भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| [ अङ्गुष्ठमात्रपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ३८१ |
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ल्पनायाऽङ्गुष्ठमात्रत्वम्। स्मृतेश्च—'अथ सत्यवतः कायात्पाशबद्धं वशं गतम्। अङ्गुष्ठ- मात्रं पुरुषं निष्ककर्ष यमो बलात्॥' (म० भा० ३।२९७।१७) इति। नहि परमेश्वरो बलाद्यमेन निष्क्रष्टुं शक्यः। तेन तत्र संसार्यङ्गुष्ठमात्रो निश्चितः, स एवेहापीत्येवं
भामती सम्भवतीति जीवात्मैवाङ्गुष्ठमात्रः, स खल्वन्तःकरणाद्युपाधिकल्पितो भागः परमात्मनः अन्तःकरणञ्च प्रायेण हृत्कमलकोशस्थानं, हृत्कमलकोशश्च मनुष्याणामङ्गुष्ठमात्र इति तदवच्छिन्नो जीवात्माप्यङ्गुष्ठ- मात्रो नभ इव वंशपर्वावच्छिन्नमरत्निमात्रम्। अपि च जीवात्मनः स्पष्टमङ्गुष्ठमात्रत्वं स्मर्यते—'अङ्गुष्ठ- मात्रं पुरुषं निष्ककर्ष यमो बलात्।' इति। नहि सर्वेशस्य ब्रह्मणो यमेन बलात्निष्कर्षः कल्पते। यमो हि जगौ—'हरिगुरुवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः' इति। तेनाङ्गुष्ठमात्रत्वस्य जीवे निश्चयाद् आपेक्षिकं किञ्चिद् भूतभव्यं प्रति जीवस्येशानत्वं व्याख्येयम्। एतद्वै तदिति च प्रत्यक्षजीवरूपं परामृशतीति। तस्माज्जीवात्मैवात्रोपास्य इति प्राप्तेऽभिधीयते —
भामती-व्याख्या स्थान विशेष की अवगति नहीं होती, क्योंकि वहाँ 'आत्म' शब्द या तो स्वभावार्थक होगा, या जीवार्थक. अथवा ब्रह्माभिधायी। उनमें स्वस्य भाव, स्वभावः'—इस व्युत्पत्ति के अनुसार स्वभाव एक ऐसा धर्म है, जो कि 'स्व' शब्द से अभिमत धर्मी ( भविता ) की अपेक्षा करता है, किन्तु किसी धर्मी का निर्देश न होने के कारण यह नहीं जाना जा सकता कि 'मध्ये स्वभावे' - यहाँ किसके भाव का मध्य विवक्षित है ? जीवात्मा और परमात्मा दोनों निरंश हैं. अतः उनमें मध्यता ( मध्यभागता ) का सामञ्जस्य नहीं हो सकता। फलतः 'मध्ये आत्मनि' - इस वाक्य के द्वारा किसी स्थान ( उपलब्धि-केन्द्र) का निर्देश नहीं हो सकता। हाँ, 'अंगुष्ठमात्रः' पद के द्वारा परिमाणविशेष का उल्लेख अत्यन्त स्पष्ट है। अंगुष्ठमात्रतारूप परिमाणविशेष परमात्मा का सम्भव नहीं, अतः जीवात्मा ही 'अंगुष्ठमात्रः पुरुषः' कहा गया है, क्योंकि वह (जीव) ब्रह्म का अन्तःकरणरूप उपाधि से कल्पित (अवच्छिन्न) एक भाग है। अन्तःकरणरूप आन्तर इन्द्रिय का हृदय गोलक है और मनुष्यों का हृदय प्रायः उनके अंगूठे के परिमाण का होता है, अतः उस (हृदय-कमलस्थ अन्तःकरण) से अवच्छिन्न जीव भी अंगुष्ठमात्र वैसे ही कहा जाता है, जैसे अरत्नि मात्र ( कनिष्ठिका को सीधा रखते हुए मुष्टि-बन्धे हाथ के परिमाणवाली) बाँस की पोरी से अवच्छिन्न आकाश को अरत्निमात्र।
इतना ही नहीं महाभारतगत सत्यवान् के उपाख्यान में जीवात्मा को स्पष्टरूप से अंगुष्ठमात्र कहा गया है—
ततः सत्यवतः कायात् पाशबद्धं वशंगत:। अंगुष्ठमात्रं पुरुषं निष्ककर्ष यमो बलात्॥ (म. भार. ३।१९७।१७)
अर्थात् यमराज ने पाश में बन्धे हुए सत्यवान् के शरीर से अंगूठे मात्र के जीवात्मा को बलपूर्वक खींच कर निकाल लिया। ब्रह्म का किसी शरीर से खींच कर निकालना सम्भव नहीं, क्योंकि वहाँ यमराज ने ही कहा है — "प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः" ( ) अर्थात् परमेश्वर तो हमारा ( यम का ) भी नियमन करता है, वह किसी के भी नियन्त्रण में नहीं, सर्वथा स्वतन्त्र है। फलतः अंगुष्ठमात्रता जीव में ही पर्यवसित होती है, उसके अनुरोध पर यत्किञ्चित् भूतादि पदार्थों की ईशानता ( शासकता) जीव में घटाई जा सकती है या ध्यान के लिए सर्वेशिता का निर्देश माना जा सकता है। दूसरी बात यह भी है कि "एतद्वै तत्" (कठो. २।४।१३) इस वाक्य के द्वारा प्रत्यक्षतः जीव का परामर्श किया गया है, क्योंकि उसके पूर्व "येयं प्रेते विचिकित्सा"—इस प्रकार जीव के विषय में ही सन्देह प्रस्तुत किया गया है।