भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. १९
प्मत्वादि दर्शयति—‘एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म’ इति। नाह खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि’ ( छा० ८।११।१, २) इति च सुषुप्तावस्थायां दोषमुपलभ्य ‘एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्मात्’ इति चोपक्रम्य, शरीरसम्बन्धनिन्दापूर्वकं ‘एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः’ इति जीवमेव शरीरात्समुत्थितमुत्तमपुरुषं दर्शयति। तस्मादस्ति संभवो जीवे पारमेश्वराणां धर्माणां। अतः ‘दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः’ इति जीव एवोक्त इति चेत्कश्चिद् ब्रूयात्। तं प्रति ब्रूयात् ‘आविर्भूतस्वरूपस्तु’ इति।
भामती
केवलमयं निजे चैतन्यान्दघने रूपे व्यवस्थितः समस्तलोककामान् प्राप्तो भवति। एतस्यैव हि परमानन्दस्य मात्राः सर्वे कामाः, दुःखं त्वविद्यानिर्माणमिति न विद्वानाप्नोति। अशीलितोपनिषदां व्यामोह इव जायते, तेषामनुग्रहायेदमुपाख्यानमवर्तयम् ॥ एवं व्यवस्थित उत्तराद्वाक्यसन्दर्भात् प्राजापत्यादक्षणि च स्वप्ने च सुषुप्ते च चतुर्थे च पर्याये एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरादुत्थायेति जीवात्मैवापहतपाप्माविगुणः श्रुत्योच्यते। नो खलु परस्याक्षिस्यानं सम्भवति, नापि स्वप्नाद्यवस्थायोगः, नापि शरीरात् समुत्थानम्। तस्माद्यस्यैतत् सर्वं सोऽपहतपाप्मादिगुणः श्रुत्योक्तः। जीवस्य चैतत् सर्वमिति स एवापहतपाप्मादिगुणः श्रुत्योक्त इति नापहतपाप्मादिभिः परं ब्रह्म गम्यते। ननु जीवस्यापहतपाप्मत्वादयो न सम्भवन्तीत्युक्तम्। वचनाद्भविष्यन्ति। किमिव वचनं न कुर्यात् ? नास्ति वचनस्यातिभारः। न च मानान्तरविरोधः। नहि जीवः पाप्मादिस्वभावः, किन्तु वाग्बुद्धिशरीरारम्भसम्भवोऽस्य पाप्मादिः शरीराद्ध्यभावे न भवति धूम इव धूमध्वजाभाव इति शङ्कार्थः।
भामती-व्याख्या
करता है, वह शरीर रहते हुए भी अशरीर होकर देहादि के सुख-दुःखों से रहित और विविक्त मानता और सन्ताप से उन्मुक्त हो जाता है। वह अपने विशुद्ध चैतन्यान्द स्वरूप में व्यवस्थित होकर समस्त लोकों और फलों को पा लेता है। इस परमानन्दघन की ही सुख-कणिकाएँ निखिल कर्मों और उपासनाओं से जनित फलों में उपलब्ध होती है। दुःख अविद्या का कार्य होने के कारण विद्वान् पुरुष का स्पर्श नहीं कर सकता।
अशीलितोपनिषदां व्यामोह इह जायते ।
तेषामनुग्रहायैदमुपाख्यानमवर्तयम् ॥
'श्रुत्युक्त इन्द्र, विरोचनादि का उपाख्यान सरल शब्दों में इस लिए हम (वाचस्पति मिश्र) ने कह दिया है कि जो लोग उपनिषत् ग्रन्थों का समुचित अनुशीलन नहीं कर पाते, उन्हें कई स्थलों पर व्यामोह (भ्रम) हो जाता है, जिससे वे वास्तविक रहस्य तक नहीं पहुँच पाते।'
पूर्वपक्षी का आशय यह है कि अक्षि, स्वप्न और सुषुप्ति में जिस आत्मतत्त्व का वर्णन कर "एष सम्प्रसादो शरीरात् समुत्थाय'—इत्यादि वाक्यों से जिसकी विशेषताएँ वर्णित की हैं, वह जीवात्मा ही अपहतपाप्मादि गुणोंवाला श्रुति-प्रतिपादित है, परमात्मा नहीं, क्योंकि परमात्मा का न तो अक्षिस्यान हो सकता है, न स्वप्नादि अवस्था से सम्बन्ध और न शरीर से समुत्थान। फलतः अपहतपाप्मत्वादि गुणों के द्वारा परब्रह्म की अवगति नहीं हो सकती। 'जीव में अपहतपाप्मत्वादि गुण समझस क्योंकर होंगे ?' ऐसी शङ्का नहीं कर सकते, क्योंकि श्रुति वचन के द्वारा उसका जीव में सामञ्जस्य हो जायगा। प्रमाण वचन क्या नहीं कर सकता 'नास्ति वचनस्यातिभारः' शब्द की प्रतिपादन और उपपादन की शक्ति असीम है, उसके लिए कुछ असम्भव नहीं। जीव में अपहतपाप्मत्वादि गुणों के प्रतिपादन का कोई प्रमाणान्तर विरोधी भी नहीं, क्योंकि किसी प्रमाण के द्वारा जीव में पाप्मादिस्वभावता सिद्ध