भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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दहराकाशस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३५१

णोपार्जितत्वात् । भक्त्या च तस्य ब्रह्मशब्दवाच्यत्वम् । नहि परस्य ब्रह्मणः शरीरेण स्वस्वामिभावः संबन्धोऽस्ति । तत्र पुरस्वामिनः पुरैकदेशेऽवस्थानं दृष्टं, यथा राज्ञः ।

भामती

असाधारणेन हि व्यपदेशा भवन्ति । तद्यथा क्षितिजलपवनबीजादिसामग्रीसमवधानजन्माऽप्य- ङ्कुरः शालिबीजेन व्यपदिश्यते शाल्यङ्कुर इति । न तु क्षित्यादिभिः, तेषां कार्यान्तरेष्वपि साधार- ण्यात् । तदिह शरीरं ब्रह्मविकारोऽपि न ब्रह्मणा व्यपदेष्टव्यम् । ब्रह्मणः सर्वविकारकारणत्वेनातिसाधा- रण्यात् । जीवभेदधर्माधर्मोपार्जितं तदित्यसाधारणकारणत्वाज्जीवेन व्यपदिश्यत इति युक्तम् । अपि च ब्रह्मपुर इति सप्तम्यधिकरणे स्मर्यते, तेनाधेयेनानेन सम्बद्धव्यम् । न च ब्रह्मणः स्वे महिम्नि व्यवस्थित- स्यानाधेयस्याधारसम्बन्धः कल्पते । जीवस्त्वाराग्रमात्र इत्याधेयो भवति । तस्मात् ब्रह्मशब्दो रूढिं परि- त्यज्य देहादिवृंहणतया जीवे यौगिको वा भाक्तो वा व्याख्येयः । चैतन्यं च भक्तिः । उपधानानुपधाने तु विशेषः । ॐ वाच्यत्वं ॐ गम्यत्वम् । स्यादेतत् जीवस्य पुरं भवतु शरीरं, पुण्डरीकदहरगोचरता त्वन्यस्य भविष्यति, वत्सराजस्य पुर इवोज्जयिन्यां मैत्रस्य सद्मेत्यत आह ॐ तत्र पुरस्वामिन इति ॐ ।

भामती-व्याख्या

क्योंकि जीव परिच्छिन्न होने से आधेय और शरीर उसका अधिकरण है एवं जीव में ही यह विशेषता है कि वह अपने अदृष्टों के द्वारा इस शरीर का उपार्जन करता है । इसके विपरीत इस शरीर के साथ ब्रह्म का स्वस्वामिभावरूप सम्बन्ध नहीं बनता, क्योंकि ब्रह्म न तो परिच्छिन्न है और न अपने अदृष्टों के द्वारा शरीर का उपार्जक । दूसरी बात यह भी है कि जीव शरीर का विशेष सम्बन्धी है और ब्रह्म साधारण सम्बन्धी, 'असाधारण्येन व्यपदेशा भवन्ति'—इस न्याय के अनुसार जैसे शालीअंकुर (धान के अंकुर) के साथ शाली का विशेष सम्बन्ध होने के कारण उस अंकुर को 'शाल्यंकुरः' कहते हैं, 'क्षित्यंकुरः' या 'सलिलांकुरः' नहीं, क्योंकि क्षित्यादि के साथ उसका साधारण सम्बन्ध होता है, असाधारण नहीं । वैसे ही यह शरीर ब्रह्म का विकार (कार्य) होने पर भी 'ब्रह्मणः शरीरम्'—ऐसा नहीं कहला सकता, क्योंकि ब्रह्म समस्त विकार का साधारण कारण है किन्तु जीव इस शरीर का विशेष सम्बन्धी है, क्योंकि इस शरीर में रहनेवाले जीव ने इस शरीर का अपने अदृष्टों के द्वारा उपार्जन किया है, अतः इस शरीर को 'जीवशरीरम्' कहने के लिए 'ब्रह्मपुरम्' कह दिया गया है । दूसरी बात यह भी है कि 'ब्रह्मपुरे' यहाँ पर सप्तमी विभक्ति अधिकरणार्थ में विहित है, अतः आधेयरूप जीव के साथ ही इसका सम्बन्ध होना चाहिए, ब्रह्म के साथ नहीं, क्योंकि ब्रह्म स्वमहिमा में अवस्थित होने से किसी का आधेय नहीं । जीव का स्वरूप आरा की नोक के समान परिच्छिन्न कहा गया है, अतः वह आधेय हो सकता है, अतः 'ब्रह्मपुरे' यहाँ 'ब्रह्म' शब्द अपने रूढ अर्थ का परित्याग करके जीव में बृंहणकर्तृत्वेन यौगिक अथवा गौण मानना उचित है, ब्रह्म का चैतन्यरूप ही वह भक्ति (गुण) है, जिसके सम्बन्ध से जीव को ब्रह्म कह दिया गया है । ब्रह्म और जीव में चैतन्य की समानता होने पर भी निरुपाधित्व और सोपाधिकत्व की विशेषता है, अतः निरुपाधिक परतत्त्व का वाचक 'ब्रह्म' शब्द गौणी वृत्ति से जीव का बोधकमात्र है, वाचक नहीं । भाष्यकार ने जो कहा है—“तस्य ब्रह्मशब्द- वाच्यत्वम्” । वहाँ वाच्यत्व का तात्पर्य बोध्यत्व में ही है ।

शङ्का—इस शरीर को भले ही जीव का पुर (नगर) मान लिया जाय और इसकी संज्ञा 'ब्रह्मपुरम्' रख दी जाय किन्तु हृदय कमलगत 'दहराकाश' शब्द से जीव से भिन्न ब्रह्म का ही ग्रहण किया जायगा, क्योंकि जैसे महाराज वत्सराज के उज्जयिनी नगर में वत्सराज से भिन्न मैत्रादि का महल होता है, वैसे ही जीव के शरीररूप पुर (नगर) में जीव से भिन्न