतिपत्स्येते स्वयमेवेति मत्वोवाच — एष आत्मेतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति । तयो- विरोचनो देहानुपातित्वाच्छायाया देह एवात्मतत्त्वमिति मत्वा निजसदनमागत्य तथैवासुरानुपदिदेश । देवेन्द्रस्त्वप्राप्तनिजसदनोऽध्वन्येव किञ्चिद्विरलकल्मषतया छायात्मनि शरीरगुणदोषानुविधायिनि तं तं दोषं परिभावयन् नाहमत्र छायात्मदर्शने भोग्यं पश्यामीति प्रजापतिसमीपं समित्पाणिः पुनरेवेयाय । आगतश्च प्रजापतिनाऽऽगमनकारणं पृष्टः पथि परिभावितं जगाद । प्रजापतिस्तु सुव्याख्यातमप्यात्मतत्त्व- मक्षीणकल्मषावरणतया नाग्रहीस्तत् पुनरपि तत्क्षयाय चरापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमथ प्रक्षीणकल्मषाय ते अहमेतमेवात्मानं भूयोऽनुव्याख्यास्यामीत्यवोचत् । स च तथा चरितब्रह्मचर्यः सुरेन्द्रः प्रजापतिमुपससाद । उपसन्नाय चास्मै प्रजापतिर्व्याचष्टे, य आत्माऽपहतपाप्मादिलक्षणोऽक्षिणि दर्शितः

भामती-व्याख्या

ने दिया कि भली-भाँति परिष्कृत और अलंकृत व्यक्ति अपना प्रतिबिम्ब भी वैसा ही देखेंगे । उस उत्तर को सुन कर प्रजापति ने अपने मन में कहा कि बड़े खेद का विषय है कि अभी भी इन दोनों का भ्रम दूर नहीं हुआ, अतः फिर प्रयत्न करना चाहिए कि अभिमत आत्मतत्त्व को जान लें। इनका कल्मष ( ज्ञान-प्रतिबन्धक पाप ) निवृत्त होने पर स्वयं ही हमारे उपदेश के पूर्वापर सन्दर्भ की आलोचना कर आत्मज्ञान प्राप्त कर लेंगे—ऐसा सोच कर प्रजापति ने कहा—"एष आत्मा, एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति' । इस उपदेश को दोनों ने सुना । उनमें से विरोचन ने छाया में देह का अनुवर्तन देख कर देह को ही आत्मतत्त्व मान लिया और अपने घर लौट कर अपनी असुर प्रजा को वैसा ही उपदेश दिया किन्तु देवराज इन्द्र का अपने घर पहुँचने से पहले मार्ग में ही प्रजापति के उपदेश की अनुचिन्तना करते-करते कुछ अन्तःकालुष्य क्षीण हो गया, उसने छायात्मा में शरीर के गुण-दोषों का अनुविधान देखा और उस पक्ष में दोषों की उद्भावना प्रबल हो गई और अन्तःप्रेरणा हुई कि छायापुरुष का पक्ष कल्याणप्रद नहीं, अतः पुनः प्रजापति की सेवा में समित्पाणि होकर इन्द्र उपस्थित हो गया । प्रजापति के द्वारा पुनः आगमन का कारण पूछे जाने पर इन्द्र ने मार्ग में अपनी समस्त उधेड़- बुन की पूरी गाथा कह सुनाई । प्रजापति ने कहा कि आपका ज्ञान-प्रतिबन्धकीभूत अन्तः कालुष्य निवृत्त न होने के कारण आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके, अतः उस पाप का क्षय करने के लिए फिर और बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करें । प्रतिबन्धकीभूत पाप की निवृत्ति हो जाने पर पुनः आत्मतत्त्व का उपदेश करेंगे । इन्द्र ने वैसा ही किया । प्रजापति ने अपनी शरण में आए हुए इन्द्र को उपदेश दिया कि 'जो निष्पापादिरूप परमात्मा नेत्र में दिखाया था, वही स्वप्न में अपने विस्तृत पुत्र, पौत्र और स्त्री के साथ स्वप्नोचित भोग भोगता हुआ विहरण करता है ।' प्रजापति के द्वारा निर्दिष्ट स्वप्न-पुरुष को भी आत्मा समझने में इन्द्र को भय बना रहा । यद्यपि यह ( स्वप्नपुरूष ) छायापुरुष के समान शरीर के धर्मों का अनुवर्तन नहीं करता, तथापि शोक-भयादि विविध बाधाओं से वह भी उन्मुक्त नहीं— ऐसा इन्द्र के कहने पर प्रजापति ने कहा—यदि अब भी आप को ज्ञान नहीं हुआ, तब और