भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 387, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंदहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३६९
प्रमाणजनितविवेकग्रहणात्तु पराचीनः स्फटिकः स्वाच्छ्येन शौक्ल्येन च स्वेन रूपे- णाभिनिष्पद्यत इत्युच्यते प्रागपि तथैव सन् । तथा देहाद्युपाध्यविविक्तस्यैव सतो
भामती
मिव वृष्ट्यादिरूपमद्य प्रथते । तथा च देहेन्द्रियादिगतैस्तापादिविभिस्तापादिमदिव भवतीति । उपपादित- ञ्चैतद्विस्तरेणाध्यासभाष्य इति नेहोपपाद्यते । यद्यपि स्फटिकादयो जपाकुसुमादिसन्निहिताः, सन्निधानञ्च संयुक्तसंयोगात्मकम् , तथा च संयुक्ताः, तथापि न साक्षाज्जपादिकुसुमसंयोगिनः इत्येतावता दृष्टान्तता इति । ॐ वेदनाः ॐ हर्षभयशोकादयः । दार्ष्टान्तिके योजयति ॐ तथा देहादि इति ॐ । सम्प्रसादोऽस्मा- च्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत इत्येतद्विभजते ॐ श्रुतिकृतं विवेकविज्ञा- नम् इति ॐ । तदनेन श्रवणमननध्यानाभ्यासाद्विवेकज्ञानमुक्त्वा तस्य विवेकविज्ञानस्य फलं केवलात्म- रूपसाक्षात्कारः, स्वरूपेणाभिनिष्पत्तिः । स च साक्षात्कारो वृत्तिरूपः प्रपञ्चमात्रं प्रविलापयन् स्वयमपि प्रपञ्चरूपत्वात् कतकफलवत् प्रलीयते । तथा च निमृष्टनिखिलप्रपञ्चजालमनुपसंसर्गमपराधीनप्रकाशमात्म- ज्योतिः सिद्धं भवति । तदिदमुक्तं ॐ परं ज्योतिरुपसम्पद्य इति ॐ । अत्र चोपसम्पत्ताबुत्तरकालायामपि
भामती-व्याख्या
जैसा प्रतीत होता है। फलतः देहेन्द्रियादिगत ताप के द्वारा संतप्त-जैसा हो जाता है। अध्यास- भाष्य में इस विषय का उपपादन विस्तार से किया जा चुका है, अतः यहाँ उसका पिष्ट-पेषण नहीं किया जाता।
यद्यपि स्फटिकादि पदार्थ जपाकुसुमादि उपाधियों से सन्निहित हैं और सन्निधान है— संयुक्तसंयोगात्मक [ जपाकुसुम साक्षात् स्फटिक से जुड़ा नहीं, अपितु जिस भूतल पर स्फटिक है, उसके समीप है, अतः स्फटिक-संयुक्त भूतल का संयोग जपाकुसुम के साथ है]। यद्यपि असंसृष्ट आत्मा की पररूपापत्ति और स्वरूपाभिव्यक्ति में जो दृष्टान्त दिया गया है— स्फटिकादि, वह जपाकुसुमादि से संसृष्ट (संयुक्त) होकर ही रक्त और जपाकुसुम के हट जाने पर अपने स्वच्छ शुक्लरूप में अभिव्यक्त होता है, अतः दृष्टान्त और दार्ष्टान्त की एकरूपता उपपन्न नहीं होती। तथापि स्फटिक का जपाकुसुम के साथ स्वसंयुक्तसंयोगरूप परम्परा सम्बन्ध होने पर भी साक्षात् सम्बन्ध न होने के कारण स्फटिक भी साक्षात् असंसृष्ट है, अतः दृष्टान्त और दार्ष्टान्त में असंसृष्टता का समन्वय हो जाता है। 'वेदना' पद से विवक्षित हैं-हर्ष, भय और शोकादि। दृष्टान्त-प्रदर्शन का दार्ष्टान्त में समन्वय किया जाता है—"तथा देहाद्युपाध्यविविक्तस्यैव सतो जीवस्य"। "सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुप- सम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते" (छां. ८।१२।३) इस श्रुति से प्रतिपादित विवेक-विज्ञान को ही शरीर से समुत्थान कहा गया है—"श्रुत्युक्तं विवेकविज्ञानं शरीरात् समुत्थानम्"। इसका निष्कर्ष यह है कि श्रवण, मनन और ध्यान का अभ्यास करने से जो विवेक-विज्ञान उत्पन्न होता है, उसका ही फल है—केवलात्मसाक्षात्कार या स्वरूपेण अभिनिष्पत्ति। वह वृत्तिरूप साक्षात्कार समस्त प्रपञ्च का प्रविलापन करता हुआ स्वयं भी प्रपञ्चान्तर्गत होने के कारण वैसे ही समाप्त हो जाता है, जैसे कतक-रज (रीठे के फल का चूर्ण) जलगत्त पार्थिव कणों को नीचे बिठाता हुआ स्वयं बैठ जाता है। इस प्रकार निखिल प्रपञ्च से रहित सर्वथा अनासक्त, स्वयंप्रकाश ब्रह्मज्योति उपसम्पन्न हो जाती है—यही श्रुति कह रही है— "परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते" (छां. ८।१२।३)। यद्यपि स्वरूपाभिनिष्पत्तिरूप मानस वृत्ति के द्वारा आत्मगत आवरण की निवृत्ति हो जाने के पश्चात् ज्योति की उपसम्पत्ति होती है, अतः 'उपसम्पद्य अभिनिष्पद्यते'—ऐसा विपरीताभिधान उचित नहीं। तथापि 'क्त्वा' प्रत्यय का यहाँ केवल समानकर्तृता में ही वैसा ही प्रयोग किया गया है, जैसा कि 'मुखं