भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ १ पा. ३ सू. १४
मनउपाधिकश्च जीवः, मनश्च प्रायेण हृदये प्रतिष्ठितमित्यतो जीवस्यैवेदं हृदयेऽन्तरवस्थानं स्यात् । दहरत्वमपि तस्यैव आराग्रोपमितत्वादवकल्पते । आकाशोपमितत्वादिश्च ब्रह्माभेदविवक्षया भविष्यति । न चात्र दहरस्याकाशस्यान्वेष्टव्यत्वं विजिज्ञासितव्यत्वं च श्रूयते । 'तस्मिन्यदन्तः' इति परविशेषणत्वेनोपादानादिति ।
अत उत्तरं ब्रूमः - परमेश्वर एवात्र दहराकाशो भवितुमर्हति, न भूताकाशो जीवो वा । कस्मात् ? उत्तरेभ्यो वाक्यशेषगतेभ्यो हेतुभ्यः । तथाहि अन्वेष्टव्यतयाऽभिहितस्य दहरस्याकाशस्य 'तं चेद् ब्रूयुः' इत्युपक्रम्य किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यम् इत्येवमाक्षेपपूर्वकं प्रतिसमाधानवचनं भवति - 'स ब्रूयाद्यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते' (छा० ८।१।३) इत्यादि । तत्र पुण्डरीकदहरत्वेन प्राप्तदहरत्वस्याकाशस्य
भामती
अयमर्थः - वेश्म खल्वधिकरणमनिर्दिष्टधेयमाधेयविशेषापेक्षायां पुरस्वामिनः प्रकृतत्वात्तेनैवाधेयेन सम्बद्धं सदनपेक्षं नाधेयान्तरेण सम्बन्धं कल्पयति । ननु तथापि शरीरमेवास्य भोगायतनमिति को हृदयपुण्डरीकेऽस्य विशेषो यत्तदेवास्य सद्मेत्यत आह ॐ मन उपाधिकश्च जीवः इति ॐ । ननु मनोऽपि चलतया सकलदेहवृत्ति पर्यायेणेत्यत आह ॐ मनश्च प्रायेण इति ॐ । आकाशशब्दश्चारूपत्वादिना सामान्येन जीवे भाक्तः । अस्तु वा भूताकाश एवायमाकाशशब्दो दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश इति, तथाप्यदोष इत्याह ॐ न चात्र दहरस्य आकाशस्य अन्वेष्टव्यत्वम् इति ॐ ।
एवं प्राप्ते उच्यते - भूताकाशस्य तावन्न दहरत्वं यावान्वाऽयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश इत्युपमानविरोधात् । तथाहि -
भामती-व्याख्या
ब्रह्म का वेश्म (महल) पुण्डरीक-दहर हो सकता है।
समाधान — उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार कह रहे हैं— "तत्र पुरस्वामिनः पुरैकदेशेऽवस्थानं दृष्टम्"। आशय यह है कि उक्त श्रुति में निर्दिष्ट 'वेश्म' शब्द एक ऐसे आधार को उपस्थित कर रहा है, जो अपने आधेय की अपेक्षा करता है, पुर-स्वामी के रूप में जीव प्रस्तुत है, अतः जीवरूप आधेय से जुड़ कर वेश्मरूप आधार अन्य (ब्रह्मरूप) आधेय का कल्पक नहीं हो सकता। यह जो प्रश्न उठता है कि शरीर तो जीव का भोगायतन है, अतः शरीररूप पुर के साथ उसका सम्बन्ध सम्भव है किन्तु हृदयपुण्डरीक के साथ उसका क्या संबंध ? उस प्रश्न का उत्तर है— "मन उपाधिकश्च जीवः, मनश्च प्रायेण हृदये प्रतिष्ठितम्"। यद्यपि मन चलायमान है, शरीर के कोने-कोने में घूमता रहता है, तथापि हृदय में उसका अधिक निवास रहता है। 'दहर' पद तो परिच्छिन्न जीव का निसर्गतः बोधक है और 'आकाश' शब्द भी स्ववाच्य (भूताकाश) में वर्तमान अरूपत्वादि गुण के योग से जीव का गमक हो सकता है। अथवा "दहरेऽस्मिन्नन्तराकाशः"—यहाँ पर 'आकाश' शब्द भूताकाश का ही वाचक है, फिर भी कोई दोष नहीं, क्योंकि वहाँ दहराकाश को अन्वेष्टव्य नहीं माना गया है कि उससे ब्रह्म की उपस्थिति करानी आवश्यक हो, किन्तु उस भूताकाश के अन्तःस्थित तत्त्व को अन्वेष्टव्य कहा गया है, वह उससे भिन्न हो सकता है।
सिद्धान्त — सर्वप्रथम भूताकाश में दहरत्व ही नहीं बनता, क्योंकि "यावान् वा अयमाकाशः, तावान् एषोऽन्तर्हृदये आकाशः" (छां० ८।१।३) इस श्रुति में उसको व्यापक उपमान के रूप में वर्णित किया गया है, अतः उसे दहर (परिच्छिन्न या अव्यापक) कहना विरुद्धाभिधान हो जाता है। अर्थात्—