भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 385

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६७

तुशब्दः पूर्वपक्षव्यावृत्त्यर्थः। नोत्तरस्मादपि वाक्यादिह जीवस्याशङ्का संभवतीत्यर्थः। कस्मात्? यतस्तत्राप्याविर्भूतस्वरूपो जीवो विवक्ष्यते। आविर्भूतं स्वरूपमस्येत्याविर्भूत-स्वरूपः। भूतपूर्वगत्या जीववचनम्। एतदुक्तं भवति - 'य एषोऽक्षिणि' इत्यक्षिलक्षितं द्रष्टारं निर्दिश्योदशरावब्राह्मणेनैनं शरीरात्मताया व्युत्थाप्य 'एतं त्वेव ते' इति पुनःपुनः तमेव व्याख्येयत्वेनाकृष्य स्वप्नसुषुप्तोपन्यासक्रमेण 'परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इति यदस्य पारमार्थिकं स्वरूपं परं ब्रह्म तद्रूपतयैनं जीवं व्याचष्टे, न जैवेन रूपेण। यत्तत्परं ज्योतिरुपसंपत्तव्यं श्रुतं तत्परं ब्रह्म। तच्चापहतपाप्मत्वादि-धर्मकं, तदेव च जीवस्य पारमार्थिकं स्वरूपं 'तत्त्वमसि' इत्यादिशास्त्रेभ्यः, नेतरदुपा-धिकल्पितम्। यावदेव हि स्थाणाविव पुरुषबुद्धिं द्वैतलक्षणामविद्यां निवर्तयन्कूटस्थ-नित्यदृक्स्वरूपमात्मानमहं ब्रह्मास्मीति न प्रतिपद्यते, तावज्जीवस्य जीवत्वम्। यदा तु देहेन्द्रियमनोबुद्धिसंघाताद् व्युत्थाप्य श्रुत्या प्रतिबोध्यते, नासि त्वं देहेन्द्रिय-मनोबुद्धिसंघातः, नासि संसारी, किं तर्हि? तद्यत्सत्यं स आत्मा चैतन्यमात्र-स्वरूपस्तत्त्वमसीति, तदा कूटस्थनित्यदृक्स्वरूपमात्मानं प्रतिबुद्ध्यास्माच्छरीराद्यभि-


भामती

निराकरोति ॐ तं प्रतिब्रूयात् , आविर्भूतस्वरूपस्तु ॐ । अयमभिसन्धिः - पौर्वापर्यपर्यालोच-नया तावदुपनिषदां शुद्धबुद्धमुक्तमेकमप्रपञ्चं ब्रह्म तदतिरिक्तं च सर्वं तद्विवर्तो रज्जोरिव भुजङ्ग इत्यत्र तात्पर्यमवगम्यते। तथा च जीवोऽप्यविद्याकल्पितदेहेन्द्रियाद्युपहितं रूपं ब्रह्मणो न तु स्वाभाविकः। एवं च नापहतपाप्मत्वादयस्तस्मिन्नविद्योपाधौ सम्भविनः। आविर्भूतब्रह्मरूपे तु निरुपाधौ सम्भवन्तो ब्रह्मण एव न जीवस्य। एवञ्च ब्रह्मैवापहतपाप्मादिगुणं श्रुत्युक्तमिति तदेव दहराकाशो न जीव इति। स्यादे-तत् — स्वरूपाविर्भावः चेत् ब्रह्मैव न जीवः, र्तहि विप्रतिषिद्धमिदमभिधीयते, जीव आविर्भूतस्वरूप इष्यत आह ॐ भूतपूर्वगत्या इति ॐ । ॐ उदशरावब्राह्मणेन इति ॐ । यथैव हि मघोनः प्रतिबिम्बान्य उदशराब उपजनापायधर्मकाण्यात्मलक्षणविरहान्नात्मा, एवं देहेन्द्रियाद्यप्युपजनापायधर्मकं नात्मेत्युदशराबदृष्टान्तेन


भामती-व्याख्या

नहीं की गई, पाप्मादि तो जीव के वाक्, बुद्धि और शरीर की क्रियाओं से उत्पन्न होते हैं, शरीरादि का अभाव हो जाने पर पाप्मादि का भी अभाव हो जाता है।

पूर्वपक्ष का निराकरण किया जाता है—"तं प्रति ब्रूयात्, आविर्भूतस्वरूपस्तु"। आशय यह है कि पूर्वापरवाक्यों की आलोचना से उपनिषत् ग्रन्थों का तात्पर्य यही निश्चित होता है कि एकमात्र ब्रह्म शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और निष्प्रपञ्चैकस्वभाव सत्य है। उससे भिन्न समस्त प्रपञ्च ब्रह्म का वैसे ही विवर्त है, जैसे रज्जु का सर्प। जीव भी अविद्या-कल्पित देह, इन्द्रियादि उपाधियों से संवलित ब्रह्म का रूप है, स्वाभाविक नहीं; अतः उस अविद्योपाधिक जीव में अपहतपाप्मत्वादि गुण सम्भव नहीं। जब जीव अविद्या-रहित होकर ब्रह्म के रूप में अविर्भूत हो जाता है, तब वे गुण सम्भावित होकर ब्रह्म के ही कहे जाते हैं, जीव के नहीं। श्रुति ने अपहतपाप्मत्वादि गुण ब्रह्म के ही बताए हैं, अतः ब्रह्म ही दहराकाश है, जीव नहीं।

'आविर्भूतस्वरूपः' का अर्थ है—आविर्भूतं स्वरूपं यस्य, स आविर्भूतस्वरूपः—इस प्रकार अन्य पदार्थ ब्रह्म या परमेश्वर सिद्ध होता है, अतः 'आविर्भूतस्वरूपः परमेश्वरः'—ऐसा कहना था, किन्तु 'आविर्भूतस्वरूपो जीवः'—ऐसा क्यों कहा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"भूतपूर्वगत्या जीववचनम्"। ब्रह्म ही अपनी पूर्व (अविद्यावत्ता की) अवस्था में जीव कहलाता है, अतः ब्रह्म को ही पूर्वावस्थापत्ति के दृष्टिकोण से जीव कह दिया गया है। भाष्यकार ने जो कहा है कि "उदशरावब्राह्मणेनैनं शरीरात्मताया व्युत्थाप्य"। उसका आशय यह है कि इन्द्र को उदकादिगत प्रतिबिम्ब दिखा कर यह समझाया गया कि जैसे