भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३८० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. २४

'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति' इति श्रूयते। तथा 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः। ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्व एतद्वै तत्' (का० २।४।१३) इति च। तत्र योऽयमङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः श्रूयते, स किं विज्ञानात्मा, किंवा परमात्मेति संशयः। तत्र परिमाणोपदेशात्तावद्विज्ञानात्मेति प्राप्तम्। न ह्यनन्तायामविस्तारस्य परमात्मनोऽङ्गुष्ठपरिमाणमुपपद्यते। विज्ञानात्मनस्तूपाधिमत्त्वात्संभवति कयाचित्क-


भामती

किमङ्गुष्ठमात्रश्रुत्यनुग्रहाय जीवोपासनापरमेतद्वाक्यमस्तु, तदनुरोधेन चेशानश्रुतिः कथञ्चिद्व्याख्यायताम्, आहोस्वदीशामश्रुत्यनुग्रहाय ब्रह्मपरमेतदस्तु, तदनुरोधेनाङ्गुष्ठमात्रश्रुतिः कथञ्चिन्नींयताम्, तत्रान्यतरस्यान्यतरानुरोधविषये प्रथमानुरोधो न्याय्य इत्यङ्गुष्ठश्रुत्यनुरोधेनेशानश्रुतिर्ने॑तव्या। अपि च युक्तं हृत्पुण्डरीकदहरस्थानस्वं परमात्मनः, स्थानभेदनिवेशात्। तद्धि तस्योपलब्धिस्थानं शालग्राम इव कमलनाभस्य भगवतः। न च तथेहाङ्गुष्ठमात्रश्रुत्या स्थानभेदो निर्दिष्टः, परिमाणमात्रनिर्देशात्। न च मध्य आत्मनीत्यत्र स्थानभेदोऽवगम्यते। आत्मशब्दो ह्ययं स्वभाववचनो वा जीववचनो वा ब्रह्मवचनो वा स्यात्। तत्र स्वभावस्य स्वभवित्रधीननिरूपणतया स्वस्य च भवितुरनिर्देशान्न ज्ञायते कस्य मध्य इति। न च जीवपरयोरस्ति मध्यमंक्षसेति नैव स्थाननिर्देशो विस्पष्टः, स्पष्टस्तु परिमाणनिर्देशः। परिमाणभेदश्च परस्मिन्न


भामती-व्याख्या

पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः' (कठो० २।४।१३) इत्यादि श्रुतियों में 'अङ्गुष्ठमात्र' शब्द का अर्थ विचारणीय है।

संशय— उक्त श्रुतियों में जीवात्मा और परमात्मा का संशय इसलिए हो गया कि—

नाञ्जसा मानभेदोऽस्ति परस्मिन् मानवर्जिते।
भूतभव्येशिता जीवे नाञ्जसी तेन संशयः ॥

अर्थात् यदि यहाँ परमात्मा (ब्रह्म) का ग्रहण किया जाता है, तब उसमें श्रुति-प्रतिपादित अङ्गुष्ठमात्रता रूप परिमाण विशेष का सामंजस्य नहीं होता, क्योंकि ब्रह्म को परिमाणातीत माना जाता है और यदि जीव का ग्रहण किया जाता है, तब उसमें 'ईशानो भूतभव्यस्य'—इस प्रकार कथित भूत-भावी सकल प्रपञ्च की ईशिता (शासकता) नहीं घटती। अतः यहाँ सन्देह हो जाता है कि क्या उक्त श्रुति-वाक्यों में कथित अङ्गुष्ठमात्र परिमाण के बल पर जीव का उपास्यत्वेन प्रतिपादन मानकर जीव में भूत-भावी जगत् की ईशिता का कथञ्चित् समन्वय किया जाय ? अथवा मुख्य ईशितृत्व के अनुरोध पर ब्रह्म का प्रतिपादन मानकर ब्रह्म में औपाधिक रूप से अङ्गुष्ठमात्रता का समन्वय किया जाय ?

पूर्वपक्ष—जहाँ दो वाक्यों में परस्पर अनुरोध की अपेक्षा होती है, वहाँ प्रथम वाक्य का अनुरोध पहले न्यायोचित माना जाता है, अतः अङ्गुष्ठमात्रता का मुख्यरूप से सामञ्जस्य करने के लिए जीव का प्रतिपादन मान कर भूत-भावी प्रपञ्च की ईशिता का जीव में ही समन्वय किया जाना उचिततर है। इतना ही नहीं, यहाँ परमात्मा का प्रतिपादन मानने पर विगत दहराधिकरण से पुनरुक्ति भी हो जाती है, क्योंकि जैसे दहर (स्वल्प) परिमाण के हृदय में उपलब्ध होने के कारण ब्रह्म को दहराकाश कहा जा सकता है, वैसे ही अङ्गुष्ठमात्र परिमाण के हृदय में उपास्य होने के कारण ब्रह्म को 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः' कहा जा सकता है, उपलब्धि-स्थान में उपलभ्यमान का व्यवहार शालग्राम में विष्णु-व्यवहार के समान लोकप्रसिद्ध है।

प्रकृत में 'अंगुष्ठमात्र' शब्द के द्वारा किसी उपलब्धि-स्थान का निर्देश नहीं, अपितु परिमाण-विशेष का उल्लेख किया गया है। 'मध्य आत्मनि'—इस वाक्य के द्वारा भी किसी