भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६५

भामती

सोऽयं य एष स्वप्ने महीयमानो वनितादिभिरनेकधा स्वप्नोपभोगान् भुञ्जानो विहरतीति । अस्मिन्नपि देवेन्द्रो भयं ददर्श । यद्यप्ययं छायापुरुषवन्न शरीरधर्माननुपतति, तथापि शोकभयादिविविधबाधानुभवान्न तत्राप्यस्ति स्वस्तिप्राप्तिरित्युक्तवति मघवति पुनरपराणि चर द्वात्रिंशतं वर्षाणि स्वच्छं ब्रह्मचर्यमिदानीमप्यक्षीणकल्मषोऽसीत्यूचे प्रजापतिः । अथास्मिन्नेवङ्कारमुपसन्ने मघवति प्रजापतिरुवाच—य एष आत्माऽपहतपाप्मादिगुणो दर्शितोऽक्षिणि च स्वप्ने च स एष यो विषयेन्द्रियसंप्रयोगविरहात्प्रसन्नः सुषुप्तावस्थायामिति । अत्रापि नेन्द्रो निर्ववार । यथा हि जाग्रद्वा स्वप्नगतो वाऽयमहमस्मीति इमानि भूतानि चेति विजानाति नैवं सुषुप्तः किञ्चिदपि वेदयते तदा खल्वयमचेतयमानोऽभावं प्राप्त इव भवति । तदिह का निर्वृत्तिरिति । एवमुक्तवति मघवति वताद्यापि न ते कल्मषक्षयोऽभूत् । तत् पुनरपराणि चर पञ्च वर्षाणि ब्रह्मचर्यमित्यवोचत्प्रजापतिः । तदेवमस्य मघोनस्त्रिभिः पर्यायैर्व्यतीताः षण्णवतिर्वर्षाणि । चतुर्थे च पर्याये पञ्च वर्षाणीत्येकोत्तरं शतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यं चरतः सहस्राक्षस्य सम्पदिरे । अथास्मै ब्रह्मचर्यसंपदुन्मृदितकल्मषाय मघवते य एषोऽक्षणि यश्च स्वप्ने यश्च सुषुप्तावनुस्यूत एष आत्माऽपहतपाप्मादिगुणो दर्शितः तमेव मघवन् मर्त्यं वै शरीरमित्यादिना विस्पष्टं व्याचष्ट प्रजापतिः ।

अयमस्याभिसन्धिः—यावत् किञ्चित् सुखं दुःखमागमपायि तत् सर्वं शरीरेन्द्रियान्तःकरणसम्बन्धि, न त्वात्मनः । स पुनरेतानेव शरीरादीन् अनाद्यविद्यावासनावशादात्मत्वेनाभिप्रतीतस्तद्गतेन सुखदुःखेन तद्वन्तमात्मानमनुमन्यमानोऽनुतप्यते । तदा स्वयमपहतपाप्मादिलक्षणमुदासीनमात्मानं देहादिभ्यो विविक्तमनुभवति, अथास्य शरीरवतोऽप्यशरीरस्य न देहादिधर्मसुखदुःखप्रसङ्गोऽस्तीति नानु तप्यते,

भामती-व्याख्या

बत्तीस वर्ष का ब्रह्मचर्य-वास धारण करें, क्योंकि आपके अन्तस्तल का मल और विक्षेप अभी तक निवृत्त नहीं हुआ है। इन्द्र ने वैसा ही किया। विधिवत् उपसन्न (शरणागत) इन्द्र को प्रजापति ने उपदेश दिया कि जो अपहतपाप्मत्वादि गुणों से युक्त आत्मा आँख (जाग्रत् अवस्था) में और स्वप्न अवस्था में प्रदर्शित किया गया, वही यह आत्मा सुषुप्ति अवस्था में विषय और इन्द्रियों के सम्बन्ध से रहित हो जाने के कारण सुप्रसन्न हो जाता है। सुषुप्ति अवस्था की इस साधारण जन-सुलभ अनुभूति से भी इन्द्र को निर्वृत्ति (सुख-शान्ति) नहीं हुई। उसने कहा—'जैसे जाग्रत् और स्वप्न अवस्था में 'अहमस्मि' एवं 'इमानि भूतानि'—ऐसी अनुभूति होती है, सुषुप्ति अवस्था में तो वह भी अनुभूति नहीं होती, क्योंकि इस अवस्था में पुरुष खो जाता विलुप्त-सा हो जाता है, तब यहाँ क्या सुख-शान्ति है?' ऐसा सुनकर प्रजापति ने कहा कि 'महान् खेद है कि अभी भी आपका कल्मष (पाप) समाप्त नहीं हुआ, अतः और पाँच वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत धारण करें। इस प्रकार पहले तीन पर्यायों में इन्द्र के ३२ × ३ = ९६ छान्नवे वर्ष बीत चुके थे, चौथे पर्याय में पाँच वर्ष, सब मिला कर एक सौ एक वर्ष हो गए। तब जाकर उसके सकल कल्मष (प्रतिबन्धक पाप) प्रक्षीण हुए, प्रजापति का उपदेशामृत पान किया—'जो आत्मा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति में अपहतपाप्मत्वादि गुणों से युक्त सर्वत्र अनुस्यूत प्रतीत होता है, हे इन्द्र! "मर्त्यं वा इदं शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्यात्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति, अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः" (छां. ८।१२।१)। तात्पर्य यह है कि जो कुछ भी सुख और दुःख आगमपायी (आने-जानेवाला विनश्वर) है, वह सब शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण से ही सम्बन्धित है, आत्मा से नहीं। वह आत्मा अनादि अविद्या-वासनाओं के आधार पर शरीरादि अनात्म पदार्थों को अपना ही स्वरूप मान कर शरीरादि के सुख-दुःखों को अपना ही सुख-दुःख मान कर सन्तप्त होता रहता है। वही आत्मा जब अपने को अपहतपाप्मत्वादि-स्वरूप उदासीन (तटस्थ) और देहादि से असङ्ग अनुभव