भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 389

दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३७१

येऽपि पर्याये 'य एष स्वप्ने महीयमानश्चरति' इति न प्रथमपर्यायनिर्दिष्टादक्षिपुरुषाद् द्रष्टुरन्यो निर्दिष्टः, एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि' इत्युपक्रमात्। किञ्चाहमद्य स्वप्ने हस्तिनमद्राक्षं, नेदानीं तं पश्यामीति दृष्टमेव प्रतिबुद्धः प्रत्याचष्टे, द्रष्टारं तु तमेव प्रत्यभिजानाति 'य एवाहं स्वप्नमद्राक्षं स एवाहं जागरितं पश्यामि' इति। तथा तृतीयेऽपि पर्याये 'नाह खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि इति सुषुप्तावस्थायां विशेषविज्ञानाभावमेव दर्शयति, न विज्ञातारं प्रतिषेधति।

भामती

न छायात्मा। तस्मादसिद्धो दृष्टान्त इत्यर्थः। किञ्च द्वितीयादिष्वपि पर्यायेष्वेतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्या- स्यामीत्युपक्रमात् प्रथमपर्यायनिर्दिष्टो न छायापुरुषोऽपि तु ततोऽन्यो द्रष्टाऽस्त्विति दर्शयत्यन्यथा प्रजापतेः प्रतारकत्वप्रसङ्गादित्यत आह ॐ तथा द्वितीयेऽपि इति ॐ। अथ छायापुरुष एव जीवः कस्मान्न भवति ? तथा च छायापुरुष एवैतमिति परामृश्यत इत्यत आह ॐ किञ्चाहमद्य स्वप्ने हस्तिनम् इति ॐ। ॐ किञ्च इति ॐ। समुच्चयाभिधानं पूर्वोपपत्तिसाहित्यं ब्रूते, तच्च शङ्कानिराकरणद्वारेण। छायापुरुषोऽस्थायी स्थायी चायमात्मा चकास्ति, प्रत्यभिज्ञानादित्यर्थः। ॐ नाह खल्वयमेव इति ॐ। अयं सुषुप्तः। ॐसम्प्रतिॐ सुषुप्तावस्थायाम्। अहमात्मानमहंकारास्पद्मात्मानम्। न जानाति। केन प्रकारेण न जाना- तीत्यत आह ॐ अयमहमस्मीमानि भूतानि च इति ॐ। ॐ यथा जागृति स्वप्ने च इति ॐ। न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते, अविनाशित्वादित्यनेनाविनाशित्वं सिद्धवद्धेतुं कुर्वता सुषुप्तोत्थितस्यात्म-

भामती-व्याख्या

समाधान—उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"नापि प्रतिच्छायात्माऽयमभिलक्षितो निर्दिश्यते"। आशय यह है कि अक्षिपुरुष के रूप में आत्मा का ही निर्देश किया गया है, छाया (प्रतिबिम्ब) का नहीं, अतः छाया में दृष्टान्तता सिद्ध नहीं होती। दूसरी बात यह भी है कि द्वितीयादि पर्यायों में पूर्व-निर्दिष्ट वस्तु के निर्देश की प्रतिज्ञा की गई है—"एतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि"। द्वितीयादि पर्यायों में आत्मा का पुनः निर्देश तभी उपपन्न होगा, जब कि प्रथम पर्याय में भी अक्षिपुरुष के रूप में आत्मा का ही निर्देश माना जाय, छाया का नहीं। छाया से भिन्न आत्मा का निर्देश यदि अक्षि में नहीं माना जाता, अपितु प्रजापति के द्वारा छाया को ही आत्मा बताया जाता है, तब प्रजापति में वञ्चकत्व प्रसक्त होता है, क्योंकि आत्मा के जिज्ञासुओं को छायारूप अनात्म पदार्थ में आत्मत्व का उपदेश निरी वञ्चना है, भाष्यकार कहते हैं—"अन्यथा प्रजापतेर्मृषावादित्व- प्रसङ्गात्"। 'छायापुरुष को जीव और उसी का 'एतम्' पद के द्वारा परामर्श क्यों न मान लिया जाय ? इस प्रश्न का उत्तर है—किञ्चाहमद्य स्वप्ने हस्तिनमद्राक्षं नेदानीं तं पश्यामीति दृष्टमेव प्रतिबुद्धः प्रत्याचष्टे द्रष्टारं तु तमेव प्रत्यभिजानीते"। 'किञ्च' पद का वहीं प्रयोग किया जाता है, जहाँ पूर्व-दर्शित उपपत्ति के साथ उपपत्त्यन्तर का समुच्चयाभिधान किया जाय। प्रथम उपपत्ति है—शङ्कापूर्वक छाया-निर्देश का निरास और दूसरी उपपत्ति है—प्रत्यभिज्ञा। छाया-पुरुष अस्थायी है, किन्तु यह आत्मा प्रत्यभिज्ञा प्रमाण के द्वारा स्थायी सिद्ध होता है। "नाह खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानाति—अयमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि"—इस श्रुति का अर्थ यह है कि 'अयं सुषुप्तः, सम्प्रति सुषुप्तावस्थायाम्, अहमात्मानमहंकारास्पद्मात्मानं न जानाति' अर्थात् यह सुषुप्त पुरुष सुषुप्ति अवस्था में अहङ्कारास्पद आत्मा को नहीं जानता। आत्मा को कैसा नहीं जानते ? इस प्रश्न का उत्तर है—"अयमहमस्मि इमानि भूतानि च" अर्थात् जागरण और स्वप्न की अवस्थाओं में जैसा ज्ञान आत्मा और अनात्मा का होता है, सुषुप्ति में वैसा ज्ञान नहीं होता। "न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्"—